अच्छी बहू की तलाश में अरबपति मां लिया भिखारी का भेष फिर जो हुआ…….

सोने का दिल: अंजलि सिंघानिया की कठिन परीक्षा
जयपुर की गुलाबी शाम ढल चुकी थी और शहर की रोशनी ‘सिंघानिया मेंशन’ के कांच के झरोखों से टकराकर और भी चमकदार हो रही थी। लेकिन इस भव्य महल की तीसरी मंजिल पर खड़ी अंजलि सिंघानिया के मन में अंधेरा था। उनके हाथ में रखी चाय ठंडी हो चुकी थी, पर यादें अभी भी गर्म थीं।
अध्याय 1: एक मरते हुए पिता का वचन
अंजलि को आज भी वह दिन याद था जब उनके पति राजेश सिंघानिया अस्पताल में अपनी आखिरी सांसें ले रहे थे। करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने वाले राजेश ने अंजलि का हाथ पकड़कर कहा था, “अंजलि, आदित्य के लिए वह लड़की चुनना जो गहनों से नहीं, अपने संस्कारों से चमकती हो। मुझे वह बहू चाहिए जो हमारे बेटे की दौलत से नहीं, उसके वजूद से प्यार करे।”
आदित्य, जो आज राजस्थान का सबसे बड़ा बिजनेस आइकन था, लड़कियों के लिए एक ‘प्रॉप’ बन गया था। उसके साथ सेल्फी लेने वालों की लाइन थी, लेकिन उसके दिल को समझने वाला कोई नहीं था। अंजलि ने तय किया कि वे अब और दिखावा बर्दाश्त नहीं करेंगी।
अध्याय 2: रानी से भिखारिन तक का सफर
अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ, अंजलि सिंघानिया का एक नया अवतार जन्म ले चुका था। उन्होंने अपनी रेशमी साड़ियाँ उतारीं, हीरे के हार तिजोरी में बंद किए और अपनी पुरानी नौकरानी की फटी-पुरानी मटमैली साड़ी पहन ली। चेहरे पर राख और मिट्टी लगाई, बालों को बिखेरा और हाथ में एक फटा हुआ झोला ले लिया।
जब वे मेंशन की सर्विस लिफ्ट से बाहर निकलीं, तो कोई उन्हें पहचान नहीं पाया। तपती धूप में सड़क पर कदम रखते ही उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि दुनिया बिना पैसे के कितनी बेरहम है। प्यास लगने पर एक चाय वाले ने उन्हें दुत्कार दिया, “ए बुढ़िया! आगे बढ़, यहाँ भीड़ मत लगा।”
अंजलि की आँखों में आँसू थे, पर इरादा पत्थर जैसा मजबूत। वे उस इलाके की ओर बढ़ीं जहाँ आम लोग रहते थे—मालवीय नगर की तंग गलियाँ।
अध्याय 3: कूड़े के ढेर में मिला हीरा
मालवीय नगर के ‘आशीर्वाद अपार्टमेंट’ के पास अंजलि थककर एक पेड़ के नीचे बैठ गईं। वहीं पास में कूड़े का एक बड़ा ढेर था। अपनी योजना के अनुसार, अंजलि ने झुककर कूड़े से प्लास्टिक की बोतलें चुननी शुरू कीं। तभी उनका पैर फिसला और वे गिरने ही वाली थीं।
“संभल के माँ जी!” एक सुरीली और चिंता भरी आवाज गूंजी।
अंजलि ने ऊपर देखा। एक साधारण से सूट में एक बेहद खूबसूरत लड़की खड़ी थी। वह प्रिया थी। प्रिया ने बिना झिझक अंजलि के मैले हाथों को थामा और उन्हें सहारा देकर खड़ा किया। उसने अपने दुपट्टे से अंजलि के माथे का पसीना पोंछा।
“आप यहाँ बैठिए माँ जी, धूप बहुत तेज है,” प्रिया ने कोमलता से कहा। अंजलि ने अपना अभिनय जारी रखा, “बेटी, दो वक्त की रोटी के लिए यह कचरा चुनना पड़ता है।”
प्रिया का दिल पिघल गया। उसने बिना किसी घृणा के, खुद उस गंदे डस्टबिन से बोतलें निकालनी शुरू कीं और अंजलि के झोले में डाल दीं। ऊपर बालकनी से उसकी सौतेली माँ सुधा चिल्लाई, “प्रिया! उस भिखारिन के साथ क्या कर रही है? ऊपर आ, वरना आज खाना नहीं मिलेगा!”
