गरीब बच्चों ने की करोड़पति की मदद पर बच्चे नहीं जानते थे कि करोड़पति हैं ……..

दिल की दौलत

भूमिका

शहर की हलचल भरी जिंदगी में, जहाँ अमीरी और गरीबी का फर्क हर गली, हर चौराहे पर साफ नजर आता है, वहीं कहीं एक कोने में दो मासूम बच्चे अपनी किस्मत से लड़ रहे थे। यह कहानी है आकाश और तारा की, जिनके पास ना घर था, ना कोई सहारा, सिर्फ भूख और अपमान की विरासत थी। लेकिन उनकी सच्चाई और इंसानियत ने शहर के सबसे अमीर आदमी की सोच को बदल दिया।

ठंडी रात की शुरुआत

ठंडी सर्दियों की वह रात थी, जब शहर के फुटपाथ पर दो छोटे-छोटे शरीर एक फटी हुई त्रपाल के नीचे ठिठुर रहे थे। आकाश, जो मुश्किल से 11 साल का था, अपनी 8 साल की छोटी बहन तारा को सीने से लगाकर गर्माहट देने की कोशिश कर रहा था। उनके शरीर पर सिर्फ फटे पुराने कपड़े थे, जिनमें से ठंडी हवा सीधे हड्डियों तक पहुंच रही थी।

“भैया, मुझे बहुत तेज भूख लगी है,” तारा ने कमजोर आवाज में कहा।
कल से कुछ नहीं खाया था। आकाश का गला भर आया। वह जानता था कि तारा पिछले दो दिनों से सिर्फ पानी पीकर गुजारा कर रही है। उसने बहन के माथे को चूमा और कहा, “बस थोड़ी देर और, कल सुबह मैं जरूर कुछ इंतजाम करूंगा।”

लेकिन आकाश खुद नहीं जानता था कि वह क्या इंतजाम करेगा। उनके पास ना घर था, ना कोई रिश्तेदार। मां-बाप की मृत्यु एक बस एक्सीडेंट में हो गई थी और तब से ये दोनों बच्चे सड़कों पर अपना गुजारा करने को मजबूर थे।

संघर्ष की सुबह

सुबह होते ही दोनों उठे। तारा की हालत और भी खराब थी। चक्कर आने से वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। आकाश ने उसका हाथ मजबूती से पकड़ा और दोनों शहर के मुख्य बाजार की तरफ चल पड़े।

वहाँ पहुँचकर आकाश ने एक सब्जी वाले से कहा,
“काका जी, हमें कुछ काम दे दो। हमारे पास दो दिन से खाना नहीं है।”
सब्जी वाला चिढ़कर बोला, “भाग यहां से। मेरे ग्राहक तुम्हें देखकर सब्जी नहीं खरीदेंगे। जाकर भीख मांगो कहीं और।”

आकाश की आँखें भर आईं। वह काम मांग रहा था, भीख नहीं। लेकिन समाज उसे सिर्फ भिखारी के रूप में देखता था। दोपहर तक दोनों ने कई दुकानों पर कोशिश की, लेकिन हर जगह से धक्के खाकर वापस आना पड़ा।

शाम होते-होते तारा की तबीयत और खराब हो गई। उसे बुखार भी आने लगा था। रात के समय वे एक बड़े होटल ‘ग्रैंड पैलेस’ के बाहर बैठे थे। होटल से आती खुशबू उनकी भूख को और बढ़ा रही थी।

अपमान और दर्द

तभी एक महंगी कार आकर रुकी। उसमें से एक रईस परिवार निकला। तारा हिम्मत जुटाकर उस परिवार के पास गई।
“अंकल-आंटी, मैं दो दिन से भूखी हूँ, कृपया खाने के लिए कुछ दे दो।”

उस अमीर आदमी ने तारा की तरफ घृणा से देखा और चिल्लाया,
“भाग यहां से! अपने गंदे हाथों से मेरे कपड़े मत छूना। तुम जैसे भिखारी बच्चों की वजह से हमारा शहर बदनाम हो रहा है।”
इतना कहकर उसने तारा को जोर से धक्का दिया।

