एक अकेला फौजी पुलिस वालों पर भारी पड़ गया।।

कर्तव्य पथ पर सिपाही

भाग 1: घर की दहलीज और मां का ममत्व

गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से होते हुए जब विक्रम अपनी मोटरसाइकिल से घर के पास पहुँचा, तो हवा में मिट्टी की वही चिर-परिचित सौंधी खुशबू थी जिसे वह सरहद की बर्फीली चोटियों पर अक्सर याद किया करता था। घर के बाहर पुराने नीम के पेड़ के नीचे बैठे काका को देखकर विक्रम ने गाड़ी धीमी की।

“राम-राम काका! कैसे हैं आपके पौधे?” विक्रम ने मुस्कुराते हुए पूछा।

बूढ़े काका की धुंधली आँखों में चमक आ गई। “अरे विक्रम बाबा! आप आ गए? कब आए? बताया भी नहीं।”

विक्रम ने उत्तर दिया, “बस काका, अभी आ रहा हूँ। सोचा सबको सरप्राइज दूँ। सब ठीक है ना?”

“सब बढ़िया है बेटा। जाओ, अंदर जाओ। माँ जी सुबह से ही बेचैन हैं, जैसे उन्हें पता हो कि उनका शेर बेटा आने वाला है।”

विक्रम घर के अंदर दाखिल हुआ। अगरबत्ती की खुशबू और माँ के हाथ के बने खाने की महक ने उसका स्वागत किया। वह कुछ देर चुपचाप दरवाजे पर खड़ा रहा। अंदर से माँ की आवाज आई, “विक्रम! बेटा तू बाहर क्यों खड़ा है? अंदर आ ना। कब से तेरा रास्ता देख रही थी।”

विक्रम हैरान रह गया। “माँ, आपको कैसे पता चला कि मैं हूँ?”

“माँ हूँ तेरी, तेरी आहट पहचानती हूँ।” माँ ने उसके माथे को चूमा। “तू बैठ, मैं तेरे लिए नाश्ता लाती हूँ। तूने रास्ते में कुछ खाया?”

विक्रम सोफे पर ढहते हुए बोला, “नहीं माँ, तेरे हाथ का खाना खाने के लिए ही तो भूख बचा कर रखी थी।”

कुछ ही देर में मेज पर गरमा-गरम पराठे और मक्खन सज गए। विक्रम ने पहला निवाला लिया और उसकी आँखें भर आईं। “वाह माँ! आज तो दावत है। दुनिया में कहीं भी चले जाओ, पर माँ के हाथ के खाने जैसा स्वाद कहीं नहीं मिलता।”

माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। “दुबला हो गया है तू। वहां ठीक से खाना नहीं मिलता क्या?”

“अरे माँ, फौज का खाना बहुत बढ़िया होता है, बस तेरे प्यार का तड़का नहीं होता वहां।”

भाग 2: कर्तव्य की पुकार

अभी नाश्ता खत्म ही हुआ था कि विक्रम के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘CO सर’ का नाम चमक रहा था। विक्रम का चेहरा तुरंत गंभीर हो गया।

“यस कमांडिंग ऑफिसर, विक्रम हियर।”

“जय हिंद विक्रम। कहाँ हो तुम?” दूसरी तरफ से भारी आवाज आई।

“सर, घर पहुँचा हूँ। अभी नाश्ता कर रहा था।”

“विक्रम, एक इमरजेंसी है। तुम्हारी यूनिट को तुरंत मूव करने का ऑर्डर मिला है। क्या तुम अभी निकल सकते हो?”

