एक इंजीनियर की शादी,गांव वालों ने पागल लड़की से करा दी,फिर जो हुआ…पूरा गांव रोया

बैरागपुर – चुप्पी की सजा और उम्मीद की लौ

प्रस्तावना

बैरागपुर – एक ऐसा गांव, जहां फैसले पल भर में हो जाते थे, लेकिन पछतावा कभी नहीं होता था।
यहां लोगों की थकान सूरज निकलने से पहले जाग जाती थी, और औरतों की आवाजें सूरज ढलने से पहले ही दब जाती थीं।
यहां किसी के रोने से फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन किसी के हंसने पर सवाल उठते थे।
जिंदगी का मतलब था – सहना और चुप रहना।

गांव के आखिरी छोर पर एक झोपड़ी थी, जो किसी घर से ज्यादा एक चेतावनी जैसी लगती थी।
वहां रहती थी गौरी – जिसे लोग उसके नाम से नहीं, उसकी हालत से जानते थे – “वो पागल लड़की।”

गौरी – डर और चुप्पी की कहानी

गौरी की उम्र 22 साल थी, लेकिन उसकी चाल में उम्र नहीं, डर था।
वह अचानक किसी आवाज पर चौंक जाती, किसी आदमी की परछाई देखकर उसकी उंगलियां कांपने लगतीं।
कभी-कभी वह घंटों मिट्टी में उंगलियां चलाती रहती, जैसे जमीन से पूछ रही हो – “तुम भी मुझे छोड़ दोगी?”
कभी-कभी बिना वजह हल्की सी हंसी हंस देती, फिर अगले ही पल उसकी आंखें भर आतीं।
गांव के लिए इतना ही काफी था – “पागल है।”

उसकी मां धनिया हर सुबह तुलसी के सामने बैठती थी, नंगे पांव, सर्दी हो या गर्मी।
हथेलियों में मेहनत की लकीरें नहीं, फटी हुई दरारें थीं, और आंखों में एक ही सवाल – “मेरी बेटी का क्या होगा?”

धनिया भगवान से नहीं डरती थी, वह अपनी बेटी के टूटने से डरती थी।
हर सुबह उसकी प्रार्थना एक सी होती – “भगवान या तो मेरी बेटी को ठीक कर दे या फिर मुझे उठा ले। मैं उसे रोज-रोज मरते नहीं देख सकती।”

गौरी का पिता रामदीन अब आदमी कम, परछाई ज्यादा लगने लगा था।
इलाज में उसका खेत बिक चुका था, शादी के गहने साहूकार के पास गिरवी थे।
शहर के डॉक्टरों ने कहा था – “सदमा गहरा है, वक्त लगेगा।”
लेकिन बैरागपुर के पास ना वक्त था, ना सब्र।
बैरागपुर के पास सिर्फ फैसले थे।

गौरी का अतीत – एक टूटी रात

गौरी कभी बाकी लड़कियों जैसी थी।
स्कूल जाती थी, स्लेट पर अक्षर बनाती थी, डांट पड़ती तो जीभ बाहर निकालकर हंस देती थी।
उसे मेले पसंद थे, रंग पसंद थे, और सबसे ज्यादा अपनी गुड़िया।
फिर वो रात आई – गांव में मेला लगा था, ढोल बज रहे थे, लोग हंस रहे थे, बच्चे दौड़ रहे थे।
गौरी मां का हाथ पकड़े थी।
भीड़ बढ़ी, किसी ने धक्का दिया, हाथ छूट गया।
उसके बाद जो हुआ, उस पर गांव आज भी चुप रहता है।
जब गौरी मिली, तो वह जिंदा थी, लेकिन उसकी आंखें मर चुकी थीं।

उस रात के बाद गौरी ने बोलना कम कर दिया।
रात में चीख कर उठती, किसी आदमी की परछाई देखकर कांप जाती।
एक दिन पंचायत बैठी – “रामदीन कब तक ढोएगा इसे?”
“लड़की जवान हो गई है।”
“पागल है तो क्या, शादी कर दे।”
धनिया वहीं जमीन पर बैठकर रोने लगी – “कौन अपनाएगा मेरी बेटी को?”

