हिंदू लड़के के साथ फरार हुई मुस्लिम लड़की, हिंदू पक्ष ने कहा—लड़की हमारी बेटी की तरह है, हम उसे वापस लेकर आएंगे।

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बेटी की तरह: जोगे खेड़े की पंचायत

1. गाँव की सुबह

मुजफ्फरनगर के जोगे खेड़े गाँव में सुबह की हल्की धुंध थी। खेतों में काम शुरू हो चुका था, लेकिन गाँव के चौपाल पर आज भीड़ थी। वजह थी एक घटना—एक मुस्लिम लड़की, आयशा, अपने हिंदू दोस्त अमित के साथ घर से भाग गई थी। दोनों अभी तक गायब थे। यह खबर पूरे इलाके में आग की तरह फैल गई थी।

आयशा के पिता, सलीम, और अमित के पिता, रमेश, दोनों परेशान थे। सलीम की आँखों में चिंता थी, रमेश की आँखों में डर। लेकिन सबसे ज्यादा बेचैनी गाँव के बुजुर्गों में थी।

2. पंचायत की तैयारी

सर्व समाज की पंचायत बुलाई गई थी। इसमें सभी धर्म, जाति, समुदाय के लोग थे—राजपूत, ब्राह्मण, सैनी, मुस्लिम, दलित सब। गाँव के प्रधान, सुरेश सिंह, ने कहा, “आज सिर्फ एक परिवार का मामला नहीं है, यह पूरे गाँव का मामला है।”

गाँव के चौपाल पर बड़ी सी चादर बिछाई गई। लोग बैठे थे, महिलाएँ खड़ी थीं, बच्चे दूर से देख रहे थे। माहौल गंभीर था।

3. घटना की चर्चा

पंचायत शुरू हुई। सलीम ने कहा, “मेरी बेटी आयशा नाबालिग है। उसे अमित बहला-फुसला कर ले गया है। मुझे नहीं पता वो कहाँ है, लेकिन मैं चाहता हूँ वह सकुशल लौट आए।”

रमेश ने सिर झुका कर कहा, “मुझे नहीं पता अमित ने क्या किया, लेकिन अगर उसने कोई गलती की है तो उसे सजा मिले।”

प्रधान बोले, “यह मामला दो समुदायों का है, लेकिन लड़की हमारी बेटी की तरह है। हम उसे वापस लाएँगे।”

4. समाज की भूमिका

राजपूत समाज के प्रतिनिधि बोले, “आयशा चाहे मुस्लिम परिवार की हो, लेकिन हमारे लिए वह बेटी है। उसे वापस लाना हमारा फर्ज है।”

ब्राह्मण समाज के पंडित जी बोले, “हमारे गाँव में कभी किसी की बेटी को पराया नहीं समझा गया। आयशा को परिवार को सौंपना हमारी जिम्मेदारी है।”

मुस्लिम समाज के मौलवी बोले, “हम चाहते हैं कि आयशा सही सलामत लौटे। उसके परिवार की इज्जत हमारी इज्जत है।”

5. समाज की चिंता

पंचायत में चर्चा हुई कि अगर आयशा कहती है, “मैं अमित के साथ रहना चाहती हूँ,” तो क्या होगा? प्रधान बोले, “लड़की नाबालिग है। कानून कहता है कि उसे परिवार को सौंपना चाहिए। चाहे वह कुछ भी कहे।”

महिलाएँ आपस में फुसफुसा रही थीं, “आजकल फोन की वजह से ये सब हो रहा है। बच्चों पर नजर रखनी चाहिए।”

एक बुजुर्ग बोले, “आजकल की बीमारी मोबाइल है। मां-बाप को चाहिए कि बच्चों पर निगाह रखें।”

6. पंचायत का फैसला

पंचायत ने सर्वसम्मति से फैसला लिया—आयशा को हर हाल में वापस लाना है। हिंदू समाज ने जिम्मेदारी ली कि वे आयशा को ढूंढकर लाएँगे और मुस्लिम परिवार को सौंपेंगे।

प्रधान ने कहा, “हम प्रशासन से मिलेंगे, पुलिस की मदद लेंगे। हमारी कोशिश होगी कि लड़की सही सलामत लौटे।”

7. प्रशासन की भूमिका

अगले दिन प्रधान, सलीम, रमेश और गाँव के कुछ बुजुर्ग जिला प्रशासन से मिलने गए। उन्होंने अफसर से कहा, “यह मामला सिर्फ दो परिवारों का नहीं, पूरे गाँव का है। हमें प्रशासन का साथ चाहिए।”

अफसर ने भरोसा दिलाया, “पुलिस जांच करेगी। दोनों बच्चों को ढूंढकर परिवार को सौंपा जाएगा।”

