गरीब आदमी को झूठे केस मे फंसाया जा रहा था… गरीब लड़का बोला “इनका केस मैं करूंगा जज साहब

सच का वकील: अर्जुन की अदालत

प्रस्तावना

“जज साहब, इस अंकल को सजा मत दीजिए। ये बेकसूर हैं। मैं इनका वकील बनकर इनका यह केस लडूंगा।”
पूरा कोर्टरूम सन्नाटे में था। सामने खड़ा था एक दुबला सा, नंगे पांव, बारह साल का लड़का – अर्जुन। उसके पास कोई डिग्री नहीं, कोई वकील की बैज नहीं, बस एक किताब, एक पेन और बहुत सारी हिम्मत। कड़घरे में खड़ा था रमेश – एक साधारण चाय वाला, जिसे एक भयानक सड़क हादसे का दोषी बनाया गया था। अदालत में भी बिके हुए वकील, झूठे गवाह, फर्जी रिपोर्टें… लेकिन अर्जुन के पास था सिर्फ सच।
यह कहानी है न्याय, साहस और ईमानदारी की, जो सिस्टम की दीवारों को भी हिला देती है।

भाग 1: एक मासूम पर झूठा इल्जाम

कुछ हफ्ते पहले शहर के बाहरी इलाके में एक तेज रफ्तार ब्लैक कार ने सड़क किनारे सो रहे चार मजदूरों को कुचल दिया था।
तीन की मौके पर मौत हो गई, एक बुजुर्ग अस्पताल में जिंदगी से लड़ रहा था।
अखबारों ने लिखा – “नशे में धुत चाय वाले ने सड़क पर तेज गाड़ी चलाई, चार मजदूरों को कुचल दिया।”
असल गुनहगार था विक्रम सिंह – एक रसूखदार उद्योगपति का बेटा, ड्रग्स का आदि, पहले भी कई केसों में नाम आया, लेकिन हर बार पैसे के दम पर छूट गया।
इस बार भी पैसा चला, गवाह बदले, सबूत गायब, और इल्जाम रमेश पर डाल दिया गया।
रमेश – एक गरीब चाय वाला, बेकसूर।

भाग 2: रमेश की दुनिया

रमेश की छोटी सी चाय की दुकान थी, जिससे वह अपनी बुजुर्ग मां और दो बेटियों को पालता था।
ना पढ़ा-लिखा, ना ताकतवर, ना कोई रसूख।
उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह किसी एक्सीडेंट के लिए आरोपी बना दिया जाएगा।
एक रात पुलिस ने दरवाजा तोड़ा, “तुम अरेस्ट हो। हिट एंड रन केस में।”
रमेश कुछ समझ ही नहीं पाया, “मैंने क्या किया? मेरी दुकान तो बंद थी, मैं सो रहा था।”
पर किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

भाग 3: बिके हुए वकील और टूटता भरोसा

अदालत में रमेश को एक सरकारी वकील मिला – अनिल कुमार।
वह केस लड़ने से ज्यादा डील करने में इंटरेस्टेड था।
“सुनो, एडमिट कर दो कि तुमने गाड़ी चलाई थी। फिर बेल के लिए अर्जी लगा देंगे, दो महीने में केस खत्म हो जाएगा।”
रमेश हैरान, “लेकिन मैंने गाड़ी चलाई ही नहीं!”
अनिल हंस पड़ा, “यहां कानून में यह सब मैटर नहीं करता। मेरे कहने पर चलो, वरना उम्र कैद हो जाएगी।”

पहली सुनवाई में जज ने पूछा, “क्या तुम गिल्टी हो?”
रमेश ने सिर हिलाया, “नहीं जज साहब, मैं निर्दोष हूं।”
जज ने पेपर्स देखे – सब कुछ क्लियर कट लग रहा था।
सीसीटीवी फुटेज फेक, पुलिस रिपोर्ट झूठी, गवाह खरीदे हुए।
सरकारी वकील भी रमेश को ही कंडेम कर रहा था।
जज ने कहा, “नेक्स्ट हियरिंग में अपना सच लेकर आना, नहीं तो कोर्ट तुम्हें लाइफ इंप्रिजनमेंट दे देगा।”

