गरीब लड़की इंटरव्यू देने गई थी, करोड़पति ने कहा तुम मेरी पत्नी बन जाओ, फिर आगे जो हुआ…

एक साल का समझौता: गरीबी, मजबूरी और फिर मुकम्मल मोहब्बत की दास्तान
अध्याय 1: राजाजीपुरम की तंग गलियाँ और एक सपना
लखनऊ के राजाजीपुरम की पुरानी बस्ती में सुबह की शुरुआत हमेशा शोर-शराबे से होती थी। कहीं हैंडपंप चलने की खट-खट, तो कहीं स्कूल जाने वाले बच्चों का शोर। इन्हीं आवाजों के बीच सिया शर्मा उस दिन बहुत जल्दी उठ गई थी। उसकी आँखें लाल थीं क्योंकि उसकी माँ सरोज शर्मा की खाँसी ने उसे रात भर सोने नहीं दिया था। घर में दवा की शीशी खाली हो चुकी थी और बटुए में उम्मीद के नाम पर सिर्फ कुछ सिक्के बचे थे।
चाय का कप माँ की ओर बढ़ाते हुए सिया ने मुस्कुराकर कहा, “माँ, आज का इंटरव्यू पक्का अच्छा जाएगा। शाम को लौटते समय तुम्हारी दवा ले आऊंगी।” सरोज ने धुंधली आँखों से अपनी बेटी को देखा और सिर हिला दिया, पर उनकी आँखों में शहर के बड़े आकार को लेकर डर था।
सिया ने अपनी फटी-पुरानी फाइल उठाई, जिसमें उसकी डिग्रियाँ और कड़ी मेहनत बंद थी। वह घर से निकली तो आसमान साफ़ था, पर उसके मन में अनिश्चितता के बादल मँडरा रहे थे।
अध्याय 2: कांच की इमारत और ठुकराई गई उम्मीद
गोमती नगर एक्सटेंशन की चौड़ी सड़कें और मेहरा ग्रुप का शानदार ऑफिस देखकर सिया की धड़कनें तेज हो गईं। वह सुबह से लाइन में खड़ी थी। दोपहर बीती, शाम ढलने लगी, लेकिन तभी घोषणा हुई कि आज के इंटरव्यू रद्द कर दिए गए हैं। लोग बड़बड़ाते हुए चले गए, पर सिया वहीं जमी रही। उसके पास बस का किराया तो था, पर कल दोबारा आने के पैसे नहीं थे।
अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। सिया के पास छाता नहीं था, उसने अपनी फाइल को अपने पुराने दुपट्टे में लपेट लिया ताकि उसकी डिग्रियाँ न भीगें। उसने गार्ड से मिन्नत की कि वह मालिक से एक बार मिलवा दे, पर गार्ड ने उसे झिड़क दिया।
तभी एक काली लग्जरी कार पोर्च में रुकी। कार से उतरा 30 साल का एक गंभीर व्यक्तित्व—आर्यन मेहरा। सफेद शर्ट, थका हुआ चेहरा और गहरी आँखें। सिया ने हिम्मत जुटाई और उनके सामने जाकर खड़ी हो गई।
“सर, मैं सुबह से इंतज़ार कर रही हूँ। मेरी माँ बीमार है, मुझे नौकरी की बहुत ज़रूरत है।”
अध्याय 3: एक अजीबोगरीब प्रस्ताव
आर्यन ने सिया को ऊपर से नीचे तक देखा। उसने गार्ड को अंदर जाने का इशारा किया और फिर सिया से पूछा, “तुम मुझसे शादी करोगी?”
सिया सन्न रह गई। उसे लगा उसने गलत सुना है। लेकिन आर्यन के चेहरे पर मजाक का कोई निशान नहीं था। “एक साल की शादी। बदले में तुम्हारी माँ का सबसे अच्छा इलाज, रहने की जगह और पैसे। यह सिर्फ एक समझौता होगा।”
सिया के दिमाग में हजार सवाल थे। “मैं ही क्यों?” आर्यन ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “क्योंकि तुम मेरी दिवंगत पत्नी रिया जैसी दिखती हो। घर वाले चाहते हैं कि मैं आगे बढ़ूँ, पर मैं किसी को अपनी जिंदगी में जगह नहीं देना चाहता। तुम बस एक जवाब बन कर मेरे घर चलो।”
मजबूरी ने सिया से ‘हाँ’ कहलवा दी। उसकी बस एक ही शर्त थी—उसकी माँ को इस समझौते की सच्चाई कभी पता न चले।
अध्याय 4: मेहरा विला और सावित्री देवी का आतंक
कार जब ‘मेहरा विला’ के द्वार पर रुकी, तो सिया को लगा वह किसी सपने में है। फव्वारे, मखमली घास और नौकरों की कतार। लेकिन अंदर कदम रखते ही उसका सामना आर्यन की दादी, सावित्री मेहरा से हुआ। दादी का व्यक्तित्व सख्त था। उन्होंने सिया को संदेह की नज़रों से देखा।
आर्यन ने बिना किसी भूमिका के घोषणा कर दी, “दादी, यह सिया है। मैं इससे शादी कर रहा हूँ।” अगले दिन सादगी से शादी हुई। लाल जोड़े में सजी सिया मेहरा खानदान की बहू बन गई, पर उसका दिल अभी भी राजाजीपुरम की उन तंग गलियों में अटका था। रात को आर्यन ने स्पष्ट कर दिया, “घबराओ मत, यह कमरा और यह बिस्तर तुम्हारा है। मैं सोफे पर सोऊंगा। और हाँ, ऊपर की लॉबी का वो आखिरी कमरा कभी मत खोलना।”
