बेचारे 10 साल के लड़के ने एक अरबपति के घर में अपनी माँ की तस्वीर देखी! सच्चाई जानकर हर कोई रो पड़ा!

कहते हैं कि एक तस्वीर हजार शब्द कह सकती है। लेकिन 10 साल के करण के लिए उस एक तस्वीर ने उसकी पूरी दुनिया को खामोश कर दिया था। करण की दुनिया उस आलीशान कोठी से बहुत दूर थी, जहां आज वह पहली बार दाखिल हुआ था। वह मुंबई की उस झुग्गी में रहता था, जहां आसमान से ज्यादा टपकती हुई छतें दिखाई देती थीं। उसकी जिंदगी अपनी बीमार दादी मां की देखभाल और पेट भरने के जुगाड़ के बीच सिमटी हुई थी। आज एक कैटरिंग कंपनी में हेल्पर के तौर पर उसे यह काम मिला था।

पहली बार आलीशान घर में

मैनेजर ने उसे सख्त हिदायत दी थी, “किसी चीज को हाथ मत लगाना और अपनी नजरें झुकाए रखना।” करण ने नजरें झुकाए रखी थीं। वह कांच के भारी गिलासों की ट्रे पकड़े हुए था, जो उसके नन्हे हाथों से कहीं ज्यादा वजनदार थी। वह अरबपति श्री अशोक वर्मा के घर पर था। यह घर नहीं, एक महल था। संगमरमर के फर्श इतने साफ थे कि करण को अपना धुंधला अक्स दिख रहा था। एक दुबला-पतला लड़का, जिसके बदन पर ढीली-ढाली यूनिफार्म थी, पार्टी जोरों पर थी। महंगे इत्र की खुशबू और ऊंची आवाज में हंसते लोगों के बीच करण खुद को लगभग अदृश्य महसूस कर रहा था।

वह बस यह सोच रहा था कि आज की दिहाड़ी से वह दादी के लिए दवाइयां जरूर खरीद लेगा। उसकी मां को उसने ठीक से याद नहीं किया। दादी कहती थीं कि वह एक बहुत अच्छी औरत थी जो भगवान के पास चली गई। करण के पास उसकी बस एक छोटी सी मुड़ी काले और सफेद रंग की तस्वीर थी, जिसे वह अपने तकिए के नीचे छुपा कर रखता था।

हादसा

तभी एक हादसा हुआ। किसी मेहमान से टकराकर एक गिलास करंट की ट्रे से गिरा और जमीन पर जा गिरा। महंगी शराब कालीन पर फैल गई। “अंधा है क्या?” हेड वेटर सुरेश उस पर चीखा। “तेरी औकात है इस कालीन की कीमत चुकाने की। चल साफ कर इसे।” करण कांपते हुए घुटनों पर बैठ गया और कपड़े से दाग पोंछने लगा।

वो हॉल के उस हिस्से में था जहां मेहमान ज्यादा नहीं आते थे। यहां दीवार पर बहुत सी तस्वीरें लगी थीं। जैसे ही उसने दाग पोंछा, उसकी नजर सामने दीवार पर पड़ी। एक, दो, तीन कई तस्वीरें और फिर बीच में सोने के फ्रेम में जड़ी एक बड़ी सी तस्वीर करण के हाथ जम गए। कपड़ा उसके हाथ से छूट गया। वो मुस्कुराती हुई आंखें। वो हल्का सा तिल जो होठ के ऊपर था। यह वही औरत थी। यह उसकी मां थी।

पहचान

एक अरबपति के घर में सबसे बीचोंबीच उसकी मां की तस्वीर क्या कर रही थी? करण का छोटा सा दिमाग सुन्न हो गया था। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे पार्टी का शोरशराबा सुनाई देना बंद हो गया था। वो बस उस तस्वीर को घूर रहा था। वो उसकी मां थी। इसमें कोई शक नहीं था। वही हल्की सी उदास मुस्कान जो उसकी अपनी आंखों में भी झलकती थी। लेकिन यहां इस तस्वीर में वो महंगे कपड़े और गहने पहने हुई थी। वो खुश नहीं लग रही थी। वो किसी और की दुनिया का हिस्सा लग रही थी।

दादी ने तो कहा था कि मां एक गांव की सीधी साधी औरत थी जो शहर की भीड़ में खो गई। उन्होंने कहा था कि गरीबी ने उसे छीन लिया। तो फिर वो यहां कैसे?

