क्या हुआ जब इंस्पेक्टर ने आम लड़की समझकर IPS अफसर से बदतमीजी कर दी, फिर उसके बाद जो हुआ

मां की इज्जत – डीएम बेटी का संघर्ष

भाग 1: बाजार में इज्जत की लड़ाई

बाजार की एक व्यस्त सड़क पर पार्वती देवी रोज की तरह अपनी छोटी सी टोकरी में मीठे और पके हुए अमरूद बेच रही थीं। उनकी दो बेटियां थीं – बड़ी बेटी प्रिया वर्मा जो दूसरे जिले में आईपीएस अधिकारी थी, और छोटी बेटी नेहा वर्मा इसी शहर की डीएम थी। पार्वती देवी को अपनी बेटियों पर बेहद गर्व था। जब भी कोई पूछता, “अम्मा आपकी बेटियां क्या करती हैं?” तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। वह कहतीं, “एक जिले में कानून व्यवस्था संभालती है, दूसरी जिले की मालकिन है।”

फिर भी पार्वती देवी आज भी कभी-कभी बाजार में अमरूद बेचने बैठ जातीं, पर अपनी बेटियों को कभी नहीं बताती थीं। सब कुछ ठीक चल रहा था, तभी एक इंस्पेक्टर दीपक राय अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर वहां आया। उसने बाइक सड़क किनारे रोकी और सीधा पार्वती देवी की टोकरी के पास आकर खड़ा हो गया।

दीपक ने टोकरी में से एक अमरूद उठाया और बिना कुछ कहे मुंह में डाल लिया। पार्वती देवी सकुचाईं, “साहब, अमरूद बहुत रसीले हैं। आप चाहे तो वजन कर दूं।” दीपक राय ने अकड़ते हुए जवाब दिया, “देना 1 किलो जल्दी।” पार्वती देवी ने कांपते हाथों से अमरूद तौलकर पॉलिथीन में दे दिए। दीपक ने पैकेट लिया, फिर से एक अमरूद निकाला और सामने ही काट कर खाने लगा।

कुछ देर चबाने के बाद उसने मुंह बनाते हुए कहा, “अरे यह क्या दिया रे? एकदम फीके हैं। अमरूद मीठे तो बिल्कुल भी नहीं है।” पार्वती देवी घबरा गईं, “नहीं साहब, बहुत रसीले हैं। आप चाहे तो दूसरा टेस्ट कर लीजिए।” लेकिन दीपक राय हंसते हुए बोला, “चुप! तेरे अमरूद का एक टुकड़ा भी मीठा नहीं। तूने मुझे ठग लिया है और सुन, मैं एक पैसा भी नहीं दूंगा। समझी?”

पार्वती देवी ने हिम्मत करके हाथ जोड़ते हुए कहा, “साहब, मेहनत से लाए हैं। थोड़ा सा तो दे दीजिए बस।” यही सुनते ही दीपक राय का पारा चढ़ गया। उसने गुस्से में झुककर पूरी टोकरी उठाई और सड़क की दूसरी तरफ जोर से फेंक दी। टोकरी पलट गई और सारे अमरूद सड़क, गाड़ियों और नाली में बिखर गए। पार्वती देवी हक्की-बक्की रह गईं। उनकी आंखों में आंसू भर आए। होंठ कांपने लगे। उनकी मेहनत और इज्जत दोनों ही सड़क पर कुचली जा रही थी।

आसपास भीड़ जमा हो गई थी। लोग तमाशा देख रहे थे, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उस वर्दी वाले से कुछ कहे। पास के ही एक घर की छत पर खड़ा नौजवान विक्रम यह सब अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर रहा था। उसका खून खौल रहा था। वह पार्वती अम्मा को बचपन से जानता था और उनका बहुत सम्मान करता था।

दीपक राय अपनी मूछों पर ताव देता हुआ बाइक स्टार्ट कर चला गया, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। भीड़ में से किसी ने पार्वती देवी की मदद नहीं की। विक्रम ने वीडियो रिकॉर्ड करना बंद किया और सोचने लगा कि इस वीडियो का क्या किया जाए। उसे पता था कि पार्वती अम्मा की एक बेटी पुलिस में है। उसने कहीं से उनका नंबर जुगाड़ किया और तुरंत वह वीडियो प्रिया वर्मा के WhatsApp पर भेज दिया, “प्रिया दीदी देखिए आज बाजार में आपकी मां के साथ क्या हुआ।”