तारा का संतुलन बिगड़ा और वह सड़क के किनारे बने नाले में जा गिरी। उसके हाथ-पैर छिल गए और कपड़े पूरी तरह गंदे हो गए। आकाश भागता हुआ आया और अपनी बहन को उठाया। तारा जोर-जोर से रो रही थी। आसपास खड़े लोग हंस रहे थे और कुछ लोग वीडियो भी बना रहे थे।

एक दुकानदार चिल्लाया, “यह छोकरे यहाँ भीड़ लगा रहे हैं। इन्हें यहाँ से भगाओ वरना पुलिस बुलानी पड़ेगी।”
आकाश ने तारा के आँसू पोंछे और उसे एक तरफ ले गया। वह अपनी फटी शर्ट के कोने से तारा का चेहरा साफ करने लगा।

“भैया, क्यों लोग हमसे इतनी नफरत करते हैं? क्या हम इंसान नहीं हैं?”
आकाश का गला भर आया। उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

बीमारी और बेबसी

उस रात दोनों एक पार्क के कोने में सो गए। भूख और ठंड से तारा की हालत बहुत खराब हो गई थी। उसे तेज बुखार था और वह बार-बार बेहोश हो जा रही थी। आकाश रात भर जाग कर अपनी बहन की सेवा करता रहा।

सुबह उठते समय तारा ने कहा,
“भैया, मुझे लगता है मैं मम्मी-पापा के पास चली जाऊंगी।”
यह सुनकर आकाश की रूह कांप गई। उसने फैसला किया कि आज वह कुछ भी करके अपनी बहन के लिए पैसे का इंतजाम करेगा, चाहे उसे भीख ही मांगनी पड़े।

अमीरी का दूसरा चेहरा

उसी शहर के दूसरे कोने में राजेंद्र अग्रवाल नाम का एक करोड़पति व्यापारी अपनी आलीशान कोठी में बेचैनी से टहल रहा था। आज उसकी कंपनी की सबसे बड़ी डील का दिन था। ₹500 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट, जो उसकी जिंदगी को एक नए मुकाम पर ले जा सकता था। राजेंद्र के पास सब कुछ था, लेकिन आज उसे बहुत घबराहट हो रही थी।

सुबह तैयार होकर राजेंद्र अपनी Mercedes कार में बैठा और मीटिंग के लिए निकला। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। रास्ते में भारी ट्रैफिक जाम के कारण उसकी गाड़ी फंस गई। समय बहुत कम था और मीटिंग का वक्त नजदीक आ रहा था।

राजेंद्र ने फैसला किया कि वह पैदल जाएगा। उसने ड्राइवर से कहा, “तुम गाड़ी यहीं पार्क कर दो। मैं शॉर्टकट से जाऊंगा।”

गिरती इज्जत

राजेंद्र एक तंग गली से होकर जाने लगा। भीड़ में चलते समय राजेंद्र को एहसास नहीं हुआ कि एक शातिर जेबकतरे ने उसका बटुआ चुरा लिया है। उस बटुए में ना केवल पैसे थे बल्कि उसके सभी कार्ड, पहचान पत्र और मीटिंग के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी थे।

जब राजेंद्र को एहसास हुआ कि उसका बटुआ गायब है तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह घबराकर इधर-उधर देखने लगा। लेकिन चोर का कोई पता नहीं था। बिना पैसे और बिना फोन के राजेंद्र बिल्कुल लाचार हो गया।

वह लोगों से मदद मांगने लगा,
“भाई साहब, मैं राजेंद्र अग्रवाल हूँ। मेरा पर्स चोरी हो गया है। कृपया मुझे एक फोन करने दें।”
लोग उसे संदेह की नजर से देख रहे थे।
“नया तरीका निकाला है भीख मांगने का। अगर तुम इतने बड़े बिजनेसमैन हो तो यहाँ अकेले क्यों घूम रहे हो?”

