आखिर उस चिट्ठी में ऐसा क्या लिखा था?

पारुल का सपना – एक पिता, एक बेटी और एक स्कूल की इंसानियत
भूमिका
गरीबी केवल जेब की हालत नहीं, बल्कि दिल की मजबूती का इम्तिहान है। यह कहानी है चंद्रपुर की एक छोटी सी कॉलोनी की, जहां देवेंद्र पाटिल की चाय की दुकान के धुएं में सिर्फ चाय नहीं, उम्मीद भी उबलती है। उसकी बेटी पारुल, 7 साल की मासूम, डॉक्टर बनने का सपना देखती है। लेकिन जब गरीबी उसके सपनों के रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो जाती है, तब इंसानियत, हौसला और माफी की ताकत मिलकर एक ऐसी कहानी लिखते हैं, जो पीढ़ियों तक याद रखी जाती है।
संघर्ष की शुरुआत
पारुल स्कूल से लौटती है। उसकी आवाज कांप रही है, “पापा आज स्कूल में सबने मुझसे बात नहीं की।”
देवेंद्र पाटिल के हाथों में सफेद लिफाफा है, जिसमें लाल अक्षरों में लिखा है –
अंतिम चेतावनी। 3 महीने की बकाया फीस ₹15,000 कल तक जमा ना होने पर पारुल का नाम स्कूल से काट दिया जाएगा।
देवेंद्र की सांस रुक गई। बेटी की तरफ देखा – स्कूल ड्रेस फटी हुई, जूते घिसे हुए, लेकिन आंखों में सपने चमक रहे थे।
“पापा, क्या मैं कल स्कूल जा पाऊंगी?”
देवेंद्र कुछ बोल नहीं पाया। उसकी जेब में सिर्फ ₹70 थे।
देवेंद्र का जीवन
चंद्रपुर की आशियाना कॉलोनी, गली नंबर 12।
देवेंद्र की छोटी सी चाय की दुकान – सुबह 5 बजे खोलता, रात 10 बजे बंद करता।
पत्नी कविता दो घरों में बर्तन मांझती थी।
महीने के ₹8000 – किराया 3000, राशन 2000, बिजली-पानी 1000, बाकी बचता क्या? कुछ नहीं।
6 महीने पहले मां की बीमारी में 15,000 का कर्ज लेना पड़ा।
अब हर दिन एक संघर्ष था। और अब पारुल की फीस…
कोशिशें और उम्मीदें
रात को कविता ने कहा, “कल स्कूल जाकर प्रिंसिपल से मिल लो। कुछ दिन का वक्त मांग लो।”
देवेंद्र ने सिर हिलाया, लेकिन मन में सवाल था – कितनी बार मांगेंगे वक्त?
अगली सुबह, देवेंद्र ब्राइट फ्यूचर एकेडमी के गेट पर खड़ा था। स्कूल बड़ा था, पौश इलाके में।
फटी चप्पल, मैले कपड़े देखकर गार्ड ने रोका।
“मुझे प्रिंसिपल साहब से मिलना है, बहुत जरूरी है।”
गार्ड ने मुंह बनाया, लेकिन अंदर जाने दिया।
ऑफिस में संजय मेहता, स्कूल का अकाउंटेंट।
“तुम फिर आ गए? सर बस एक हफ्ते का वक्त दे दीजिए, मैं फीस भर दूंगा।”
“हफ्ता… 3 महीने हो गए पाटिल। अब बहुत हो गया। कल तक पैसे नहीं आए तो पारुल का नाम कट जाएगा।”
देवेंद्र के पैर कांप गए।
“सर, प्लीज… वो बच्ची है, उसकी पढ़ाई छूट जाएगी…”
“यहां चैरिटी नहीं चल रही, स्कूल चल रहा है।”
देवेंद्र ने हाथ जोड़े, “सर, मैं प्रिंसिपल साहब से एक बार बात कर लूं?”
