12 साल का लड़का और सेना का गुप्त मिशन

जंगल का रक्षक: एक प्राचीन रहस्य

अध्याय 1: बारिश और रेडियो की गूँज

अरुणाचल प्रदेश के घने और दुर्गम जंगलों में लगातार बारिश हो रही थी। यहाँ के पेड़ इतने ऊँचे और घने थे कि दिन में भी सूरज की रोशनी जमीन तक मुश्किल से पहुँच पाती थी। इसी जंगल के बीचों-बीच सागवान की लकड़ी से बनी एक छोटी सी झोपड़ी थी, जो अब वक्त के साथ पुरानी पड़ चुकी थी।

झोपड़ी के भीतर 12 साल का एक लड़का, आरव, मेज पर बिखरे हुए सर्किट बोर्डों और तारों के जाल में खोया हुआ था। वह कोई साधारण लड़का नहीं था। जब उसके हमउम्र बच्चे शहरों में वीडियो गेम खेल रहे थे, आरव यहाँ रेडियो फ्रीक्वेंसी और कोडिंग के गुर सीख रहा था। उसके दादाजी, जो सेना में एक कुशल तकनीशियन थे, ने उसे मशीनों की भाषा सिखाई थी। दादाजी दो साल पहले रहस्यमयी तरीके से गायब हो गए थे, और तब से आरव इस जंगल में अकेला ही रह रहा था।

उस रात, आसमान में बिजली कड़की और झोपड़ी की छत काँप उठी। अचानक, कोने में रखा एक पुराना रेडियो जो हफ्तों से बंद था, शोर करने लगा। आरव चौंक गया। उसने धीरे से उसकी घुंडी घुमाई। दूसरी तरफ से एक करक्ष और डरी हुई आवाज आई:

“चौकी डेल्टा… हम फंस गए हैं… संचार टूट गया है… जो कोई भी सुन रहा है… हमें मदद की जरूरत है!”

आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने उस कॉल साइन को पहचान लिया था। यह भारतीय सेना की फ्रीक्वेंसी थी। आरव जानता था कि वह चुप नहीं बैठ सकता। उसने अपना हाथ से बनाया हुआ एंटीना ठीक किया और जवाब दिया:

“चौकी डेल्टा, यहाँ जंगल का स्थानीय स्टेशन है। मुझे आपका सिग्नल मिल रहा है।”

अध्याय 2: जंगल का सफर और पहली मुलाकात

अगली सुबह का कोहरा अभी छंटा भी नहीं था कि आरव अपना बैग तैयार कर चुका था। उसके पास दादाजी का पुराना नक्शा, एक सिग्नल ट्रैकर और कुछ ‘फ्लेयर्स’ (प्रकाश संकेत) थे जो उसने कबाड़ से बनाए थे। आरव जंगल के चप्पे-चप्पे को जानता था। वह जानता था कि उत्तरी भाग में दलदल और गहरी खाइयाँ हैं, जहाँ कोई भी अनुभवी सैनिक रास्ता भटक सकता है।

करीब दो घंटे के कठिन सफर के बाद, आरव एक नदी के किनारे पहुँचा। उसने अपना नीला प्रकाश संकेत आसमान में छोड़ा। कुछ ही देर बाद झाड़ियों में हलचल हुई।

“हिलो मत!” एक सख्त आवाज आई।

दो सैनिक, कीचड़ से लथपथ और थके हुए, अपनी बंदूकें ताने बाहर निकले। आरव ने हाथ खड़े कर दिए।

“आप लोग चौकी डेल्टा से हैं?” आरव ने पूछा।

उनमें से एक, लेफ्टिनेंट अर्जुन, ने आरव को हैरानी से देखा। “तुमने कल रात संदेश भेजा था? हमने सोचा कि यह कोई दुश्मन का जाल है।”

“मैं यहीं रहता हूँ,” आरव ने शांति से कहा। “आप लोग रास्ता भटक गए हैं, और आपकी टीम के दो लोग भी लापता हैं, है ना? मुझे उनके निशान मिले हैं।”

