करोड़पति लड़की ने मज़ाक उड़ाया बूढ़े ने खूंखार सांड को काबू कर दिया! 😱

घमंड और जिद: एक अनोखी प्रेम दास्तां

अध्याय 1: रूप का अहंकार

रूपनगर के सेठ रामप्रसाद की बेटी मीना अपनी सुंदरता के लिए पूरे इलाके में मशहूर थी। मीना जितनी खूबसूरत थी, उसका दिल उतना ही पत्थर का था। उसे अपने रूप पर इतना घमंड था कि वह आम इंसानों को कीड़ा-मकौड़ा समझती थी। सेठ रामप्रसाद अपनी बेटी के नखरों से परेशान तो थे, लेकिन वे उसके मोह में अंधे भी थे।

एक दिन सेठ जी ने मीना की शादी के लिए एक अजीब शर्त रखी। उन्होंने घोषणा की कि जो भी पहलवान उनके पालतू और खूंखार बैल ‘काल-भैरव’ को अखाड़े में हरा देगा, मीना उससे शादी करेगी। अखाड़े में कई हट्टे-कट्टे नौजवान आए, लेकिन काल-भैरव के एक ही वार ने सबको धूल चटा दी।

अखाड़े के पास खड़ी मीना ठहाके मारकर हंस रही थी। “पिताजी, ये फटे हुए ढोल जैसे पहलवानों को आप कहां से पकड़ लाते हो? देखो इनकी शक्लें, चले थे मुझे जीतने!”

सेठ जी मुस्कुराए, “बेटी, ये सब तेरे रूप के दीवाने हैं। इन्हें तेरी एक झलक के लिए मरना भी मंजूर है।”

मीना ने तिरस्कार से कहा, “मरने दो! मेरी खूबसूरती है ही ऐसी। जो इस सांड को नहीं हरा सकता, वो मेरे नखरे क्या उठाएगा? हटाओ इस कचरे को यहां से!”

अध्याय 2: एक बूढ़ा आशिक

तभी भीड़ को चीरते हुए एक बूढ़ा आदमी सामने आया। उसके बाल सफेद थे, कमर थोड़ी झुकी हुई थी, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सा पागलपन था। उसका नाम था दामोदर।

दामोदर को देखकर भीड़ हंसने लगी। “बाप रे! ये बुड्ढा? इसे रास्ता दिखाने के लिए किसी को भेजूं या लाठी के सहारे श्मशान चला जाए?” मीना ने मखौल उड़ाया।

दामोदर की नजरें मीना पर टिकी थीं। उसने शांत स्वर में कहा, “श्मशान तो जा रहा था मीना, पर तेरी जवानी की चमक ने मेरे कदम रोक लिए। सुना है जो जीतता है, तू उसकी हो जाती है?”

मीना सन्न रह गई। “तू मुझे जीतेगा? अपनी उम्र देख, तेरे पैर कब्र में हैं!”

दामोदर मुस्कुराया, “पैर कब्र में हैं पर दिल तो अभी भी धड़कता है… सिर्फ तेरे लिए। मुझे तू चाहिए मीना। तेरी ये घमंड वाली हंसी, तेरी ये तिरछी आंखें, मुझे सब चाहिए।”

सेठ रामप्रसाद गुस्से में चिल्लाए, “ए पागल, निकल यहां से! मेरी बेटी का अपमान मत कर।”

दामोदर ने दृढ़ता से कहा, “अपमान नहीं सेठ जी, सौदा कर रहा हूं। शर्त सांड को हराने की थी, उम्र की तो कोई शर्त नहीं थी। अगर मैं जीत गया, तो मीना मेरी होगी। मंजूर?”

मीना ने घृणा से कहा, “जाने दो इसे पिताजी, मुझे इसके फटने में मजा आएगा। जब सांड इसके चिथड़े उड़ाएगा, तब मैं ताली बजाऊंगी। जा बुड्ढे, मर जा!”

अध्याय 3: जुनून की जीत

अखाड़े में काल-भैरव फुंकार रहा था। दामोदर निहत्था उसके सामने खड़ा था। सांड ने हमला किया, लेकिन दामोदर की फुर्ती किसी जवान से कम नहीं थी। उसने सांड के सींग पकड़ लिए और उसके कान में कुछ बुदबुदाया।

“तुझे गुस्सा आ रहा है ना? मुझे भी आता है। पर हम दोनों गुलाम हैं—तू उस खूंटे का और मैं इस लड़की की खूबसूरती का। समझा? क्योंकि दामोदर ने आज तक हारना नहीं सीखा और तू तो मेरा अपना है।”

अचानक चमत्कार हुआ। वह खूंखार सांड शांत होकर दामोदर के पैरों के पास बैठ गया। पूरा मजमा खामोश था।

दामोदर ने मीना की ओर देखा और कहा, “देख लिया रानी? जानवर भी समझ गया कि दामोदर की जिद के आगे टिकना नामुमकिन है।”

मीना का चेहरा सफेद पड़ गया। “मैं नहीं करूंगी शादी! मैं जहर खा लूंगी, लेकिन इस खूसट के साथ नहीं जाऊंगी!”

