अनाथ बच्चे ने भूखे कुत्ते को खिलाई अपनी आखिरी रोटी…फिर कुत्ते ने जो किया, वह देख आप दंग रह जाएंगे!

भूख, दोस्ती और वफादारी – बालू, मोती और हेमंत की कहानी

प्रस्तावना

भूख की मार सबसे खतरनाक होती है। यह ना उम्र देखती है ना मासूमियत। यह पेट की वह आग है जो इंसान को कुछ भी करने पर मजबूर कर देती है। लेकिन इसी भूख और गरीबी के बीच कभी-कभी इंसानियत का एक फूल खिलता है, जिसकी खुशबू पत्थरों को भी पिघला सकती है।
यह कहानी है 12 साल के बालू की, जो एक अंधेरी गली के कोने में अपनी फटी हुई चादर ओढ़े बैठा था। बालू अनाथ था। 5 साल पहले एक सड़क हादसे ने उसके माता-पिता को उससे छीन लिया था और तब से यह फुटपाथ ही उसका घर था और आसमान उसकी छत।

फुटपाथ की जिंदगी

दिसंबर की कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। हवा इतनी सर्द थी कि हड्डियों को भी कांपने पर मजबूर कर दे। बालू ने दिन भर कूड़ा बिनकर और रद्दी बेचकर कुल ₹20 जमा किए थे। उसका पेट सुबह से खाली था। भूख के मारे उसकी आंतें सिकुड़ रही थीं। उसकी नजर सामने वाली बेकरी पर टिकी थी, जहां से ताजा ब्रेड और केक की खुशबू आ रही थी।
वह खुशबू उसकी भूख को और भी बढ़ा रही थी। बालू ने अपनी मुट्ठी में भी हुए उन ₹20 को देखा। उसकी कमाई इतनी ही थी कि वह अपने लिए सिर्फ एक बद्ध पांव या सूखी ब्रेड खरीद सके। हिम्मत करके वह बेकरी के पास गया।

दुकानदार सेठ बनवारी उसे देखकर नाक-भौं सिकोड़ने लगा।
“ए लड़के, दूर रह। गंदे हाथ मत लगा।”
बालू ने चुपचाप काउंटर पर सिक्के रखे और एक ब्रेड का पैकेट मांगा।
सेठ ने अनमने ढंग से ब्रेड का सस्ता पैकेट उसकी तरफ फेंक दिया।

बालू के लिए वह सूखी ब्रेड किसी शाही दावत से कम नहीं थी।
वह ब्रेड लेकर वापस अपनी जगह उस स्ट्रीट लाइट के नीचे आ गया, जहां वह रोज सोता था।
उसने पैकेट खोला ही था और ब्रेड का पहला टुकड़ा मुंह की तरफ ले जा रहा था कि तभी उसे एक धीमी सी कराने की आवाज सुनाई दी।

मोती से मुलाकात

बालू रुका। उसने अपनी दाई ओर देखा। वहां कचरे के डिब्बे के पास एक मरियल सा गंदा कुत्ता लेटा हुआ था। उसकी पसलियां साफ दिखाई दे रही थीं और उसके पैर में चोट लगी थी जिससे खून रिस रहा था। कुत्ता ठंड से बुरी तरह कांप रहा था और उसकी नजरें सीधे बालू के हाथ में मौजूद ब्रेड पर टिकी थीं।
उन आंखों में एक अजीब सी लाचारी थी। ऐसी मूख पुकार जिसे सिर्फ वही समझ सकता था जिसने खुद भूख को करीब से देखा हो।

बालू के हाथ रुक गए। उसका पेट गवाही दे रहा था कि उसे उस भोजन की सख्त जरूरत है। लेकिन उसका दिल उस बेजुबान जानवर की हालत देख पसीज गया।
उसे याद आया कि जब उसकी मां जिंदा थी तो वह हमेशा कहती थी,
“बेटा, जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है और भगवान उनकी मदद करता है जो दूसरों का दर्द समझते हैं।”