सुरेश का गुस्सा

“अबे बहरे, सुन नहीं रहा?” हेडवेटर सुरेश वापस आ गया था। उसने देखा कि करण अभी भी जमीन पर बैठा है। लेकिन अब वो कालीन नहीं बल्कि दीवार को घूर रहा था। “खड़ा हो।” सुरेश ने लगभग फुसफुसाते हुए गुस्से से कहा और करण की बाह को जोर से पकड़ कर उसे खड़ा किया। “क्या देख रहा है? यह तस्वीरें तेरे बाप दादा ने लगाई हैं। चल निकल यहां से। तेरी आज की दिहाड़ी कटी।” दर्द से करण की आंखों में आंसू आ गए। लेकिन उसका ध्यान अभी भी उस तस्वीर पर था।

“नहीं,” वो बस इतना ही कह पाया। “क्या वो जबान चलाता है?” सुरेश ने उसे घसीटते हुए किचन की तरफ ले जाने लगा।

अशोक वर्मा का ध्यान

यह हंगामा पार्टी के मेजबान श्री अशोक वर्मा का ध्यान खींचने के लिए काफी था। वो एक गंभीर 50 से 55 साल के आदमी थे, जिनके चेहरे पर रुतबा और दौलत साफ झलकती थी। उनके साथ उनकी पत्नी नंदिनी वर्मा भी थी, जो सोने के गहनों से लदी हुई थी।

“क्या हो रहा है यह?” अशोक वर्मा ने अपनी भारी आवाज में पूछा। “मेहमानों के सामने यह तमाशा क्यों?” सुरेश ने तुरंत करण की बाह छोड़ दी और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। “सर, माफ कीजिए। यह नया लड़का है, काम चोर है। मेहमानों पर ध्यान देने की जगह यह आपकी फैमिली फोटो को घूर रहा था। पता नहीं क्या चुराने की फिराक में था।”

नंदिनी का घिन

“चुराने?” नंदिनी वर्मा ने घिन से करण को देखा। “इन झुग्गी झोपड़ी वालों का यही काम है। सुरेश, इसे बाहर फेंको और पुलिस को फोन करो।” करण डर गया। “नहीं मैडम, मैंने कुछ नहीं किया। मैं बस…”

वो जानता था कि इन बड़े लोगों की दुनिया में उसकी सच्चाई का कोई मोल नहीं था। वो उसे धक्के मारकर बाहर निकाल देंगे। लेकिन वो अपनी मां की तस्वीर का सच जाने बिना नहीं जा सकता था। उसने अपनी बची खुची सारी हिम्मत जुटाई। आंसू उसकी गालों पर बह रहे थे।

सच का सामना

उसने अशोक वर्मा की तरफ नहीं बल्कि उस तस्वीर की तरफ उंगली उठाई। “मैं चोर नहीं हूं,” उसने कांपती आवाज में कहा, “मैं बस यह जानना चाहता हूं कि मेरी मां की तस्वीर आपके घर में क्या कर रही है।”

पार्टी में अचानक सन्नाटा छा गया। जो मेहमान पास खड़े थे वो रुक गए। सुरेश का मुंह खुला का खुला रह गया। अशोक वर्मा की आंखें सिकुड़ गईं। उन्होंने एक नजर उस लड़के पर डाली और फिर उस तस्वीर पर। नंदिनी वर्मा के चेहरे का रंग उड़ गया।

बकवास की आवाज़

“क्या बकवास कर रहा है यह?” नंदिनी ने घबराकर कहा। करण ने जेब से अपनी फटी हुई मुड़ी तुड़ी ब्लैक एंड वाइट तस्वीर निकाली, जिसे उसने अपने तकिए के नीचे से उठाया था। “यह देखिए। यह मेरी मां है। और वह भी मेरी मां है।”

सन्नाटा इतना गहरा था कि महंगे क्रिस्टल गिलासों के टकराने की हल्की सी आवाज भी एक धमाके जैसी लगती। करण की उंगली अभी भी उस शानदार सोने के फ्रेम वाली तस्वीर की तरफ उठी हुई थी और उसके दूसरे हाथ में उसकी अपनी छोटी मुड़ी तस्वीर कांप रही थी।

एक ही चेहरा, दो दुनिया

एक ही चेहरा, दो दुनिया। नंदिनी वर्मा इस सदमे से सबसे पहले उभरी। उनका चेहरा गुस्से और घबराहट से लाल हो गया था। “यह यह बकवास है,” सुरेश वो लगभग चीखी। “मैंने कहा ना, इसे बाहर फेंको। यह जरूर किसी ने सिखा पढ़ाकर भेजा है। हमारे दुश्मनों ने हमारी इज्जत पर कीचड़ उछालने के लिए…”

लेकिन करण ने अपनी मुट्ठी भी ली। यह उसकी मां की इकलौती निशानी थी। यह उसकी जिंदगी थी।

अशोक का निर्णय

“नंदिनी, रुको,” यह आवाज अशोक वर्मा की थी। उनकी आवाज में वह गुस्सा नहीं था जो नंदिनी की आवाज में था। उनकी आवाज में एक अजीब सी ठंडी गहराई थी। उन्होंने सुरेश को हाथ के इशारे से पीछे हटने को कहा।

अशोक वर्मा धीरे-धीरे करण के पास आए। वो एक शिकारी की तरह थे जो अपने शिकार का जायजा ले रहा हो। उन्होंने करण के चेहरे को घूरा। उसकी आंखों को, उसके नाक-नक्श को। फिर उन्होंने दीवार पर लगी उस शानदार तस्वीर को देखा।

अतीत की यादें

वह तस्वीर उनकी पहली पत्नी स्वर्गीय मानसी वर्मा की थी। नहीं, यह मानसी नहीं थी। यह वह औरत थी जिसे वह सालों पहले भूल जाना चाहते थे। यह पल्लवी थी। अशोक वर्मा को वो दिन याद आ गया। एक तूफानी रात। पल्लवी उनकी आंखों में आंसू कह रही थी। “मैं इस झूठ के साथ नहीं जी सकती। अशोक, यह पाप है।” और फिर वह चली गई थी। हमेशा के लिए।

उन्होंने सबको यही बताया था कि वह एक एक्सीडेंट में मारी गई। उन्होंने उसकी यादों को इस घर के एक कोने में दफन कर दिया था और आज इतने सालों बाद उस अतीत का एक हिस्सा एक जीता-जागता सबूत उनके सामने खड़ा था।

सवाल और जवाब

“तुम्हारा नाम क्या है?” अशोक वर्मा ने पूछा। उनकी आवाज स्थिर थी लेकिन उनकी आंखें करण के चेहरे का हर इंच स्कैन कर रही थीं। “करण।”

“और तुम्हारी दादी का नाम?” “तुम्हारी दादी का नाम तुम कहां रहते हो?” “मेरी दादी का नाम शकुंतला है। हम धारावी में रहते हैं।”

“शकुंतला?” यह नाम सुनते ही नंदिनी वर्मा के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह नाम वह जानती थी। वह पल्लवी की पुरानी आया का नाम था।

नंदिनी का डर

“अशोक, यह झूठ है,” नंदिनी ने हक लाना शुरू कर दिया। अशोक वर्मा ने अपनी पत्नी की तरफ नहीं देखा। उनका पूरा ध्यान उस 10 साल के लड़के पर था, जिसमें उन्हें वही आंखें दिख रही थीं जिन्होंने कभी उनका दिल तोड़ा था।

“तुम कहते हो यह तुम्हारी मां है?” अशोक ने तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए कहा। “तुम्हारे पास क्या सबूत है? इस फटी हुई तस्वीर के अलावा?” करण कांप गया। उसे लगा कि वो इस अमीर आदमी के सवालों के जाल में फंस रहा है।

“सबूत नहीं है,” उसने ईमानदारी से कहा। आंसू उसकी आंखों से फिर बहने लगे। “बस मेरी दादी कहती थी कि मेरी मां के होंठ पर एक दिल था। बिल्कुल वैसा ही जैसा उस तस्वीर में है और वह मुझे यही लोरी गाकर सुलाती थी।”

पल्लवी की यादें

करण ने घबराहट में टूटी आवाज में वह धुन गुनगुनानी शुरू कर दी जो उसकी दादी उसे मां की लोरी बताकर सुनाती थी। वो धुन सुनते ही अशोक वर्मा का पत्थर जैसा चेहरा एक पल के लिए टूट गया। वो धुन, वो पल्लवी की पसंदीदा धुन थी।

नंदिनी वर्मा का चेहरा अब सफेद पड़ चुका था। वह जानती थी कि यह खेल अब उनके हाथ से निकल चुका है। अशोक वर्मा ने अपने हेड ऑफ सिक्योरिटी रमन को इशारा किया। “पार्टी खत्म। मेहमानों से माफी मांगो और उन्हें विदा करो।”

एक नई शुरुआत

फिर वो करण की तरफ मुड़े जो अभी भी सहमा हुआ खड़ा था। “तुम,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज में अब ना गुस्सा था ना घबराहट, बल्कि एक अजीब सा अधिकार था। “तुम मेरे साथ, मेरे ऑफिस में आ रहे हो। अभी।”

अशोक वर्मा का ऑफिस किसी शाही दरबार जैसा था। एक तरफ ऊंची-ऊंची किताबों की अलमारियां थीं और दूसरी तरफ कांच की एक विशाल खिड़की जहां से रोशनी में नहाया शहर दिख रहा था। वो शहर जो करण की दुनिया से कोसों दूर था।

करण को एक महंगी लेदर की कुर्सी पर बिठाया गया। लेकिन वह उसके किनारे पर ही सहमा हुआ बैठा। उसके पैर जमीन को भी नहीं छू रहे थे। दरवाजा जोर से खुला और नंदिनी वर्मा तूफान की तरह अंदर आईं।

नंदिनी का गुस्सा

“अशोक, आप होश में तो हैं? आप इस गंदे लड़के के साथ अकेले में बात कर रहे हैं। यह साफ-साफ ब्लैकमेलिंग का केस है। इसे पुलिस के हवाले कीजिए।” अशोक वर्मा अपनी बड़ी सी डेस्क के पीछे खड़े थे। उन्होंने अपनी पत्नी की तरफ देखा। लेकिन उनकी नजरें बर्फ की तरह ठंडी थीं।

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