भाग 2: बेटियों का गुस्सा, मां का दर्द

प्रिया वर्मा अपने ऑफिस में एक जरूरी फाइल पढ़ रही थीं। तभी उनके फोन पर WhatsApp का मैसेज टोन बजा। उन्होंने फोन उठाकर देखा, एक अनजान नंबर से वीडियो आया था। वीडियो प्ले किया, तो उनके चेहरे का रंग बदलता गया। उनकी शांत आंखें गुस्से से लाल हो गईं। जब उन्होंने इंस्पेक्टर दीपक राय को अपनी मां की टोकरी उठाकर फेंकते देखा तो उनके हाथ कांपने लगे।

उनकी मां, जिसने उन्हें और उनकी बहन को पालने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, आज सड़क पर बेबस रो रही थी और लोग तमाशा देख रहे थे। उनके अंदर का पुलिस अधिकारी जाग उठा। उनका मन किया कि अभी यहां से जाएं और उस इंस्पेक्टर की वर्दी नोच लें। उन्होंने अपने दांत भीच लिए, सांसे तेज हो गई थीं। तुरंत वह वीडियो अपनी छोटी बहन डीएम नेहा वर्मा को फॉरवर्ड किया। वीडियो भेजते ही नेहा को फोन लगाया।

नेहा उस वक्त अपने ऑफिस में एक जरूरी मीटिंग में थी। उन्होंने अपनी बड़ी बहन का फोन देखा तो मीटिंग रोक कर फोन उठाया, “हां दीदी, सब ठीक है?”
“ठीक है? कुछ भी ठीक नहीं है,” बोली प्रिया। उनकी आवाज में गुस्सा और दर्द साफ झलक रहा था।
“मैंने तुझे एक वीडियो भेजा है। उसे देख, अभी के अभी देख।”
नेहा ने फोन होल्ड पर रखा और WhatsApp खोला। वीडियो देखते ही उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उनकी प्यारी मां सड़क पर बिखरे अमरूद के लिए रो रही थी। एक मामूली इंस्पेक्टर ने उनकी मां की इज्जत को सड़क पर रौंद दिया था। नेहा की आंखों में भी आंसू आ गए। लेकिन उन्होंने खुद को संभाला। वह एक डीएम थीं। उन्हें भावनाओं में बहने का हक नहीं था।

“दीदी, मैं यह सब सह नहीं सकती।”
“मैं आ रही हूं। छुट्टी लेकर मैं उसको नहीं छोड़ूंगी।”
“नहीं दीदी, आपकी जरूरत आपके जिले में कानून व्यवस्था संभालने में है। यह मेरा इलाका है। यह लड़ाई मैं लूंगी। मां को इंसाफ मैं दिलाऊंगी, कानून के तरीके से।”
प्रिया कुछ देर चुप रहीं। बोलीं, “ठीक है, लेकिन उसे ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि उसकी नींद उड़ जाए।”
“आप चिंता मत करो दीदी, अब यह मेरा काम है,” कहकर नेहा ने फोन काट दिया।

भाग 3: डीएम का प्लान

नेहा ने मीटिंग खत्म की। अपनी सरकारी गाड़ी में नहीं बल्कि एक प्राइवेट गाड़ी में बैठकर अपने पुराने घर की तरफ निकलीं। रास्ते में अपने डीएम वाले कपड़े बदलकर एक साधारण सा गुलाबी रंग का सलवार सूट पहन लिया। वह अपनी मां के पास एक बेटी बनकर जाना चाहती थीं, डीएम बनकर नहीं। जब वह घर पहुंचीं तो पार्वती देवी एक कोने में चुपचाप बैठी थीं। उनकी आंखें सूजी हुई थीं। अपनी बेटी को अचानक देखकर वह घबरा गईं।

“नेहा तू यहां, सब ठीक तो है?”
नेहा कुछ नहीं बोलीं। बस अपनी मां के पास गईं और उन्हें कसकर गले लगा लिया। मां की गोद में सिर रखकर वह अपने आंसू नहीं रोक पाईं।
“मां, आपने बताया क्यों नहीं?”
पार्वती देवी ने सिसकते हुए कहा, “क्या बताती बेटी? मैं नहीं चाहती थी कि तुम लोगों को कोई परेशानी हो। और वह पुलिस वाला है, छोड़ उसकी बात। आज तू इतने दिनों बाद आई है, आज मैं बहुत खुश हूं।”
नेहा ने अपनी मां के आंसू पोंछे और उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया, “अब आप गरीब और अकेली नहीं हैं मां। आपकी बेटी इस जिले की मालिक है। मैं वादा करती हूं जिसने भी आपके साथ ऐसे दुर्व्यवहार किया है, उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। आपकी खोई हुई इज्जत मैं वापस लाऊंगी।”

