हरदोई की वायरल जोड़ी: ट्रेन के आगे कूदे जीजा-साली | वजह कर देगी हैरान | यूपी वायरल वीडियो लड़का और लड़की

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कुहरे में दफन मोहब्बत: हरदोई की एक अधूरी दास्तान

अध्याय 1: वो आखिरी सर्द रात

जनवरी की वह रात हरदोई के लिए कोई नई बात नहीं थी। उत्तर भारत की कड़ाके की ठंड और आँखों के सामने हाथ न सूझने वाला घना कोहरा। खदरा फाटक के पास रेलवे ट्रैक सन्नाटे में डूबा हुआ था। केवल दूर कहीं से आती किसी मालगाड़ी की गूंज या कुत्तों का भौंकना उस चुप्पी को तोड़ रहा था।

घड़ी में रात के 2:15 बज रहे थे। पिलर नंबर 1173 के पास दो साये धीरे-धीरे चल रहे थे। एक 28 साल का युवक, रितेश, और एक युवती, मुस्कान। उनके हाथ एक-दूसरे में इस तरह गुंथे हुए थे जैसे कोई अंतिम वादा कर रहे हों। कोहरे की सफेद चादर ने उन्हें दुनिया की नजरों से छिपा लिया था, लेकिन उनकी रूह के भीतर जो तूफान चल रहा था, उसे शांत करने वाली कोई ताकत वहां मौजूद नहीं थी।

अध्याय 2: खुशियों का आगाज़ और नियति का खेल

कहानी की शुरुआत महज छह महीने पहले हुई थी। 3 जुलाई 2024—रितेश सिंह के घर में शहनाइयां बज रही थीं। उसके छोटे भाई की शादी मुस्कान की बड़ी बहन के साथ तय हुई थी। गांव की परंपराओं के अनुसार, दो परिवारों के बीच यह नया रिश्ता खुशियां लेकर आया था। रितेश, जो हरियाणा के बहादुरगढ़ की एक फैक्ट्री में काम करता था, शादी के लिए घर आया हुआ था।

शादी के रस्मों-रिवाजों के बीच रितेश और मुस्कान की पहली मुलाकात हुई। रितेश सरल स्वभाव का था, जबकि मुस्कान, जो बीए कर चुकी थी, भविष्य के सपने संजोए हुए एक पढ़ी-लिखी लड़की थी। जीजा और साली का रिश्ता हंसी-मजाक का होता है, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही लिखा था।

रितेश का मुस्कान के घर आना-जाना बढ़ गया। बातों का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे घंटों लंबी फोन कॉल्स में तब्दील हो गया। उन्हें पता ही नहीं चला कि कब यह हंसी-मजाक एक गहरे और समाज द्वारा ‘वर्जित’ प्रेम में बदल गया। रितेश अविवाहित था, और मुस्कान नौकरी की तलाश में थी, लेकिन उनके बीच का रिश्ता एक ऐसी पेचीदगी बन चुका था जिसे परिवार कभी स्वीकार नहीं करता।

अध्याय 3: समाज की दीवार और बेबसी

जब प्यार परवान चढ़ा, तो इसकी भनक दोनों परिवारों को लग गई। छोटे भाई की पत्नी (मुस्कान की बड़ी बहन) के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा शर्मनाक थी। समाज की नजरों में यह रिश्ता ‘मर्यादा’ के खिलाफ था। एक ही घर में दो भाइयों का दो बहनों से रिश्ता तो सामान्य था, लेकिन शादीशुदा भाई के बड़े भाई और छोटी बहन के बीच का प्रेम प्रसंग ‘अनैतिक’ माना जाने लगा।

घरवालों ने बंदिशें लगा दीं। मुस्कान का घर से निकलना बंद हो गया। रितेश को वापस बहादुरगढ़ भेज दिया गया ताकि दूरी से आग ठंडी हो जाए। लेकिन दूरियों ने उनकी तड़प और बढ़ा दी। फोन ही उनका एकमात्र सहारा था। मुस्कान के लिए दूसरे रिश्ते तलाशे जाने लगे। उस पर दबाव बनाया गया कि वह रितेश को भूल जाए और किसी और से शादी कर ले।

मुस्कान ने रितेश से फोन पर रोते हुए कहा था, “रितेश, ये लोग मुझे कहीं और ब्याह देंगे। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। अगर हम साथ नहीं जी सकते, तो कम से कम साथ मर तो सकते हैं।”