भाग 4: अर्जुन की नजर में झूठ

हर रोज की सुनवाई के बाद अदालत के बाहर एक बच्चा फाइलें उठाता था – अर्जुन।
नंगे पांव, फटी कमीज, उलझे बाल, लेकिन आंखों में तेज।
अर्जुन एक अनाथ बच्चा था, माता-पिता की मौत के बाद अदालत के बाहर ही रहता था।
कभी वकीलों की बहस सुनता, कभी फाइलें उठाता, कभी कूड़े से निकली कानून की किताबें पढ़ता।
एक बुजुर्ग ने पूछा, “तुम यह सब क्यों पढ़ते हो?”
अर्जुन बोला, “क्योंकि यहां न्याय नहीं, बिजनेस चल रहा है। अगर कोई सच के साथ हो तो जीत सकता है। मैं यह सब सीखना चाहता हूं।”

जब अर्जुन ने रमेश की फाइल देखी, उसे कहानी में बहुत झूठ दिखा।
सीसीटीवी फुटेज में दिखने वाली कार का रंग था सफेद Maruti Suzuki, लेकिन पुलिस रिपोर्ट में लिखा था ब्लैक BMW।
उसी कार में से एक बैग निकला था जिसमें लाखों रुपये नकद थे।
अर्जुन को लगा – यह तो प्लांटेड एविडेंस है।

भाग 5: अदालत में अर्जुन की एंट्री

अगली सुनवाई में रमेश टूट चुका था।
अदालत के दरवाजे खुले, अर्जुन अंदर गया।
सब ने ध्यान दिया – दुबला सा नंगे पांव बच्चा।
जज ने मुस्कुराते हुए पूछा, “क्या बात है बेटा?”
अर्जुन ने हिम्मत से कहा, “जज साहब, मैंने इस केस को देखा है और पाया है कि इसमें बहुत सारे झूठ हैं।”

पूरी अदालत में हलचल मच गई।
अनिल गवर्नमेंट लॉयर चिल्लाया, “जज यह बच्चा क्या बेतुकी बातें कर रहा है?”
जज ने हाथ उठाया, “चुप, इसे सुनने दो।”
अर्जुन बोला, “जज साहब, मैं इस केस को फॉर्मली हैंडल करना चाहता हूं। मैं रमेश अंकल का वकील बनना चाहता हूं और उन्हें बेकसूर साबित करूंगा।”

जज ने चश्मा उतार लिया, “बेटा, तुम समझते हो कि वकील बनने के लिए लॉ डिग्री चाहिए। तुम्हारे पास तो यह सब है ही नहीं।”
अर्जुन ने साहस से जवाब दिया, “जज साहब, मैंने कानून की किताबें पढ़ी हैं। मैं जानता हूं कि न्याय क्या होती है और मैं जानता हूं कि इस केस में झूठ है। मुझे सिर्फ एक मौका दीजिए।”
जज ने सोचा, फिर बोले, “ठीक है। मैं तुम्हें एक हफ्ता देता हूं। अगर तुम ठोस सबूत ला सकते हो तो मैं केस को रीइन्वेस्टिगेट करवाऊंगा। नहीं तो मैं लाइफ इंप्रिजनमेंट का फैसला दे दूंगा।”

भाग 6: सात दिन की जंग

अर्जुन के पास सिर्फ सात दिन थे।
वह रातोंरात काम करने लगा।

पहला सबूत: सीसीटीवी फुटेज
शहर के सभी चाय की दुकानों में पूछा।
एक दुकानदार के फोन में एक्सीडेंट के दिन का फुटेज मिल गया।
उसमें साफ दिख रहा था – एक सफेद कार ने एक्सलरेट किया और मजदूरों को कुचल दिया।
पुलिस रिपोर्ट में ब्लैक कार लिखा था – झूठ।

दूसरा सबूत: नंबर प्लेट
एक पान वाले ने बताया – उसने कार का नंबर प्लेट फोटो ले लिया था।
अर्जुन ने ओरिजिनल नंबर प्लेट देखा – VK 05 BMW, विक्रम सिंह की कार।

तीसरा सबूत: ब्लड रिपोर्ट
अस्पताल के रिकॉर्ड से अर्जुन ने विक्टिम की ब्लड रिपोर्ट निकाली।
उसमें अल्कोहल का कोई सबूत नहीं था।
पुलिस रिपोर्ट में लिखा था – विक्टिम वास ड्रंक। फिर से झूठ।

चौथा सबूत: कार के पार्ट्स
अर्जुन एक स्क्रैप यार्ड गया।
वहां क्रैश की हुई BMW का हिस्सा मिला।
उस हिस्से पर गाड़ी की मैन्युफैक्चरिंग डेट, चेसिस नंबर और ओनर का नाम – विक्रम सिंह।
उसका रिसीप्ट भी मिल गया।

पांचवां सबूत: असली गवाही
अर्जुन ने दुकानदारों को ट्रैक किया जो हादसे के समय मौजूद थे।
पता चला – असली गवाही तो फेंकी गई थी।
लोगों को पैसे देकर गलत बयान दिलवाया गया था।
अर्जुन ने असली गवाहों को अदालत में लाने का इंतजाम किया।

भाग 7: अदालत में सच की जीत

हफ्ते बाद अर्जुन ने अदालत के सामने एक मोटी फाइल रख दी – सबूतों, डॉक्यूमेंट्स, फोटोग्राफ्स के साथ।
जज की आंखें खुली रह गईं, “यह सब तुम एक हफ्ते में कैसे जुटा सके?”
अर्जुन ने साधारण सी बात कही, “जज साहब, सच को खोजने के लिए सिर्फ एक चीज चाहिए – हिम्मत।”

जज ने सबूत देखे, हर झूठ सामने आ गया।
असल गुनहगार विक्रम सिंह का नाम सामने आया।
पुलिस ऑफिसर्स का नाम आया, जिन्होंने फेक रिपोर्ट बनाई थी।
सरकारी वकील का नाम आया, जिसने रिश्वत ली थी।

फैसला सुनाया गया:
रमेश सभी आरोपों से मुक्त।
विक्रम सिंह – 25 साल की कैद।
पुलिस ऑफिसर्स – सस्पेंड, जांच के लिए भेजे गए।

भाग 8: अर्जुन का सम्मान

जज ने अर्जुन को अपने पास बुलाया।
उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा, “बेटा, आज तुमने कानून नहीं, अपनी जमीर को जिताया है। जो वकील, जो पुलिस, जो सरकार नहीं कर सके, तुम एक बच्चे के रूप में कर गए। तुम्हारे लिए मेरे पास कोई सजा नहीं है, बस एक उपहार है।”

जज ने अर्जुन को एक लॉ डिग्री का सर्टिफिकेट दिया, “जब तुम बड़े हो जाओगे, यह तुम्हें लॉयर बनने में मदद करेगा। तब तक तुम मेरी अदालत में जूनियर एडवोकेट के तौर पर काम कर सकते हो।”

भाग 9: नई शुरुआत

अर्जुन अब अदालत का ऑफिशियल जूनियर एडवोकेट बन गया।
उसके पास फॉर्मल डिग्री नहीं थी, पर सच था।
सच ही सबसे बड़ी डिग्री है।

रमेश की खुशी:
रमेश अपनी दुकान पर लौट आया।
उसकी मां, बेटियां सब खुश थे।
अर्जुन हर शाम चाय पीने आता।
“अंकल, आपको पता है? अगर आप सच बोलते रहते तो न्याय निश्चित था। न्याय कभी देर करता है, पर कभी गायब नहीं होता।”

भाग 10: अंतिम संदेश

यह सिर्फ एक कहानी नहीं है,
यह लाखों लोगों की कहानी है जो हर दिन गलत न्याय का शिकार होते हैं।
एक बच्चे को कोई डिग्री नहीं चाहिए।
अगर उसके पास सच है, साहस है,
तो पूरा सिस्टम भी बदल जाता है।
कोई भी, किसी भी उम्र में, अगर साहस और सच के साथ खड़ा हो जाए
तो कोई भी झूठ, कोई भी सिस्टम हमें हरा नहीं सकता।

समाप्ति

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“सच को वकील नहीं, हिम्मत चाहिए!”
क्योंकि जब तक हम सच के साथ खड़े रहेंगे, तब तक कोई भी झूठ, कोई भी सिस्टम हमें हरा नहीं सकता।