गरीब मासूम बच्चे का अल्लाह के नाम खत 💔अल्लाह, मेरी माँ के लिए एक रोटी दे दे 😰

जैद का खत – अल्लाह की रहमत और उम्मीद

भूमिका

एक छोटे से कस्बे के मदरसे में, गरीबी और मायूसी से जूझता एक मासूम बच्चा जैद, अपनी मां के लिए थोड़ा सा खाना और अपने लिए एक जोड़ा कपड़े मांगता है। उसकी दुआ, उसकी उम्मीद और उसका अल्लाह पर यकीन, एक ऐसी कहानी बन जाती है जो हर दिल को छू जाती है। यह कहानी सिर्फ जैद की नहीं, बल्कि हर उस बच्चे की है जो भूख, गरीबी और तन्हाई में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता।

अध्याय 1: जैद की दुनिया

मदरसे के एक कोने में बैठा जैद, फटे पुराने कपड़ों में, उदास चेहरा लिए, अपनी किस्मत को देख रहा था। उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे, और मां रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रही थी। मदरसे के बच्चे उसका मजाक उड़ाते – “तेरे बाबा कहां हैं?” “तू मदरसे पढ़ने आया है या होटल पर काम करने?”

ज़द की आंखों में आंसू थे, लेकिन वह चुपचाप सब सहता रहा। मदरसे का उस्ताद उसकी हालत देखकर दुखी होता, लेकिन कुछ कह नहीं पाता। छुट्टी के बाद जैद अपने घर लौटा – एक टूटी-फूटी झोपड़ी, जिसमें उसकी मां चूल्हे पर सूखी रोटी सेंक रही थी। मां रोजे की हालत में थी, मगर खाने को कुछ नहीं था। जैद ने मां से कहा, “मदरसे में सब बच्चों के पास नए कपड़े हैं।” मां मुस्कुराकर बोली, “इंशा अल्लाह, तेरे पास भी नए कपड़े जरूर आएंगे।”

अध्याय 2: मां की दुआ और जैद का खत

रात को जैद ने अपनी मां को जानमाज पर रोते हुए देखा – “या अल्लाह, मेरे बेटे को खुशियां दे दे। उसकी ईद अच्छी बना दे।” जैद की आंखों में आंसू थे। उसने एक कागज और कलम लिया और अल्लाह के नाम खत लिखा:

“या अल्लाह, सब बच्चों के पास अच्छे कपड़े हैं। मैं भी नए कपड़े चाहता हूं। सबके घरों में इफ्तारी होती है, मेरे घर में कुछ नहीं। मेरी मां हर रोज भूखी सोती है। बस ईद पर एक जोड़ा कपड़ा और मां के लिए कुछ खाने को दे दे। आमीन।”

जैद ने वह खत मस्जिद के गल्ले के पास रख दिया, दिल में उम्मीद थी कि शायद अल्लाह उसकी दुआ सुन ले।

अध्याय 3: उम्मीद और मायूसी

बाजार में जैद ने खूबसूरत कपड़े देखे, लेकिन दुकानदार ने तंजिया लहजे में कहा, “यह तेरे बस की बात नहीं।” जैद शर्मिंदा होकर लौट गया। मदरसे में बच्चे फिर उसका मजाक उड़ाते – “फकीर, ईद पर कौन सा नया जोड़ा पहनोगे?” जैद चुपचाप सुनता रहा, उसकी आंखें नीचे थीं।

घर लौटकर देखा, मां बहुत कमजोर थी। इफ्तार के वक्त सिर्फ सूखी रोटी और पानी था। मां ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा तू खा ले। मुझे भूख नहीं है।” जैद ने पानी पी लिया और आंखों में आंसू लिए नुक्कड़ पर जाकर बैठ गया। उसने फिर अल्लाह के नाम खत लिखा:

“या अल्लाह, क्या तू मुझसे नाराज है? क्या मैं तुझसे ज्यादा मांग रहा हूं? मेरी मां भूखी सोती है। मैं कुछ नहीं कहता, लेकिन तू तो सब कुछ दे सकता है ना। फिर मुझे क्यों नहीं देता?”