“वह बाहर गए हैं, शाम को आना।”
मनोज त्रिपाठी से मुलाकात
शाम को देवेंद्र फिर स्कूल पहुंचा।
प्रिंसिपल मनोज त्रिपाठी – 60 साल के, सफेद बाल, गंभीर चेहरा।
“आइए…”
“सर, मैं पारुल पाटिल का पिता हूं, कक्षा तीन…”
“हां, मुझे पता है। तुम्हारी बेटी की फीस 3 महीने से बाकी है।”
“सर, मेरी मां बीमार थी, इलाज में सारे पैसे खर्च हो गए। अब जोड़ रहा हूं पैसे, बस दो हफ्ते का वक्त दे दीजिए।”
मनोज त्रिपाठी ने गहरी सांस ली।
“पाटिल जी, मुझे तुम्हारी मुश्किल समझ में आती है। लेकिन स्कूल के नियम हैं, सबके साथ एक जैसा व्यवहार करते हैं।”
“सर, मैं वादा करता हूं, मैं पैसे दे दूंगा…”
“बस ठहरो…”
प्रिंसिपल ने हाथ उठाया, कुछ सोचने लगे।
“तुम कल सुबह 9 बजे आना, मैं कुछ सोचता हूं।”
देवेंद्र को थोड़ी उम्मीद बंधी।
उम्मीद की किरण
अगली सुबह, ठीक 9 बजे स्कूल पहुंच गया।
स्कूल के मुख्य गेट पर बड़ा बैनर –
हर बच्चे का हक है शिक्षा।
देवेंद्र समझ नहीं पाया।
ऑफिस में संजय मेहता मुंह लटकाए बैठा था।
“प्रिंसिपल साहब ने बुलाया है, तुम्हें अंदर जाओ।”
देवेंद्र केबिन में गया।
मनोज त्रिपाठी के साथ दीप्ति वर्मा – पारुल की क्लास टीचर।
“बैठिए पाटिल जी।”
“पाटिल जी, मैंने रात भर सोचा और एक फैसला लिया है। लेकिन इससे पहले मुझे तुमसे एक सवाल पूछना है। तुम्हारी बेटी पारुल की ड्रेस फटी हुई थी कल, जूते घिसे हुए थे, फिर भी वह रोज स्कूल आती है। क्यों?”
देवेंद्र की आंखों में पानी आ गया।
“सर, वो पढ़ना चाहती है। उसका सपना है डॉक्टर बनने का। मैं उसका सपना नहीं तोड़ सकता।”
दीप्ति वर्मा बोली, “सर, पारुल क्लास में सबसे होशियार है। हर टेस्ट में फर्स्ट आती है।”
मनोज त्रिपाठी ने सिर हिलाया, फिर एक फाइल देवेंद्र के सामने रखी।
“पाटिल जी, यह देखो…”
देवेंद्र ने फाइल खोली –
फी वेवर एप्लीकेशन अप्रूव्ड।
देवेंद्र की आंखें फटी रह गईं।
“सर, यह क्या है?”
“पाटिल जी, हमने तुम्हारी बेटी की फीस माफ कर दी है। अब से पारुल को कोई फीस नहीं देनी होगी, बोर्ड तक।”
देवेंद्र की आंखों से आंसू बह निकले।
“सर, आप… आप ऐसा क्यों?”
“क्योंकि पारुल जैसी प्रतिभा को हम खोना नहीं चाहते। दीप्ति मैम ने बताया कि तुम्हारी बेटी हर सब्जेक्ट में सबसे तेज है। उसका भविष्य उज्जवल है, और हमारा स्कूल ऐसे बच्चों को सपोर्ट करता है।”
देवेंद्र ने हाथ जोड़ दिए।
“सर, मैं… मैं आपका एहसान कभी नहीं भूलूंगा।”
“एहसान नहीं, पाटिल जी, यह हमारा फर्ज है।”
नई शुरुआत
देवेंद्र उठा, बाहर निकला। उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।
सीधा घर की तरफ भागा। कविता दरवाजे पर खड़ी थी।
“क्या हुआ? सब ठीक है?”