उस रात नेहा ने एक पूरा प्लान बनाया। अगली सुबह अपने भरोसेमंद अफसर एसडीएम अमित को फोन किया, “अमित, मैं तुम्हें एक काम दे रही हूं और यह बात हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिए। मैं अभी सिविल ड्रेस में शहर के कोतवाली थाने में एक रिपोर्ट लिखवाने जा रही हूं। अपनी पहचान छिपा कर। मैं चाहती हूं कि तुम ठीक 2 घंटे बाद जिले के ईएसपी, डीएसपी और बाकी बड़े पुलिस अफसरों की टीम के साथ थाने पहुंचो। जब तक मैं इशारा ना करूं, कोई कुछ नहीं बोलेगा।”

भाग 4: कानून की ताकत

नेहा आम नागरिक की तरह ऑटो पकड़ कर कोतवाली थाने पहुंची। थाने का माहौल वैसा ही था जैसा उन्होंने सोचा था। एक हवलदार ऊंघ रहा था, इंस्पेक्टर दीपक राय और एसएओ कमल शर्मा चाय पीते हुए हंसी-मजाक कर रहे थे। नेहा डरते-डरते उनकी टेबल के पास गईं, “जी मुझे एक शिकायत दर्ज करवानी है।”

“क्या हुआ? किसने परेशान किया?”
“जी कल बाजार में इंस्पेक्टर साहब ने…”
जैसे ही उन्होंने इंस्पेक्टर का नाम लिया, दीपक राय चौकन्ना हो गया।
“नाम क्या है तेरा? और किस इंस्पेक्टर की बात कर रही है?”
“जी आप ही थे। आपने कल बाजार में एक बुजुर्ग महिला के अमरूद की टोकरी सड़क पर फेंकी थी। मैं उनकी बेटी हूं।”
यह सुनते ही दीपक और कमल जोर-जोर से हंसने लगे।
“तू उस बुढ़िया की बेटी है? तो क्या हुआ? सड़क पर गंदगी फैलाएगी तो डंडा पड़ेगा ना। चल भाग यहां से। कोई एफआईआर नहीं लिखी जाएगी।”

नेहा ने थोड़ा साहस दिखाते हुए कहा, “लेकिन यह गैरकानूनी है। आपने वर्दी का गलत इस्तेमाल किया है।”
“तू हमें कानून सिखाएगी? ज्यादा जबान चलाई तो तुझे ही अंदर कर दूंगा। निकल यहां से।”
नेहा वहीं खड़ी रहीं, “मैं एफआईआर लिखवाए बिना नहीं जाऊंगी।”

तभी एक हवलदार भागता हुआ अंदर आया, “सर सर, वीरेंद्र सिंह चौहान जी थाने में आ रहे हैं।”
वीरेंद्र सिंह शहर का दबंग नेता था, जिसके इशारे पर पुलिस वाले नाचते थे। दोनों इंस्पेक्टर गेट की तरफ भागे। एक सफेद सफारी गाड़ी थाने के अंदर आकर रुकी। उसमें से वीरेंद्र सिंह चौहान उतरा।
“क्या हाल है राय? कामधाम अच्छा चल रहा है ना? कोई मुर्गावर्गा फंसाया कि नहीं आज?”
दीपक और कमल हाथ जोड़कर मुस्कुराने लगे, “साहब आपकी कृपा है। आइए बैठिए।”

लेकिन तभी वीरेंद्र सिंह की नजर कोने में खड़ी नेहा पर पड़ी। उसके चेहरे की हंसी गायब हो गई, माथे पर पसीना आ गया। वह तेजी से आगे बढ़ा और नेहा के सामने जाकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, “नमस्ते मैडम। आप यहां, मुझे फोन कर लिया होता, मैं हाजिर हो जाता।”

दीपक और कमल हैरान रह गए। यह हो क्या रहा है? यह तो उस बुढ़िया की बेटी है। वीरेंद्र सिंह जी इसके सामने हाथ क्यों जोड़े हैं? जिस नेता के सामने पूरा जिला झुकता है, वह इस लड़की के सामने हाथ जोड़े क्यों खड़ा है?