बालू ने एक पल के लिए अपनी भूख को भूलने की कोशिश की।
वह धीरे-धीरे उस कुत्ते के पास गया। कुत्ता डर के मारे थोड़ा पीछे खिसका।
लेकिन बालू ने बड़े प्यार से ब्रेड का एक टुकड़ा उसकी तरफ बढ़ाया।
कुत्ते ने पहले सूंघा और फिर एक ही बार में उसे निगल गया।
वह कितना भूखा था, यह देखकर बालू की आंखों में आंसू आ गए।
बालू ने एक और टुकड़ा दिया। फिर एक और।
देखते ही देखते बालू ने अपनी पूरी ब्रेड उस कुत्ते को खिला दी।
खुद भूखा रहकर उसने उस बेजुबान का पेट भरा था।

कुत्ता पूंछ हिलाता हुआ बालू के पैरों के पास आकर बैठ गया, जैसे उसे कोई पुराना साथी मिल गया हो।
उस रात बालू का पेट भले ही खाली था लेकिन उसका दिल एक अजीब से सुकून से भरा हुआ था।

दोस्ती और सहारा

ठंड बहुत थी लेकिन थोड़ी देर बाद उसे अपने पैरों के पास गर्माहट महसूस हुई।
उसने देखा कि वही कुत्ता जिसका पेट उसने भरा था, अब सट कर उसके पैरों के पास लेटा हुआ था।
मानो वह अपने शरीर की गर्मी देकर बालू को ठंड से बचाने की कोशिश कर रहा हो।

उस रात फुटपाथ की उस ठंडी जमीन पर दो अनाथ रूहों ने एक दूसरे में सहारा ढूंढ लिया था।
सुबह जब बालू की आंख खुली तो उसने सोचा कि कुत्ता चला गया होगा।
लेकिन वह वहीं बैठा बालू के उठने का इंतजार कर रहा था।
बालू ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा,
“तू अभी तक यहीं है? तेरा नाम क्या रखूं? मोती… हां, मोती ठीक रहेगा।”
मोती ने अपनी पूंछ हिलाकर सहमति जताई।

उस दिन से बालू और मोती की जोड़ी बन गई।
जहां बालू कूड़ा बिनने जाता, मोती उसके पीछे-पीछे चलता।
अगर कोई बालू को डांटता या मारने की कोशिश करता तो मोती ढाल बनकर सामने खड़ा हो जाता और जोर-जोर से भौंकने लगता।
जो दुनिया कल तक बालू को अनदेखा करती थी, अब मोती के कारण थोड़ा संभलकर चलने लगी थी।

बालू अपनी रूखी सूखी रोटी में से आधा हिस्सा हमेशा मोती को देता।
यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा।

बीमारी और संघर्ष

कुदरत शायद उनकी परीक्षा अब भी और लेना चाहती थी।
मौसम बद से बदतर होता जा रहा था। लगातार पड़ती ओस और ठंडी हवाओं ने बालू को जकड़ लिया।
एक शाम कूड़ा बिनकर लौटते वक्त बालू को तेज चक्कर आया और वह सड़क किनारे गिर पड़ा।
उसका शरीर बुखार से तप रहा था। उसके पास ना दवा के पैसे थे, ना ही कोई डॉक्टर को बुलाने वाला।
वह अपनी फटी पुरानी चादर में सिकुड़ कर लेट गया।
उसका बदन आग की तरह जल रहा था।

मोती समझ गया कि उसका नन्हा दोस्त मुसीबत में है।
वह बालू के चेहरे को चाटता, कभी उसके पास लेट जाता और राहगीरों की तरफ देखकर मदद के लिए भौंकता।
लेकिन शहर की भीड़ में किसी के पास एक बीमार भिखारी बच्चे के लिए वक्त नहीं था।
लोग उसे नशेड़ी या पागल समझकर आगे बढ़ जाते।

