गरीब समझकर किया अपमान ! अगले दिन खुला राज— वही निकला बैंक का मालिक 😱 फिर जो हुआ…

सम्मान का मूल्य: एक पिता, एक बेटा और बैंक की कहानी

भूमिका

शहर के बीचों-बीच स्थित समृद्ध बैंक पिछले कई वर्षों से अपने शानदार भवन और कड़े सुरक्षा प्रबंधों के लिए प्रसिद्ध था। यहां हर दिन सैकड़ों लोग आते, पैसे जमा करते, निकालते या फिर किसी वित्तीय सलाह के लिए मिलते। इस बैंक की चमक-दमक और वहां काम करने वाले कर्मचारियों का रौब दूर से ही नजर आता था। लेकिन एक सुबह, इस बैंक में घटी एक घटना ने न सिर्फ बैंक बल्कि पूरे शहर को सोचने पर मजबूर कर दिया कि असली सम्मान क्या होता है और उसकी कीमत क्या है।

एक साधारण सुबह

सुबह के समय, जब सूरज की किरणें शहर की सड़कों पर बिखर रही थीं, समृद्ध बैंक की सभी दुकानें सज चुकी थीं। बैंक के बाहर गाड़ियों की कतारें, ग्राहकों की भीड़ और सुरक्षा गार्ड की सख्त निगाहें माहौल को गंभीर बना रही थीं। उसी समय, एक बुजुर्ग व्यक्ति, राम प्रसाद जी, धीरे-धीरे अपने कांपते कदमों से बैंक के दरवाजे की ओर बढ़ रहे थे। उनके चेहरे पर अनुभव की गहराई थी, कपड़ों में सादगी और आंखों में आत्मसम्मान।

जैसे ही वे दरवाजे के पास पहुंचे, वहां खड़े गार्ड ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी नजरों में सवाल था – “तुम यहां क्या करने आए हो?” लेकिन राम प्रसाद जी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया और कांच का दरवाजा धकेल कर अंदर चले गए।

अजनबी निगाहें और अपमान

बैंक के अंदर जाते ही कर्मचारियों और ग्राहकों की नजरें राम प्रसाद जी पर टिक गईं। सब उन्हें ऐसे देख रहे थे जैसे कोई गलत जगह पर आ गया हो। वह धीरे-धीरे काउंटर की तरफ बढ़े। एक काउंटर पर ‘पूछताछ’ लिखा था, जहां रतिका नाम की एक 30 साल की महिला बैठी थी। रतिका अपने फोन में व्यस्त थी और उसके चेहरे पर एक अजीब सी अकड़ थी।

राम प्रसाद जी ने बहुत ही विनम्रता से कहा, “बेटी, मुझे बैंक से पैसे निकालने थे।” रतिका ने उन्हें घूर कर देखा और मन ही मन सोचा, “पेंशन के 2000 निकालने आया होगा।” उसने बेरुखी से कहा, “तो निकालो। मैं क्या करूं? जाओ उस काउंटर पर।”

राम प्रसाद जी ने कहा, “बेटी, चेक से निकालने हैं।” रतिका ने नकली हंसी हंसते हुए पूछा, “ओहो, चेक से कितने निकालने हैं?”
“मुझे आर एस 1 लाख नकद निकालने हैं।”
यह सुनते ही रतिका जोर-जोर से हंसने लगी। उसकी हंसी इतनी तेज थी कि आसपास के लोग भी देखने लगे।
“क्या कहा? आर एस 1 लाख। अरे चाचा, सुबह-सुबह मजाक करने आ गए क्या? तुम अपनी शक्ल देखी है आईने में? जिंदगी में कभी इतने पैसे एक साथ देखे भी हैं? भिखारी कहीं के। चलो निकलो यहां से। मेरा और बैंक का टाइम खराब मत करो।”