तभी किसी ने कहा – “शहर से एक बाबू आया है। सरकारी नौकरी वाला।”
गांव की आंखों में चमक आ गई।

सागर शेखर – शहर से आया बाबू

सागर का बैरागपुर आना कोई संयोग नहीं था, लेकिन उसका रुक जाना गांव की सबसे बड़ी खुशखबरी थी।
वह शहर का आदमी था, लेकिन उस शहर का नहीं, जहां चमक होती है।
उसका बचपन टीन की छतों के नीचे बीता था – जहां बारिश की आवाज नींद तोड़ देती थी और भूख सपना बनने से पहले ही जगा देती थी।

उसके पिता मामूली क्लर्क थे – ईमानदार, सीधे, बीमार।
एक सुबह दफ्तर गए, शाम तक लौटे नहीं – दिल का दौरा पड़ा।
सरकारी फाइलों में नाम दर्ज हो गया, लेकिन घर में बस एक खाली कुर्सी बची।
उस दिन के बाद सागर की मां बूढ़ी हो गई थी।
दूसरों के घरों में सिलाई करके बेटे को पढ़ाया।
कई रातें ऐसी थीं जब मां ने कहा – “मैंने खा लिया है,” और सागर जानता था कि वह झूठ बोल रही है।

इन्हीं रातों में सागर ने तय कर लिया था कि वह कभी किसी मजबूर इंसान से नजर नहीं चुराएगा।
इंजीनियर बनना उसके लिए सपना नहीं, मजबूरी थी।
सरकारी नौकरी मिली तो राहत की सांस ली।
मां का दबाव बढ़ गया – “अब घर बसा ले बेटा।”

बैरागपुर में सागर – गांव की सादगी या जरूरत?

तबादला बैरागपुर के पास हुआ।
सड़क सर्वे का काम था, दिनभर धूप में, शाम को सरकारी रेस्ट हाउस में थकान।
गांव के लोग उसके आसपास जमा होने लगे – कोई दूध रख जाता, कोई सब्जी, कोई बिना पूछे खाना दे जाता।
सागर को लगा यह गांव की सादगी है।
उसे नहीं पता था – यह सादगी नहीं, जरूरत थी।

एक शाम सरपंच खुद आया – “बाबू, आप हमारे अपने बन जाएं।”
फिर शादी की बात आई।
सागर ने साफ कहा – “वह लड़की देखना चाहता है, उससे बात करना चाहता है।”
कुछ पल के लिए चुप्पी छा गई – “गांव की लड़की है बाबू, ज्यादा बोलना नहीं जानती, बहुत सीधी है।”
सागर ने इन बातों में छिपे अर्थ नहीं समझे।
उस रात मां का फोन – “अब मुझे डर लगता है, तू अकेला रहा तो मैं टूट जाऊंगी।”

गौरी और सागर – एक अनजाना रिश्ता

दूसरे शाम सरपंच आया – “इंजीनियर बाबू, चलिए लड़की दिखा देंगे।”
गौरी को शादी के बारे में कुछ नहीं बताया गया – बस इतना कि अब वह दूसरे घर जाएगी और वहां चुप रहना है।
सागर ने गौरी को देखा – सुंदर थी, लेकिन आंखों में कुछ टूटा हुआ था।
शादी के दिन गांव में ढोल बजे, लोगों के चेहरों पर राहत थी।
गौरी लाल जोड़े में बैठी थी, शरीर सजा था, लेकिन आंखें डरी हुई थीं।
वह बार-बार मां की साड़ी पकड़ लेती।

शादी के बाद कमरे में गौरी सिमटी बैठी थी – जैसे किसी सजा का इंतजार कर रही हो।
सागर ने बहुत धीमी आवाज में कहा – “डरो मत, मैं कुछ नहीं करूंगा।”
इतना सुनते ही गौरी फूट-फूट कर रोने लगी – “मुझे मत मारना, मैं चुप रहूंगी।”
सागर जम गया – यह डर शादी का नहीं था, बहुत पुराना था।
उस रात सागर ने कमरे की लाइट बुझा दी और खुद जमीन पर लेट गया।

सच्चाई का सामना – जिम्मेदारी या रिश्ता?

