एक नौकरानी रोज़ खाना चुराकर गरीब बच्चों को खिलाती थी, लेकिन एक दिन मालिक ने उसे…

“स्वर्णविला की ममता”

भूमिका

दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में स्थित स्वर्णविला, शहर का सबसे आलीशान बंगला था। इसकी चमक-दमक, विदेशी गाड़ियां और महल जैसी सजावट हर किसी को चौंका देती थी। इस बंगले का मालिक था आर्यन खन्ना—एक अरबपति, होटल बिजनेस का बादशाह, सख्त मिजाज और पैसे का पुजारी। उसके लिए दुनिया में सबसे अहम चीज थी दौलत। उसके नौकर उससे नजर मिलाने से भी डरते थे।

रसोई की जिम्मेदारी संभालती थी एक साधारण महिला—सुधा। सुबह छह बजे आती, दिनभर खाना बनाती, सबका ख्याल रखती। आर्यन के खाने का स्वाद, टाइमिंग, सब उसे मुंहजुबानी याद था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से आर्यन ने नोटिस किया कि सुधा रोज ज्यादा खाना बना रही है, जबकि वह खुद डाइट पर था। शाम को छह बजे जब सुधा घर जाती, उसके हाथ में एक बड़ा स्टील का टिफिन बॉक्स होता। आर्यन को शक हुआ कि सुधा उसके घर से खाना और राशन चुराकर ले जाती है।

पहला मोड़: चोरी का आरोप
एक शाम आर्यन जल्दी घर आ गया। उसने देखा, सुधा जल्दी-जल्दी रोटियां कपड़े में लपेटकर एक थैले में भर रही है। उसके चेहरे पर घबराहट थी। जैसे ही सुधा पिछले दरवाजे की ओर बढ़ी, आर्यन ने कड़क आवाज में पुकारा, “रुको सुधा!” सुधा के कदम थम गए। आर्यन ने पूछा, “इस थैले में क्या है?” सुधा ने डरते हुए कहा, “बस बचा हुआ कूड़ा और मेरा पुराना सामान है।”

आर्यन का शक और गहरा हो गया। उसने धमकी दी, “कल मैं खुद देखूंगा कि तुम कहां जाती हो। अगर चोरी साबित हुई तो तुम्हें जेल जाना पड़ेगा।” सुधा रोती हुई वहां से चली गई।

सच का पीछा
अगले दिन आर्यन ने अपनी सारी मीटिंग्स कैंसिल कर दीं। शाम को उसने अपनी पुरानी कार निकाली, पहचान छुपाने के लिए टोपी और चश्मा लगाया। स्वर्णविला के बाहर एक पेड़ की छांव में कार खड़ी की। ठीक छह बजे सुधा बाहर निकली, भारी थैला और एक पोटली लिए। वह पैदल ही तंग गलियों की ओर बढ़ गई। आर्यन उसका पीछा करता रहा। शहर की चमक-दमक पीछे छूट गई। अब वह दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाके में पहुंच गया था।

सुधा एक पुराने पुल के नीचे गई, जहां टूटी-फूटी टाट पट्टियों पर 101 बच्चे और कुछ बुजुर्ग लेटे थे। सुधा को देखते ही बच्चे “माँ-माँ” चिल्लाते हुए दौड़ पड़े। सुधा ने टिफिन खोला, उसमें बची हुई रोटियां, दाल और फल थे—वही खाना, जो अमीर घरों में डस्टबिन में चला जाता। बच्चों के लिए वह किसी शाही दावत से कम नहीं था। सुधा खुद एक निवाला भी नहीं खा रही थी, बस बच्चों को खिलाते हुए देख रही थी।

सुधा की ममता
तभी वहां तीन बदमाश आ गए। उन्होंने टिफिन को लात मार दी, दाल जमीन पर बिखर गई। पैसे मांगने लगे। सुधा ने हिम्मत से कहा, “मेरे पास पैसे नहीं हैं। भगवान के लिए इन मासूमों को तंग मत करो।” बदमाशों ने सुधा को धक्का दिया। आर्यन से अब और नहीं रहा गया। वह बाहर आया, “खबरदार जो उसे हाथ लगाया।” उसकी आवाज से बदमाश डर गए और भाग गए।