देवेंद्र ने उसे गले लगा लिया।
“कविता, पारुल की फीस माफ हो गई। स्कूल ने माफ कर दी।”
कविता की आंखों में भी आंसू आ गए। दोनों रो पड़े – खुशी के आंसू।
शाम को पारुल स्कूल से आई।
देवेंद्र ने उसे गोद में उठा लिया।
“बेटा, अब तुम्हें कोई स्कूल से नहीं निकालेगा। तुम पढ़ोगी, बड़ी डॉक्टर बनोगी।”
“पक्का पापा?”
“बिल्कुल पक्का।”
एहसान का बदला
उस रात देवेंद्र को नींद नहीं आई। सोचता रहा – इतना बड़ा एहसान कैसे चुकाएगा?
अगले दिन सुबह स्कूल गया।
“सर, मैं आपका धन्यवाद करने आया हूं।”
“धन्यवाद की जरूरत नहीं, पाटिल जी।”
“सर, लेकिन मैं कुछ करना चाहता हूं। मैं स्कूल के लिए कुछ काम कर सकता हूं, कुछ भी…”
मनोज त्रिपाठी ने सोचा, फिर बोले –
“ठीक है, अगर तुम चाहो तो स्कूल के बगीचे में थोड़ी मदद कर सकते हो। माली की तबीयत ठीक नहीं रहती।”
“जी सर, मैं रोज सुबह आ जाऊंगा।”
और वैसा ही हुआ।
देवेंद्र रोज सुबह 4 बजे उठता, 5 बजे स्कूल पहुंच जाता।
बगीचे में पौधों को पानी देता, घास काटता, फूलों की देखभाल करता।
फिर 7 बजे अपनी दुकान खोलता।
स्कूल के बच्चे उसे देखते –
“वो देखो पारुल के पापा…”
पारुल को शर्म आती, लेकिन गर्व भी होता।
सच्चाई का सामना
तीन हफ्ते बाद, देवेंद्र स्कूल के बगीचे में काम कर रहा था।
संजय मेहता आया, चेहरा गुस्से से लाल –
“पाटिल, तुम्हें प्रिंसिपल साहब ने बुलाया है, अभी।”
देवेंद्र घबरा गया। क्या हुआ? उसने कुछ गलत किया?
ऑफिस में मनोज त्रिपाठी की मेज पर कुछ कागज पड़े थे।
“पाटिल जी, मुझे तुमसे कुछ पूछना है और सच बताना…”
“जी सर…”
“तुमने मुझसे झूठ बोला था…”
देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।
“सर, मैं… मैं समझा नहीं…”
मनोज त्रिपाठी ने एक कागज उठाया।
“यह रिपोर्ट है। मैंने तुम्हारे बारे में पता लगाया। और मुझे पता चला कि तुमने मुझसे पूरी सच्चाई नहीं बताई…”
देवेंद्र के हाथ जोड़ गए।
“सर, मुझे माफ कर दीजिए। मेरी मां की बीमारी का इलाज 15,000 में नहीं हुआ था, 45,000 में हुआ था। मुझे 30,000 और कर्ज लेना पड़ा। साहूकार से वह हर महीने ब्याज मांगता है। मैं उसे 2,000 देता हूं। इसलिए फीस के पैसे नहीं बचते थे…”
मनोज त्रिपाठी ने गहरी सांस ली।
“पाटिल जी, तुम्हें पता है मुझे इस बात से क्या लगा?”