दो दिन बीत गए। बालू की हालत बिगड़ती जा रही थी।
वह अब बेहोशी की हालत में था।

खतरा और मोती की वफादारी

तभी वहां से गुजरते हुए एक संदिग्ध आदमी की नजर बालू पर पड़ी।
उस आदमी का नाम शंकर था, जो शहर में बच्चों से भीख मंगवाने वाले गिरोह का गुर्गा था।
शंकर ने देखा कि लड़का लावारिस पड़ा है और बीमार है। उसकी आंखों में एक चमक आ गई।
उसने सोचा – यह बीमार है, लोग इसे देखकर ज्यादा दया करेंगे और ज्यादा भीख देंगे।
इसे उठा ले चलता हूं।

शंकर धीरे-धीरे दबे पांव बालू की ओर बढ़ा।
जैसे ही वह बालू को उठाने के लिए झुका, सन्नाटे को चीरती हुई एक खूंखार गुर्राहट सुनाई दी।
मोती, जो अब तक बालू की आड़ में बैठा था, शेर की तरह तना हुआ खड़ा था।
उसके दांत बाहर निकले हुए थे और आंखों में खून उतर आया था।

शंकर थोड़ा घबराया लेकिन उसने मोती को डराने के लिए पत्थर उठाया।
“हट जा कुत्ते!” वह चिल्लाया।
लेकिन मोती अपनी जगह से 1 इंच भी नहीं हिला।
वह जानता था कि आज उसे अपने दोस्त का कर्ज चुकाना है।

शंकर को लगा था कि वह एक लात मारेगा और यह मरियल सा कुत्ता दुम दबाकर भाग जाएगा।
लेकिन उसने मोती की वफादारी को कम आंका था।

जैसे ही शंकर ने दोबारा आगे बढ़ने की कोशिश की, मोती पूरी ताकत से उस पर झपटा।
उसने शंकर की पैंट को अपने जबड़ों में जकड़ लिया और उसे पीछे खींचने लगा।
शंकर घबरा गया। उसने पास ही पड़ा एक डंडा उठाया और मोती की पीठ पर दे मारा।
मोती दर्द से बिलबिलाया। एक पल के लिए उसकी पकड़ ढीली हुई लेकिन वह पीछे नहीं हटा।
वह फिर से गुर्राया और इस बार उसने शंकर की पिंडली पर अपने दांत गड़ा दिए।

सन्नाटे वाली सड़क पर शंकर की चीख गूंज उठी।
“आ छोड़ मुझे शैतान!”
वह दर्द से चिल्लाया और लंगड़ाते हुए पीछे हटा।

मोती अब बालू के शरीर के ऊपर खड़ा हो गया था।
किसी अभेद्य दीवार की तरह उसके मुंह से लार टपक रही थी और वह लगातार उस बदमाश पर नजर रखे हुए था।

शंकर समझ गया कि जब तक यह कुत्ता जिंदा है, वह उस लड़के को हाथ भी नहीं लगा सकता।
डर और दर्द के मारे शंकर ने वहां से भागने में ही भलाई समझी।
वह गालियां बकता हुआ अंधेरे में ओझल हो गया।

मोती अब भी वहीं खड़ा था। हाफ रहा था। उसकी पीठ पर डंडे की चोट से सूजन आ गई थी।
लेकिन उसने अपनी जगह नहीं छोड़ी।

एक नई उम्मीद – हेमंत से मिलना

तभी सड़क के दूसरी ओर एक चमकती हुई लग्जरी गाड़ी आकर रुकी।
शायद शंकर की चीख या कुत्ते के लगातार भौंकने की आवाज ने कार में बैठे व्यक्ति का ध्यान खींच लिया था।
गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बाहर निकला।
उसका नाम हेमंत था, जो शहर का एक जाना-माना उद्योगपति था।

हेमंत ने दूर से ही देखा कि एक कुत्ता फुटपाथ पर लेटे एक बच्चे के ऊपर खड़ा होकर रक्षात्मक मुद्रा में है।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। मोती ने हेमंत को अपनी ओर आते देखा तो वह फिर से गुर्राने लगा।
उसे लगा कि शायद यह भी बालू को चोट पहुंचाने आया है।