सुधा घबराई, “साहब, मैं चोरी नहीं करना चाहती थी। वह बचा हुआ खाना था, जो कूड़े में जाने वाला था।” सुधा की आंखों में आंसू थे। उसने बताया, “पाँच साल पहले मेरा बेटा राजू भूख से मर गया था। मैंने कसम खाई थी कि अब कोई बच्चा मेरी नजर के सामने भूख से नहीं मरेगा।”

आर्यन सुनता रहा। उसकी आंखों में भी आंसू थे। उसने सुधा के हाथ अपने हाथों में लिए, “मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें चोर समझा, जबकि तुम तो देवी हो।”

नई शुरुआत
आर्यन ने सुधा को पैसे दिए, “आज इन बच्चों को ढाबे से भरपेट खाना खिलाओ। कल से तुम्हें चोरी-छुपे खाना लाने की जरूरत नहीं है।” सुधा डर गई, “क्या आप मुझे काम से निकाल रहे हैं?” आर्यन ने सिर हिलाया, “नहीं। कल से तुम मुझे भी अपने नेक काम में शामिल करोगी।”

अगली सुबह जब सुधा काम पर आई, रसोई में शाही पनीर, दाल, पुलाव बन रहा था। रसोइया बोला, “साहब ने आर्डर दिया है कि रोज 50 बच्चों का ताजा खाना बनेगा। अब से बासी खाना बंद।”

सम्मान और अपमान
दो दिन बाद स्वर्णविला में बड़ी पार्टी थी। शहर के बड़े अमीर, नेता, बिजनेस पार्टनर आए थे। सुधा को जूस सर्व करने का काम मिला। उसने अपनी सबसे साफ साड़ी पहनी थी, लेकिन बाकी लोगों के बीच वह अलग और गरीब लग रही थी।

पार्टी में मिसेज मल्होत्रा ने सुधा को धक्का देकर गिरा दिया, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? दो टके की नौकरानी!” सुधा रोती रही, फर्श साफ करती रही। तभी आर्यन भीड़ को चीरते हुए आया। उसने सुधा का हाथ पकड़कर उसे सम्मान से खड़ा किया, उसके हाथ से खून पोंछा।

आर्यन ने सबके सामने ऐलान किया, “सुधा मेरे घर की नौकरानी नहीं है। आज से वह मालकिन के बराबर है। मेरी कंपनी का 50% मुनाफा राजू मेमोरियल फाउंडेशन में जाएगा, जिसकी चेयरमैन सुधा होंगी।”

सुधा की सादगी
अब सुधा चेयरमैन थी, लेकिन उसने कभी रेशमी साड़ी नहीं पहनी। एक शाम आर्यन ने उसके लिए महंगे कपड़े लाए। सुधा ने कहा, “यह फटी साड़ी मुझे याद दिलाती है कि मैं कौन हूं और कहां से आई हूं। अगर मैं मखमल पहन लूंगी तो बच्चों का दर्द भूल जाऊंगी। मैं नेता नहीं, उनकी माँ बनकर रहना चाहती हूं।”

आर्यन सन्न रह गया। उसे महसूस हुआ कि असली अमीर वही है जो देने का जिगर रखता है।

प्रेम और बदलाव
आर्यन ने सुधा का हाथ अपने हाथों में लिया, “तुमने मुझे इंसान बनना सिखाया है। मेरी सारी दौलत तुम्हारे विचार के सामने मिट्टी है। मुझे तुम्हारी 100% आवश्यकता है।” दोनों ने घंटों बातें कीं। आर्यन ने फैसला लिया, वह सुधा को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना चाहता है।

एक साल बाद दिल्ली के सबसे बड़े ऑडिटोरियम में राष्ट्रीय सेवा सम्मान समारोह था। सुधा मंच पर आई, “यह अवार्ड मेरा नहीं, उन हजारों आर्यन का है जो गरीबों की मदद करते हैं।” आर्यन ने मंच पर आकर कहा, “सुधा ने मुझे इंसान बनाया है।” फिर उसने सबके सामने सुधा से शादी का प्रस्ताव रखा।

अंतिम भाग: इंसानियत की जीत
सुधा ने रोते हुए सिर हिलाया और हां कह दिया। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। यह सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं था, अमीरी और गरीबी के बीच की दीवार का गिरना था।

आर्यन और सुधा ने मिलकर हजारों अनाथ बच्चों की जिंदगी बदल दी। स्वर्णविला अब समाज सेवा का केंद्र बन गया। सुधा की ममता ने अरबपति आर्यन के दिल को बदल दिया।