एक महिला जज की हैरान कर देने वाली कहानी |

कर्तव्य और न्याय की पुकार: एक जज की अनूठी प्रेम और त्याग की कहानी

राजस्थान की वीर धरा, जहाँ की हवाओं में त्याग और बलिदान की कहानियाँ आज भी गूँजती हैं, वहीं की मिट्टी से उपजी यह कहानी ‘अंजू’ (बदला हुआ नाम) की है। यह कहानी केवल एक महिला की सफलता की नहीं, बल्कि उसके भीतर चल रहे उस द्वंद्व की है, जहाँ एक ओर कानून की कठोर किताबें थीं और दूसरी ओर बचपन के वो कच्चे धागे, जिन्हें समय ने और भी पक्का कर दिया था।

अध्याय 1: बचपन की वो अनजानी रस्म

राजस्थान के एक छोटे से गाँव में, जहाँ विकास की किरणें पहुँचने में वक्त लग रहा था, अंजू का जन्म एक अत्यंत साधारण और निर्धन परिवार में हुआ। अंजू बचपन से ही अपनी उम्र की लड़कियों से अलग थी। जहाँ दूसरी लड़कियाँ गुड़ियों से खेलती थीं, अंजू टूटी हुई स्लेट पर भी शब्द उकेरने की कोशिश करती थी। उसकी मेधा की चमक उसके शिक्षकों की आँखों में साफ दिखती थी।

परंतु, नियति ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा था। साल था 1990 के दशक का अंत, जब अंजू मात्र 11 साल की थी और छठी कक्षा में पढ़ाई कर रही थी। समाज की पुरानी परंपराओं और गरीबी के दबाव में, उसके माता-पिता ने उसकी शादी शंकर नाम के लड़के से तय कर दी। शंकर भी एक साधारण परिवार से था।

राजस्थान में ‘बाल विवाह’ के बाद ‘गौना’ (विदाई) की परंपरा थी। शादी के समय यह समझौता हुआ कि अंजू अपने मायके में रहकर पढ़ाई जारी रखेगी और जब वह बालिग (18 वर्ष) हो जाएगी, तब उसकी विदाई होगी। अंजू के लिए उस समय ‘शादी’ शब्द का अर्थ केवल नए कपड़े और मिठाइयां थीं, वह नहीं जानती थी कि यह रस्म उसके भविष्य को किस मोड़ पर खड़ा कर देगी।

अध्याय 2: संघर्ष और सफलता की सीढ़ियाँ

समय बीतता गया। अंजू ने अपनी किताबों को ही अपना संसार बना लिया। उसने 10वीं और फिर 12वीं की परीक्षा 90% से अधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण की। गाँव के लोग हैरान थे कि एक लड़की इतना पढ़ कैसे रही है। जब वह 18 साल की हुई, तो गाँव में चर्चाएँ शुरू हो गईं कि अब उसका गौना कर देना चाहिए।

लेकिन अंजू के सपने अब आसमान छूने लगे थे। उसने अपने पिता से शहर जाकर वकालत पढ़ने की जिद्द की। उसके ससुर, जो कि एक समझदार व्यक्ति थे, ने अपने बेटे शंकर की कमजोरी देख ली थी—शंकर 12वीं की परीक्षा में बार-बार असफल हो रहा था। उन्होंने सोचा कि यदि बहू पढ़ लेगी तो घर की दशा सुधर जाएगी। उन्होंने उदारता दिखाते हुए अंजू को जयपुर जाने की अनुमति दे दी।

अंजू ने जयपुर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में 5 साल के एलएलबी (LLB) कोर्स में दाखिला लिया। जहाँ वह एक कमरे में रहकर खुद खाना बनाती और देर रात तक कानूनी धाराओं को याद करती थी। दूसरी ओर, शंकर ने पढ़ाई छोड़ दी और अपने पिता के साथ बढ़ई (फर्नीचर) के काम में हाथ बंटाने लगा। वह लकड़ी के तख्तों पर रंदा चलाता और अंजू शहर में भविष्य की नींव रख रही थी।