विक्रम के अंदर का सैनिक जाग गया। “यस सर! आई एम मूविंग। मैं तुरंत निकलता हूँ।”

फोन रखते ही उसने देखा माँ की आँखों में आँसू थे। “बेटा, अभी तो आया था। नाश्ता तो पूरा कर ले। तुझे देखे एक साल हो गया, तूने वादा किया था कि इस बार रुकेगा।”

विक्रम ने माँ के हाथ थाम लिए। “माँ, इमरजेंसी है। अगर मैं नहीं गया तो मेरे साथी खतरे में पड़ सकते हैं। तू तो शेरनी है माँ, और मैं तेरा शेर बेटा। भारत माँ बुला रही है, मुझे जाना होगा।”

माँ ने भारी मन से आशीर्वाद दिया, “जा बेटा, विजय हो।”

विक्रम अपनी वर्दी पहनकर और अपनी सर्विस राइफल (AK-41) कंधे पर टांगकर निकल पड़ा। रास्ते में फिर वही काका मिले। “अरे बेटा क्या हुआ? अभी तो गए थे।”

“ड्यूटी काका, ड्यूटी!” विक्रम ने संक्षेप में उत्तर दिया और अपनी बाइक की रफ्तार बढ़ा दी।

भाग 3: अहंकार का टकराव

हाइवे पर सब-इंस्पेक्टर जालिम सिंह अपनी जीप में बैठा शिकार ढूंढ रहा था। उसके साथ उसके चेले कालिया, रेशम और बिल्लू थे। जालिम सिंह अपने नाम के अनुरूप ही भ्रष्ट और अहंकारी था।

“अरे कालिया, देख रहा है दरोगा जी का टशन आज? आज तो लग रहा है कोई बड़ा मुर्गा फंसेगा,” रेशम ने चापलूसी करते हुए कहा।

कालिया हंसा, “सही पकड़ा! आज तो अपनी चांदी है साहब।”

तभी जालिम सिंह की नजर तेजी से जाती हुई विक्रम की बाइक पर पड़ी। “देखो आगे कौन जा रहा है। लगता है कोई फौजी है। साहब चलो बढ़ाओ, देखते हैं कितनी हिम्मत है इसकी।”

जालिम सिंह ने अपनी जीप विक्रम की बाइक के समानांतर लगा दी। “ओए फौजी! ओ हीरो! कहाँ भागा जा रहा है बे?”

विक्रम ने शांत रहकर जवाब दिया, “जय हिंद साहब। यूनिट से इमरजेंसी कॉल आया है, जल्दी जाना है।”

जालिम सिंह को उसका संयम रास नहीं आया। “इमरजेंसी तेरे घर में होगी! ये सड़क तेरे बाप की है क्या? हेलमेट कहाँ है तेरा?”

विक्रम ने नरमी से कहा, “साहब, साइड में ही चल रहा हूँ। और हेलमेट जल्दबाजी में घर रह गया। प्लीज जाने दीजिए, मामला देश की सुरक्षा का है।”

रेशम पीछे से चिल्लाया, “अरे साहब, ये तो डरपोक निकला! देश की सुरक्षा का हवाला दे रहा है।”

जालिम सिंह ने जीप को विक्रम की बाइक की तरफ जोर से दबाया, जिससे विक्रम को अपनी बाइक सड़क से नीचे कच्ची मिट्टी में उतारनी पड़ी।

“ओए! नीचे क्यों उतर गया? दम नहीं है क्या?” जालिम सिंह ने ठहाका लगाया।

विक्रम का धैर्य अब जवाब दे रहा था। “साहब क्या चाहते हो? अब क्या खेत में उतार दूँ गाड़ी?”

“जुबान लड़ाता है? रेशम गाड़ी भगा! आगे अपना चेक पोस्ट आने वाला है, इसे वहीं रोकेंगे। आज इसकी वर्दी उतार कर ही दम लूँगा।”

भाग 4: चेक पोस्ट पर महाभारत

चेक पोस्ट पर पहुँचते ही पुलिस वालों ने विक्रम को चारों तरफ से घेर लिया। जालिम सिंह जीप से उतरा और विक्रम की बाइक की चाबी छीन ली।

“अब बोल! अब कहाँ गई तेरी रफ्तार?”