हेमंत वहीं रुक गया। उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और घुटनों के बल बैठ गया ताकि उसका कद कुत्ते के बराबर हो जाए।
वह कुत्तों की भाषा समझता था।
“शांत हो जाओ दोस्त, शांत हो जाओ।”
हेमंत ने बेहद नरम आवाज में कहा।
“मैं उसे चोट पहुंचाने नहीं आया हूं। अच्छा मैं मदद करना चाहता हूं।”

मोती ने हेमंत की आंखों में देखा।
जानवरों के पास इंसानों की नियत पहचानने की एक छठी इंद्रिय होती है।
मोती को हेमंत की आवाज में खतरा नहीं बल्कि दया महसूस हुई।
उसकी गुर्राहट कम हो गई, लेकिन वह बालू के ऊपर से नहीं हटा।

हेमंत ने धीरे-धीरे हाथ बढ़ाया और बालू के माथे को छूने की कोशिश की।
मोती ने उसे रोका नहीं।
जैसे ही हेमंत का हाथ बालू के माथे पर लगा, वह सिहर उठा।
“हे भगवान, यह तो आग की तरह तप रहा है।”
हेमंत बुदबुदाया।

उसने तुरंत फैसला लिया।
अपनी बाहें बालू के नीचे डाली और उसे गोद में उठा लिया।
मोती ने एक हल्की सी आवाज निकाली और हेमंत के पीछे चलने लगा।

हेमंत ने अपनी कार का पिछला दरवाजा खोला और बालू को गद्देदार सीट पर लिटा दिया।
फिर उसने मुड़कर मोती की ओर देखा जो कार के दरवाजे पर खड़ा होकर अंदर झांक रहा था।
जैसे पूछ रहा हो कि क्या मैं भी आ सकता हूं?

हेमंत मुस्कुराया,
“आ जाओ बहादुर। तुम अपने दोस्त को अकेले कैसे छोड़ोगे?”

मोती ने एक छलांग लगाई और बालू के पैरों के पास जाकर सिकुड़ कर बैठ गया।
हेमंत ने गाड़ी स्टार्ट की और सीधे शहर के सबसे बड़े अस्पताल की ओर बढ़ा दी।

अस्पताल में इंसानियत

अस्पताल के पोर्च में जैसे ही हेमंत की गाड़ी रुकी, उसने बिना एक पल गवाए बालू को अपनी गोद में उठाया और इमरजेंसी की तरफ भागा।
“डॉक्टर जल्दी देखिए, यह बच्चा बहुत बीमार है।”
हेमंत की रसूखदार आवाज और महंगी वेशभूषा देखकर अस्पताल का स्टाफ तुरंत हरकत में आ गया।

वार्ड बॉय स्ट्रेचर लेकर दौड़े।
बालू को स्ट्रेचर पर लिटाया गया और डॉक्टर उसे आईसीयू की तरफ ले गए।
इस पूरी भागदौड़ में मोती भी पीछे-पीछे अंदर घुसने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन सुरक्षा गार्ड ने उसे डंडा दिखाकर रोक दिया।
“बाहर निकल, जानवर अंदर नहीं जा सकते।”
मोती वहीं कांच के दरवाजे के पास ठिटक गया।
उसने जबरदस्ती अंदर घुसने की कोशिश नहीं की।
बस अपनी नम आंखों से उस स्ट्रेचर को तब तक देखता रहा जब तक वह उसकी नजरों से ओझल नहीं हो गया।

हेमंत ने डॉक्टरों को निर्देश दिया कि बच्चे के इलाज में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
सारा खर्चा वह उठाएगा।

डॉक्टर ने बताया कि बालू को निमोनिया हो गया है और ठंड के कारण संक्रमण बहुत फैल चुका है।
“अगर आप इसे लाने में थोड़ी और देर करते तो शायद हम इसे बचा नहीं पाते।”
हेमंत ने राहत की सांस ली और कांच के दरवाजे की तरफ देखा।
बाहर कड़ाके की ठंड थी और मोती अभी भी वहीं मूर्ति की तरह बैठा था।
उसकी नजरें लगातार अंदर के गलियारे पर टिकी थीं।