सैनिकों को यकीन नहीं हुआ कि एक बच्चा इस खतरनाक इलाके में उनकी मदद कर सकता है, लेकिन आरव की आँखों में जो आत्मविश्वास था, उसने उन्हें चुप करा दिया।

अध्याय 3: कोहरे में छिपा रहस्य

जैसे-जैसे वे उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़े, आरव को कुछ अजीब महसूस हुआ। उसे मिट्टी पर ऐसे जूतों के निशान मिले जो सेना के नहीं थे।

“यहाँ कुछ और लोग भी हैं,” आरव ने फुसफुसाते हुए कहा। “वे न तो सैनिक हैं और न ही शिकारी। उनके पास बड़े-बड़े ट्रांसमीटर हैं।”

अर्जुन और भीम (हवलदार) सतर्क हो गए। उन्हें सूचना मिली थी कि एक विदेशी समूह इस क्षेत्र में कुछ अवैध खोज कर रहा है। रात गहरा गई थी और कोहरे ने सब कुछ ढक लिया था। तभी उन्हें दूर से एक नारंगी रोशनी दिखाई दी।

वे चुपचाप एक चट्टान के पीछे छिप गए। सामने एक गुप्त शिविर था। शिविर के बीचों-बीच एक विशाल, काले-चांदी रंग का पत्थर खड़ा था। यह कोई सामान्य पत्थर नहीं था; इसकी सतह पर अजीबोगरीब यंत्र लगे थे और वह एक धीमी नीली रोशनी उत्सर्जित कर रहा था।

“यह क्या है?” भीम ने पूछा।

“यह कोई हथियार जैसा लग रहा है,” अर्जुन ने कहा।

लेकिन आरव की नजरें कहीं और थीं। उसने देखा कि लापता सैनिक एक तंबू में बंधे हुए हैं। आरव ने तुरंत एक योजना बनाई। उसने अपना बनाया हुआ ‘मिनी फ्लेयर’ पश्चिम की ओर फेंका। जैसे ही रोशनी चमकी और धमाका हुआ, शिविर के पहरेदार उस तरफ भागे।

“अब!” आरव ने इशारा किया।

अर्जुन और भीम तंबू में घुस गए और अपने साथियों को आजाद कराया। लेकिन जैसे ही वे बाहर निकलने लगे, एक लंबा आदमी काले चोगे में उनके सामने आकर खड़ा हो गया। उसके सीने पर एक अनोखा लॉकेट था।

आरव उसे देखकर स्तब्ध रह गया। वैसा ही लॉकेट उसके दादाजी के पास भी था।

अध्याय 4: दादाजी की विरासत

“तुम्हें वह हार कहाँ से मिला?” आरव ने पूछा, उसकी आवाज काँप रही थी।

काले चोगे वाले आदमी ने एक ठंडी मुस्कान दी। “तुम नहीं जानते कि तुम कौन हो, आरव। तुम्हारे दादाजी इस पत्थर की रक्षा कर रहे थे, और अब उनका खून तुम्हें पुकार रहा है।”

अचानक, वह काला पत्थर जोर-जोर से धड़कने लगा। जमीन कांपने लगी। वह पत्थर कोई हथियार नहीं, बल्कि एक प्राचीन संचार उपकरण था, जो पृथ्वी से बाहर कहीं संदेश भेज रहा था।

आरव के दिमाग में दादाजी की बातें गूँजने लगीं: “बेटा, अगर कभी मशीनों की आवाज तुम्हें पुकारे, तो डरना मत, उसे सुनना।”

आरव ने पत्थर की ओर कदम बढ़ाया। अर्जुन ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन आरव के हाथ जैसे ही पत्थर की सतह से छुए, एक सफेद रोशनी चारों ओर फैल गई। आरव को एक विजन (दृश्य) दिखा। उसने अपने दादाजी को सालों पहले उसी जगह खड़े देखा।