राम प्रसाद जी का चेहरा अपमान से लाल हो गया। उन्होंने कांपती आवाज में कहा, “बेटी, तुम ऐसी बातें क्यों कर रही हो? मेरा खाता इसी बैंक में है। तुम बस एक बार चेक तो देख लो।”
रतिका अब चिल्लाने लगी, “मुझे नहीं देखना कोई चेक वेक। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इतने बड़े बैंक में घुसने की? यह बैंक तुम जैसे भिखारियों के लिए नहीं है। यहां शहर के बड़े-बड़े लोग आते हैं। तुम्हारी तो औकात भी नहीं है यहां खाता खोलने की। पता नहीं कौन चपरासी था जिसने तुम्हारा खाता खोल दिया। चलो निकलो यहां से। वरना गार्ड को बुलाकर धक्के मारकर बाहर निकलवा दूंगी।”

घमंड और सत्ता का प्रदर्शन

यह हंगामा सुनकर आसपास भीड़ जमा हो गई थी। तभी बैंक मैनेजर मिस्टर मल्होत्रा अपनी कांच की केबिन से बाहर निकला। मिस्टर मल्होत्रा एक नंबर का घमंडी और चापलूस इंसान था। उसने दूर से ही माजरा समझ लिया।
“क्या हो रहा है यहां? रतिका, यह कौन हंगामा कर रहा है?”
रतिका को जैसे और बल मिल गया। उसने चटकारे लेते हुए कहा, “सर, देखिए ना, यह कोई भिखारी है। सुबह-सुबह आ गया है और कह रहा है कि इसे आर एस लाख कैश चाहिए। मैं इसे बाहर जाने को कह रही हूं। तो यह जा ही नहीं रहा।”

मिस्टर मल्होत्रा गुस्से में राम प्रसाद जी की तरफ बढ़ा।
“ए बुड्ढे, सुनाई नहीं दे रहा तुझे जब वह कह रही है कि यहां से जाओ तो जाता क्यों नहीं? यह बैंक है। कोई धर्मशाला नहीं जो कोई भी मुंह उठाकर चला आए।”
राम प्रसाद जी ने हाथ जोड़कर कहा, “साहब, मैं भिखारी नहीं हूं। मेरा पैसा है।”
मल्होत्रा ने अपना आपा खो दिया। उसने आगे बढ़कर रामप्रसाद जी को जोर से सीने पर धक्का दे दिया।
“निकल यहां से।”
धक्का इतना जोरदार था कि 60 साल के राम प्रसाद जी अपना संतुलन खो बैठे और लड़खड़ा कर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़े। उनकी पासबुक और चेक हाथ से छूट कर दूर जा गिरे। उनके सिर में हल्की सी चोट भी आई। एक पल के लिए पूरे बैंक में सन्नाटा छा गया।

मैनेजर गार्ड पर चिल्लाया, “देख क्या रहे हो? उठाओ इसे और बाहर फेंको।”
गार्ड ने लपक कर राम प्रसाद जी की बाह पकड़ी और उन्हें घसीटते हुए बैंक के दरवाजे से बाहर कर दिया।
राम प्रसाद जी ने पीछे मुड़कर देखा। रतिका विजय मुस्कान के साथ उन्हें देख रही थी। मिस्टर मल्होत्रा अपनी टाई ठीक करता हुआ वापस अपने केबिन में जा रहा था और बाकी ग्राहक अपनी-अपनी जगह लौट गए जैसे कुछ हुआ ही ना हो।

एक पिता की बेबसी

बैंक के बाहर धूल और गाड़ियों के शोर के बीच राम प्रसाद जी जमीन पर बैठे थे। आंखों में बेबसी के आंसू थे। उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत मेहनत और ईमानदारी से पैसा कमाया था। लेकिन आज उनके ही पैसों ने उन्हें भिखारी बना दिया था। वह अब वहां से उठकर धीरे-धीरे घर की ओर पैदल ही चलने लगे। हर कदम एक बोझ की तरह लग रहा था।