राजेंद्र हैरान था। जिस समाज में वह एक सम्मानित व्यक्ति था, आज वही समाज उसे संदेह की नजर से देख रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि बिना पैसे और बिना पहचान के दुनिया में उसकी कोई औकात नहीं है।

भूख की मार

दिन भर भटकने के बाद राजेंद्र थक हारकर एक चौराहे के पास बनी बेंच पर बैठ गया। उसकी मीटिंग का समय निकल चुका था। 500 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट उसके हाथ से निकल गया था। वह सोच रहा था कि कैसे वह घर तक पहुंचेगा।

भूख और प्यास से परेशान होकर वह एक ढाबे के पास गया।
“भाई साहब, मुझे एक गिलास पानी दे दो। मैं कल पैसे दे दूंगा।”
ढाबे वाले ने उसे गुस्से से देखा,
“पानी भी उधार चाहिए? अबे यहाँ से भाग।”

राजेंद्र को लगा जैसे उसकी इज्जत मिट्टी में मिल गई हो। जिस आदमी को लोग सर आँखों पर बिठाते थे, आज वही एक गिलास पानी के लिए तरस रहा था।

गरीब बच्चों की ईमानदारी

अगली सुबह आकाश और तारा पार्क से उठे। तारा की हालत और भी खराब हो गई थी। उसे तेज बुखार था और वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। आकाश ने एक पुराना कटोरा सामने रखा और लोगों से मदद मांगने लगा। दिन भर की मेहनत के बाद उनके पास सिर्फ ₹15 आए थे। इतने पैसों से ना तो दवाई मिल सकती थी, ना डॉक्टर को दिखा सकते थे।

शाम होते-होते तारा बेहोश होने लगी। आकाश घबरा गया। वह अपनी बहन को गोद में उठाकर सरकारी अस्पताल की तरफ भागने लगा। रास्ते में अचानक उसका पैर किसी चीज से टकराया। नीचे देखा तो एक चमड़े का बटुआ पड़ा हुआ था।

आकाश ने इधर-उधर देखा। कोई नहीं दिखा तो उसने बटुआ उठा लिया। जब उसने बटुआ खोला तो उसकी आँखें फैल गईं। अंदर 500-500 के नोटों की गड्डी थी। पूरे ₹50,000। इतने पैसे उसने अपनी जिंदगी में एक साथ कभी नहीं देखे थे।

लेकिन तभी उसकी नजर बटुए में पड़े आईडी कार्ड पर गई। वहाँ ‘राजेंद्र अग्रवाल, अग्रवाल इंडस्ट्रीज’ लिखा था। साथ ही एक फोटो भी थी।

आकाश कुछ सोचने लगा। वह जानता था कि यह पैसे किसी और के हैं। अगर वह इन्हें रख लेता है तो यह चोरी होगी।
“भैया, डॉक्टर के पास चलो ना। मुझे बहुत दर्द हो रहा है,” तारा ने कहा।

आकाश दुविधा में पड़ गया। एक तरफ उसकी बहन की जान और दूसरी तरफ ईमानदारी। उसे अपने माता-पिता की बात याद आई,
“बेटा, गरीबी से मरना बेहतर है, लेकिन कभी झूठ मत बोलना और कभी किसी का हक मत मारना।”

सही फैसला

आकाश ने आसपास नजर दौड़ाई। तभी उसे सड़क के उस पार एक आदमी दिखा जो बहुत परेशान लग रहा था। वह वही व्यक्ति था जिसकी फोटो बटुए में थी – राजेंद्र अग्रवाल।

आकाश ने तारा को समझाया,
“मम्मी-पापा ने हमें क्या सिखाया था? हमें हमेशा सच का साथ देना चाहिए। यह पैसे हमारे नहीं हैं।”
तारा छोटी थी लेकिन समझदार थी। उसने धीमी आवाज में कहा,
“तुम ठीक कह रहे हो भैया। हम रोज भूखे रहते हैं, आज भी रह लेंगे लेकिन गलत काम नहीं करेंगे।”

आकाश को अपनी छोटी बहन पर गर्व हुआ। उसने तारा को कमजोर हालत में भी अपनी गोद में उठाया और राजेंद्र की तरफ चलने लगा।

इंसानियत का इनाम

राजेंद्र अभी भी इधर-उधर खोज रहा था। उसकी आंखों में आंसू थे।
आकाश ने कांपती आवाज में कहा,
“अंकल, हमें यह बटुआ मिला है। हमें लगता है यह आपका है।”

