पुनर्जन्म | 4 साल के बच्चे ने बताई अपने पिछले जन्म की कहानी | 4 साल का बच्चा निकला…

हरियाणा के एक छोटे से गांव में एक किसान रामपाल और उसकी पत्नी सुमित्रा के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। यह एक खुशी का मौका था, क्योंकि उन्हें कई वर्षों के प्रयास के बाद संतान सुख मिला था। बच्चे का नाम देवांश रखा गया। देवांश की परवरिश साधारण किसान परिवार में होने लगी, लेकिन उसकी आदतें असाधारण थीं। जैसे-जैसे वह बड़ा होने लगा, उसका व्यवहार गांव के बाकी बच्चों से बिल्कुल अलग था।

देवांश की उम्र जब चार साल हुई, तो उसने अपने मां-बाप से ऐसी बातें करनी शुरू कीं, जिन्हें सुनकर किसी का भी दिमाग चकरा जाए। उसने कहा, “मेरा नाम देवांश नहीं है। मेरा नाम कर्नल रघुवीर है। मैं एक आर्मी ऑफिसर हूं। दिल्ली का रहने वाला हूं। मेरी उम्र 35 साल है। मेरी एक बीवी भी है जो प्रेग्नेंट है। मैं एक मिशन में शहीद हो गया था और मैंने अपनी बीवी से वादा किया था कि मैं वापस आऊंगा। इसलिए मैंने दोबारा जन्म लिया है।”

सुनकर रामपाल और सुमित्रा के होश उड़ गए। उन्हें लगा कि उनके बेटे पर कोई ऊपरी शक्ति का असर है। उन्होंने झाड़-फूंक करवाई, मंदिर-मस्जिद ले गए, लेकिन देवांश की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती जा रही थी। वह बार-बार एक ही बात दोहराता, “आप मेरे माता-पिता नहीं हो। मेरे माता-पिता तो एक कार एक्सीडेंट में मर चुके थे। मेरा नाम देवांश नहीं है। मेरा नाम कर्नल रघुवीर है।”

गांव में बात फैल गई कि रामपाल का बेटा पागल हो गया है। रामपाल और उसकी पत्नी शर्म और डर के मारे किसी से नजरें नहीं मिला पाते थे। देवांश की हालत ऐसी हो गई थी कि उसने कई बार घर से भागने की कोशिश की। लेकिन हर बार गांव वाले उसे पकड़ लाते। एक दिन उसने खाना-पीना बिल्कुल छोड़ दिया। वह बस एक ही रट लगाए हुए था, “मुझे प्रिया के पास जाना है।”

रामपाल और सुमित्रा अपने बच्चे को खोना नहीं चाहते थे। उन्होंने देवांश को एक कमरे में बंद करना शुरू कर दिया। लेकिन उनकी चिंता बढ़ती गई। एक दिन रामपाल ने गांव के प्रधान के पास जाकर अपनी समस्या बताई। प्रधान ने कहा, “इस मामले की गंभीरता को समझना होगा। हमें इस बच्चे को दिल्ली ले जाना पड़ेगा।”

प्रधान ने अपनी रिश्तेदार कणिका, जो दिल्ली पुलिस में एसपी थी, को फोन किया। कणिका ने शुरू में इसे अंधविश्वास समझा, लेकिन प्रधान की मिन्नतें सुनकर उसने एक बार जांच करने का फैसला किया। अगले दिन, जब कणिका ने देवांश के बारे में पता लगाया, तो उसे पता चला कि कर्नल रघुवीर नाम का एक आर्मी ऑफिसर चार साल पहले एक सीक्रेट मिशन के दौरान शहीद हो गया था। उसकी पत्नी का नाम प्रिया था और उनका एक चार साल का बेटा भी था।

जब कणिका ने यह जानकारी प्रधान को दी, तो वह सुन्न पड़ गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसे मुमकिन है। कुछ घंटे बाद, कणिका गांव पहुंची। उसने देवांश से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?” देवांश ने आत्मविश्वास से कहा, “मेरा नाम कर्नल रघुवीर है।” कणिका को यह सुनकर अजीब लगा, लेकिन उसने आगे की जांच करने का फैसला किया।

