इस बच्चे की हिम्मत देख Indian Army भी रो पड़ी! रोंगटे खड़े कर देगा

गुलैल का सिपाही: राजू और जनरल का साहस

अध्याय 1: सरहद का नन्हा रखवाला

कश्मीर की खूबसूरत वादियों में, जहाँ बर्फ से ढके पहाड़ आसमान को छूते हैं, वहाँ के घने जंगलों में एक गहरा राज दफ़न था। यह कहानी किसी फिल्मी हीरो की नहीं, बल्कि 12 साल के राजू की है। राजू अपनी बूढ़ी दादी के साथ सीमा के पास एक छोटे से गाँव में रहता था। उसके माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे, और गाँव वाले कहते थे कि उसके पिता सेना में थे और देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे।

राजू का रोज़ का काम था जंगल से सूखी लकड़ियाँ और जड़ी-बूटियाँ चुनना। एक दिन, एक तीतर का पीछा करते हुए राजू ‘काली घाटी’ के प्रतिबंधित इलाके में जा पहुँचा। वहाँ उसने कुछ ऐसा देखा जिसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी।

अध्याय 2: लोहे का पिंजरा और कैद शेर

सामने दो विशाल बरगद के पेड़ों के बीच एक लोहे का बड़ा पिंजरा रखा हुआ था। पिंजरे के अंदर कोई जानवर नहीं, बल्कि एक इंसान कैद था। राजू ने गौर से देखा, वह भारतीय सेना की वर्दी में एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति थे। उनकी वर्दी पर लगे सितारे और ‘विक्रम सिंह’ नाम का बैज बता रहा था कि वह कोई साधारण सिपाही नहीं, बल्कि एक जनरल थे।

तभी वहाँ दो नकाबपोश दुश्मन आए, जिनके हाथों में ए.के.-47 राइफलें थीं। वे अजीब भाषा में बात कर रहे थे। राजू ने सुना कि वे जनरल साहब को बेहोश कर सरहद पार ले जाने की योजना बना रहे थे। उन्हें ‘बाप पक्षी’ यानी हेलीकॉप्टर का इंतज़ार था।

अध्याय 3: राजू की पहली चाल

राजू जानता था कि वह अकेला उन हथियारों से लैस दुश्मनों का मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन वह भागना भी नहीं चाहता था। उसने अपनी पुरानी गुलैल निकाली। उसने निशाना साधकर एक कंकड़ पास के पेड़ पर बैठे लंगूरों के झुंड पर मारा।

लंगूरों के शोर मचाने से दुश्मन सतर्क हो गए। एक दुश्मन जांच करने के लिए दूर गया, और पिंजरे के पास केवल एक ही बचा। राजू रेंगते हुए पिंजरे के पीछे पहुँचा। “साहब, मैं राजू हूँ। मैं आपको यहाँ से निकालूँगा,” उसने धीमी आवाज़ में जनरल साहब से कहा। जनरल साहब ने उसे अपनी जान बचाने के लिए भाग जाने को कहा, लेकिन राजू के मन में अपने पिता जैसी ही वीरता थी।

अध्याय 4: ताला और संडासी

रात का अंधेरा गहरा गया था। राजू को पता था कि बिना चाबी के ताला खोलना मुश्किल है। वह पास की एक पुरानी चरवाहा झोपड़ी की ओर भागा। वहाँ कबाड़ में उसे एक भारी और पुरानी संडासी (प्लायर्स) मिली। वह वापस पिंजरे के पास पहुँचा।

दुश्मनों ने आग जला रखी थी। राजू ने झाड़ियों में दूसरी ओर आग लगाकर उनका ध्यान भटकाया। जैसे ही दोनों दुश्मन आग बुझाने और जांच करने दौड़े, राजू ने संडासी से अपनी पूरी जान लगाकर ताला तोड़ दिया। जनरल साहब का शरीर नशीली दवाओं और चोटों के कारण कमजोर था, लेकिन राजू ने उन्हें सहारा दिया और जंगल की गहराई में ले गया।