हेमंत का दिल भर आया।
उसने गार्ड को बुलाया और कहा,
“इस कुत्ते को यहां वेटिंग एरिया के कोने में बैठने दो। यह कोई आम कुत्ता नहीं है, यह उस बच्चे का परिवार है। और हां, कैंटीन से इसके लिए दूध और बिस्कुट का इंतजाम करो।”

गार्ड हेमंत का रुतबा जानता था।
उसने तुरंत मोती को अंदर बुला लिया।
मोती चुपचाप एक कोने में बैठ गया।
उसका ध्यान सिर्फ उस दिशा में था जहां उसके दोस्त को ले जाया गया था।

पूरी रात हेमंत वहीं कुर्सी पर बैठा रहा।
वह सोचने लगा कि उसके पास दौलत, शोहरत और बड़ा बंगला सब कुछ है।
लेकिन क्या कोई ऐसा है जो उसके लिए इस तरह बिना किसी स्वार्थ के जान देने को तैयार हो? शायद नहीं।

उसे उस अनाथ बच्चे और सड़क के कुत्ते के बीच का यह निस्वार्थ प्रेम देखकर अपनी जिंदगी खोखली लगने लगी।
यह रिश्ता खून का नहीं बल्कि रूह का था।

नई सुबह, नया परिवार

अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ बालू के शरीर में हरकत हुई।
उसने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोली।
उसे अपने ऊपर वह फटी हुई चादर नहीं बल्कि एक गर्म और मुलायम कंबल महसूस हुआ।
हवा में कचरे की बदबू नहीं बल्कि दवाओं की गंध थी।
वह घबरा गया, “मैं कहां हूं?” उसने कमजोर आवाज में पूछा।
उसका हाथ आदतन अपने बगल में टटोला, जहां मोती सोया करता था।
लेकिन वहां कोई नहीं था।
एक डर उसके दिल में बैठ गया।
“मोती… मोती कहां है?”

वह उठने की कोशिश करने लगा लेकिन कमजोरी के कारण वापस गिर पड़ा।
तभी कमरे का दरवाजा खुला और हेमंत अंदर आया।
उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी।
“घबराओ मत बेटे, तुम सुरक्षित हो।”
हेमंत ने पास आकर उसके सिर पर हाथ फेरा।

बालू ने सहमी हुई नजरों से उसे देखा और बस एक ही सवाल किया,
“साहब, मेरा कुत्ता… वो मोती… वो ठीक तो है ना?”

हेमंत की आंखों में नमी आ गई।
अपनी जान की परवाह किए बिना इस बच्चे को सबसे पहले अपने साथी की चिंता थी।
“वह बिल्कुल ठीक है। वह बाहर तुम्हारा ही इंतजार कर रहा है। उसने कल रात से कुछ नहीं खाया है। शायद वह तुम्हारे हाथ से ही खाना चाहता है।”

हेमंत ने नर्स से इशारा किया और थोड़ी ही देर बाद मोती को अंदर लाया गया।
जैसे ही मोती ने बिस्तर पर लेटे बालू को देखा, उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा।
वह पूंछ हिलाता हुआ दौड़ा और बिस्तर के पास खड़ा होकर बालू का हाथ चाटने लगा।

बालू की कमजोर आंखों से आंसू बह निकले।
उसने अपनी बाहें मोती के गले में डाल दी और उसे कसकर भींच लिया।
उस पल उस आलीशान अस्पताल के कमरे में जो दृश्य था, उसने वहां मौजूद हर इंसान की आंखें नम कर दी।

एक गरीब अनाथ बच्चा और एक सड़क का कुत्ता।
दोनों के पास दुनिया की नजर में कुछ नहीं था, पर एक दूसरे के लिए वे ही पूरी दुनिया थे।

इंसानियत का पाठ

बालू ने अपनी थाली से बिस्कुट उठाया और मोती को खिलाया।
ठीक वैसे ही जैसे उसने उस पहली मुलाकात में अपनी ब्रेड खिलाई थी।
मोती ने भी खुशी-खुशी खाया।
हेमंत एकटक उन्हें देखता रहा।

तभी बालू ने डरते-डरते पूछा,
“साहब, आपने मुझे क्यों बचाया? मेरे पास तो आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है। ना पैसा, ना घर…”