दादाजी की आवाज उसके मन में गूँजी: “यह पत्थर एक चेतावनी है, आरव। यह किसी भी इंसान के लालच के लिए नहीं है। इसे बंद करना होगा, वरना यह पूरी दुनिया का संचार तंत्र नष्ट कर देगा।”

अध्याय 5: अंतिम संघर्ष और बलिदान

शिविर में अफरा-तफरी मच गई। विदेशी गुर्गों ने गोलीबारी शुरू कर दी। अर्जुन और उनकी टीम ने मोर्चा संभाला, लेकिन पत्थर की ऊर्जा बेकाबू हो रही थी। काले चोगे वाला आदमी पत्थर की शक्ति को अपने पास मौजूद एक डिवाइस में कैद करना चाहता था।

“आरव, इसे रोको!” अर्जुन चिल्लाया।

आरव ने देखा कि पत्थर के पास एक मुख्य सर्किट बोर्ड था जिसे उसके दादाजी ने ही मॉडिफाई (संशोधित) किया था। आरव ने अपनी जेब से एक छोटा सा तार का टुकड़ा निकाला। उसे पता था कि फ्रीक्वेंसी को कैसे ओवरराइड (अमान्य) करना है।

गोलियाँ उसके पास से गुजर रही थीं, लेकिन आरव का ध्यान सिर्फ उस कोड पर था जो उसके दादाजी ने उसे बचपन में सिखाया था। उसने तेजी से तारों को जोड़ा और अपने रेडियो से एक विशिष्ट फ्रीक्वेंसी भेजी।

अचानक, पत्थर से एक कान फाड़ देने वाली गूँज निकली। काले चोगे वाले आदमी का डिवाइस जल गया और वह पीछे जा गिरा। पत्थर की रोशनी धीरे-धीरे मद्धम पड़ने लगी। ऊर्जा वापस पत्थर के भीतर सिमट गई।

सब कुछ शांत हो गया। विदेशी समूह के लोग जंगल में भाग गए।

अध्याय 6: एक नई शुरुआत

जब सुबह हुई, तो सेना की अतिरिक्त टुकड़ी वहाँ पहुँच चुकी थी। लापता सैनिक सुरक्षित थे और उस प्राचीन पत्थर को सुरक्षित तरीके से कब्जे में ले लिया गया था।

अर्जुन ने आरव के कंधे पर हाथ रखा। “आज तुमने सिर्फ हमारे सैनिकों की नहीं, बल्कि इस देश के एक बड़े रहस्य की रक्षा की है, आरव।”

आरव ने उस पुराने लॉकेट को देखा जो अब उसके हाथ में था। वह जानता था कि उसके दादाजी शायद अब इस दुनिया में नहीं थे, लेकिन उन्होंने आरव को जो ज्ञान और साहस दिया था, वह हमेशा उसके साथ रहेगा।

आरव को शहर ले जाने का प्रस्ताव मिला, लेकिन उसने मना कर दिया। उसने कहा, “यह जंगल मेरा घर है, और यहाँ अभी भी बहुत कुछ है जिसकी रक्षा की जरूरत है।”

सेना ने आरव की झोपड़ी को एक आधुनिक निगरानी केंद्र में बदल दिया और उसे ‘जंगल का मानद तकनीशियन’ घोषित किया। आरव अब अकेला नहीं था; उसके पास अपने दादाजी की यादें थीं और भारत की सेना का भरोसा।

रात को जब जंगल फिर से शांत हुआ, आरव ने अपना रेडियो चालू किया। इस बार रेडियो पर कोई डरावना संदेश नहीं था, बल्कि दूर से आती एक मधुर धुन थी, जो उसे याद दिला रही थी कि वह इस महान जंगल का असली रक्षक है।

शिक्षा: सच्ची शक्ति हथियारों में नहीं, बल्कि सही ज्ञान और निस्वार्थ साहस में होती है। अपनी विरासत की रक्षा करना ही सबसे बड़ा कर्तव्य है।

समाप्त