विक्रम बाइक से उतरा, उसकी आँखें लाल थीं। “साहब चाबी दीजिए। आप वर्दी वाले होकर एक फौजी को रोक रहे हैं?”

“अबे ओ फौजी! आवाज नीचे! यहाँ हम राजा हैं,” जालिम सिंह ने चिल्लाकर कहा और विक्रम के कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की।

विक्रम ने उसका हाथ झटक दिया। “हाथ मत लगाना! वर्दी की इज्जत करना सीखो।”

“अच्छा! तू हमें सिखाएगा कानून? तेरा चालान कटेगा, हेलमेट नहीं है, रश ड्राइविंग कर रहा है और पुलिस से बदतमीजी! गाड़ी सीज होगी और तू थाने जाएगा,” जालिम सिंह ने धमकाया।

विक्रम ने अपनी जेब से पैसे निकालने की कोशिश की। “साहब, चालान काटना है तो काटिए, जो जुर्माना है ले लीजिए, लेकिन मुझे जाने दीजिए। मेरी यूनिट इंतजार कर रही है।”

तभी जालिम सिंह ने विक्रम की वर्दी के कॉलर पर हाथ डाल दिया। विक्रम का पारा चढ़ गया। उसने जालिम सिंह का कलाई पकड़ ली। “साहब! हाथ अपनी हद में रखिए। यह फौजी की वर्दी है, किसी चोर की जेब नहीं।”

आस-पास भीड़ जमा हो गई थी। कुछ लोग वीडियो बनाने लगे।

जालिम सिंह ने आपा खो दिया। “देखो सब! इस बदमाश ने पुलिस पे बंदूक तानी है! गवाह रहो सब!”

विक्रम ने अपनी राइफल के स्ट्रैप को सही किया। “साहब, मैंने बंदूक तानी नहीं है, यह मेरे शरीर का हिस्सा है। मेरा सब्र टूट रहा है।”

“तेरी हेकड़ी निकाल दूंगा साले फौजी! मैं अभी एसपी साहब को फोन करता हूँ। तुझे यहीं नंगा करके मारूँगा,” जालिम सिंह ने चिल्लाकर कहा।

भाग 5: सोशल मीडिया और न्याय की पुकार

भीड़ में से एक युवक चिल्लाया, “देश के रक्षक का अपमान! देखिए कैसे भ्रष्ट पुलिस वाले एक आर्मी जवान को रोक रहे हैं। इसे वायरल करें!”

सोशल मीडिया की ताकत ने काम करना शुरू कर दिया। वीडियो कुछ ही मिनटों में जिले के पुलिस कप्तान (SP) सूर्यकांत राठौर के पास पहुँच गया। एसपी साहब अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। जैसे ही उन्होंने वीडियो देखा, उनका खून खौल उठा।

“इंस्पेक्टर शर्मा! ये वीडियो देखिए। ये कौन है?” एसपी ने चिल्लाकर पूछा।

“सर, ये सब-इंस्पेक्टर जालिम सिंह है, हाईवे पेट्रोलिंग पर,” शर्मा ने डरते हुए कहा।

“हिम्मत कैसे हुई इसकी? एक फौजी पे हाथ उठाया! यह वर्दी कानून की रक्षा के लिए है, गुंडागर्दी के लिए नहीं। गाड़ियां तैयार करो! हमें अभी इसी वक्त वहां पहुँचना होगा। मूव!”