अध्याय 5: खामोशियाँ और बदलता घर
शुरुआती कुछ हफ्ते सिया के लिए बहुत कठिन थे। नौकर उसे ‘मैडम’ तो कहते थे पर सम्मान की कमी थी। सिया ने चुपचाप घर को संभालना शुरू किया। उसने किचन का प्रबंधन देखा, दादी की दवाइयों का चार्ट बनाया और धीरे-धीरे घर की व्यवस्था दुरुस्त कर दी।
एक दिन जिज्ञासावश सिया ने वह ‘बंद कमरा’ खोल दिया। अंदर रिया की तस्वीरें थीं। सिया दंग रह गई—रिया हूबहू उसकी तरह दिखती थी। तभी पीछे से आर्यन की आवाज़ आई। उसने गुस्सा नहीं किया, बल्कि अपनी व्यथा सुनाई। सिया को पहली बार एहसास हुआ कि आर्यन एक कठोर बिज़नेसमैन नहीं, बल्कि एक टूटा हुआ इंसान है।
अध्याय 6: माँ का आगमन और पिघलती बर्फ
जब सिया की माँ सरोज शर्मा को इलाज के बाद मेहरा विला लाया गया, तो घर का माहौल ही बदल गया। माँ को लगा कि उनकी बेटी की किस्मत खुल गई है। उनकी मासूमियत और दुआओं ने दादी के सख्त दिल को भी पिघला दिया। आर्यन ने भी पहली बार महसूस किया कि घर में अब रिया की यादों का बोझ नहीं, बल्कि एक नई ऊर्जा है।
एक रात जब बिजली गुल हुई, तो सिया ने दादी के पास बैठकर उन्हें आर्यन के बचपन की कहानियाँ सुनाने को कहा। अंधेरे में जलती मोमबत्ती की रोशनी में दादी और सिया का रिश्ता जुड़ गया। आर्यन दरवाजे पर खड़ा यह सब देख रहा था। उसे लगा कि सिया सिर्फ रिया का चेहरा नहीं है, वह एक अलग और मुकम्मल इंसान है।
अध्याय 7: समझौते का अंत और सच का सामना
देखते-देखते एक साल बीतने को आया। कैलेंडर पर लगी तारीखें सिया को डराने लगीं। उसने धीरे-धीरे अपना पुराना सामान समेटना शुरू किया। उसे डर था कि अगर वह यहाँ और रुकी, तो वह इस समझौते से प्यार कर बैठेगी।
शादी की सालगिरह वाले दिन, सिया ने एक पत्र लिखा और चुपचाप घर छोड़कर चली गई। पत्र में लिखा था— “समझौता पूरा हुआ। आपने जो माँ के लिए किया, उसका अहसान जिंदगी भर रहेगा।”
जब आर्यन सुबह उठा और सिया को नहीं पाया, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने दादी को सब सच बता दिया कि यह शादी एक कॉन्ट्रैक्ट थी। दादी ने उसे डाँटा, “मूर्ख! रिश्ते कागज़ों पर नहीं, दिल की धड़कनों से चलते हैं। जा उसे वापस ला!”
अध्याय 8: राजाजीपुरम का वही बस स्टैंड और नई शुरुआत
आर्यन पागलों की तरह सिया को ढूंढने राजाजीपुरम पहुँचा। तेज बारिश हो रही थी—ठीक वैसी ही जैसी एक साल पहले हुई थी। उसने देखा, सिया उसी पुराने बस स्टैंड पर बैठी थी।
“तुम बिना बताए कैसे जा सकती हो?” आर्यन चिल्लाया। सिया ने आँसू पोंछते हुए कहा, “समय पूरा हो गया था सर।”
आर्यन ने सिया का हाथ पकड़ा और पहली बार अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोया। “सिया, मैं तुम्हें रिया की परछाई समझकर लाया था, पर आज मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। घर खाली है, दादी उदास हैं और मैं… मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ। इस बार कोई समझौता नहीं है, इस बार हकीकत है। क्या तुम मेरी पत्नी बनकर वापस चलोगी?”
सिया ने आर्यन की आँखों में वह सच देखा जो उसने कभी नहीं देखा था। उसने अपना बैग उठाया और आर्यन का हाथ थाम लिया।
उपसंहार: मेहरा विला की नई सुबह
जब वे वापस घर पहुँचे, तो दादी आरती की थाली लेकर खड़ी थीं। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “बहू रूठकर जाती है, पर उसे वापस लाना पति का धर्म है।” मेहरा विला में अब कोई कमरा बंद नहीं था। पुरानी यादें अपनी जगह थीं, पर नई यादों के लिए अब पूरे घर के दरवाजे खुले थे।
लखनऊ के राजाजीपुरम की वो गरीब लड़की अब सिर्फ एक करोड़पति की पत्नी नहीं थी, बल्कि उस घर की रूह बन चुकी थी। यह कहानी गवाह है कि कभी-कभी मजबूरी में लिए गए फैसले भी हमें हमारी मंजिल तक पहुँचा देते हैं।
शिक्षा: रिश्ते समझौतों से शुरू हो सकते हैं, लेकिन उन्हें निभाने के लिए निस्वार्थ प्रेम और समर्पण की आवश्यकता होती है।
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