हेमंत कुर्सी खींच कर उसके पास बैठ गया।
उसकी आवाज भारी हो गई,
“बेटा, तुमने मुझे वह दिया है जो करोड़ों रुपए खर्च करके भी नहीं मिलता – इंसानियत का पाठ। जिस रात तुमने अपनी भूख मारकर इस बेजुबान को खाना खिलाया था, उस दिन मैं अपनी गाड़ी में बैठा सब देख रहा था। मैं बेकरी के पास ही था। मैं देखना चाहता था कि दुनिया में क्या अब भी अच्छाई बची है। और उस दिन तुमने मुझे वह उम्मीद दी।”

हेमंत ने आगे बताया कि कैसे उसका अपना बेटा सालों पहले उसे छोड़कर विदेश चला गया था और कभी पलटकर नहीं देखा।
वह दुनिया की भीड़ में अकेला महसूस करता था।
लेकिन बालू और मोती के रिश्ते ने उसे सिखा दिया कि परिवार खून के रिश्तों से नहीं बल्कि एहसास और त्याग से बनता है।

“बालू, मैं तुम्हें वापस सड़क पर नहीं जाने दूंगा। मेरा घर बहुत बड़ा है लेकिन बहुत खाली है। क्या तुम और मोती मेरे साथ चलोगे? क्या तुम मेरे बेटे बनकर उस घर की सूनी दीवारों में जान डालोगे?”

बालू को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।
जिस समाज ने उसे हमेशा दुत्कारा था, आज वही समाज उसे अपना रहा था।

उसने मोती की ओर देखा।
मोती ने अपनी चमकदार आंखों से जैसे सहमति दी।
बालू ने धीरे से सिर हिलाया,
“जी बाबूजी।”

हेमंत ने उसे गले लगा लिया।

एक नया जीवन

कुछ दिनों बाद बालू को अस्पताल से छुट्टी मिल गई।
हेमंत उसे और मोती को लेकर अपने बंगले पर पहुंचा।
नौकरों ने जब एक सड़क के बच्चे और कुत्ते को मालिक के साथ देखा तो हैरान रह गए।
लेकिन हेमंत के लिए अब वही उसका परिवार थे।

बालू को नए कपड़े मिले, अच्छा खाना मिला और सबसे बड़ी बात – सुरक्षा मिली।
मोती के लिए भी एक खास बिस्तर लगवाया गया।
लेकिन वह हमेशा बालू के कमरे में उसके पलंग के नीचे ही सोता था।

जिंदगी पटरी पर लौट रही थी।
लेकिन कहानी का सबसे बड़ा मोड़ आना अब भी बाकी था।

लालच और साजिश

हेमंत का एक बिजनेस पार्टनर था, कुंदन।
कुंदन की नजर हेमंत की जायदाद पर थी।
क्योंकि हेमंत का कोई वारिस नहीं था।
कुंदन को उम्मीद थी कि हेमंत के बाद सब कुछ उसे ही मिलेगा।
लेकिन बालू के आने से उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
कुंदन को डर सताने लगा कि कहीं हेमंत अपनी सारी संपत्ति इस अनाथ बच्चे के नाम ना कर दे।

लालच इंसान को अंधा कर देता है।
और कुंदन ने एक खौफनाक साजिश रच डाली।
उसने तय किया कि वह बालू को रास्ते से हटा देगा ताकि उसका रास्ता साफ हो जाए।

साजिश का पर्दाफाश

एक दिन हेमंत को किसी जरूरी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा।
उसे लौटने में एक दिन लगने वाला था।
उसने घर के नौकरों को सख्त हिदायत दी कि बालू का खास ख्याल रखा जाए।

कुंदन को जैसे ही इस बात की भनक लगी कि हेमंत शहर में नहीं है, उसकी आंखों में शैतानी चमक आ गई।
उसने एक बड़ा सा डिब्बा लेकर हेमंत के बंगले पर पहुंचा।
बालू बगीचे में मोती के साथ खेल रहा था।
कुंदन ने बालू को आवाज दी,
“बेटा बालू, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूं। शहर की सबसे मशहूर मिठाई तुम्हारे पापा ने भिजवाई है।”

