एक मुस्लिम फ़कीर रोज़ हिंदू के घर खाना मांगने आता था… एक दिन हिंदू ने जो किया, इंसानियत जीत गई

इंसानियत का सबसे बड़ा धर्म: एक फकीर, एक हिंदू परिवार और वह राज जो रूह कपा दे

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के एक छोटे से गाँव नूरपुर में सुबह की शुरुआत मंदिर की घंटियों और मस्जिद की अजान के साथ होती थी। यहाँ की धूल भरी पगडंडियों पर हर सुबह एक आवाज गूँजती थी— “अल्लाह के नाम पर कुछ दे दे बाबा।”

यह आवाज थी बाबा करीम शाह की। सफेद लंबी दाढ़ी, सिर पर हरी टोपी और कंधे पर एक पुराना झोला लिए बाबा रोज लाठी टेकते हुए एक ही दरवाजे पर रुकते थे। वह दरवाजा था हरिदास शर्मा का।

अध्याय 1: एक अनोखा नियम और गाँव वालों का शक

गाँव वाले अक्सर मजाक उड़ाते थे। लोग कहते थे, “पता नहीं हरिदास ने इस मुस्लिम फकीर में क्या देखा है?” लेकिन हरिदास और उनकी पत्नी सावित्री देवी के मन में बाबा के लिए अटूट सम्मान था। बाबा जब भी भिक्षा लेते, अपनी आँखें बंद कर दुआ देते— “अल्लाह तुम्हारे घर को सलामत रखे, हर दुख दूर करे।”

पर एक बात अजीब थी। बाबा भिक्षा लेने के बाद हरिदास के घर की चौखट को बड़े गौर से देखते थे, कभी उसे सहलाते, तो कभी उस पर अपना माथा टेक देते। हरिदास ने कई बार यह नोटिस किया, पर कभी पूछा नहीं। उनके सीने में भी एक पुराना जख्म था—उनका 20 साल का बेटा मोहन, जो आठ साल पहले एक छोटी सी डाँट के बाद घर छोड़कर चला गया था और फिर कभी नहीं लौटा।

अध्याय 2: बाबा की बिगड़ती तबीयत और सावित्री की ममता

समय बीतता गया। बाबा करीम शाह अब और भी कमजोर हो गए थे। एक सुबह जब वे दरवाजे पर आए, तो उनकी आवाज काँप रही थी। सावित्री देवी ने देखा कि बाबा का चेहरा पीला पड़ गया है। उन्होंने पहली बार बाबा को सिर्फ रोटी नहीं, बल्कि गरम दाल-चावल और दूध भी दिया।

सावित्री ने कहा, “बाबा, आज आप यहीं बैठिए, आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही।” बाबा की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने धीमे से कहा, “बेटी, तू माँ की तरह सेवा करती है।” इस एक वाक्य ने जैसे बाबा के भीतर छिपा कोई पुराना राज हिला दिया।

अध्याय 3: वह तूफानी रात और सन्दूक का राज

उस रात बाबा की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। हरिदास उन्हें अपने घर के भीतर ले आए और एक खाट बिछा दी। रात के सन्नाटे में हरिदास की आँख खुली तो उन्होंने देखा कि बाबा खाट पर बैठे रो रहे हैं। उनके हाथ में एक पुरानी, धुंधली तस्वीर थी।

जिज्ञासावश हरिदास करीब गए और जैसे ही उनकी नज़र उस तस्वीर पर पड़ी, उनका दिल धड़कना भूल गया। वह तस्वीर उनके बेटे मोहन के बचपन की थी!

हरिदास की आवाज काँप गई, “बाबा, यह तस्वीर… यह तो मेरे मोहन की है! आपके पास कैसे?”