घर पहुंचकर उन्होंने दरवाजा बंद किया और वहीं जमीन पर बैठ गए। वह बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगे। काफी देर रोने के बाद उनका मन थोड़ा हल्का हुआ। लेकिन अपमान की आग अभी भी अंदर जल रही थी। उन्होंने सोचा कि क्या उन्हें अर्जुन को यह सब बताना चाहिए? वह अपने बेटे को परेशान नहीं करना चाहते थे। लेकिन फिर उन्होंने सोचा अगर मैं चुप रह गया तो उन जैसे लोगों का हौसला और बढ़ेगा। उन्होंने कांपते हाथों से अपना फोन उठाया और अर्जुन का नंबर मिलाया।

बेटे का संकल्प

उस समय अर्जुन दिल्ली में एक बहुत बड़ी इंटरनेशनल डील की मीटिंग में था। करोड़ों का प्रोजेक्ट था। जैसे ही उसके पर्सनल फोन पर पिताजी का नाम चमका, उसने मीटिंग में बैठे लोगों से माफी मांगी। उसने फोन उठाया। हॉल से बाहर निकल गया और अपने अंदाज में कहा,
“हां पिताजी, सब ठीक है। आपने आज सुबह फोन नहीं किया। मैं चिंता कर रहा था।”

दूसरी तरफ से राम प्रसाद जी की भारी और भीगी हुई आवाज आई,
“हां बेटा, सब ठीक है।”
एक बेटे को अपने पिता की आवाज का जरा सा भी बदलाव पता चल जाता है। अर्जुन तुरंत समझ गया कि कुछ गड़बड़ है।
“पिताजी, आपकी आवाज ठीक नहीं लग रही। क्या हुआ? प्लीज बताइए।”

राम प्रसाद जी और खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने रोते-रोते बैंक में हुई सारी घटना अपने बेटे को बता दी। कैसे उन्हें भिखारी कहा गया? कैसे मैनेजर ने उन्हें धक्का दिया और कैसे उन्हें गार्ड से बाहर फेंकवा दिया गया। जैसे-जैसे अर्जुन सुनता गया, उसके चेहरे का रंग बदलता गया। फोन पर राम प्रसाद जी की सिसकियां सुनकर उसका दिल टूट गया।
“पिताजी, आप बस शांत हो जाइए। प्लीज आप रोइए मत। मैं अभी आ रहा हूं।”
“नहीं बेटा, तू अपनी मीटिंग कर। मैं ठीक हूं। बस मन हल्का करना था इसलिए बता दिया।”
“नहीं।” अर्जुन की आवाज में एक ऐसी दृढ़ता थी जिसे कोई काट नहीं सकता था।
“कोई मीटिंग, कोई डील मेरे पिता के सम्मान से बड़ी नहीं है। मैं पहली फ्लाइट से वापस आ रहा हूं। आप बस दरवाजा बंद करके आराम कीजिए। अब जो भी करना है मैं करूंगा।”

अर्जुन ने फोन काटा और वापस मीटिंग रूम में गया। उसने सबसे माफी मांगी। बिना किसी और की सुने वह मीटिंग से बाहर निकल गया। उसने तुरंत अपने असिस्टेंट को मुंबई की पहली फ्लाइट बुक करने को कहा और अपनी कार से सीधा एयरपोर्ट के लिए निकल गया। रास्ते भर उसके दिमाग में अपने पिता का रोता हुआ चेहरा और बैंक कर्मचारियों के घमंडी चेहरे घूम रहे थे। अर्जुन ने मन ही मन फैसला कर लिया था। वह उन लोगों को सिर्फ सजा नहीं देगा बल्कि उन्हें एक ऐसा सबक सिखाएगा जो वह अपनी पूरी जिंदगी नहीं भूल पाएंगे।