बालू स्वभाव से बहुत भोला था, उसने कुंदन की बातों पर विश्वास कर लिया।
वह दौड़कर कुंदन के पास पहुंचा।
लेकिन मोती, जो अब तक शांत बैठा था, अचानक सतर्क हो गया।
उसके कान खड़े हो गए और वह कुंदन को देखकर धीमी आवाज में गुर्राने लगा।

मोती को कुंदन से आने वाली गंध और उसकी नजरों में छिपी क्रूरता पसंद नहीं आ रही थी।

कुंदन ने डिब्बा खोला और एक चमचमाता हुआ लड्डू निकालकर बालू की ओर बढ़ाया।
“ले बेटा, खा ले। यह बहुत स्वादिष्ट है।”

उस लड्डू में कुंदन ने एक तेज जहर मिला रखा था, जो कुछ ही मिनटों में किसी की भी जान ले सकता था।

बालू ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
जैसे ही बालू की उंगलियां लड्डू को छूने वाली थी, मोती ने एक तेज छलांग लगाई।
उसने जोर से भौंकते हुए बालू के हाथ पर झपट्टा मारा, जिससे वह लड्डू बालू के हाथ से छूटकर दूर घास पर जा गिरा।

“मोती, यह क्या कर रहे हो?”
बालू चिल्लाया।
उसे लगा कि मोती शायद खेलना चाह रहा है।
लेकिन मोती का रूप आज अलग था।
वह कुंदन और बालू के बीच दीवार बनकर खड़ा हो गया और कुंदन पर खूंखार तरीके से भौंकने लगा।

कुंदन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
उसकी योजना विफल हो रही थी।
“हट जा, पागल कुत्ते!”
कुंदन चिल्लाया और उसने पास ही पड़ी एक लोहे की रड उठा ली,
“आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा।”

बालू डर गया,
“अंकल, प्लीज उसे मत मारो।”

लेकिन कुंदन पर खून सवार था।
उसने रड हवा में लहराई और मोती के सिर पर मारने की कोशिश की।
मोती फुर्ती से पीछे हट गया।

इसी बीच बगीचे में दाना चुग रहे एक कौवे ने जमीन पर पड़े उस लड्डू को चोंच मारी।
उसने अभी दो-चार दाने ही निगले थे कि अचानक वह फड़फड़ाने लगा और देखते ही देखते बालू और कुंदन की नजरों के सामने उस पक्षी ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।

बालू सन्न रह गया।
वह समझ गया कि वह मिठाई नहीं, मौत थी।
मोती ने उसकी जान बचाई थी।

कुंदन घबरा गया।
उसका राज खुल चुका था।
अब उसके पास छिपने का कोई रास्ता नहीं था।

उसने अपना असली रूप दिखाया।
उसने रड फेंकी और अपनी जेब से एक चाकू निकाल लिया,
“अगर यह कुत्ता नहीं मरने देगा तो मैं तुझे अपने हाथों से मारूंगा।”

कुंदन ने चिल्लाते हुए बालू की तरफ दौड़ लगाई।
बालू डर के मारे पीछे हटा और गिर पड़ा।
चाकू बालू के सीने में उतरने ही वाला था कि तभी हवा में एक परछाई लहराई।

मोती ने अपनी पूरी ताकत से कुंदन की कलाई पर अपने मजबूत जबड़े गड़ा दिए।
कुंदन दर्द से बिलबिला उठा।
मोती के नुकीले दांत उसकी कलाई के मांस में धंस चुके थे।
उसके हाथ से चाकू छूटकर दूर जा गिरा।

“छोड़ मुझे, छोड़!”
कुंदन चीख रहा था।
लेकिन मोती की आंखों में आज खून सवार था।
वह किसी भी कीमत पर उस शैतान को छोड़ना नहीं चाहता था।