अध्याय 4: मेहनत और धोखा

अगले दिन जैद मदरसे जाने के बजाय काम की तलाश में बाजार चला गया। मजदूरों के बीच काम मांगने लगा, पर सबने उसे नजरअंदाज किया। आखिरकार एक जालिम आदमी राशिद ने उसे बोरी उठाने का काम दिया। जैद ने रोजे की हालत में भारी बोरियां उठाईं, पसीने में भीग गया। शाम को पैसे मांगने गया तो राशिद ने उसे धक्का देकर भगा दिया।

जैद टूट चुका था। उसने फिर एक खत लिखा – “या अल्लाह, अगर तूने मेरा खत नहीं पढ़ा, तो अब आखिरी बार लिख रहा हूं। मेरी मां भूखी सोती है। मैं काम करता हूं, लेकिन लोग धोखा दे देते हैं। बस एक बार कुछ चमत्कार कर दे।”

अध्याय 5: अल्लाह का करम

मस्जिद में एक उम्रदराज शख्स इब्राहिम साहब ने जैद का खत पढ़ा। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने इमाम साहब से पूछा, “कोई ऐसा यतीम बच्चा हो जो बहुत मुसीबत में हो?” इब्राहिम साहब ने जैद को ढूंढना शुरू किया। आखिरकार वे जैद के घर पहुंचे, जहां जैद की मां बेहोश पड़ी थी। इब्राहिम साहब और इमाम साहब ने फौरन डॉक्टर को बुलाया।

डॉक्टर ने कहा, “मां को बहुत कमजोरी हो गई है। अगर तुरंत अच्छा खाना और दवाइयां नहीं मिलीं, तो…” इब्राहिम साहब ने कहा, “जितना खर्च हो, मैं दूंगा। बस उसकी मां को बचा लीजिए।”

अध्याय 6: दुआ का असर

अस्पताल में जैद मां का हाथ पकड़े दुआ कर रहा था – “या अल्लाह, तूने मेरा पत्र पढ़ा था ना? अब मेरी मां को ठीक कर दे।” सुबह मां की उंगलियां हिलने लगीं, आंखें खुलीं। जैद खुशी से रो पड़ा। इब्राहिम साहब बोले, “बेटा, आज से तुम अकेले नहीं हो। मैं तुम्हारी मदद के लिए आया हूं।”

जैद ने पूछा, “क्या मैं अब भी मदरसे जा सकूंगा? क्या मां को अब खाने के लिए तरसना नहीं पड़ेगा?” इब्राहिम साहब बोले, “अब तुम्हारी मां को कुछ नहीं होगा और तुम भी वह सब कुछ करोगे जो तुम हमेशा से करना चाहते थे।”

अध्याय 7: नई जिंदगी

इब्राहिम साहब ने जैद और उसकी मां को अपने घर ले जाकर नई जिंदगी दी। साफ-सुथरा कमरा, अच्छा खाना, नए कपड़े। जैद ने पूछा, “क्या मैं कुरान हिफज़ कर सकता हूं?” इब्राहिम साहब बोले, “तुम जरूर आलिम बनोगे, मैं तुम्हारी पूरी मदद करूंगा।”

जैद की आंखों में खुशी के आंसू थे। अब वह नए कपड़ों में मदरसे पहुंचा। वही बच्चे जो पहले उसका मजाक उड़ाते थे, अब शर्मिंदा होकर माफी मांगने लगे। जैद मुस्कुरा कर बोला, “कोई बात नहीं, अल्लाह ने मुझे सिखा दिया है कि हर परीक्षा के बाद आसानी आती है।”

अध्याय 8: मिसाल और सबक

मदरसे के उस्ताद बोले, “बच्चों, जैद हम सबके लिए सबसे बड़ी मिसाल है। जिसने अल्लाह पर भरोसा किया, कुरान से मोहब्बत की और दुआ का दामन नहीं छोड़ा।”

मस्जिद में इब्राहिम साहब ने जैद का खत सबको पढ़कर सुनाया। लोगों की आंखों में आंसू थे। सबने ठान लिया कि अब मोहल्ले के किसी भी गरीब बच्चे को भूखा नहीं सोने देंगे।

अंतिम संवाद

रात को जैद अपने बिस्तर पर बैठा, हाथ में अपना खत लिए आसमान की तरफ देख रहा था – “या अल्लाह मुझे माफ कर दे। मुझे लगा कि तूने मेरा खत नहीं पढ़ा, मगर तूने ना सिर्फ पढ़ा बल्कि मेरी तकदीर ही बदल दी।”

जैद ने कुरान को सीने से लगाकर कहा, “तूने मुझे दुनिया की सबसे कीमती चीज दी। अपना कलाम। अब मैं इसे कभी नहीं छोड़ूंगा।”

सीख

जैद की कहानी हमें सिखाती है कि अल्लाह पर यकीन, सब्र और दुआ कभी बेकार नहीं जाती। हर यतीम, हर गरीब बच्चा उम्मीद रखता है – बस हमें उसका वसीला बनना है। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो इसे शेयर करें ताकि हर दिल में उम्मीद और रहमत की लौ जल सके।

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मिलते हैं अगले वीडियो में। तब तक खुश रहिए, अपनों के साथ रहिए और रिश्तों की कीमत समझिए।