राख से उठी चिंगारी: एक अधूरी दास्तान जो पूरी हुई
“क्या तुम सच में सोचती हो कि साठ साल की उम्र में तुम यह कर पाओगी? लोग हसेंगे हम पर, सुमित्रा। अब उम्र पूजा-पाठ की है, कंपनी चलाने की नहीं।”
जब मेरे पति, रघुनाथ जी ने यह बात ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठकर कही, तो उनके हाथ में अखबार था और चेहरे पर वही पुरानी व्यंग्यात्मक मुस्कान। वह मुस्कान, जिसने पिछले पैंतीस सालों से मेरे हर सपने, हर इच्छा और हर आवाज को कुचल दिया था। कमरे में मेरे बेटे और बहू भी बैठे थे। वे चुप थे। शायद इसलिए कि इस घर में पिता के खिलाफ बोलने का रिवाज नहीं था, या शायद इसलिए कि उन्हें भी लगता था कि ‘मां तो बस मां है’, वह भला बिजनेस वुमन कैसे बन सकती हैं?
लेकिन उस दिन, मैंने पलटकर जवाब नहीं दिया। मैंने बस अपनी फाइल उठाई, जिसमें ‘सुमित्रा मसाले’ का रजिस्ट्रेशन पेपर था, और चुपचाप अपने कमरे में चली गई। उन्हें नहीं पता था कि जिस औरत को वे सिर्फ रसोई तक सीमित समझते थे, उसने अपनी रसोई को ही अपना हथियार बना लिया था।
.
.
.
मेरा नाम सुमित्रा देवी है। उम्र 62 वर्ष। बनारस के एक पुराने मोहल्ले में रहती हूँ। लोग मुझे ‘रघुनाथ जी की पत्नी’ या ‘विक्की की माँ’ के नाम से जानते थे। मेरी अपनी कोई पहचान नहीं थी। सुबह 5 बजे उठना, चाय बनाना, नाश्ता तैयार करना, घर की सफाई, और फिर रात को सबके सोने के बाद सोना—यही मेरी जिंदगी थी।
शादी के वक़्त मैं बीए पास थी। हिंदी साहित्य में मेरी बहुत रुचि थी। मैं लेखिका बनना चाहती थी। लेकिन रघुनाथ जी का परिवार रूढ़िवादी था। “हमारे घर की बहुएं बाहर काम नहीं करतीं,” यह कहकर मेरी कलम छीन ली गई। मुझे याद है, शादी के एक हफ्ते बाद ही उन्होंने मेरी डायरी रद्दी वाले को दे दी थी। उस दिन मैं बहुत रोई थी, लेकिन आंसुओं का किसी पर कोई असर नहीं हुआ। धीरे-धीरे, मैंने सपने देखना छोड़ दिया। मैं एक आदर्श पत्नी और माँ बन गई।

लेकिन, दस साल पहले कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। रघुनाथ जी को दिल का दौरा पड़ा था। वह तीन महीने बिस्तर पर रहे। घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। उनकी दवाईयों का खर्च, बेटे की पढ़ाई, घर का राशन—सब कुछ मुश्किल हो गया था। रघुनाथ जी बीमारी में और भी चिड़चिड़े हो गए थे। वह हर बात पर मुझे ताना मारते, “तुम क्या जानो पैसे कैसे कमाए जाते हैं? तुम तो मुफ्त की रोटियां तोड़ती हो।”
वह बात मेरे दिल में तीर की तरह चुभ गई थी। ‘मुफ्त की रोटियां?’ मैंने अपना पूरा जीवन, अपनी जवानी, अपने सपने इस घर को दे दिए, और बदले में मुझे यह सुनने को मिला? उस रात मैंने फैसला किया कि अब बहुत हो गया।
मेरे पास कोई बड़ी डिग्री नहीं थी, कोई अनुभव नहीं था। लेकिन मेरे पास एक हुनर था—मसाले बनाने का। मेरी माँ ने मुझे सिखाया था कि मसालों को सही अनुपात में कैसे मिलाया जाता है। अचार और पापड़ बनाने में मेरा कोई सानी नहीं था।
मैंने चुपके से काम शुरू किया। मैंने अपने गहने गिरवी रखकर थोड़े पैसे जुटाए और कच्चा माल मंगवाया। जब रघुनाथ जी सो जाते, तो मैं रात भर जागकर मसाले कूटती और अचार बनाती। सुबह होते ही सब कुछ छिपा देती। मैंने अपने मोहल्ले की कुछ गरीब और जरूरतमंद महिलाओं को साथ जोड़ा। वे मसाले पैकेट में भरतीं और आस-पास की दुकानों पर बेचने लगीं।