देवेंद्र ने सिर झुका लिया।
“मुझे लगा कि तुम अभी भी अकेले लड़ रहे हो, अपनी सारी परेशानी छुपा रहे हो…”
देवेंद्र ने सिर उठाया।
मनोज त्रिपाठी की आंखों में नमी थी।
“पाटिल जी, मैं तुम्हें एक बात बताता हूं। 15 साल पहले मैं भी तुम्हारी जगह पर था। मेरा बेटा बीमार था, मेरे पास पैसे नहीं थे। तब एक डॉक्टर ने मुफ्त इलाज किया। उसने कहा था – मनोज, जब तुम कामयाब हो जाओ तो किसी जरूरतमंद की मदद जरूर करना। आज मैं वही कर रहा हूं।”
देवेंद्र फूट-फूट कर रोने लगा।
मनोज त्रिपाठी ने एक और फाइल निकाली।
“यह देखो, मैंने स्कूल के ट्रस्ट से बात की है। हम तुम्हारा 30,000 का कर्ज चुका देंगे। साहूकार से तुम्हें छुटकारा मिल जाएगा।”
देवेंद्र विश्वास नहीं कर पाया।
“सर, यह कैसे संभव है?”
“क्योंकि हमारे स्कूल का मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं है। हम समाज को बदलना चाहते हैं, एक-एक परिवार को मदद करके।”
देवेंद्र उठा, मनोज त्रिपाठी के पैर छूने लगा।
“नहीं, ऐसा मत करो। बस अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा देना, वही काफी है।”
एक नई सुबह
देवेंद्र घर लौटा। उसे लग रहा था जैसे सपना देख रहा है।
कविता को सब बताया। कविता रोते-रोते हंस पड़ी।
रमेश चौधरी का अंतिम खत
अगले दिन सुबह स्कूल में एक बड़ी भीड़ थी।
गेट पर पुलिस की गाड़ी खड़ी थी।
देवेंद्र का दिल बैठ गया।
ऑफिस में दो पुलिस वाले, मनोज त्रिपाठी गंभीर, संजय मेहता सिर झुकाए।
“आप देवेंद्र पाटिल हैं?”
“जी…”
“हमें आपसे कुछ सवाल पूछने हैं…”
देवेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई।
क्या उसने कुछ गलत किया? क्या कर्ज लेना अपराध है?
पुलिस वाले ने एक फोटो दिखाया –
“क्या आप इस आदमी को जानते हैं?”
देवेंद्र ने फोटो देखी – साहूकार रमेश चौधरी।
“जी, मैंने इससे पैसे लिए थे…”
“यह आदमी कल रात मर गया…”
देवेंद्र की सांस अटक गई।
“क्या?”
“और उसकी जेब में एक कागज मिला है, जिस पर तुम्हारा नाम लिखा है…”
देवेंद्र के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
“सर, मेरा नाम… लेकिन मैंने तो कुछ नहीं किया…”
पुलिस वाले ने वह कागज निकाला –
देवेंद्र पाटिल का कर्ज ₹0 माफ। नीचे रमेश चौधरी के हस्ताक्षर थे, तारीख थी कल की।
देवेंद्र की आंखें फटी रह गईं।
“यह… यह कैसे?”