सुबह सागर ने सरपंच से कहा – “आपने मुझसे झूठ बोला है।”
सरपंच ने नजरें झुका ली – “थोड़ी दिमाग से कमजोर है बाबू।”
सागर हंसा – “आपने मुझे इंसान नहीं, जिम्मेदारी थमा दी है।”
गांव चुप रहा।
उस दिन से सागर ने गौरी से दूरी बना ली – अलग कमरे में सोता, कम बोलता, बाहर रहता।

गौरी ने कुछ नहीं पूछा – हर सुबह उसकी थाली लगाती, चप्पल सीधी रखती, नजर उठाकर नहीं देखती।
अगर गलती से सागर की आवाज ऊंची हो जाती तो सिहर जाती।
एक दिन जूते साफ करते हुए बोली – “अगर गलती हो जाए तो मारना मत।”

सागर समझ नहीं पा रहा था – गुस्सा किस पर निकाले, गांव पर, खुद पर, या उस व्यवस्था पर जिसने एक टूटी लड़की को बोझ समझकर थमा दिया था।
लेकिन उसे यह भी पता था – अगर वह चला गया तो गौरी पूरी तरह टूट जाएगी।
उसे अपनी मां याद आई – वह भी तो अकेली थी, चुपचाप सब सहती रही थी।

गौरी की बीमारी – जख्म और इलाज

एक रात गौरी बुखार से कांप रही थी – बिस्तर के एक कोने में सिकुड़ी हुई थी।
दोनों घुटने पेट से चिपकाए, दोनों हाथ खुद को कसकर पकड़े हुए।
माथे पर पसीना, होठ सूखे, आंखों में वही पुरानी घबराहट।
सागर ने उसके माथे पर हाथ रखा – “आप छोड़ मत देना।”

सागर की छाती में कुछ चुब गया।
डॉक्टर ने कहा – “यह बीमारी नहीं, जख्म है। बहुत पुराना, बहुत गहरा।”
ठीक हो सकती है, लेकिन गांव में नहीं – माहौल बदलना पड़ेगा, शहर ले जाइए।
इलाज दवाइयों से ज्यादा धैर्य मांगता है।

शहर की ओर – उम्मीद की छोटी लौ

गांव में खबर फैल गई – “बाबू पागल हो गया है, अब इसे शहर में छोड़ देगा।”
धनिया चुपचाप सब सुनती रही – दिल में पहली बार उम्मीद का एक छोटा सा दिया जला था।
जाते वक्त उसने सागर के हाथ जोड़ दिए – “बेटा, मेरी बेटी को इंसान समझ लेना।”

शहर गौरी के लिए नया था – बस में बैठते ही सागर की कमीज पकड़ ली।
रास्ते भर खिड़की से बाहर देखती रही – चीजों को नहीं, वक्त को देख रही थी।
शहर पहुंचते ही ट्रैफिक का शोर, गाड़ियों के हॉर्न, लोगों की आवाजें – सब कुछ उसके लिए हमला जैसा था।
किराए का छोटा सा कमरा – पहली रात आंख नहीं बंद की।

इलाज की शुरुआत – भरोसे की पहली सीढ़ी

अगले दिन डॉक्टर के पास ले गए – डॉक्टर ने नरमी से बात की।
“यहां कोई फैसला तुम्हारे बिना नहीं होगा।”
गौरी ने पहली बार डॉक्टर की तरफ देखा – भरोसा नहीं था, लेकिन हैरानी थी।
इलाज शुरू हुआ – दवाइयां भी, लेकिन सबसे बड़ा इलाज था – रोज एक छोटा सा भरोसा।