राजेंद्र ने बटुए की तरफ देखा और उसकी आँखें फैल गईं।
“यह मेरा बटुआ है! लेकिन तुमने पैसे क्यों नहीं रखे?”
तारा धीमी आवाज में बोली,
“अंकल, यह पैसे हमारे नहीं थे।” हमारे मम्मी-पापा ने सिखाया था कि दूसरों की चीज नहीं लेनी चाहिए।”

राजेंद्र की आँखों से आंसू आ गए। जिन बच्चों के पास खाने को रोटी नहीं थी, उन्होंने ईमानदारी दिखाई थी।
“तुमने आज कुछ खाया है?”
“नहीं अंकल, दो दिन से कुछ नहीं खाया और मेरी बहन बीमार भी है।”

राजेंद्र का सीना भर आया। इन बच्चों की बहन मर रही थी, फिर भी उन्होंने पैसे वापस कर दिए।
“चलो पहले तुम्हारी बहन को डॉक्टर के पास ले चलते हैं। पैसों की चिंता मत करो। तुमने मेरी जिंदगी बचाई है, अब तुम्हारी बहन की जिंदगी बचाना मेरी जिम्मेदारी है।”

राजेंद्र ने तुरंत एक टैक्सी बुलाई। वे तीनों शहर के सबसे अच्छे प्राइवेट अस्पताल गए। डॉक्टर ने तारा की जांच की और बताया कि उसे निमोनिया हो गया है। सही समय पर इलाज ना मिलने से उसकी जान भी जा सकती थी।

राजेंद्र ने तुरंत तारा के सभी टेस्ट कराए और बेहतरीन इलाज का इंतजाम किया। दो दिन बाद तारा की हालत में सुधार हुआ।

नई जिंदगी की शुरुआत

अस्पताल में रहने के दौरान राजेंद्र ने आकाश से पूछा,
“बेटा, तुम्हारे मां-बाप कहाँ हैं?”
आकाश ने आंखों में आंसू लेकर बताया कि कैसे उनके माता-पिता की मौत एक एक्सीडेंट में हो गई थी और वे दोनों सड़कों पर रहने को मजबूर हैं।

राजेंद्र का दिल भर आया।
“आकाश, अब तुम दोनों मेरे बच्चे हो। तुम्हें कभी सड़कों पर नहीं रहना पड़ेगा।”
आकाश को यकीन नहीं आ रहा था।
“सच में अंकल?”
“हाँ बेटा। तुमने मुझे सिखाया है कि सच्ची अमीरी पैसों में नहीं, दिल की अच्छाई में होती है। आज से तुम दोनों का सारा खर्च मैं उठाऊंगा।”

तारा खुशी से चिल्लाई,
“भैया, अब हमें भूखे नहीं रहना पड़ेगा।”
राजेंद्र ने दोनों बच्चों को गले लगाया। उसे एहसास हुआ कि भगवान ने उसे इन बच्चों के रूप में फरिश्ते भेजे थे।

बदलाव की लहर

अगले दिन राजेंद्र अपने कंपनी के अफसरों से मिला। बटुआ मिल जाने से उसकी 500 करोड़ की डील भी बच गई थी। उसने सबको आकाश और तारा के बारे में बताया।

“सर, यह बहुत अच्छी बात है कि आपको ईमानदार बच्चे मिले,” एक अफसर ने कहा।
“नहीं, यह केवल ईमानदारी नहीं थी। यह शुद्ध इंसानियत थी। इन बच्चों ने मुझे जिंदगी का सबसे बड़ा सबक दिया है,” राजेंद्र ने कहा।

उसने अपने स्टाफ से कहा,
“आज से हमारी कंपनी में एक नई नीति होगी। हम हर महीने गरीब बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए ₹1 करोड़ खर्च करेंगे।”

सपनों की उड़ान

एक महीने बाद आकाश और तारा राजेंद्र के घर में रह रहे थे। राजेंद्र ने उन्हें शहर के सबसे अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया था। दोनों बच्चे अब पढ़ लिख रहे थे और अपने भविष्य के सपने देख रहे थे।