लेकिन सेठ रामप्रसाद अपनी जुबान के पक्के थे। उन्होंने भारी मन से कहा, “बेटी, तुझे जाना ही होगा।”

दामोदर ने मीना का हाथ पकड़ा और बोला, “शोर मत मचाओ मीना, गला खराब हो जाएगा। अब तुम मेरी हो। मेरी जिद… मेरा इनाम।”

अध्याय 4: नर्क जैसा घर

दामोदर मीना को अपने साथ एक टूटी-फूटी झोपड़ी में ले आया। मीना ने वहां कदम रखते ही नाक सिकोड़ ली। “छी! इस कबूतरखाने में रहूंगी मैं? मेरे घर का बाथरूम इससे बड़ा है।”

दामोदर ने प्यार से कहा, “बैठ जा मीना। तुझे सजाने के लिए मैंने ये घर नहीं, ये दिल रखा है। मैं बरसों से तुझे सड़क से गुजरते हुए छिपकर देखता था। आज तू मेरे सामने है, यकीन नहीं हो रहा।”

मीना चिल्लाई, “तू पागल है, तू साइको है!”

दामोदर हंसा, “हां, हूं। प्यार में कौन सयाना होता है? अब सो जा, मैं सारी रात जागकर तुझे देखूंगा।”

मीना ने उसे परेशान करने के लिए हर संभव कोशिश की। उसने खाना फेंक दिया, चीजें तोड़ दीं। “मुझे होटल का खाना चाहिए, ये जला हुआ हलवा नहीं खाना!”

दामोदर ने मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं, मैं दूसरा बना लूंगा। पर तू भूखी मत रह, तेरा चेहरा उतर जाएगा तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।”

मीना हैरान थी। “तुझे गुस्सा क्यों नहीं आता? मार मुझे, डांट मुझे! ये क्या नाटक है तेरा?”

दामोदर ने उसकी आंखों में देखकर कहा, “गुस्सा किस पर करूं? अपनी इकलौती दौलत पर? तू जितनी नफरत करेगी, मेरा प्यार उतना बढ़ेगा। तू चीजें तोड़, मैं उन्हें जोड़ दूंगा।”

अध्याय 5: खौफनाक रात और हकीकत

एक रात मीना वहां से भाग निकली। वह अंधेरे में भागती हुई पुराने जंगल की तरफ निकल गई। अचानक उसे कुछ आवारा लड़कों ने घेर लिया। “अरे देखो तो कौन है? सेठ की बेटी मीना! आज तो लॉटरी लग गई भाई।”

मीना डर के मारे कांपने लगी। “दूर रहो! मैं सेठ रामप्रसाद की बेटी हूं!”

“यहां सेठ नहीं, हम राजा हैं,” एक लड़के ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“बचाओ! कोई है!” मीना जोर-जोर से चिल्लाई।

तभी अंधेरे से एक परछाई उभरी। वह दामोदर था। “मीना को छेड़ने की हिम्मत कैसे हुई? आज तुम्हारा अंत है!”

दामोदर उन लड़कों पर टूट पड़ा। वह बूढ़ा आदमी उस समय किसी हैवान से कम नहीं लग रहा था। उसने अकेले ही उन सबको मार-मारकर भगा दिया। लेकिन इस लड़ाई में उसे बहुत चोटें आईं।

मीना रोते हुए उसके पास आई। “क्यों… क्यों आए बचाने? मैं तो भाग रही थी ना, मरने देते मुझे।”

दामोदर ने खून पोंछते हुए कहा, “मरने कैसे देता? तू मेरा गुरूर है मीना। अगर तुझे खरोंच भी आती, तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाता।”

मीना का घमंड उस रात जंगल की मिट्टी में मिल गया। उसने देखा कि जिन लड़कों की तारीफों पर वह इतराती थी, उनमें से कोई नहीं आया। आया तो वह बूढ़ा, जिससे वह सबसे ज्यादा नफरत करती थी।

अध्याय 6: जिद से आदत तक

कुछ महीने बीत गए। दामोदर और मीना अब साथ-साथ थे। मीना की आंखों में अब वह नफरत नहीं थी।

एक दिन वे बाजार से गुजर रहे थे। दामोदर थोड़ा लंगड़ा कर चल रहा था। मीना ने उसका हाथ थाम लिया। “संभलकर चलिए बाबा, रास्ता पथरीला है।”

दामोदर रुक गया, “क्या कहा? क्या तुझे अब मुझसे डर नहीं लगता?”

मीना मुस्कुराई और उसके कंधे पर सिर रख दिया। “आज बाजार से मेरे लिए गजरा लाइएगा। और हां, अगर कोई मुझे देखे तो उसकी टांगे तोड़ दीजिएगा।”

दामोदर ठहाका मारकर हंसा, “अरे टांगे क्या, तू बस मेरी है! सिर्फ मेरी!”

मीना ने धीरे से कहा, “हां… सिर्फ आपकी। क्योंकि मेरे घमंड को सिर्फ आपकी जिद ही संभाल सकती है।”

इश्क कभी-कभी जिद से शुरू होता है और आदत पर खत्म। मीना को अब उस बूढ़े के चेहरे में झुर्रियां नहीं, बल्कि वह अटूट प्यार नजर आता था जो दुनिया के किसी जवान चेहरे में नहीं मिल सकता था।