पहला कदम बहुत छोटा था – “तुम्हारा नाम क्या है?”
गौरी ने जमीन की तरफ देखा – आवाज नहीं निकली।
सागर ने बहुत धीरे से कहा – “गौरी।”
डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा – “ठीक है, आज बस इतना ही।”

तीसरे दिन गौरी के होठ हिले – “ग…री।”
सागर की आंखें भर आई – बाहर जाकर दीवार से सिर टिका कर रो पड़ा।

छोटी-छोटी खुशियां – बदलाव की शुरुआत

घर लौटते वक्त सागर ने गौरी के लिए एक कपड़े की गुड़िया खरीदी।
गौरी ने डरते-डरते उसे छुआ, फिर गोद में रख लिया।
उंगलियां गुड़िया के बालों पर चलीं, चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
सागर के लिए वह मुस्कान किसी चमत्कार से कम नहीं थी।

दिन बीतने लगे – सागर ऑफिस जाता, लौटकर दो शब्द बोलता – “खाना खाया? दवा ली?”
गौरी जवाब कम देती, लेकिन सुनती जरूर थी।
धीरे-धीरे उसे सागर की आवाज पहचान में आने लगी – वो आवाज जिसके साथ मार नहीं आता था, बस साथ आता था।

एक शाम गौरी रसोई में खड़ी थी – गैस जलाने की कोशिश कर रही थी, हाथ कांप रहे थे।
रोटी बेलने की कोशिश में आटा गिर गया।
सागर ने आवाज नरम रखी – “मैं डांट नहीं रहा, मैं साथ हूं।”
गौरी ने आंखें उठाकर देखा – पहली बार उसकी आंखों में डर के साथ-साथ एक छोटी सी उम्मीद थी।

गर्व की पहली झलक – खुद को पहचानना

एक दिन गौरी ने सागर की शर्ट उल्टी पहन ली।
सागर ने आईने में देखा और हंस पड़ा – गौरी डर गई।
सागर ने तुरंत कहा – “अरे नहीं, अच्छा लग रहा है। कोई बात नहीं।”
गौरी ने बहुत हल्की हंसी दी – उस पल ने सागर को अंदर से हिला दिया।

ऑफिस में भी लोग बातें करने लगे – “आपकी पत्नी ठीक नहीं है?”
सागर ने जवाब दिया – “वो मुझसे ज्यादा मजबूत है, उसे ठीक करने की जिम्मेदारी मेरी है।”
उस दिन उसने खुद में एक नया आदमी महसूस किया – जो सच के साथ खड़ा होता है।

समय के साथ गौरी में बदलाव आने लगा – अब वह डर को शब्दों में पकड़ने लगी थी।
एक शाम बोली – “आज आवाजें कम हैं।”
सागर चौंक गया – “क्या कहा?”
“आज डर कम है।”
सागर को लगा – दुनिया का सबसे बड़ा इनाम मिल गया।

गांव वापसी – चुप्पी की दरार

गांव से खबर आई – धनिया की तबीयत बिगड़ रही है।
गौरी चुप थी, लेकिन आंखें नमी से भरी थीं।
बस जैसे ही बैरागपुर के पास रुकी, गौरी के हाथ ठंडे पड़ गए।
गौरी खिड़की से बाहर नहीं देख रही थी – लेकिन सब देख रही थी।
डर लग रहा है?
“पर आप हो।”
एक वाक्य में सागर ने वह भरोसा सुना, जिसके लिए उसने सब कुछ दांव पर लगाया था।

गांव में लोग जमा होने लगे – “देखो वही है, अब तो और बिगड़ गई होगी।”
गौरी पीछे हटने लगी – उसी पल सागर ने सबके सामने उसका हाथ थाम लिया।
“डरने की जरूरत नहीं।”
लोग चुप हो गए – पहली बार किसी बाबू ने पत्नी का हाथ इस तरह थामा था।

धनिया चारपाई पर पड़ी थी – जब गौरी ने देखा, “अम्मा…”
धनिया फूट-फूट कर रो पड़ी – “मेरी बच्ची मुझे माफ कर देना।”
गौरी ने मां के बाल सहलाए – “अब कोई मुझे नहीं डराएगा। अब मैं अकेली नहीं हूं।”