एक दिन राजेंद्र ने आकाश को एक खुशखबरी दी,
“आकाश, मैंने तुम्हारे नाम पर एक ट्रस्ट बनाया है – ‘आकाश तारा फाउंडेशन’। यह ट्रस्ट उन बच्चों की मदद करेगा जो तुम्हारी तरह सड़कों पर रहने को मजबूर हैं।”

आकाश की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
“अंकल, यह तो बहुत अच्छी बात है। अब और बच्चों को हमारी तरह भूखे नहीं रहना पड़ेगा।”
“यह सब तुम्हारी ईमानदारी का फल है बेटा,” राजेंद्र ने कहा।

फाउंडेशन का उद्घाटन पूरे शहर की मौजूदगी में हुआ। आकाश और तारा ने भी भाषण दिया।
“दोस्तों, मैं आज आपको बताना चाहता हूँ कि सच्ची अमीरी पैसों में नहीं, अच्छे कामों में होती है। जब हमने राजेंद्र अंकल का बटुआ वापस किया था तब हमारे पास खाने को कुछ नहीं था। लेकिन हमने सोचा कि भूख से मरना बेहतर है, लेकिन गलत काम नहीं करना चाहिए।”

तारा ने भी कहा,
“आज हम यहाँ हैं तो सिर्फ इसलिए कि हमने सच का साथ दिया। भगवान हमेशा सच्चे लोगों का साथ देता है।”

सभी लोग तालियां बजा रहे थे। कई लोगों की आँखों में आँसू थे।

अमीरी की नई परिभाषा

राजेंद्र ने अपने भाषण में कहा,
“मैं आज तक सोचता था कि मैं एक सफल व्यापारी हूँ। लेकिन इन बच्चों ने मुझे सिखाया कि सच्ची सफलता इंसानियत में होती है। जिस दिन मेरा बटुआ खो गया था, उस दिन मैंने महसूस किया कि गरीब लोग कितनी मुश्किलों से गुजरते हैं। लेकिन इन बच्चों की ईमानदारी ने मेरी आँखें खोल दी।”

उन्होंने आगे कहा,
“आज से मेरी कंपनी का एक ही उद्देश्य है – समाज की सेवा करना। हमारी सारी कमाई का 50% हिस्सा गरीब बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करेंगे।”

फाउंडेशन के जरिए अब तक हजारों गरीब बच्चों को मदद मिल चुकी है। आकाश और तारा बड़े होकर डॉक्टर और इंजीनियर बने। लेकिन वे कभी अपनी जड़े नहीं भूले।

आकाश अब एक बड़ा डॉक्टर है। वह गरीबों का इलाज मुफ्त में करता है। तारा एक सफल इंजीनियर बनकर गरीब बच्चों के लिए स्कूल बनवाती है। राजेंद्र अब 70 साल के हो गए हैं, लेकिन वे आज भी आकाश और तारा को अपने बच्चों की तरह प्यार करते हैं।

वे हमेशा कहते हैं,
“इन बच्चों ने मुझे जिंदगी का सबसे कीमती सबक दिया कि इंसानियत ही सबसे बड़ी दौलत है।”

कहानी की सीख

सच्ची अमीरी दिल की अच्छाई में होती है।
ईमानदारी का फल हमेशा मिलता है।
भगवान हमें अलग-अलग रूपों में परखता रहता है।
गरीबी कोई शर्म की बात नहीं, लेकिन बुरे काम करना शर्म की बात है।
जो लोग दूसरों की मदद करते हैं, भगवान उनकी भी मदद करता है।

आज भी जब राजेंद्र को कोई मुश्किल आती है तो वे आकाश और तारा से सलाह लेते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि ये बच्चे उनके सच्चे मार्गदर्शक हैं।

यह कहानी हमें सिखाती है कि फरिश्ते हमेशा सफेद कपड़े पहनकर नहीं आते। कभी-कभी वे फटे कपड़ों में भी आ सकते हैं। असली बात यह है कि हमारा दिल कितना साफ है और हम दूसरों की मदद करने के लिए कितने तैयार हैं।

अंत