“रमेश चौधरी को कल रात दिल का दौरा पड़ा। मरने से पहले उसने यह कागज लिखा। उसके बेटे ने बताया कि कल दोपहर कोई स्कूल से फोन आया था। प्रिंसिपल ने बात की थी। उसके बाद से रमेश चौधरी बहुत परेशान था…”
देवेंद्र ने मनोज त्रिपाठी की तरफ देखा।
मनोज त्रिपाठी ने धीरे से कहा,
“मैंने उसे फोन किया था। मैंने कहा था कि हम पाटिल जी का कर्ज चुकाना चाहते हैं। लेकिन उसने मना कर दिया। उसने कहा कि वह खुद सोचेगा…”
पुलिस वाले ने आगे कहा,
“उसके बेटे ने बताया कि रमेश चौधरी रात भर कुछ सोचता रहा। सुबह 3 बजे उसने यह कागज लिखा। फिर 4 बजे उसे दिल का दौरा पड़ा…”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
देवेंद्र की आंखों से आंसू बह निकले।
“सर, उसने ऐसा क्यों किया? वह तो बहुत सख्त आदमी था, हमेशा ब्याज मांगता था…”
पुलिस वाले ने एक और कागज निकाला –
आखिरी खत।
“बेटा राजीव, मैं जानता हूं तुम मुझे कठोर इंसान समझते हो। लेकिन आज मुझे एहसास हुआ कि मैं गलत था। जब प्रिंसिपल साहब ने फोन किया और देवेंद्र पाटिल की कहानी बताई, तो मुझे अपना अतीत याद आ गया। 35 साल पहले मैं भी देवेंद्र जैसा था। गरीब, बेबस। तब एक स्कूल के प्रिंसिपल ने मेरी मदद की थी। मेरी बेटी तुम्हारी बहन नेहा की फीस माफ कर दी थी। लेकिन मैं उस एहसान को चुका नहीं पाया। नेहा बीमारी में चली गई। उसके बाद मैं सख्त हो गया, पैसों के पीछे भागता रहा। लेकिन आज मुझे लगा कि मैं फिर वही मौका पा सकता हूं, किसी की जिंदगी बदल सकता हूं। इसलिए मैंने देवेंद्र का कर्ज माफ कर दिया। बेटा, मेरे जाने के बाद तुम इस कागज को देवेंद्र को दे देना और उसे बताना कि कभी-कभी माफी देना ही सबसे बड़ी दौलत होती है।”
कमरे में सबकी आंखें नम थीं।
देवेंद्र जमीन पर बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा।
मनोज त्रिपाठी ने उसके कंधे पर हाथ रखा –
“पाटिल जी, उठो। रमेश चौधरी ने तुम्हें एक नई जिंदगी दी है, उसका सम्मान करो।”
बदलाव की शुरुआत
उस दिन के बाद देवेंद्र की जिंदगी बदल गई।
कर्ज से मुक्ति मिली, पारुल की पढ़ाई जारी रही।
देवेंद्र ने एक और काम शुरू किया।
रमेश चौधरी की याद में हर महीने ₹500 एक जगह जमा करने शुरू किए।
“यह मैं क्यों कर रहा हूं?” कविता ने पूछा।
“क्योंकि एक दिन किसी और देवेंद्र को मदद की जरूरत पड़ेगी, तब यह पैसे काम आएंगे।”
6 महीने बीत गए। पारुल की पढ़ाई शानदार चल रही थी।
स्कूल में उसका नाम सबसे होशियार बच्चों में आता था।
देवेंद्र की चाय की दुकान भी अच्छी चलने लगी।
लोग उसकी कहानी सुनकर उसके पास आते –
“आप वही हैं ना जिनकी बेटी की फीस माफ हुई थी?”
देवेंद्र मुस्कुरा देता –
“हां, लेकिन असली कहानी तो रमेश चौधरी की है।”
सम्मान और नई जिम्मेदारी
स्कूल की वार्षिक परीक्षा में पारुल ने पूरे स्कूल में पहला स्थान हासिल किया।
मनोज त्रिपाठी ने स्पेशल असेंबली बुलाई –
“आज मैं आप सबके सामने पारुल पाटिल को सम्मानित करना चाहता हूं। लेकिन साथ ही मैं उसके पिता देवेंद्र पाटिल को भी सम्मानित करना चाहता हूं। क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया कि गरीबी कभी हार की वजह नहीं होती। हौसला और मेहनत ही असली दौलत है।”
पूरा स्कूल तालियां बजाने लगा।
पारुल स्टेज पर गई, ट्रॉफी ली।
फिर उसने माइक पकड़ा –
“थैंक यू सर, थैंक यू टीचर्स, लेकिन सबसे ज्यादा थैंक यू मेरे पापा को जिन्होंने कभी हार नहीं मानी।”
देवेंद्र स्टेज के नीचे खड़ा था, आंखों में आंसू थे – लेकिन इस बार यह दुख के नहीं, खुशी के, गर्व के आंसू थे।
स्कूल की नई पहल
असेंबली के बाद मनोज त्रिपाठी ने देवेंद्र को अपने केबिन में बुलाया।
“पाटिल जी, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं। तुम रोज सुबह यहां आकर बगीचे का काम करते हो। लेकिन अब मैं चाहता हूं कि तुम यहां स्कूल के परमानेंट माली बन जाओ। तनख्वाह 10,000, साथ में तुम्हारी दुकान भी चला सकते हो।”
देवेंद्र को विश्वास नहीं हुआ।
“सर, आप मेरे लिए इतना कर रहे हैं?”