तभी थाने के बाहर गाड़ियों के रुकने की आवाज आई। एक-एक कर जिले के कई बड़े अफसर आए और नेहा के पीछे लाइन बनाकर खड़े हो गए। डीएसपी ने आगे बढ़कर गुस्से में दीपक राय की तरफ देखा, “इंस्पेक्टर तमीज से खड़े हो जाओ। तुम डीएम मैडम नेहा सिंह के सामने खड़े हो।”

“डीएम मैडम!” यह शब्द थाने में बम की तरह फटा। दीपक और कमल के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे कांपते हुए नेहा को देखने लगे। नेहा की आंखों में अब आम लड़की की घबराहट नहीं, बल्कि एक डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट का रौब और गुस्सा था।

“यू आर सस्पेंडेड विद इमीडिएट इफेक्ट।”
नेहा ने आदेश दिया, “एसडीएम साहब, इन दोनों के खिलाफ वर्दी की धौंस दिखाने, एक आम नागरिक को अपमानित करने और अपनी ड्यूटी ना करने के जुर्म में एफआईआर दर्ज कीजिए। साथ ही इनके खिलाफ विभागीय जांच भी बिठाई जाए।”

एसपी साहब ने तुरंत अपने मातहतों को इशारा किया और दोनों इंस्पेक्टरों की बेल्ट और टोपी उतरवा दी गई। कल तक जो शेर बने घूम रहे थे, आज भीगी बिल्ली की तरह सिर झुकाए खड़े थे।

भाग 5: साजिश का जाल

नेता वीरेंद्र सिंह चौहान ने हिम्मत करके कहा, “मैडम, नादान हैं गलती हो जाती है, माफ कर दीजिए मैं समझा दूंगा इनको।”
नेहा ने घूमकर वीरेंद्र सिंह को ऐसी नजरों से देखा कि वह कांप गया, “नेता जी, यह नादान नहीं, सरकारी वर्दी में छुपे गुंडे हैं। जहां तक समझाने की बात है, अब इन्हें कानून समझाएगा। बेहतर होगा कि आप इस मामले से दूर रहें, वरना जांच की आंच आप तक भी पहुंच सकती है।”

वीरेंद्र सिंह का चेहरा सफेद पड़ गया। वह समझ गया कि इस नई डीएम से टकराना आसान नहीं है। वह चुपचाप सिर झुकाकर वहां से खिसक गया। लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी नफरत और गुस्सा था जो नेहा ने पढ़ लिया था।

भाग 6: मां पर हमला

कुछ दिन शांति से गुजरे। नेहा को लगा शायद चेतावनी काम कर गई और वीरेंद्र सिंह पीछे हट गया है। लेकिन वह तूफान से पहले की शांति थी। एक सुबह पार्वती देवी बाजार से अमरूद खरीद कर आ रही थीं कि अचानक पुलिस की तीन गाड़ियां वहां आकर रुकीं। उनमें से एक नया इंस्पेक्टर उतरा जिसे नेहा नहीं जानती थी।

“हमें सूचना मिली है इन अमरूदों की आड़ में नशीले पदार्थ की तस्करी हो रही है, तलाशी लो।”
एक सिपाही ने अमरूदों के नीचे से भूरे रंग का नशीला पदार्थ निकाला और चिल्लाया, “सर मिल गया नशीला पदार्थ!”
बाजार में हड़कंप मच गया। लोग कानाफूसी करने लगे, “देखो डीएम की मां नशीले पदार्थ ले जा रही थी!”

पार्वती देवी सन्न रह गईं। रोते हुए बोलीं, “नहीं साहब, यह मेरा नहीं है। किसी ने मुझे फंसाया है।”
लेकिन किसी ने उनकी एक ना सुनी। पुलिस उन्हें जबरदस्ती जीप में बिठाकर ले गई। यह खबर आग की तरह पूरे शहर में फैल गई। न्यूज़ चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगी: “डीएम नेहा वर्मा की मां नशीले पदार्थ के आरोप में गिरफ्तार।”

यह वीरेंद्र सिंह चौहान का मास्टर स्ट्रोक था। उसने नेहा पर सीधा हमला नहीं किया, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी उसकी मां पर वार किया था।

भाग 7: कानून का दांव और सच्चाई की जीत

नेहा एक दुविधा में फंस गई थीं। अगर वह अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके मां को छुड़ाती तो उन पर पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगता। अगर वह चुप रहती तो उनकी बेगुनाह मां जेल में सड़ती। नेहा ने तुरंत एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, “कानून सबके लिए बराबर है। चाहे वह एक आम नागरिक हो या डीएम की मां। मैं इस केस की जांच से खुद को अलग करती हूं ताकि जांच पर कोई असर ना पड़े। एसपी साहब एक स्पेशल टीम बनाकर निष्पक्ष जांच करेंगे। मुझे भारत के कानून पर पूरा भरोसा है।”

