Ek Aurat Aur Kachray Ke Paas Milne Wala Masoom Bacha Ki💔Dil Ko Choo Lene Wali Kahani

मोहब्बत का रिश्ता – हमजा और समीना की कहानी

भूमिका

यह कहानी एक ऐसे रिश्ते की है, जो खून से नहीं, बल्कि दिल से जुड़ता है। यह कहानी है समीना की, जिसने एक मासूम बच्चे को कचरे के ढेर से उठाया, उसे अपनी औलाद की तरह पाला, और फिर वक्त के थपेड़ों में उस बेटे ने अपने दूध का कर्ज ऐसे चुकाया कि सबकी आंखें नम हो गईं। यह कहानी इंसानियत, मां की ममता, और मोहब्बत की मिसाल है।

कहानी की शुरुआत

गांव की गलियों में दोपहर का सन्नाटा पसरा था। समीना तेज़ कदमों से अपने घर जा रही थी। उसके दिल में एक अजीब सा सुकून था। अचानक, एक सुनसान जगह से बच्चे की रोने की आवाज़ आई। समीना ठिठक गई। आवाज़ कचरे के ढेर की तरफ से आ रही थी। समीना ने देखा – एक टोकरी में एक मासूम बच्चा बिलख रहा था। समीना के दिल में दर्द उठा। उसने बच्चे को गोद में उठा लिया। समीना एक बीवा थी, उसके शौहर का इंतकाल कुछ साल पहले हो चुका था। उसके पास एक बेटा फराज था, जो पांच साल का था।

समीना ने उस मासूम बच्चे को अपने घर ले आई। फराज ने पूछा, “अम्मा, यह बच्चा कौन है?” समीना ने मुस्कुराकर कहा, “आज से यह तुम्हारा भाई है।” फराज को यह बात नागवार गुज़री। लेकिन समीना ने बच्चे को अपना लिया। उसका नाम रखा – हमजा।

हमजा और फराज का बचपन

गांव में खबर फैल गई कि समीना को एक बच्चा कचरे में मिला है। समीना ने सबके सामने ऐलान किया, “यह मेरा बेटा है। कोई नहीं कह सकता कि यह कचरे से मिला है।” दोनों बच्चे बड़े होने लगे। फराज कभी हमजा को अपना भाई नहीं मानता था। खेलते वक्त उसे मारता, ताने देता। समीना समझाती, “वह तुम्हारा भाई है।” लेकिन फराज के दिल में हमजा के लिए कोई नरम गोशा नहीं था।

हमजा मेहनती और जहीन था। स्कूल में अच्छा पढ़ता था। एक दिन फराज ने हमजा को कचरे वाला कहकर ताना मारा। हमजा रोता हुआ समीना के पास आया, “अम्मा, क्या मैं आपका बेटा नहीं हूं?” समीना ने उसे गले लगाया, “तुम मेरे बेटे हो, बहादुर हो, प्यारे हो।” हमजा की आंखों में आंसू थे, लेकिन उसके दिल को सुकून मिला।

समय का बदलता रंग

समय बीतता गया। फराज ने शहर की यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। समीना ने जमीन बेचकर उसका खर्च उठाया। हमजा गांव में रहकर खेती और जमीन संभालता। हर महीने पैसे फराज को भेजता। समीना अपने बेटे की जिम्मेदारी और मोहब्बत देखकर दुआएं करती।

हमजा समीना की खूब सेवा करता। दवाइयां, खाना, सब देखता। एक दिन समीना परेशान थी। फराज ने शहर में एक लड़की से शादी कर ली थी। समीना के अरमान टूट गए। हमजा ने मां को तसल्ली दी, “अम्मा, फिक्र मत करें। जब बहू आएगी, आप खुश हो जाएंगी।”

कुछ दिनों बाद फराज अपनी बीवी नजमा के साथ घर आया। नजमा खुश नहीं थी। वह समीना से मुंह फेरे रहती, काम नहीं करती, ताने देती। समीना खामोश रही। मगर नजमा के दिल में चाल थी। उसने फराज के कान में बोला, “तुम्हारी मां सारी जायदाद हमजा के नाम करने वाली है।” फराज के दिल में शक और गुस्सा भर गया।