उधर हाईवे पर, जालिम सिंह का अहंकार सातवें आसमान पर था। उसका फोन बज रहा था—एसपी साहब का कॉल था। लेकिन उसने फोन काट दिया। “अरे साहब, एसपी साहब का फोन है, उठा लो,” कालिया ने डरते हुए कहा।

“अबे चुप कर! बाद में बोल दूँगा कि नेटवर्क नहीं था। आज तो इस फौजी को मजा चखा के रहूँगा।”

तभी दूर से सायरन की आवाजें सुनाई देने लगीं। एक नहीं, बल्कि दस गाड़ियां तेजी से चेक पोस्ट की तरफ आ रही थीं।

भाग 6: न्याय का प्रहार

एसपी सूर्यकांत राठौर अपनी गाड़ी से उतरे। उनके साथ कमांडो और भारी पुलिस बल था। जालिम सिंह उन्हें देखते ही सिटपिटा गया।

“सर… आप यहाँ?” जालिम सिंह ने सैल्यूट मारने की कोशिश की।

एसपी ने उसे एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। “जालिम सिंह! मैंने तुम्हें फोन किया था, तुमने फोन क्यों नहीं उठाया?”

“सर… वो नेटवर्क… फोन साइलेंट…” जालिम सिंह हकलाने लगा।

एसपी ने विक्रम की तरफ इशारा किया। “ये वो है जिसकी वजह से तुम और मैं रात को चैन से सो पाते हैं। और तुमने इसके आत्मसम्मान को कुचलने की कोशिश की?”

“सर, ये रश ड्राइविंग कर रहा था…”

“चुप! मैंने वीडियो देखा है। तुमने पुलिस डिपार्टमेंट के नाम पर कालिख पोत दी है।”

एसपी राठौर विक्रम के पास गए। “जवान, मैं एसपी सूर्यकांत राठौर हूँ। मुझे खेद है कि आपको इस स्थिति का सामना करना पड़ा। भारतीय पुलिस भारतीय सेना का सम्मान करती है। कुछ सड़े हुए सेबों की वजह से पूरे टोकरे को खराब मत समझिएगा।”

विक्रम ने सैल्यूट किया। “सर, मुझे बस अपनी ड्यूटी पे जाना था।”

एसपी ने गरजते हुए आदेश दिया, “इंस्पेक्टर शर्मा! सब-इंस्पेक्टर जालिम सिंह, रेशम, बिल्लू और कालिया—इन चारों से इनकी बंदूकें और बेल्ट अभी वापस ले ली जाएं। इन्हें सस्पेंड किया जाता है और इनके खिलाफ क्रिमिनल केस दर्ज होगा।”

जालिम सिंह गिड़गिड़ाने लगा, “सर माफ कर दीजिए, गलती हो गई।”

“ले जाओ इन्हें यहाँ से और डाल दो उसी लॉकअप में जिसमें ये इस जवान को डालने की धमकी दे रहे थे!” एसपी ने आदेश दिया।

भाग 7: विदाई और सम्मान

एसपी साहब ने स्वयं विक्रम की बाइक की चाबी उसे लौटाई। “यह रही तुम्हारी चाबी जवान। मैं पूरे सम्मान के साथ तुम्हें यह लौटा रहा हूँ। अगर आगे कोई भी रोके, तो मेरा यह कार्ड दिखा देना।”

“थैंक यू सर! जय हिंद!” विक्रम ने जोश के साथ कहा।

विक्रम ने अपनी बाइक स्टार्ट की। भीड़ ने तालियों के साथ उसे विदा किया। वह अब अपने देश की रक्षा के लिए सरहद की ओर बढ़ रहा था।

जाते-जाते विक्रम ने एक बार पीछे मुड़कर देखा। उसे अपनी माँ का चेहरा और भारत माँ की पुकार सुनाई दे रही थी। वह जानता था कि रास्ते में मुश्किलें आएंगी, लेकिन जब तक उसके सीने में देशप्रेम और दिल में सच्चाई है, कोई उसे रोक नहीं सकता।

निष्कर्ष: वर्दी का सम्मान करना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक नागरिक का कर्तव्य है। अहंकार का अंत हमेशा पतन की ओर ले जाता है, जबकि कर्तव्यनिष्ठा व्यक्ति को अमर बना देती है।

जय हिंद।