साधारण कपड़ों में असाधारण वापसी

देर रात जब अर्जुन घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसके पिता सोफे पर ही बैठे-बैठे सो गए थे। उनके चेहरे पर अभी भी उदासी और थकान थी। अर्जुन ने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा। राम प्रसाद जी हड़बड़ा कर उठ गए। अपने बेटे को सामने देखकर उनकी आंखों में फिर से आंसू आ गए। अर्जुन ने उन्हें गले से लगा लिया।
“बस पिताजी, अब और नहीं। आप आराम कीजिए। कल हम एक साथ उस बैंक में जाएंगे।”
“नहीं बेटा, अब हमें वहां जाने की क्या जरूरत है? मैं उस बैंक में अब कभी कदम नहीं रखूंगा।”
अर्जुन ने उनके हाथ पकड़ते हुए कहा,
“जाना होगा पिताजी। यह सिर्फ आपके अपमान की बात नहीं है। यह उस घमंड को तोड़ने की बात है। हमें जाना होगा ताकि आइंदा वह किसी और के पिता के साथ ऐसा करने की हिम्मत ना करें। और हम वैसे ही जाएंगे जैसे आप आज गए थे। बिल्कुल साधारण कपड़ों में।”

राम प्रसाद जी अपने बेटे के चेहरे पर दृढ़ संकल्प देखकर चुप हो गए।

बैंक में दूसरी सुबह

अगली सुबह अर्जुन ने एक साधारण सी कॉटन की पट और एक मामूली सी शर्ट पहनी। पैरों में उसने भी चप्पलें डाल लीं। अर्जुन ने अपने ड्राइवर को भी छुट्टी दे दी थी। उसने एक ऑटो रिक्शा रोका और दोनों बैंक की तरफ चल दिए। बैंक में आज भी वही माहौल था। वही चमकदमक, वही अमीर लोग। अर्जुन और राम प्रसाद जी जैसे ही अंदर घुसे, कल की तरह ही सब ने उन्हें घूरना शुरू कर दिया। अर्जुन ने अपने पिता का हाथ कसकर पकड़ लिया जैसे उन्हें हिम्मत दे रहा हो। वह सीधे उसी काउंटर पर गए जहां रतिका बैठी थी।

रतिका आज भी अपने फोन में लगी हुई थी। अर्जुन ने बहुत ही विनम्रता से कहा,
“मैडम, हमें पैसे निकालने हैं।”
रतिका ने नजर उठाकर देखा। कल वाला बूढ़ा आदमी आज अपने साथ एक लड़के को भी ले आया था। उसने रब से कहा,
“ओ तो तुम फिर आ गए। आज अपने बेटे को भी ले आए हो शिकायत करने। सुनो, यहां कोई सुनवाई नहीं होगी। चलो निकलो यहां से।”

अर्जुन मुस्कुराया,
“मैडम, हम शिकायत करने नहीं आए हैं। हम पैसे निकालने आए हैं। यह मेरे पिताजी का चेक है। प्लीज इसे प्रोसेस कर दीजिए।”
रतिका ने चेक हाथ में लिया और अमाउंट देखकर फिर से हंस पड़ी।
“कल बात मजाक कर रहा था। आज बेटा भी शुरू हो गया। आर एस 1 लाख कहां से लाओगे इतने पैसे? जाओ, पहले अपने खाते में आर एस देन तो जमा करवा लो।”
आसपास के लोग फिर से हंसने लगे। राम प्रसाद जी का चेहरा फिर से उतर गया। लेकिन अर्जुन बिल्कुल शांत था।
“मैडम, आप बस एक बार कंप्यूटर में अकाउंट नंबर डालकर बैलेंस चेक कर लीजिए। आपकी सारी गलतफहमी दूर हो जाएगी।”
रतिका ने चेक फेंकते हुए कहा,
“मेरे पास फालतू टाइम नहीं है तुम जैसे लोगों के लिए। जाओ मैनेजर साहब से मिलो। वही करेंगे तुम्हारा हिसाब।”