गांव का सामना – सच्चाई और बदलाव

बुजुर्ग बोले – “बाबू, अब इसकी मां भी बीमार है, इसे यहीं छोड़ दो।”
गौरी चुप थी – लेकिन नजरें झुकी नहीं थीं।
सागर ने कहा – “आप सब कहते हैं यह पागल है, लेकिन कभी पूछा किसने ऐसा बनाया?”
गांव में सन्नाटा छा गया।

गौरी ने सागर का हाथ छोड़ा – सब चौंक गए।
गौरी आगे बढ़ी – “मैं पागल नहीं हूं। मैं डर गई थी। लेकिन किसी ने नहीं पूछा।”
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, लेकिन सिर नहीं झुकाया।
“अगर कोई लड़की चुप हो जाए तो इसका मतलब यह नहीं कि वह गलत है, कभी-कभी वह बस टूट जाती है।”

शहर वापसी – नई शुरुआत

शहर लौटने के बाद गौरी पहले जैसी नहीं रही।
अब वह हर वक्त डरी हुई नहीं रहती थी।
इलाज जारी था – डॉक्टर दवाइयों से ज्यादा बातचीत पर जोर देता था।

धीरे-धीरे गौरी ने घर के छोटे-छोटे फैसले लेने शुरू किए – सब्जी कौन सी लानी है, पर्दे का रंग क्या होगा, चाय में चीनी कितनी होगी।
यह फैसले उसके अस्तित्व पर हस्ताक्षर करने जैसे थे।

एक दिन बोली – “मैं बाहर अकेले जाना चाहती हूं।”
पहली बार अकेले नीचे गई – दुकान तक।
10 मिनट बाद लौटी तो आंखों में डर से ज्यादा गर्व था – “मैं आ गई।”

कुछ महीनों बाद – “मैं पढ़ना चाहती हूं।”
सागर ने किताबें ला दीं – शुरुआत में अक्षर टेढ़े थे, हाथ कांपता था, लेकिन हार नहीं मानी।
हर दिन लिखती – अपना नाम, मां का नाम, सागर का नाम।
हर नाम के साथ खुद को थोड़ा सा और मजबूत करती।

सेमिनार – समाज के सामने पहली आवाज

सरकार की ओर से सेमिनार आयोजित हुआ – विषय था मानसिक स्वास्थ्य और समाज।
गौरी का नाम भेजा गया।
सेमिनार के दिन हाल पूरा भरा हुआ था – गौरी मंच पर खड़ी थी, साथ में सागर भी था।

गौरी डर रही थी – “हम तुम्हारे साथ हैं।”
गौरी मुस्कुराई – “मैं बीमार नहीं थी, मैं टूटी हुई थी। हम लोग अक्सर टूटे हुए इंसानों को नाम दे देते हैं – पागल, कमजोर। ताकि हमें खुद को आईने में ना देखना पड़े। इलाज दवा से नहीं शुरू होता, वह एक इंसान के साथ खड़े होने से शुरू होता है।”

पूरा हॉल खड़ा होकर तालियां बजा रहा था।
सागर की आंखों में गौरी का चेहरा था – वही गौरी जो कभी अपने नाम से डरती थी।

अंत – उम्मीद की लौ

उस शाम घर लौटे – गौरी छत पर बैठी थी, आसमान देख रही थी।
सागर उसके पास बैठ गया – “अगर आप नहीं मिलते…”
सागर ने बात काट दी – “तो मैं अधूरा रह जाता।”

गौरी मुस्कुराई – पूरी तरह नहीं, लेकिन सच्ची।
वो मुस्कान सफर की थी – जिसमें दर्द था, लेकिन साथ भी था।

संदेश

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जय हिंद।

(यह कहानी समाज के उन लोगों के लिए है, जो चुप्पी में सजा काट रहे हैं।
हर चुप्पी के पीछे एक कहानी होती है – बस सुनने वाला चाहिए।)