अध्याय 4: आठ साल पुराना कड़वा सच

बाबा करीम शाह ने लंबी सांस ली और टूटती आवाज में सच बताना शुरू किया।

“आठ साल पहले, एक तूफानी रात में मुझे सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे एक छोटा लड़का मिला था। वह भीगा हुआ था, काँप रहा था और हाथ में लकड़ी की एक टूटी गाड़ी लिए रो रहा था। उसने अपना नाम मोहन बताया। वह डरा हुआ था, उसे लगा था कि उसके पिता उससे नफरत करते हैं।”

सावित्री चीख पड़ी, “मेरा मोहन! वह आपके पास था?”

बाबा ने आगे कहा, “मैंने उसे अपनाया। दरगाह में रखा, खाना दिया, कपड़े दिए। वह मुझे ‘बाबा’ कहने लगा। वह भिक्षा मांगने मेरे साथ जाता था। लोग उसे फकीर का बेटा समझते थे, पर मैं जानता था कि वह किसी और का लाल है। उसने मुझसे वादा लिया था कि मैं उसके घर कभी सच न बताऊं, क्योंकि उसे लगता था कि वह एक बुरा बेटा है।”

अध्याय 5: वह राज जिसने रूह कपा दी

हरिदास ने रोते हुए पूछा, “तो आज वह कहाँ है बाबा? उसे ले आइये, मैं उसके पैर पकड़कर माफी मांगूँगा।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। बाबा की आँखों से आँसू बह निकले। “तीन साल पहले मोहन बहुत बीमार पड़ गया था। उसे तेज बुखार था। मैं उसे शहर ले गया, पर डॉक्टर ने कहा कि बहुत देर हो चुकी है। मरने से पहले उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा— ‘बाबा, अगर कभी मेरे घर जाओ, तो माँ-बाप से कहना मैं उनसे नाराज नहीं था, बस डर गया था।’

हरिदास जमीन पर गिर पड़े। सावित्री पत्थर बन गई। बाबा ने अपने झोले से एक ताबीज और लकड़ी की गाड़ी का वह टूटा पहिया निकाला, जो मोहन की आखिरी निशानी थी।

अध्याय 6: आखिरी दुआ और विदाई

सच बताने के बाद बाबा जैसे बिल्कुल खाली हो गए। उनकी साँसे उखड़ने लगीं। उन्होंने हरिदास का हाथ पकड़कर कहा, “एक वादा करो बेटा। मुझे मोहन की कब्र के पास ही दफनाना। मैंने उसे जीते जी बेटा बनाकर पाला, अब मरकर उसके पास बाप बनकर सोना चाहता हूँ।”

हरिदास ने फूट-फूटकर रोते हुए कहा, “आप फकीर नहीं, मेरे बेटे के दूसरे बाप हैं!”

उस रात बाबा ने आखिरी बार उस चौखट को देखा, जिसे वह सालों से सिर्फ इसलिए देखने आते थे क्योंकि मोहन ने कहा था— “बाबा, मेरे घर जाना तो दरवाजे को जरूर देखना, ताकि लगे मैं अभी भी वहीं हूँ।” बाबा ने हाथ उठाकर आखिरी दुआ दी और हमेशा के लिए अपनी आँखें मूंद लीं।

उपसंहार: धर्म से बड़ी इंसानियत

पूरा नूरपुर गाँव उस दिन रो पड़ा। जो लोग बाबा को ढोंगी कहते थे, वे आज उनके जनाजे में सबसे आगे थे। हरिदास ने खुद बाबा को कंधा दिया और उन्हें मोहन की कब्र के ठीक बगल में दफनाया गया।

आज भी नूरपुर में लोग उस जगह को ‘इंसानियत का मजार’ कहते हैं। जहाँ एक हिंदू बेटा और एक मुस्लिम बाप साथ-साथ सोते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि मजहब अलग हो सकते हैं, दुआओं के शब्द अलग हो सकते हैं, लेकिन माँ-बाप का प्यार और इंसानियत का धर्म हमेशा एक होता है।

सन्देश: इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।