मैनेजर के सामने सामना

अर्जुन ने शांति से कहा,
“ठीक है, हम मैनेजर साहब से ही मिल लेते हैं।”
वह अपने पिता को लेकर मैनेजर के केबिन की तरफ बढ़ा। केबिन के बाहर बैठे चपरासी ने उन्हें रोक लिया।
“कहां जा रहे हो? साहब अभी बिजी हैं।”
अर्जुन ने कहा,
“हैं, उनसे मिलना है। जरूरी काम है। अपॉइंटमेंट है।”
चपरासी ने अकड़ कर कहा,
“नहीं, तुम दोनों जाओ वहां बैठो जहां वेटिंग एरिया है। साहब फ्री होगे तो बुलाएंगे।”

अर्जुन अपने पिता के साथ उस कोने में जाकर बैठ गया। वह देख रहा था कि कैसे अमीर दिखने वाले लोग बिना अपॉइंटमेंट के सीधे अंदर जा रहे थे और उन्हें कोई नहीं रोक रहा था। आधा घंटा बीत गया। एक घंटा बीत गया। मैनेजर मल्होत्रा अपनी केबिन से कई बार बाहर आया। दूसरे ग्राहकों से हंस-हंस कर बात की। लेकिन उसने अर्जुन और उसके पिता की तरफ देखा तक नहीं।

राम प्रसाद जी अब परेशान हो रहे थे।
“बेटा, चल यहां से। मुझे और अपमान नहीं सहना।”
अर्जुन ने उनका हाथ दबाया।
“बस 5 मिनट और पिताजी, सब ठीक हो जाएगा।”

एक घंटे के इंतजार के बाद अर्जुन उठा। इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं बल्कि एक चट्टानी दृढ़ता थी। वह चपरासी को नजरअंदाज करता हुआ सीधा मैनेजर के केबिन का दरवाजा खोलकर अंदर चला गया।

सच्चाई का सामना

मिस्टर मल्होत्रा किसी से फोन पर हंस-हंस कर बात कर रहा था। अचानक किसी को बिना इजाजत के अंदर आया देखकर वह भड़क गया।
“तमीज नहीं है क्या? बिना पूछे अंदर कैसे आ गए?”
अर्जुन मल्होत्रा की टेबल के सामने आकर खड़ा हो गया। राम प्रसाद जी भी डरते-डरते उसके पीछे आ गए।

“आप मिस्टर मल्होत्रा हैं? इस ब्रांच के मैनेजर?”
“हां, मैं ही हूं। तुम कौन हो?”
मल्होत्रा तुरंत चिल्लाने लगा।
“और तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे केबिन में घुसने की? सिक्योरिटी?”
“सिक्योरिटी को बुलाने की जरूरत नहीं है, मिस्टर मल्होत्रा। वह आपकी मदद नहीं कर पाएंगे।”

अर्जुन की आवाज इतनी शांत और गहरी थी कि मल्होत्रा एक पल के लिए झिझक गया।
“क्या मतलब है तुम्हारा? तुम चाहते क्या हो?”
अर्जुन ने अपनी जेब से वहीं आर एस1 लाख का चेक निकाला और उसे टेबल पर मल्होत्रा के सामने रख दिया।
“मैं चाहता हूं कि आप यह ट्रांजैक्शन पूरा करें। यह मेरे पिता श्री राम प्रसाद जी का चेक है। कल आपने इन्हें पहचानने से इंकार कर दिया था।”