शोर सुनकर घर के माली और चौकीदार लाठियां लेकर दौड़े।
उन्होंने देखा कि कुंदन जमीन पर गिरा है और मोती ने उसे दबोच रखा है।
नौकरों ने तुरंत कुंदन को चारों तरफ से घेर लिया और उसे पकड़ लिया।

ठीक उसी वक्त गेट पर गाड़ी के रुकने की आवाज आई।
हेमंत को रास्ते में एक अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी।
जैसे उसका दिल कह रहा हो कि घर पर सब ठीक नहीं है।
वह अपनी मीटिंग रद्द करके आधे रास्ते से ही लौट आया था।

जैसे ही वह गाड़ी से उतरा और बगीचे का मंजर देखा, उसके होश उड़ गए।
बालू बुरी तरह कांप रहा था।
मोती गुर्रा रहा था और कुंदन नौकरों की गिरफ्त में था।

बालू दौड़कर हेमंत के गले लग गया और फूट-फूट कर रोने लगा,
“बाबूजी, कुंदन अंकल… वो लड्डू…”

बालू ने हिचकियों के बीच सारी बात बताई और जमीन पर पड़े उस मरे हुए कौवे की तरफ इशारा किया।
हेमंत ने जब उस काले पड़ चुके पक्षी और बिखरे हुए लड्डू को देखा तो उसे माजरा समझते देर नहीं लगी।
उसका खून खौल उठा।
जिस दोस्त पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया वही उसके बेटे की जान का दुश्मन बन बैठा था।
और जिस बेजुबान को लोग पत्थर मारते थे, उसने आज एक ढाल बनकर उसके परिवार को बचाया था।

हेमंत कुंदन के पास गया और उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा मारा,
“कुंदन, जानवर यह कुत्ता नहीं, तुम हो। इसने तो जानवर होकर भी वफादारी निभाई और तुमने इंसान होकर भी शैतानी की।”

पुलिस को बुलाया गया और कुंदन को हत्या की कोशिश के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया।
जब पुलिस उसे हथकड़ी लगाकर ले जा रही थी तो मोती ने एक आखिरी बार जोर से भौंक कर अपनी जीत का ऐलान किया।

परिवार का नया अर्थ

उस रात हेमंत बालू के कमरे में बैठा था।
बालू सो चुका था लेकिन मोती अभी भी जाग रहा था, बालू के बिस्तर के पास पहरा देते हुए।
हेमंत ने मोती के सिर पर हाथ फेरा।
उसकी आंखों से आंसू छलक आए।
उसे वह पहली रात याद आई जब उसने सड़क पर एक भूखे बच्चे को एक जख्मी कुत्ते को अपनी रोटी खिलाते देखा था।

“अगर उस दिन तुमने अपनी भूख मारकर इसे वो ब्रेड ना खिलाई होती, बालू…”
हेमंत ने सोते हुए बच्चे को देखकर धीरे से कहा,
“…तो आज शायद तुम जिंदा ना होते। तुम्हारी उस एक नेकी ने आज तुम्हारी जान बचा ली। सच ही कहा गया है, कर्म लौट कर जरूर आता है। बालू ने एक कुत्ते को जीवन दिया था और आज उसी कुत्ते ने बालू को जीवन दान दिया।”

उस अनाथ बच्चे, उस सड़क के कुत्ते और उस अकेले अमीर आदमी ने मिलकर दुनिया को सिखा दिया कि परिवार खून के रिश्तों से नहीं बल्कि प्यार, त्याग और विश्वास से बनता है।

उस आलीशान बंगले में अब कभी सन्नाटा नहीं था, क्योंकि वहां निस्वार्थ प्रेम की खिलखिलाहट गूंज रही थी।

समापन

यह कहानी हमें सिखाती है कि भूख, गरीबी और अकेलापन चाहे जितना भी गहरा हो, इंसानियत और वफादारी की एक छोटी सी चिंगारी पूरी दुनिया बदल सकती है।
अगर आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है, तो प्यार और दया ही सबसे बड़ी दौलत है।
और कभी-कभी एक रोटी, एक दोस्त और एक नेक दिल – बस इतना ही काफी होता है किसी की पूरी दुनिया बदलने के लिए।

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