एक अकेली गांव की महिला दरोगा पर भारी पड़ गई।।

वर्दी के पीछे का भेड़िया: एक डीएम की न्याय यात्रा

अध्याय 1: एक असहाय किसान की पुकार

रात का सन्नाटा पसरा हुआ था। डीएम ऑफिस के कंट्रोल रूम में इंस्पेक्टर विक्रम ड्यूटी पर थे। अचानक फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ से सिसकियों और रोने की आवाज आ रही थी।

“हेलो, डीएम ऑफिस कंट्रोल रूम? मैं रामदीन बोल रहा हूँ… रामपुर गाँव का किसान… साहब, मैं लुट गया, मैं जीते जी मर गया!”

इंस्पेक्टर विक्रम ने उसे शांत कराया। रामदीन ने कांपती आवाज में बताया कि उसकी पत्नी मरणासन्न है और वह शहर से उसके लिए ५,००० रुपये की दवा लेने जा रहा था। रास्ते में पक्की सड़क के मोड़ पर नई पुलिस चौकी के दरोगा बलवंत सिंह ने उसे रोका। चेकिंग के नाम पर उसके सारे पैसे छीन लिए और जब उसने गिड़गिड़ाकर अपनी पत्नी की बीमारी का वास्ता दिया, तो दरोगा ने उसे धक्का देकर भगा दिया।

रामदीन ने एक और भयानक बात बताई—”साहब, वो केवल पैसे नहीं छीनता, वो उस रास्ते से गुजरने वाली बहू-बेटियों पर भी गंदी नजर रखता है।”

अध्याय 2: डीएम की शपथ

अगली सुबह इंस्पेक्टर विक्रम यह पूरी रिपोर्ट लेकर जिला मजिस्ट्रेट अदिति के पास पहुँचे। अदिति उसी रामपुर गाँव की रहने वाली थीं, जहाँ के किसान के साथ यह अन्याय हुआ था।

जब उन्होंने सुना कि उनके अपने ही जिले में, उनके पैतृक गाँव के पास एक रक्षक ही भक्षक बन गया है, तो उनकी आँखों में क्रोध की ज्वाला धधक उठी। विक्रम ने फोर्स भेजने का सुझाव दिया, लेकिन अदिति ने मना कर दिया।

“विक्रम, मुझे उसे रंगे हाथों पकड़ना है। अगर मैं वर्दी और फोर्स के साथ गई, तो वह अपराधी सतर्क हो जाएगा। मैं आज एक डीएम बनकर नहीं, बल्कि रामपुर की बेटी बनकर अपने घर जाऊंगी। मैं वह देखूँगी जो एक आम आदमी देखता है।”

अध्याय 3: अपनी मिट्टी में वापसी

अदिति अपनी निजी सफेद स्कॉर्पियो गाड़ी लेकर सादे कपड़ों में गाँव की ओर निकल पड़ीं। रास्ते में उन्हें अपनी माँ मिलीं, जो खेतों में आलू खोद रही थीं। अदिति ने अपनी माँ के साथ समय बिताया, उनकी मदद की और उनकी मेहनत को नमन किया।

लेकिन जब घर लौटने का समय आया, तो माँ ने छोटे रास्ते से जाने से मना कर दिया। “बेटी, उस पक्की सड़क से मत जा, वहाँ पुलिस वाला नहीं, गुंडा बैठा है। वह औरतों को परेशान करता है।”

अदिति ने मुस्कुराकर माँ का हाथ थामा और कहा, “माँ, अगर हम डरकर रास्ता बदल लेंगे, तो वह रास्ता कभी साफ नहीं होगा। आज मैं तुम्हारे साथ हूँ, चलो उसी रास्ते से चलते हैं।”

अध्याय 4: दरोगा का अहंकार

जैसे ही सफेद स्कॉर्पियो उस मोड़ पर पहुँची, दरोगा बलवंत सिंह और उसके सिपाहियों ने उसे रोक लिया। बलवंत के चेहरे पर धूर्तता की मुस्कान थी। उसे लगा कि कोई अमीर ‘मुर्गा’ फँसा है।