शुरुआत धीमी थी। दुकानदार मना कर देते थे। लोग कहते थे, “बुढ़िया का मसाला कौन खरीदेगा?” लेकिन स्वाद में दम था। धीरे-धीरे मांग बढ़ने लगी। जो दुकानदार पहले भगा देते थे, वे अब एडवांस ऑर्डर देने लगे।
यह सब पिछले दस सालों से चल रहा था, रघुनाथ जी की नजरों से दूर। वह ठीक हो गए थे और फिर से अपनी पुरानी रोबदार जिंदगी जीने लगे थे। उन्हें लगता था कि घर का खर्च उनकी पेंशन से चल रहा है। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनकी पेंशन तो सिर्फ दवाइयों में ही खत्म हो जाती थी; घर का असली खर्च, बिजली का बिल, और यहां तक कि पोते की स्कूल फीस भी मेरी ‘गुप्त कमाई’ से जा रही थी।
कहानी आज के दिन पर आती है। आज मेरी कंपनी को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) ने खरीदने का प्रस्ताव दिया था। वे मेरे ब्रांड ‘सुमित्रा मसाले’ के साथ पार्टनरशिप करना चाहते थे और मुझे 2 करोड़ रुपये और कंपनी में 40% हिस्सेदारी दे रहे थे। आज मुझे दिल्ली जाना था, उस एग्रीमेंट पर साइन करने।
रघुनाथ जी ने जब मुझे तैयार होते देखा, तो पूछा, “कहाँ जा रही हो इस उम्र में सज-धज कर?” मैंने कहा, “दिल्ली। एक काम है।” उन्होंने हँसते हुए कहा, “दिल्ली? रास्ता भी पता है? खो जाओगी। बैठो घर पर।”
तभी दरवाजे पर एक बड़ी कार आकर रुकी। उसमें से दो लोग कोट-पैंट पहने निकले। वे मेरे घर के अंदर आए और मेरे सामने झुककर नमस्कार किया। “सुमित्रा मैम, गाड़ी तैयार है। हमें निकलना होगा, फ्लाइट का टाइम हो रहा है,” उनमें से एक ने कहा।
रघुनाथ जी, मेरा बेटा और बहू—सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं। रघुनाथ जी ने हकलाते हुए पूछा, “ये… ये कौन हैं? और तुम्हें ‘मैम’ क्यों कह रहे हैं?”
मैंने अपना पर्स उठाया और उनकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “रघुनाथ जी, पिछले दस सालों से जिस घर में आप ‘मुफ्त की रोटियां’ खाने का ताना देते थे, उस घर की छत मेरी कमाई से ही टिकी है। यह ‘सुमित्रा मसाले’ की मालकिन सुमित्रा देवी हैं, आपकी पत्नी नहीं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। ऐसा सन्नाटा जिसे काटा जा सकता था। मैंने अपनी बात जारी रखी, “आपने हमेशा कहा कि मेरा दायरा रसोई तक है। आप सही थे। मैंने उसी रसोई से अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया। आज मैं दिल्ली जा रही हूं, अपनी पहचान पर मुहर लगाने। और हां, अब मुझे आपकी इजाजत की जरूरत नहीं है।”
मैं बाहर निकल गई। कार में बैठते ही मैंने पीछे मुड़कर देखा। रघुनाथ जी दरवाजे पर खड़े थे, एकदम छोटे और बेबस लग रहे थे। वही आदमी जो कल तक मुझे चींटी समझकर मसलने की बात करता था, आज मेरी उड़ान देखकर पत्थर हो गया था।
रास्ते में मुझे याद आया कि कैसे रातों को जब मेरी उंगलियां मसाले कूटते-कूटते सूज जाती थीं, तो मैं खुद को समझाती थी। कैसे जब मसाले की मिर्च से आँखों में पानी आता था, तो मैं उसे अपने आंसुओं के साथ पोंछ लेती थी। यह सफर आसान नहीं था।
दिल्ली में मीटिंग बहुत सफल रही। जब मैंने कागजों पर साइन किए, तो मेरे हाथ कांप नहीं रहे थे। मुझे अपनी ताकत का अहसास हो रहा था। वहां मौजूद बड़े-बड़े बिजनेसमैन मेरे लिए तालियां बजा रहे थे। एक पत्रकार ने मुझसे पूछा, “मैम, आपकी सफलता का राज क्या है?”