मल्होत्रा ने चेक और फिर राम प्रसाद जी के चेहरे को देखा।
“ओह, तो यह कल वाला बुड्ढा है। सुनो लड़के, दिमाग खराब हो गया है क्या तुम्हारा? जब इसके खाते में पैसे ही नहीं है तो मैं ट्रांजैक्शन कहां से कर दूं। तुम जैसे लोग रोज आ जाते हैं टाइम खराब करने। चेहरे देखकर ही पता चल जाता है कि किसकी कितनी औकात है।”
मल्होत्रा ने चेक को बिना देखे ही किनारे फेंक दिया।
“अब चुपचाप यहां से निकल जाओ। इससे पहले कि मैं तुम दोनों को पुलिस के हवाले कर दूं।”

असली औकात का परिचय

अर्जुन ने कहा,
“अनुभव, औकात, चेहरे पढ़ना। आपकी यही बातें तो मुझे यहां खींच लाई हैं, मिस्टर मल्होत्रा।”
अर्जुन ने अपनी जेब से अपना फोन निकाला और एक नंबर डायल किया।
“हां विवान। तुम पूरी टीम के साथ बैंक के बाहर ही होना। ठीक है। अब अंदर आ जाओ। और हां, रीजनल हेड मिस्टर शर्मा और विजिलेंस डिपार्टमेंट को भी कॉन्फ्रेंस कॉल पर ले लो। उन्हें यह सब लाइव सुनना चाहिए।”

मल्होत्रा को कुछ समझ ही नहीं आया।
“यह क्या बकवास कर रहे हो?”
तभी केबिन का दरवाजा खुला और सूट-बूट पहने पांच-छह लोग अंदर आ गए। उनमें से एक ने आगे बढ़कर अर्जुन को एक फाइल दी। मल्होत्रा उन लोगों को देखकर और भी घबरा गया।

अर्जुन ने अपनी कुर्सी खींची और मल्होत्रा की आंखों में आंखें डालकर बैठ गया। उसकी आवाज अब बिल्कुल बदल चुकी थी। उसमें एक मालिक का अधिकार था।
“मिस्टर मल्होत्रा, मेरा नाम अर्जुन है और यह जिन्हें कल आपने भिखारी कहकर धक्का दिया था, मेरे पिता श्री राम प्रसाद जी हैं। और मैं अर्जुन, इस समृद्ध बैंक का मेजॉरिटी शेयर होल्डर और मालिक हूं। मतलब जिस कुर्सी पर तुम बैठे हो, जिस बैंक में तुम काम करते हो, वह मेरा है और मेरे पिताजी का है।”

एक पल के लिए केबिन में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। यह सुनते ही मैनेजर मल्होत्रा के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसका मुंह खुला का खुला रह गया। माथे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। बाहर काउंटर पर बैठी रतिका भी यह सब देखकर हैरान थी। पूरा बैंक स्टाफ और ग्राहक अब केबिन की तरफ ही देख रहे थे।

सबक और न्याय

मल्होत्रा कांपती आवाज में बोला,
“सर, आप मजाक कर रहे हैं।”
अर्जुन की आवाज गूंजी,
“मजाक तो कल आप लोगों ने मेरे पिता के साथ किया था जब आपने उन्हें भिखारी कहा था। जब आपने उन्हें धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया था। जब पूरी दुनिया तमाशा देख रही थी।”

अर्जुन ने अपने साथ आए एक आदमी को इशारा किया। उसने एक लैपटॉप खोला और उस पर कल की सीसीटीवी फुटेज प्ले कर दी। पूरी घटना एक-एक पल साफ-साफ दिख रहा था। रतिका की हंसी, मल्होत्रा का धक्का, गार्ड का घसीटना, सब कुछ।
“यह फुटेज अब से कुछ ही मिनटों में हेड ऑफिस और न्यूज़ चैनलों तक पहुंच जाएगी। मिस्टर मल्होत्रा और आपकी बर्खास्तगी के पत्र भी तैयार हैं।”

मल्होत्रा अब लगभग रोने वाला था। वह अपनी कुर्सी से उठा और सीधा राम प्रसाद जी के पैरों में गिर पड़ा।
“सर, सर, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैंने आपको पहचाना नहीं। मैं गधा हूं। मैं जानवर हूं। प्लीज मेरी नौकरी मत लीजिए सर। मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं।”