8. गाँव की चर्चा

गाँव में अफवाहें फैल रही थीं। कुछ लोग कह रहे थे, “लड़की अगर हिंदू के साथ भाग जाए तो जल्दी बरामद हो जाती है, लेकिन मुस्लिम के साथ भागे तो नहीं।” लेकिन इस बार हिंदू समाज ने पहल की थी—”हम आयशा को वापस लाएँगे।”

गाँव के युवाओं ने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली, “बेटी हमारी जिम्मेदारी है।”

9. खोज की शुरुआत

गाँव के युवाओं ने आयशा और अमित की तलाश शुरू की। पुलिस ने मोबाइल लोकेशन ट्रेस की। पता चला दोनों पास के शहर में एक लॉज में छुपे हैं।

गाँव के प्रधान, दो बुजुर्ग, और पुलिस टीम वहाँ पहुँची। आयशा डर गई थी, अमित घबराया हुआ था।

10. बातचीत और वापसी

प्रधान ने आयशा से कहा, “बेटी, घर चलो। तुम्हारे माता-पिता तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।”

आयशा रोने लगी, “मैं अमित से प्यार करती हूँ, पापा मुझे माफ कर दो।”

सलीम ने गले लगाया, “बेटी, घर चलो। तुम्हारा भला हम जानते हैं।”

पंचायत के सदस्यों ने अमित से कहा, “अगर तुम्हारी मंशा सही है तो कानून का रास्ता अपनाओ। लड़की नाबालिग है, अभी कोई फैसला नहीं हो सकता।”

11. पंचायत का दूसरा दौर

आयशा और अमित को गाँव लाया गया। पंचायत बैठी। दोनों परिवार, समाज के लोग, प्रधान, पुलिस सब मौजूद थे।

आयशा ने कहा, “मैं अमित के साथ रहना चाहती हूँ।” लेकिन पंचायत ने कहा, “तुम नाबालिग हो, तुम्हारा फैसला परिवार करेगा।”

अमित ने कहा, “मैं आयशा से शादी करना चाहता हूँ, लेकिन कानून का पालन करूंगा।”

12. समाज का संदेश

प्रधान बोले, “हमारे गाँव में बेटी की इज्जत सबसे ऊपर है। चाहे वह किसी भी धर्म की हो।”

मौलवी बोले, “हम चाहते हैं कि आयशा का भविष्य सुरक्षित रहे।”

पंडित जी बोले, “बेटी का भला परिवार ही जानता है।”

13. प्रशासन का अंतिम फैसला

पुलिस ने बयान लिया। आयशा को परिवार को सौंप दिया गया। प्रशासन ने कहा, “जब तक आयशा बालिग नहीं होती, कोई शादी, कोई फैसला नहीं होगा।”

गाँव के लोग बोले, “हम समाज में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जागरूकता फैलाएँगे।”

14. परिवार में बदलाव

सलीम ने अपनी बेटी को गले लगाया। “बेटी, हम तुम्हारे भले के लिए ही सब कर रहे हैं।”

रमेश ने अमित से कहा, “बेटा, प्यार गलत नहीं, लेकिन कानून का पालन करना जरूरी है।”

नेहा, अमित की बहन, आयशा से बोली, “हम तुम्हारे साथ हैं।”

15. गाँव में नई पहल

गाँव में महिला समूह बने, बच्चों को मोबाइल की सीमाएँ समझाई गईं। स्कूल में जागरूकता अभियान चला। पंचायत ने तय किया, “अगर कोई बच्चा घर से भागता है, तो पहले परिवार को सूचित किया जाएगा, पुलिस को नहीं।”

16. समाज में संदेश

गाँव के प्रधान ने सबको संबोधित किया, “बेटी किसी भी धर्म की हो, हमारी जिम्मेदारी है। समाज को मिलकर ऐसी घटनाओं को रोकना है।”

मौलवी बोले, “हम सबको मिलकर बच्चों की सुरक्षा के लिए काम करना है।”

पंडित जी बोले, “प्यार में गलत कुछ नहीं, लेकिन सही उम्र, सही वक्त, सही तरीका जरूरी है।”

17. अंत की सीख

आयशा अपने घर लौट आई। अमित ने स्कूल जाना शुरू किया। दोनों परिवारों में धीरे-धीरे रिश्ते सामान्य हुए। पंचायत ने समाज को संदेश दिया—”बेटी की सुरक्षा, सम्मान और भला सबसे ऊपर है।”

गाँव में फिर से शांति लौट आई। लोग कहते हैं, “जोगे खेड़े की पंचायत ने मिसाल कायम की।”

समाप्त