प्रिया ने दुखी होकर अंजलि से माफी मांगी और अंदर चली गई। अंजलि समझ गई थीं—हीरा यहीं है।
अध्याय 4: अंतिम परीक्षा – सड़क पर बेहोशी
अगले दिन अंजलि ने परीक्षा को और कठिन बनाया। वे सब्जी मंडी के पास सड़क किनारे नकली खून और फटी साड़ी में बेहोश होकर गिर गईं। सैकड़ों लोग पास से गुजरे। किसी ने कहा, “पुलिस को फोन करो, झंझट में कौन पड़ेगा?” तो किसी ने घृणा से कहा, “ये भिखारी बीमार होते हैं, इन्हें मत छुओ।”
तभी प्रिया सब्जी लेने वहाँ से गुजर रही थी। जैसे ही उसने उस ‘बूढ़ी माँ’ को देखा, उसने अपना थैला फेंका और दौड़कर उनके पास आई। उसने अंजलि के सिर को अपनी गोद में रखा। “कोई ऑटो बुलाओ! प्लीज मदद करो!” वह रोते हुए चिल्लाई।
उसने अपने पास जमा किए हुए आखिरी ₹850, जो उसने अपने पिता की बरसी के लिए बचाए थे, डॉक्टर को दे दिए। अंजलि ने जब आँखें खोलीं, तो प्रिया उन्हें पंखा झल रही थी। अंजलि ने पूछा, “बेटी, तूने अपने सारे पैसे मुझ पर खर्च कर दिए, अब तू क्या करेगी?” प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “माँ जी, पैसा फिर कमाया जा सकता है, पर दुआएं अनमोल होती हैं। मेरे पापा कहते थे—नेकी कर और दरिया में डाल।”
अंजलि को अपना जवाब मिल गया था। उन्होंने प्रिया को एक ‘ऑफिस असिस्टेंट’ की नौकरी का झांसा देकर अगले दिन ‘सिंघानिया टावर्स’ बुलाया।
अध्याय 5: सच का सामना
अगले दिन प्रिया कांपते कदमों से सिंघानिया टावर्स पहुँची। उसे लगा था कि वह किसी क्लर्क से मिलेगी, पर उसे सीधे १५वीं मंजिल पर ले जाया गया। जब वह शानदार कांच के केबिन में घुसी, तो सामने आदित्य सिंघानिया बैठा था।
“सर, मैं शायद गलत जगह आ गई हूँ,” प्रिया ने डरते हुए कहा। तभी पीछे से अंजलि सिंघानिया अपनी सिल्क की साड़ी और हीरे के गहनों में बाहर आईं। प्रिया उन्हें देखकर स्तब्ध रह गई।
“माँ जी? आप?” प्रिया के मुँह से बस इतना ही निकला। अंजलि ने प्रिया को गले लगा लिया और आदित्य से कहा, “बेटा, यही है वह लड़की जिसके पास सोने का दिल है।”
अंजलि ने प्रिया को सारी सच्चाई बताई। प्रिया की आँखों में आँसू थे, पर इस बार ये धोखे के नहीं, बल्कि सम्मान के आँसू थे। अंजलि ने कहा, “प्रिया, तुमने एक भिखारिन की मदद की, एक अजनबी का इलाज कराया। तुमने इंसान को उसकी हैसियत से नहीं, उसकी जरूरत से देखा। क्या तुम मेरे बेटे और इस घर की रौनक बनोगी?”
अध्याय 6: एक नई शुरुआत
आदित्य ने भी प्रिया की सादगी और सच्चाई को परखा और उसे दिल दे बैठा। उन्होंने किसी बड़े होटल में नहीं, बल्कि उसी छोटे से क्लीनिक के बाहर प्रिया को प्रपोज किया जहाँ उसने अंजलि की जान बचाई थी।
शादी बहुत धूमधाम से नहीं, बल्कि सादगी से हुई। अंजलि ने अपनी बहू को गहनों से लादने के बजाय उसे ‘सिंघानिया चैरिटी’ की जिम्मेदारी सौंपी। प्रिया ने उन गलियों को नहीं भुलाया जहाँ से वह आई थी।
वर्षों बाद, जब प्रिया और आदित्य के बच्चे हुए, तो अंजलि उन्हें वह पुरानी फटी हुई साड़ी दिखातीं और कहतीं, “याद रखना बच्चों, असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि दूसरों के आँसू पोंछने में होती है। तुम्हारी माँ इस साम्राज्य की मालकिन नहीं, बल्कि इस घर की सबसे बड़ी दौलत है।”
शिक्षा: सच्ची सुंदरता और संस्कार विपत्ति के समय ही प्रकट होते हैं। दिखावे की दुनिया में सादगी और मानवता ही सबसे बड़ा आभूषण है।
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