अध्याय 3: कुमार सिंह: एक आधुनिक साथी की दस्तक

जयपुर की व्यस्त सड़कों और लाइब्रेरी की शांति के बीच अंजू की मुलाकात कुमार सिंह से हुई। कुमार भी वकालत का छात्र था और एक रसूखदार, अमीर परिवार से ताल्लुक रखता था। दोनों के स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर था, लेकिन कानून के प्रति उनकी लगन ने उन्हें जोड़ दिया।

वे अक्सर रात के 9 बजे के आसपास बाजार में मिलते थे। अंजू जहाँ दिन भर की थकान के बाद रात को सस्ती सब्जियां ढूँढती थी ताकि कुछ पैसे बचा सके, वहीं कुमार उसकी इस सादगी का कायल हो गया। कुमार ने कई मौकों पर अंजू की बिना बताए मदद की। उसने अंजू को महंगे नोट्स लाकर दिए, कभी उसकी फीस भरने में सहायता की।

धीरे-धीरे, उनके बीच की दोस्ती एक गहरे भावनात्मक जुड़ाव में बदल गई। कुमार को अंजू के अतीत के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, उसे बस इतना पता था कि वह एक छोटे गाँव से आई एक संघर्षशील लड़की है। उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह अंजू को ही अपना जीवनसाथी बनाएगा।

अध्याय 4: सफलता की चकाचौंध और छिपा हुआ दर्द

वह ऐतिहासिक दिन आया जब राजस्थान न्यायिक सेवा (PCS-J) का परिणाम घोषित हुआ। अंजू ने पूरे प्रदेश में नाम रोशन किया—वह अब एक न्यायाधीश (Judge) बन चुकी थी। कुमार ने भी परीक्षा पास की थी। पूरे गाँव में ढोल-नगाड़े बजे। अंजू के माता-पिता की आँखों में गर्व के आँसू थे।

इसी खुशी के माहौल में, एक शाम कुमार ने अंजू को एक आलीशान रेस्टोरेंट में बुलाया। वहाँ मोमबत्तियों की रोशनी में कुमार ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा— “अंजू, हमने यह सफर साथ शुरू किया था, क्या तुम पूरी जिंदगी मेरा साथ निभाओगी? मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।”

अंजू का कलेजा मुँह को आ गया। उसकी आँखों के सामने उस 11 साल की बच्ची की तस्वीर घूम गई जिसके गले में एक अनजान रस्म की माला डाल दी गई थी। उसने सिसकते हुए कहा— “कुमार, मैं तुम्हें प्यार तो कर सकती हूँ, पर तुमसे शादी नहीं कर सकती। मैं पहले से शादीशुदा हूँ।” कुमार के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे यकीन नहीं हुआ कि एक जज साहिबा का बंधन एक अनपढ़ बढ़ई से जुड़ा है।

अध्याय 5: समाज की पंचायत और धर्मसंकट

अंजू की सफलता ने उसके ससुराल वालों के मन में डर पैदा कर दिया था। गाँव के लोग ताने मारते थे— “अब वह जज बन गई है, वह तुम्हारे घर क्यों आएगी? वह तो किसी बड़े अफसर से नाता जोड़ लेगी।” शंकर के घर वाले परेशान थे। उन्होंने अंजू के पिता पर दबाव बनाया कि अब फैसला हो जाना चाहिए—या तो अंजू घर आए, या फिर शंकर को आजाद करे।

एक दिन तय हुआ कि पंचायत के सामने या आपसी सहमति से इसका अंत होगा। अंजू को गाँव बुलाया गया। वह अब नीली बत्ती वाली गाड़ी में आई थी, उसके साथ गार्ड थे। पूरा गाँव उसे देखने उमड़ पड़ा। उसे एक अलग कमरे में शंकर से बात करने के लिए भेजा गया। बाहर पंचायत बैठी थी, जहाँ सम्मान और भविष्य का दांव लगा था।

