फुटपाथ से फॉर्च्यून तक
ठंडी शाम धीरे-धीरे दिल्ली शहर पर उतर रही थी। सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों की रोशनी धूल में घुलकर एक धुंधली चमक बना रही थी। हर कोई अपनी-अपनी दुनिया में खोया हुआ था—कोई घर लौटने की जल्दी में, कोई चाय-समोसे के पैकेट लिए, कोई अपने बच्चों का हाथ थामे थका-सा।
इसी भीड़ में, फुटपाथ के एक कोने पर, फटे कंबल में लिपटा एक दुबला-पतला लड़का बैठा था। दो दिनों से भूखा। अकेला। जैसे शहर ने उसे देखना ही छोड़ दिया हो।
लेकिन किसे पता था कि यही चेहरा, सालों बाद, भारत के सबसे युवा और प्रभावशाली सीईओ के रूप में जाना जाएगा।
उस लड़के का नाम था रोशन।
रोशन की आंखों में एक अजीब-सी चमक थी—थकान के पीछे छिपी हुई। पर दुनिया के पास रुकने का वक्त नहीं था। उसका रोज़ का जीवन दर्द से भरा, पर अनुशासित था।
सुबह रेलवे स्टेशन पर भीड़ देखना,
दोपहर होटल वालों की दया की आस,
शाम को खाली बोतलें बटोरकर चिल्लर कमाना,
और रात को गत्ते पर लेटकर आसमान ताकना।

हर रात सोने से पहले वह एक तारे को ढूंढता। उसे लगता था, ऊपर कहीं न कहीं एक तारा सिर्फ उसी का है—और वह एक दिन जरूर चमूकेगा।
एक ऐसी ही रात, किस्मत ने उसकी ओर देखा।
एक बुजुर्ग चप्पल बेचने वाले का बोरा सड़क पर गिर पड़ा। चप्पलें बिखर गईं। लोग गुजरते रहे। किसी ने लात मारी, किसी ने नजरें फेर लीं।
रोशन रुका। उसने एक-एक चप्पल उठाई और बोरे में रख दी।
बुजुर्ग ने कांपती आवाज में पूछा,
“बेटा, तेरा नाम क्या है?”
“रोशन,” उसने कहा।
“भगवान से कभी कुछ मांगा है?”
रोशन मुस्कुराया, “हां… एक मौका।”
बुजुर्ग ने अपने झोले से एक पुरानी, घिसी हुई डायरी निकाली।
“यह रख ले। किसी ने मुझे दी थी। कहा था, जब किसी को जरूरत हो, दे देना।”
डायरी के कवर पर लिखा था—
Notes of a Restless Mind
उस रात, रोशन ने पहली बार जिंदगी को दूसरी नजर से देखा।
वह डायरी उसका पहला शिक्षक बनी।
उसकी पहली किताब।
उसकी पहली उम्मीद।
धीरे-धीरे वह लोगों को पढ़ने लगा—उनके चेहरे, उनकी चाल, उनके डर, उनकी जरूरतें।
कबाड़ी वालों की मोलभाव से उसने बाजार सीखा।
भीड़ से उसने समय की कीमत समझी।
भूख से उसने धैर्य।
उसने डायरी में लिखा—
“सड़क मेरी दुश्मन नहीं, मेरी टीचर है।”
समय बीतता गया।
रोशन अब सिर्फ बोतलें नहीं चुनता था—वह मौके चुनता था।
एक दिन एक थका-हारा आदमी, असफल इंटरव्यू के बाद, उसके पास बैठा। हाथ में मुड़ा-तुड़ा रिज्यूमे।
रोशन ने पहली बार समझा—कागज भी किस्मत बदल सकते हैं।
यहीं से उसकी नई यात्रा शुरू हुई।
एक बुजुर्ग रिटायर्ड क्लर्क, त्रिपाठी जी, ने उसके लिखे शब्दों को पहचाना।
उन्होंने कहा,
“तुम लोगों को समझते हो। यही तुम्हारी ताकत है।”
रोशन ने लिखना शुरू किया—
एप्लीकेशन, शिकायतें, छोटे विज्ञापन, रिज्यूमे।
लोग शुक्रिया कहकर जाते, और उसका आत्मविश्वास बढ़ता।
तीन साल बाद रोशन ने अपना नाम बदल लिया—
अब वह था अभिषेक मेहता।
फुटपाथ से निकलकर एक छोटे से कोने में उसका दफ्तर खुला।
वह कागजों पर नहीं, भरोसे पर लिखता था।
एक दिन एक छोटे स्टार्टअप मालिक, प्रवीण, उसके पास आया।
अभिषेक ने उसे विज्ञापन नहीं, कहानी दी।
सच्ची, सरल, इंसानी।
और चमत्कार हो गया।
आज, वही अभिषेक मेहता, मुंबई की 60वीं मंजिल पर बैठा था—एक सफल सीईओ।
पर उसकी जेब में अब भी वही पुरानी डायरी थी।
एक दिन वही बुजुर्ग, रहीम चाचा, उससे मिलने आए—
जिन्होंने उसे वह डायरी दी थी।
अभिषेक ने उनके पैर छुए।
चाचा मुस्कुराए,
“लगता है तुमने उसे भर दिया।”
अभिषेक जानता था—
उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसकी सड़क की परछाईं थी।
आज उसने उसी गली में एक छोटा पुस्तकालय खुलवाया।
एक और बच्चे को वही डायरी थमा दी।
क्योंकि वह जानता था—
हर फुटपाथ पर बैठा बच्चा,
अपने भीतर एक तारा लेकर पैदा होता है।
बस किसी को उसे देखने की जरूरत होती है।
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