रितेश, जो अपनी नौकरी में मन नहीं लगा पा रहा था, अंदर ही अंदर टूट चुका था। उसने फैसला कर लिया था।

अध्याय 4: अंतिम वापसी

13 जनवरी 2026 को रितेश अचानक हरियाणा से हरदोई लौटा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। वह अपने बुआ के घर पहुंचा। वहां उसने अपना मोबाइल और बैग छोड़ दिया। उसने अपनी बुआ से कहा, “मैं कुछ काम से लखनऊ जा रहा हूँ, जल्दी लौट आऊंगा।”

लेकिन वह लखनऊ नहीं, बल्कि अपनी मौत के साथ आखिरी मुलाकात करने जा रहा था।

उसी समय मुस्कान भी किसी बहाने से घर से निकली। दोनों खदरा फाटक के पास मिले। प्रत्यक्षदर्शियों या बाद की जांच के अनुसार, वे दोनों काफी देर तक रेलवे ट्रैक के किनारे बैठे रहे। शायद उन्होंने अपने बिताए हुए पलों को याद किया होगा, शायद उन्होंने उस समाज को कोसा होगा जिसने उन्हें स्वीकार नहीं किया।

अध्याय 5: खौफनाक अंत

रात के सवा दो बजे। कोहरा इतना घना था कि कुछ मीटर की दूरी पर भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। तभी ट्रैक पर एक तेज रफ्तार ट्रेन की हेडलाइट की रोशनी दिखाई दी। ट्रेन का हॉर्न सन्नाटे को चीर रहा था।

रितेश और मुस्कान उठे। उन्होंने एक-दूसरे की आंखों में देखा और आखिरी बार हाथ मजबूती से थाम लिए। जैसे ही ट्रेन करीब आई, उन्होंने ट्रैक पर छलांग लगा दी। लोको पायलट ने इमरजेंसी ब्रेक लगाए, पहियों से चिंगारियां निकलीं और चीखने की आवाज आई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

ट्रेन रुकते-रुकते काफी दूर निकल गई थी। जब लोको पायलट और रेलवे कर्मचारी नीचे उतरे, तो वहां का मंजर देखकर उनकी रूह कांप गई। शवों के चीथड़े उड़ चुके थे। पहचान करना नामुमकिन था।

अध्याय 6: पहचान और मातम

पुलिस पहुंची। क्षत-विक्षत शरीर के अंगों को पॉलिथीन में इकट्ठा किया गया। ट्रेन 45 मिनट तक खड़ी रही। अगले 15 घंटों तक यह ‘अज्ञात’ शवों का मामला बना रहा।

जब रितेश के भाई और मुस्कान की मां मौके पर पहुंचे, तो वहां का दृश्य हृदयविदारक था। रितेश के भाई ने उसके कान के पीछे एक छोटे से तिल और उसके कपड़ों से उसकी पहचान की। मुस्कान की मां ने अपनी बेटी के कुर्ते के रंग को पहचान कर दहाड़ें मारना शुरू कर दिया।

वहां केवल दो लाशें नहीं थीं। वहां एक बिखरा हुआ परिवार था, टूटे हुए सपने थे और एक ऐसा सवाल था जिसका जवाब किसी के पास नहीं था। पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

अध्याय 7: निष्कर्ष

हरदोई की यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है। क्या प्रेम इतना बड़ा गुनाह था कि उसकी सजा सिर्फ मौत थी? या हमारा समाज आज भी इतना संकीर्ण है कि वह भावनाओं से ऊपर ‘लोक-लाज’ को रखता है?

रितेश और मुस्कान ने दुनिया की नजरों में गलत रिश्ता चुना हो सकता है, लेकिन उनकी पीड़ा और उनका अंत यह बताने के लिए काफी है कि वे एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर पा रहे थे। कोहरे की उस रात ने उनके सारे दर्द को हमेशा के लिए शांत कर दिया, लेकिन पीछे छोड़ गई एक ऐसी कहानी जो हरदोई की गलियों में लंबे समय तक सुनी और सुनाई जाएगी।

पुलिस की फाइलों में यह मामला ‘प्रेम प्रसंग में आत्महत्या’ के नाम से दर्ज होकर बंद हो गया, लेकिन उन दो जिंदगियों का क्या, जो खिलने से पहले ही कुचल दी गईं?