वीरेंद्र सिंह भी हैरान रह गया। नेहा सिर्फ कानून के भरोसे नहीं बैठी थी। उन्होंने विक्रम को बुलाया, “विक्रम, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। बाजार में मां की टोकरी के पास कौन-कौन आया था, कोई भी अजीब हरकत, मुझे हर छोटी-बड़ी जानकारी चाहिए।”

विक्रम ने बाजार के दुकानदारों और दोस्तों से पूछताछ शुरू की। दो दिन की मेहनत के बाद उसे एक सुराग मिला। पास की दुकान के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में एक आदमी पार्वती देवी की टोकरी के पास कुछ रखते हुए दिखा था। वह वही आदमी था जिसे लोगों ने सस्पेंड हुए इंस्पेक्टर दीपक राय के साथ कई बार देखा था।

अब बारी नेहा की थी। उन्होंने एएसपी के साथ मिलकर जाल बिछाया। झूठी खबर फैलाई कि सीसीटीवी फुटेज में नशीला पदार्थ रखने वाले का चेहरा साफ-साफ आ गया है और पुलिस उसे पकड़ने ही वाली है। वीरेंद्र सिंह के कैंप में खलबली मच गई। उसने तुरंत दीपक राय को फोन किया, “वह आदमी पकड़ा नहीं जाना चाहिए। उसको कुछ करो वरना हम सब पकड़े जाएंगे।”
वीरेंद्र सिंह को नहीं पता था कि उसका फोन पहले से ही पुलिस के सर्विलांस पर था।

दीपक राय और कमल शर्मा उस आदमी को ठिकाने लगाने के लिए जैसे ही शहर के बाहर एक सुनसान जगह पर पहुंचे, नेहा और एएसपी ने पूरी टीम के साथ उन्हें घेर लिया। हाथों पकड़े जाने पर दोनों ने वीरेंद्र सिंह चौहान के खिलाफ अपना मुंह खोल दिया।

अगली सुबह जब वीरेंद्र सिंह चौहान अपने घर पर बैठकर चाय पी रहा था, तभी दरवाजे पर जोरदार दस्तक हुई। सामने डीएम नेहा वर्मा, एसपी और भारी पुलिस फोर्स थी। नेहा ने कठोरता से कहा, “खेल खत्म हो गया। नेताजी आपके मोहरे पकड़े जा चुके हैं और उन्होंने आपके सारे राज उगल दिए हैं।”

एसपी ने अरेस्ट वारंट थमाया, “हमारे पास आपकी फोन रिकॉर्डिंग है जिसमें आप षड्यंत्र रच रहे थे। अब आप हमारे साथ थाने चलेंगे।” वीरेंद्र सिंह चौहान का राजनीतिक साम्राज्य एक ही पल में ढह गया। उसे हथकड़ियां पहनाकर पुलिस जीप में ले जाया गया।

उसी शाम पार्वती देवी को बाइज्जत बरी कर दिया गया। जब वह जेल से बाहर आईं, नेहा उन्हें लेने आई थीं। मां-बेटी एक-दूसरे के गले लगकर रो पड़ीं। अगली सुबह नेहा पार्वती देवी को अपनी गाड़ी में बैठाकर अपनी पोस्टिंग पर लेकर चली गईं और दोनों साथ में हंसी-खुशी रहने लगे। जब उनकी बड़ी बहन आईपीएस अधिकारी प्रिया को छुट्टी मिलती, वह भी आ जाती। तीनों साथ में हंसी-खुशी रहते।

सीख और संदेश
यह कहानी केवल मनोरंजन और शिक्षा के उद्देश्य से बनाई गई है। इसमें दिखाए गए सभी पात्र, घटनाएं और संवाद काल्पनिक हैं। किसी भी वास्तविक व्यक्ति, संस्था या घटना से इनका कोई संबंध नहीं है। कृपया इसे केवल कहानी के रूप में देखें, और इसका आनंद लें। हम किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं चाहते। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो तो इसे लाइक करें, शेयर करें और कमेंट करके बताएं कौन सा कदम सबसे अच्छा लगा।

हम आपके लिए ऐसे ही प्रेरणादायक कहानियां लाते रहेंगे। धन्यवाद।