मैंने माइक हाथ में लिया और कहा, “मेरी सफलता का राज एक ‘ताना’ है। मेरे पति का वो ताना कि मैं कुछ नहीं कर सकती। कभी-कभी हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन की नहीं, बल्कि अपमान की जरूरत होती है। अपमान वह आग है जो आपको जला सकती है या कुंदन बना सकती है। मैंने जलना नहीं, चमकना चुना।”
जब मैं वापस लौटी, तो घर का माहौल बदला हुआ था। मेरा बेटा, जो कभी मुझसे ढंग से बात नहीं करता था, मेरे लिए पानी लेकर आया। बहू ने मेरे पैर छुए। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव रघुनाथ जी में था। वह कोने वाली कुर्सी पर बैठे थे, सिर झुकाए हुए।
मैं उनके पास गई। उन्होंने धीरे से सिर उठाया। उनकी आँखों में अब वो पुराना अहंकार नहीं था। वहां शर्मिंदगी थी। “मुझे माफ़ कर दो, सुमित्रा,” उनकी आवाज़ भर्राई हुई थी। “मैं तुम्हें कभी समझ नहीं पाया। मैं हमेशा खुद को घर का मुखिया समझता रहा, लेकिन असली नींव तुम थीं।”
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “माफ़ी की जरूरत नहीं है। बस इतना समझ लीजिए कि औरत को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए। वह अगर घर बना सकती है, तो अपनी दुनिया भी बना सकती है। और रही बात मुखिया होने की, तो घर किसी एक पहिये से नहीं चलता। आपने अपना फ़र्ज़ निभाया, मैंने अपना।”
उस रात, मैंने अपनी पुरानी डायरी फिर से निकाली। वही डायरी जो शादी के बाद उन्होंने रद्दी में देने की कोशिश की थी, लेकिन मैंने छिपा ली थी। मैंने उस पर जमी धूल झाड़ी और नया पन्ना खोला।
आज मैंने लिखा: “उम्र सिर्फ एक नंबर है। सपने देखने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। पिंजरा चाहे सोने का हो या लोहे का, पंछी को उड़ना ही शोभा देता है। आज मैंने अपनी उड़ान भर ली है।”
यह कहानी उन सभी महिलाओं के लिए है जो सोचती हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है। जो अपने पतियों, बच्चों या समाज के ताने सुन-सुनकर अंदर ही अंदर घुट रही हैं। मैं उनसे कहना चाहती हूँ—उठो। अपनी रसोई, अपनी सिलाई मशीन, अपनी कलम—जो भी तुम्हारे पास है, उसे अपना हथियार बनाओ।
दुनिया तुम्हें तब तक नहीं पूछेगी जब तक तुम खुद को नहीं पूछोगी। सम्मान मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है। और यकीन मानिए, जिस दिन आप अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी, उस दिन वही लोग आपके लिए तालियां बजाएंगे जो आज आप पर हंसते हैं।
जीवन के इस पड़ाव पर, मैं खुश हूँ। सिर्फ पैसों की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि अब जब मैं आईने में देखती हूँ, तो मुझे एक लाचार पत्नी नहीं, एक सफल और स्वाभिमानी औरत दिखाई देती है।
अगर आपके अंदर भी कोई चिंगारी दबी है, तो उसे हवा दीजिए। उसे आग बनने दीजिए। क्योंकि राख के नीचे दबी आग जब भड़कती है, तो जंगल के जंगल रोशन कर देती है।
आपकी, सुमित्रा।
News
“5 साल बाद जब IPS पत्नी झोपड़ी लौटी, तो सामने खड़ा सच उसे तोड़ गया… फिर जो हुआ
झोपड़ी का प्यार, वर्दी का अहंकार और 5 साल बाद का खौफनाक सच: रमेश और आईपीएस रश्मि की झकझोर देने…
अमीर लड़की की ज़िद और भिखारी के आँसू: बीच सड़क पर जब लड़की ने भिखारी को गले लगाया, तो रो पड़ा पूरा देश।
इंसानियत की जीत: जब एक भिखारी बना करोड़ों के ट्रस्ट का चेयरमैन प्रस्तावना: दिल्ली की एक ठंडी शाम और किस्मत…
गरीब लड़के ने करोड़पति लड़की की जान बचाई… फिर लड़की ने जो किया, इंसानियत रो पड़ी 😢
इंसानियत की कोई कीमत नहीं: जब एक गरीब लड़के ने बचाई करोड़पति की जान प्रस्तावना: दिल्ली की एक खामोश रात…
जिस पागल को लोग पत्थर मारते थे, उसकी झोपड़ी के सामने रुकीं 50 लाल बत्ती की गाड़ियां 😱
पागल मास्टर: कचरे से निकले हीरों और एक गुरु के बलिदान की अमर गाथा प्रस्तावना: एक अनजाना मसीहा और समाज…
कल तक जिसकी कोई कीमत नहीं थी… आज वही करोड़ों की मालकिन के सामने खड़ा था—अंजाम सुनकर रो पड़ोगे।
झोपड़ी से दिल के महल तक: राजू और प्रिया की एक अनकही दास्तान प्रस्तावना: लखनऊ की पटरियाँ और एक अनजाना…
जिस पति ने कुली बनकर पत्नी को पढ़ाया, उसी ने TT बनते ही पहचानने से मना कर दिया; फिर जो हुआ!
पसीने की कमाई और वर्दी का अहंकार: जब कुली पति को पहचानने से मुकर गई टीटी पत्नी प्रस्तावना: स्टेशन की…
End of content
No more pages to load