जायदाद का झगड़ा

एक दिन फराज ने समीना से कहा, “अम्मा, सारी जमीन मेरी है। हमजा का इसमें कोई हिस्सा नहीं है। वह कचरे से मिला था।” समीना के दिल पर चोट लगी, मगर उसने सख्ती से कहा, “वह मेरा बेटा है। जायदाद का फैसला मैं करूंगी।”

नजमा ने फराज को उकसाया। दोनों ने मिलकर एक चाल चली। फराज ने समीना से दस्तखत करवा लिए, बिना बताये कि यह जायदाद के कागजात हैं। अब सारी जमीन फराज के नाम हो गई। नजमा ने कहा, “अब हमजा की क्या जरूरत है? उसे घर से निकाल दो।”

अगले दिन फराज ने हमजा को घर से निकाल दिया। समीना ने विरोध किया, मगर फराज ने उसे भी धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया। बारिश हो रही थी। समीना और हमजा रोते हुए गांव से बाहर निकल गए।

फराज की बर्बादी

फराज और नजमा खुश थे। मगर कुछ ही दिनों में फराज की सारी फसलें जल गईं। आमदनी बंद हो गई। नजमा ने जमीन बेचने को कहा। फराज ने आधी जमीन बेच दी। पैसे खत्म हो गए। बाकी जमीन भी बेच दी, कारोबार में लगा दिया, वहां भी नुकसान हुआ। फराज कंगाल हो गया। बीमार होकर व्हीलचेयर पर आ गया। नजमा ने उसे छोड़ दिया। फराज तन्हा रह गया।

फराज पछतावे की आग में जलता रहा। मां और हमजा को याद करता रहा, मगर वे कहां गए, पता नहीं चला।

मोहब्बत का कर्ज चुकता

दूसरी तरफ समीना अस्पताल में आखिरी सांसें ले रही थी। हमजा उसका हाथ थामे बैठा था। “अम्मा, मैं आपका इलाज करवा रहा हूं, आप ठीक हो जाएंगी।” समीना बोली, “हमजा, तुमने अपने बेटे होने का हक अदा कर दिया। मेरी दूध का कर्ज उतार दिया। मेरी दुआ है, अल्लाह तुम्हें बहुत दे।” समीना ने कहा, “फराज को माफ कर देना।” और उसकी सांसे थम गईं।

हमजा फूट-फूट कर रोया। मां की मोहब्बत का कर्ज कभी नहीं चुका सकता था। दिन, महीने, साल गुजर गए। हमजा शहर चला गया, मेहनत की, कारोबार शुरू किया। आज उसके पास शॉपिंग मॉल्स, कार शोरूम्स थे। वह अमीर हो गया।

रिश्तों की असली पहचान

पांच साल बाद हमजा शानदार गाड़ी में गांव लौटा। गांव वाले हैरान थे। हमजा ने फराज को देखा – व्हीलचेयर पर, तन्हा, शर्मिंदा। फराज ने माफी मांगी, “हमजा, मुझे माफ कर दो। मुझे अम्मा के पास ले चलो।” हमजा बोला, “अम्मा अब इस दुनिया में नहीं है, मगर उन्होंने मरते वक्त तुम्हें माफ कर दिया था।”

हमजा ने फराज को सहारा दिया, इलाज करवाया। गांव वालों ने देखा – मोहब्बत का रिश्ता खून से नहीं, दिल से बनता है। हमजा ने कभी फराज को सौतेला नहीं समझा। उसने भाई का फर्ज निभाया।

कहानी का सबक

यह कहानी हमें सिखाती है कि असली रिश्ता वह है, जो दिल से जुड़ा हो। मोहब्बत, वफादारी, और इंसानियत ही रिश्तों की बुनियाद है। मां की ममता, बेटे की मोहब्बत, और भाईचारे की मिसाल – यही इस कहानी का सार है।

अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी हो तो कमेंट करें और बताएं कि मोहब्बत का असली रिश्ता आपके लिए क्या मायने रखता है।