“नहीं, पाटिल जी, यह तुमने अपनी मेहनत से कमाया है। और एक बात – अगले साल से स्कूल एक नया प्रोग्राम शुरू कर रहा है।
रमेश चौधरी स्कॉलरशिप फंड – हर साल पांच गरीब बच्चों की पूरी फीस माफ होगी।”
देवेंद्र की आंखों में फिर आंसू आ गए।
“सर, यह नाम रमेश चौधरी के नाम पर?”
“हां, क्योंकि उन्होंने हमें सिखाया कि माफी देना कितनी बड़ी ताकत है।”
एक पिता का संदेश
उस शाम देवेंद्र घर लौटा।
पारुल दरवाजे पर खड़ी थी –
“पापा, आज टीचर ने कहा कि मैं बड़ी होकर जरूर डॉक्टर बनूंगी।”
देवेंद्र ने उसे गोद में उठा लिया।
“बेटा, तुम जो भी बनोगी, बस एक बात याद रखना…”
“क्या पापा?”
“जो लोग तुम्हारी मदद करें, उनका एहसान कभी मत भूलना। और जब तुम कामयाब हो जाओ, तो किसी और की मदद जरूर करना।”
“पक्का पापा, मैं बड़ी होकर गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करूंगी।”
देवेंद्र ने उसे चूमा।
आसमान में तारे चमक रहे थे और देवेंद्र को लगा जैसे उन तारों में से एक रमेश चौधरी है जो मुस्कुरा रहा है।
समापन
रात को खाना खाते वक्त कविता ने कहा –
“जानते हो? आज कॉलोनी की एक औरत ने मुझसे पूछा कि तुम्हारा पति इतना खुश कैसे रहता है?”
“क्योंकि उसने सीख लिया है कि असली खुशी पैसों में नहीं, अपनों की मुस्कान में होती है।”
देवेंद्र ने मुस्कुरा कर कहा –
“बिल्कुल सही कहा तुमने।”
उस रात देवेंद्र को गहरी नींद आई।
पहली बार कई महीनों में उसे कोई टेंशन नहीं थी, कोई डर नहीं था।
बस एक ख्वाब था – पारुल का ख्वाब, जो अब पूरा होने वाला था।
नई कहानी की शुरुआत
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
यह एक शुरुआत है – एक ऐसे सफर की जो देवेंद्र, पारुल, मनोज त्रिपाठी और रमेश चौधरी ने मिलकर शुरू किया।
एक ऐसा सफर जहां इंसानियत पैसों से बड़ी है, माफी देना बदले लेने से ज्यादा ताकतवर है, और जहां एक पिता का सपना, एक बेटी की मेहनत और एक स्कूल की समझदारी मिलकर एक नई कहानी लिख सकते हैं।
देवेंद्र आज भी ब्राइट फ्यूचर एकेडमी में काम करता है।
पारुल आज दसवीं कक्षा में है, टॉप कर रही है।
उसका सपना अब भी वही है – डॉक्टर बनना और गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करना।
रमेश चौधरी स्कॉलरशिप फंड ने अब तक 30 से ज्यादा बच्चों की जिंदगी बदल दी है।
क्योंकि कभी-कभी एक छोटी सी मदद पूरी जिंदगी बदल देती है, और कभी-कभी एक इंसान का एहसान पीढ़ियों तक चलता रहता है।
समाप्त
News
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