कणिका ने देवांश को एक कमरे में बुलाया। उसने देवांश से पूछा, “तुम्हारे माता-पिता कौन हैं?” देवांश ने कहा, “मेरे माता-पिता रामपाल और सुमित्रा नहीं हैं। मेरे माता-पिता प्रिया और रघुवीर हैं।” कणिका ने उसे और भी सवाल किए, लेकिन देवांश ने सभी का सही जवाब दिया।

कणिका को अब यकीन हो गया कि यह बच्चा सच में कुछ खास है। उसने फैसला किया कि उन्हें दिल्ली ले जाना होगा। जब वे दिल्ली पहुंचे, तो देवांश ने बिना किसी डर के रास्ता बताना शुरू किया। वह आत्मविश्वास से चल रहा था, जैसे वह पहले भी यहां आया हो।

आखिरकार, वे कर्नल रघुवीर के घर पहुंचे। देवांश ने दरवाजे पर खड़ी एक सुंदर महिला को पहचान लिया। वह प्रिया थी, रघुवीर की पत्नी। देवांश ने कहा, “प्रिया, तुमने यह सफेद विधवा वाली साड़ी क्यों पहन रखी है? मैं तो जिंदा हूं।” प्रिया हक्का-बक्का रह गई।

कणिका ने प्रिया को अकेले एक कमरे में ले जाकर उसे सारी बात समझाई। प्रिया को यकीन नहीं हो रहा था। कणिका ने कहा, “यह बच्चा हरियाणा के एक गांव का है। इसका नाम देवांश है। यह खुद को तुम्हारा पति कर्नल रघुवीर बताता है।”

प्रिया ने कहा, “यह बकवास है। कोई मेरे पति की यादों का फायदा उठा रहा है।” लेकिन जब देवांश ने प्रिया से उनकी पहली मुलाकात का जिक्र किया, तो प्रिया के हाथ-पैर कांपने लगे।

देवांश ने कहा, “आर्मी कैंटीन में तुमने कॉफी गिरा दी थी मेरी वर्दी पर।” प्रिया की आंखें फैल गईं। वह खुद को परखने का फैसला करती है और देवांश से पूछती है, “अगर तुम रघुवीर हो तो बताओ, मैंने इस घर में क्या बदलाव किया है?”

देवांश ने तुरंत कहा, “तुमने मेरी स्टडी को स्टोर रूम बना दिया और बेडरूम की दीवार का रंग नीला करवा दिया। मुझे नीला रंग पसंद नहीं था।” प्रिया अब खुद को रोक नहीं पाई और जमीन पर बैठकर रोने लगी।

कणिका ने देवांश को एक टेस्ट देने का फैसला किया। उसने आर्मी हेड क्वार्टर से कर्नल रघुवीर की ऑपरेशन थंडर टीम के सभी जीवित जवानों को बुलाया। जब वे वहां पहुंचे, तो देवांश ने उन्हें पहचान लिया और उनकी बातें बताईं।

सभी जवान हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने उस 5 साल के बच्चे को सैल्यूट किया। यह कणिका के लिए आखिरी सबूत था। उसने अपनी डायरी बंद की। केस खत्म हो चुका था।

इस घटना के बाद, रामपाल और उसकी पत्नी अपने बेटे को खोना नहीं चाहते थे और प्रिया अपने पति को फिर से जाने नहीं दे सकती थी। फैसला हुआ कि रामपाल और उसका परिवार दिल्ली में ही प्रिया के घर के पास रहेंगे।

जैसे-जैसे देवांश बड़ा होता गया, उसकी पिछले जन्म की यादें धुंधली पड़ने लगीं। वह एक आम बच्चा बन गया, जिसकी आंखों में अब कर्नल रघुवीर की नहीं बल्कि देवांश के अपने सपने थे।

उस हादसे के बाद रामपाल, उसकी पत्नी और देवांश अपने गांव लौट गए। अब उस घर में केवल प्रिया रह गई थी। तन से अकेली मगर मन से अब भी रघुवीर के साथ जुड़ी हुई।

इस कहानी ने हमें यह सिखाया कि प्यार और विश्वास की ताकत से कुछ भी संभव है। कभी-कभी, जीवन में ऐसे रहस्य होते हैं जो हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं। क्या वास्तव में पुनर्जन्म संभव है? या यह सिर्फ एक कहानी है? लेकिन एक चीज़ तो निश्चित है, प्यार कभी खत्म नहीं होता।

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