अध्याय 6: वो बंद कमरा और एक मासूम का सच

कमरे के भीतर का दृश्य बहुत ही भावुक था। शंकर, जो अब एक साधारण बढ़ई बन चुका था, फटे-पुराने लेकिन साफ कपड़ों में बैठा था। जैसे ही अंजू अंदर आई, शंकर घबराकर खड़ा हो गया और उसके पैर छूने लगा।

अंजू ने झिझकते हुए उसे पीछे खींचा— “यह क्या कर रहे हो आप? मैं आपकी पत्नी हूँ।” शंकर की आँखों में आंसू थे, उसने कहा— “नहीं साहिबा, आप अब जज हैं। पूरे जिले में आपका नाम है। लोग आपको सलाम करते हैं। मेरी क्या औकात कि मैं आपसे पत्नी का हक मांगू? मैं तो बस ये कहने आया था कि अगर आप खुश नहीं हैं, तो मैं आपको इस बंधन से आजाद कर दूँगा। मैंने 20 साल आपका इंतजार किया है, बस ये सोचकर कि आप एक दिन बड़ी आदमी बनेंगी। आप जहाँ भी रहें, बस खुश रहें।”

शंकर की उन निस्वार्थ बातों ने अंजू के भीतर चल रहे तूफानी द्वंद्व को शांत कर दिया। उसे लगा कि जो प्यार कुमार के पास था, वह सम्मान पर आधारित था, लेकिन शंकर का प्यार तो पूर्ण समर्पण और त्याग था।

अध्याय 7: न्याय की सर्वोच्च मिसाल

अंजू बाहर आई। पंचायत और गाँव वाले सांस रोककर इंतज़ार कर रहे थे। अंजू ने अपनी गर्दन ऊँची की और स्पष्ट आवाज में कहा— “मैंने कानून पढ़ा है और मैं रोज अदालतों में इंसाफ करती हूँ। आज मैंने अपनी जिंदगी का भी इंसाफ कर दिया है। मेरा गौना होगा और मैं शंकर के घर ही जाऊँगी।”

पूरा गाँव सन्न रह गया। अंजू के पिता और ससुराल वाले खुशी से रो पड़े। अंजू ने कुमार से मिलकर आखिरी विदाई ली और उससे कहा— “कुमार, तुम एक बहुत अच्छे इंसान हो और तुम्हें मुझसे भी अच्छी जीवनसाथी मिलेगी। लेकिन अगर आज मैं अपनी सफलता के अहंकार में इस गरीब और मासूम इंसान को छोड़ देती, तो मैं खुद की नजरों में कभी जज नहीं बन पाती। मेरा असली न्याय मेरा संस्कार है।”

अध्याय 8: 15 साल बाद—एक सुखद संसार

आज इस घटना को डेढ़ दशक से ज्यादा बीत चुका है। अंजू अब एक वरिष्ठ जिला न्यायाधीश हैं। शंकर का फर्नीचर का व्यवसाय अब बड़ा हो चुका है, जिसे अंजू के सहयोग से उसने आधुनिक बनाया। उनके दो बच्चे हैं जो अपनी माँ की तरह ही शिक्षित और अपने पिता की तरह ही सरल हैं।

अंजू और शंकर का जीवन आज भी सामंजस्य की एक जीती-जागती मिसाल है। शहर की बड़ी-बड़ी पार्टियों में जब जज साहिबा अपने साधारण से दिखने वाले पति के साथ प्रवेश करती हैं, तो लोग उनके पद को नहीं, बल्कि उनके चरित्र और अटूट प्रेम को सलाम करते हैं।

निष्कर्ष: सच्ची सफलता वह नहीं जो हमें हमारे अपनों से दूर कर दे, बल्कि वह है जो हमें अपनी जड़ों को और मजबूती से थामना सिखाए। अंजू का फैसला उन सभी के लिए एक जवाब है जो सफलता मिलने पर अतीत को बोझ समझने लगते हैं।

क्या अंजू का फैसला सही था? यह सवाल आज भी कई युवाओं के मन में कौंधता है। क्या एक शिक्षित महिला को एक कम पढ़े-लिखे व्यक्ति के साथ समझौता करना चाहिए? या फिर क्या त्याग ही प्रेम की पराकाष्ठा है? अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें।