गरीब बच्ची को सड़क पर एक अरबपति का बटुआ मिला — उसे क्या पता था, वो उसका असली पिता है!

“आरोही: एक झुग्गी बस्ती से परिवार तक”
प्रस्तावना
मुंबई – सपनों का शहर, जहां लाखों लोग रोज़ अपने हिस्से की रोशनी तलाशते हैं। इसी शहर की भीड़भाड़ में, धारावी की तंग गलियों में, दस साल की आरोही अपनी मां मीरा के साथ एक छोटे से सीलन भरे कमरे में रहती थी। उनकी दुनिया सीमित थी – टूटी छत, फटे कपड़े, और रोज़ की जद्दोजहद। लेकिन इस छोटी सी बच्ची के दिल में उम्मीद की लौ कभी बुझी नहीं थी।
भाग 1: संघर्ष की सुबह
धारावी की गलियों में आज सुबह कुछ अलग थी। आमतौर पर, आरोही की आवाज़ – “टिकट ले लो बाबूजी, मेरी मदद कर दो!” – गाड़ियों के बीच गूंजती थी। लेकिन आज वह घर पर थी। उसकी मां मीरा बीमार थीं, निमोनिया ने उन्हें जकड़ लिया था। कमरे में दवाइयों, सीलन और ठंडी खिचड़ी की गंध फैली थी। आरोही अपनी मां का हाथ थामे बैठी थी। मीरा की सांसें उखड़ रही थीं। डॉक्टर ने कहा था, “अगर अस्पताल में भर्ती नहीं किया तो जान को खतरा है।” लेकिन अस्पताल में दाखिले के लिए दस हजार रुपए चाहिए थे, और आरोही के पास सिर्फ 327 रुपए थे।
उस रात, टिमटिमाती ट्यूबलाइट की रोशनी में वह बार-बार पैसे गिनती रही। आंखों में आंसू थे, लेकिन हिम्मत भी। उसने मां की दी हुई चांदी का लॉकेट देखा – पक्षी और गुलमोहर के फूल की आकृति वाला। मां ने हमेशा कहा था, “इसे कभी मत खोना, यही तुम्हें वहां से जोड़ता है जहां से तुम असल में हो।”
भाग 2: कोलाबा की बारिश और किस्मत का मोड़
अगली सुबह, आरोही ने मां से वादा किया, “मैं पूरे पैसे ले आऊंगी।” वह कोलाबा मार्केट पहुंची, लॉटरी के टिकट बेचने लगी। बारिश शुरू हो गई, वह एक दुकान के छज्जे के नीचे सिकुड़ गई। तभी एक काले रंग की लग्जरी कार रुकी। एक लंबा आदमी – विक्रम सिंघानिया – बाहर निकला, फोन पर बात कर रहा था। उसने अपना बटुआ निकाला, और बारिश में फिसलकर फुटपाथ पर गिर गया। किसी ने नहीं देखा, सिर्फ आरोही ने।
भीतर की आवाज़ ने कहा, “किसी का सामान मत लेना।” लेकिन मां की जान बचाने की मजबूरी ने उसे बटुआ उठाने पर मजबूर कर दिया। पीछे से आवाज़ आई, “उस लड़की ने बटुआ चुराया।” लेकिन वह दौड़कर एक कबाड़ की दुकान के नीचे छिप गई। बटुए में नोटों की मोटी गड्डी थी, बैंक कार्ड, आधार कार्ड और एक तस्वीर – गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़ी एक औरत की। वह औरत उसकी मां जैसी लग रही थी।
भाग 3: अस्पताल की दहलीज पर
आरोही ने अस्पताल जाकर पैसे जमा कर दिए। मां को आईसीयू में भर्ती कर लिया गया। डॉक्टर ने पूछा, “इतने पैसे कहां से आए?” आरोही ने झूठ नहीं बोला – “मुझे मिले हैं, किसी ने मां की मदद के लिए दिए हैं।” डॉक्टर ने वादा किया कि वह किसी से कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन पैसे लौटाने का रास्ता निकालेंगे।
मां की हालत सुधरने लगी। लेकिन आरोही के मन में अपराधबोध था। वह बटुआ लौटाना चाहती थी। बटुए में एक बिजनेस कार्ड मिला – विक्रम सिंघानिया, वीएस ग्रुप। उसे याद आया, बस्ती में इस कंपनी का नाम सुना था। क्या उसकी मां और विक्रम का कोई रिश्ता है? लॉकेट और तस्वीर में गुलमोहर के फूल की समानता ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया।
भाग 4: सच का सामना
वीएस ग्रुप के ऑफिस में, विक्रम ने उस बच्ची को देखा जिसके गले में वही लॉकेट था जो उन्होंने सालों पहले मीरा को दिया था। आरोही ने डरते हुए बटुआ लौटाया और सच बताया कि उसने मां की जान बचाने के लिए पैसे लिए थे। विक्रम की आंखों में आंसू थे। “तुम्हारी मां का नाम क्या है?” – “मीरा शर्मा।”
सच सामने आया – मीरा वही थी जिससे विक्रम ने कभी प्यार किया था, लेकिन हालात के चलते दोनों अलग हो गए थे। विक्रम ने अस्पताल जाकर मीरा से मुलाकात की। दोनों के बीच पुराने दर्द, गलतफहमियां और अधूरे वादे थे। मीरा ने कहा, “माफी दस साल वापस नहीं ला सकती।” लेकिन विक्रम ने वादा किया, “अब मैं साथ रहना चाहता हूं।”
भाग 5: नए सफर की शुरुआत
विक्रम ने मां-बेटी के लिए नया घर किराए पर लिया। आरोही को स्कूल में दाखिला दिलवाया। डीएनए टेस्ट और कानूनी दस्तावेजों के बाद, आरोही को पिता का नाम मिला – आरोही विक्रम सिंघानिया। धीरे-धीरे, परिवार के बीच की दूरियां कम होने लगीं। मीरा ने कहा, “मैं अभी तुम्हें माफ नहीं कर सकती, लेकिन मेरी बेटी को नफरत के बीच नहीं पनपने दूंगी।”
आरोही ने पहली बार विक्रम को “पापा” कहा। परिवार में नई शुरुआत हुई, लेकिन अतीत की परछाइयां अभी बाकी थीं। रघु नामक एक पुराना साथी मीरा को ब्लैकमेल करने लगा। विक्रम ने कानूनी और निजी सुरक्षा का इंतजाम किया।
भाग 6: समाज की नजरें और पहचान की लड़ाई
एक दिन अखबार में खबर आई – “अरबपति विक्रम सिंघानिया की गुप्त बेटी का राज।” मीडिया का शोर बढ़ गया। विक्रम ने सार्वजनिक रूप से आरोही को अपनी बेटी मान लिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “गलती मेरी थी, लेकिन अब मैं अपनी जिम्मेदारी निभाऊंगा।”
आरोही की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। लोग उसकी हिम्मत और सच्चाई की तारीफ करने लगे। मीरा ने कहा, “अब तुम्हें पूरा परिवार चाहिए, सिर्फ फीस या घर नहीं।”
भाग 7: गांव की ओर और परिवार का पूर्ण होना
तीनों कोंकण के गांव गए, जहां मीरा की मां रहती थीं। परिवार ने मिलकर खाना बनाया, साधारण दाल-चावल, लेकिन उसमें सबसे ज्यादा स्वाद था। आरोही ने स्कूल के फैमिली फंक्शन के लिए भाषण लिखा – “परिवार जहां मुझे रोशनी मिली।” उसने कहा, “खुशी महलों में नहीं, अपने प्रियजनों का हाथ थामकर अंधेरे से गुजरने में है।”
भाग 8: सम्मान, प्यार और उम्मीद
सेंट जेवियस स्कूल में आरोही ने मंच से अपनी कहानी सुनाई। “मैंने मां को बचाने के लिए चोरी की, लेकिन उसी आदमी से जो मेरा पिता निकला। अब मेरे पास मां है, पापा हैं, हम परफेक्ट नहीं हैं लेकिन एक दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।”
पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा। विक्रम और मीरा की आंखों में आंसू थे। परिवार पूरा हो गया था।
समापन
अब मुंबई की गलियों में वह बच्ची लॉटरी नहीं बेचती। वह स्कूल जाती है, किताबें पढ़ती है, पेंटिंग बनाती है। उसका परिवार परफेक्ट नहीं है, लेकिन प्यार और विश्वास से भरा है। हर बारिश के बाद धूप आती है। आरोही ने अपने सफर से सीखा – परिवार को परफेक्ट होने की जरूरत नहीं, बस इतना काफी है कि वे एक दूसरे का साथ ना छोड़ें।
कहानी सुनने के लिए धन्यवाद। अगर आपकी जिंदगी में भी ऐसी कोई प्रेरणादायक कहानी है, तो जरूर साझा करें।
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