अध्याय 5: कीचड़ के भूत

दुश्मनों ने पिंजरा खाली देखा तो कोहराम मच गया। आसमान में हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट सुनाई दी। जनरल साहब ने बताया कि दुश्मनों के पास थर्मल ट्रैकर (गर्मी पहचानने वाली मशीन) हो सकती है। राजू ने तुरंत एक उपाय सोचा। उसने नाले की ठंडी काली मिट्टी और कीचड़ उठाया और उसे खुद पर और जनरल साहब पर पोत दिया।

“साहब, हमें भूत बनना पड़ेगा,” राजू ने कहा। कीचड़ के कारण थर्मल ट्रैकर उन्हें नहीं पहचान पा रहा था। वे दोनों नाले की झाड़ियों में छिप गए और मौत उनके सिर के ऊपर से गुजर गई।

अध्याय 6: भूतिया गुफा का रहस्य

राजू जनरल साहब को ‘काला पहाड़’ की ओर ले गया, जहाँ एक गुफा थी जिसे लोग ‘भूतिया गुफा’ कहते थे। वहाँ चुंबकीय चट्टानें (Magnetic Rocks) थीं। जैसे ही वे गुफा के करीब पहुँचे, हेलीकॉप्टर के उपकरण काम करना बंद कर दिए। पायलट चिल्लाया, “नेविगेशन सिस्टम फेल!”

गुफा के अंदर पहुँचकर जनरल साहब ने राजू को एक छोटी मेमोरी चिप दी। “इसमें गद्दारों के नाम हैं राजू। अगर यह दुश्मनों के हाथ लग गई तो हज़ारों जवान मारे जाएंगे।” जनरल साहब ने राजू को दूसरे रास्ते से भाग जाने को कहा, जबकि वह खुद दुश्मनों को रोकने के लिए तैयार थे।

अध्याय 7: चमगादड़ों का हमला

दुश्मन गुफा के द्वार तक पहुँच चुके थे। राजू ने देखा कि गुफा की छत पर हज़ारों चमगादड़ सो रहे थे। उसने मिट्टी के तेल (केरोसिन) की आखिरी बूंदों से एक कपड़े में आग लगाई और उसे छत की ओर उछाल दिया।

अचानक हुए शोर और रोशनी से चमगादड़ पागल होकर उड़ने लगे। हज़ारों चमगादड़ों ने दुश्मनों पर हमला बोल दिया। दुश्मन अपनी आँखें बचाने के लिए चिल्लाने लगे और पीछे हटने को मजबूर हो गए। इसी भगदड़ का फायदा उठाकर राजू ने जनरल साहब को दूसरे गुप्त रास्ते से बाहर निकाला।

अध्याय 8: मिशन की सफलता

पहाड़ी के दूसरी ओर पहुँचकर राजू ने एक पत्थर पर चढ़कर देखा, दूर आर्मी कैंप की रोशनी दिखाई दे रही थी। वह जनरल साहब को सहारा देते हुए वहाँ तक पहुँचा। जब कैंप के संतरी ने उन्हें रोका, तो राजू ने चिल्लाकर कहा, “जनरल विक्रम सिंह यहाँ हैं!”

पूरा कैंप हरकत में आ गया। जनरल साहब को तुरंत अस्पताल ले जाया गया और वह चिप सही हाथों में पहुँच गई। अगले दिन, सेना ने उस चिप की मदद से सीमा पार के बड़े ऑपरेशन को नाकाम किया और भीतर छिपे गद्दारों को पकड़ा।

उपसंहार: असली वीर

कुछ दिनों बाद, राजू को दिल्ली बुलाया गया। उसे उसकी वीरता के लिए ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। जनरल विक्रम सिंह खुद उसे पदक पहनाने आए। उन्होंने राजू को गले लगाते हुए कहा, “आज अगर मैं ज़िंदा हूँ और मेरा देश सुरक्षित है, तो सिर्फ इस नन्हे सिपाही की वजह से।”

राजू ने मुस्कुराते हुए अपनी गुलैल की ओर देखा। उसे पता था कि उसके बापू आज उस पर बहुत गर्व कर रहे होंगे।