“बड़ी महँगी गाड़ी है… क्या धंधा करते हो?” बलवंत ने बदतमीजी से पूछा।

अदिति ने विनम्रता से कहा, “साहब, हमें जाने दीजिए, हम अपनी माँ के साथ घर जा रहे हैं।”

बलवंत ने गाड़ी की तलाशी ली और पीछे रखे आलू के बोरों को सड़क पर फेंक दिया। जब अदिति ने विरोध किया, तो उसने ५,००० रुपये की मांग की। अदिति ने एक पैसा भी देने से मना कर दिया और उसे कानून की याद दिलाई।

अध्याय 5: अन्याय की सीमा

“कानून? कानून मैं हूँ!” बलवंत चिल्लाया। उसने अदिति और उनकी बुजुर्ग माँ को जबरदस्ती पुलिस जीप में डालने का आदेश दिया। कोई महिला सिपाही नहीं थी, कोई नियम नहीं था। बलवंत का अहंकार सातवें आसमान पर था।

अदिति ने शांति बनाए रखी, हालांकि उनकी माँ बहुत डरी हुई थीं। उन्हें थाने ले जाया गया और एक गंदे लॉकअप में बंद कर दिया गया। बलवंत ने धमकी दी, “रात भर यहाँ सड़ो, सुबह कोर्ट में ऐसा केस बनाऊंगा कि पूरी जिंदगी चक्की पीसती रहोगी।”

लॉकअप की सलाखों के पीछे खड़ी अदिति ने शांत स्वर में कहा, “दरोगा जी, ताला खोलकर माफी मांग लीजिए, शायद नौकरी बच जाए।” बलवंत जोर से हँसा और उसका मजाक उड़ाया।

अध्याय 6: आधी रात का इंसाफ

अदिति ने गुप्त रूप से अपनी घड़ी में लगे पैनिक बटन का इस्तेमाल किया था। अचानक थाने के बाहर दर्जनों पुलिस गाड़ियों के सायरन सुनाई देने लगे। एसपी (पुलिस अधीक्षक) खुद फोर्स के साथ थाने में दाखिल हुए।

बलवंत हड़बड़ा गया। “जय हिंद सर! आप यहाँ इतनी रात को?”

एसपी ने उसे एक जोरदार थप्पड़ मारा और चिल्लाए, “बेवकूफ! जिसे तूने लॉकअप में बंद किया है, जानता है वह कौन है? वह इस जिले की डीएम साहिबा हैं!”

बलवंत के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह कांपने लगा।

अध्याय 7: अंतिम फैसला

ताला खोला गया। अदिति बाहर निकलीं और उन्होंने बलवंत की आँखों में देखते हुए कहा, “बलवंत सिंह, अगर मैं एक साधारण औरत होती, तो क्या तुम माफी मांगते? नहीं, तुम मुझे नोच खाते। तुमने वर्दी को कलंकित किया है।”

अदिति ने आदेश दिया कि बलवंत की वर्दी तुरंत उतारी जाए और उसे गिरफ्तार किया जाए। साथ ही, उन्होंने रामदीन किसान को बुलाया, उसके पैसे वापस करवाए और उसकी पत्नी के लिए बेहतर इलाज का प्रबंध किया।

अध्याय 8: निष्कर्ष

अगले दिन, वह पक्की सड़क का मोड़ अब सुरक्षित था। अदिति ने अपनी माँ के साथ उसी रास्ते से वापस शहर का सफर किया। अब कोई डर नहीं था, कोई भ्रष्टाचार नहीं था।

यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे अपराधी कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, न्याय की एक चिंगारी उसके अहंकार के महल को राख करने के लिए काफी है। एक सच्चा अधिकारी वही है जो जनता के बीच रहकर उनके दुख को महसूस करे और उसे दूर करे।