राम प्रसाद जी का दिल पसीज गया। उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा। लेकिन अर्जुन की आंखों में कोई रहम नहीं था।
“जब तुम मेरे पिता को धक्का दे रहे थे तब तुम्हें भी अपने बच्चे याद नहीं आए। माफी। तुम माफी किस बात के लिए मांग रहे हो? मुझे और मेरे पिता को पहचानने के बाद या उस अपमान के लिए जो तुम हर उस गरीब और साधारण दिखने वाले इंसान के साथ करते हो जो तुम्हारे बैंक में आता है?”

अर्जुन खड़ा हुआ और उसने रतिका को अंदर बुलाने का इशारा किया। रतिका डरते-डरते कांपते हुए अंदर आई। उसकी आंखों में आंसू थे।
“मैडम, आप तो चेहरे पढ़कर औकात बता देती हैं। बताइए आज मेरे चेहरे पर आपको क्या दिख रहा है?”
रतिका कुछ नहीं बोली, बस रोती रही।

सम्मान का पाठ

“आप दोनों को सिर्फ इसलिए नहीं निकाला जा रहा कि आपने मेरे पिता का अपमान किया। आपको इसलिए निकाला जा रहा है क्योंकि आप उस कुर्सी के लायक नहीं हैं। बैंक का काम सिर्फ पैसे का लेन-देन करना नहीं होता। उसका काम होता है लोगों को सेवा देना सम्मान के साथ और आप दोनों ने इस बैंक के नाम और भरोसे को मिट्टी में मिला दिया है।”

अर्जुन ने अपने सीईओ की तरफ देखा और कहा,
“इन दोनों के टर्मिनेशन लेटर दो और सात गार्ड को भी। मैं अपनी बैंक में ऐसे लोगों को एक पल भी बर्दाश्त नहीं कर सकता।”

फिर वह पूरे बैंक स्टाफ की तरफ मुड़ा जो अब तक केबिन के बाहर जमा हो चुके थे।
“आज जो हुआ वह आप सबके लिए एक सबक है। इंसान की कीमत उसके कपड़ों से नहीं, उसके किरदार से होती है। ग्राहक भगवान होता है। चाहे वह फटे कपड़ों में हो या सूट-बूट में। अगर आज के बाद मुझे इस ब्रांच में किसी भी ग्राहक के साथ बदसलूकी की शिकायत मिली तो सिर्फ नौकरी नहीं जाएगी, मैं उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी करूंगा।”

पूरे बैंक में पिनड्रॉप साइलेंस था।

अंतिम संदेश

अंत में अर्जुन अपने पिता के पास गया। उसने उनके कंधे पर हाथ रखा। राम प्रसाद जी ने मल्होत्रा की तरफ देखा और बस इतना कहा,
“बेटा, हमने यह बैंक लोगों की मदद के लिए बनाया था। किसी का अपमान करने के लिए नहीं। याद रखना दौलत आज है, कल नहीं रहेगी, लेकिन इंसानियत और संस्कार जिंदगी भर साथ देते हैं।”

यह कहकर अर्जुन अपने पिता को सहारा देकर बैंक से बाहर निकल गया। आज जब वह बाहर निकल रहे थे तो पूरा स्टाफ और सारे ग्राहक सिर झुकाए सम्मान में खड़े थे। बाहर आकर राम प्रसाद जी ने एक गहरी सांस ली। आज उनके आंसू अपमान के नहीं बल्कि गर्व के थे। उन्हें गर्व था अपने बेटे पर जिसने ना सिर्फ अपने पिता का सम्मान वापस दिलाया बल्कि पूरी व्यवस्था को एक जरूरी सबक भी सिखाया।

समाज को संदेश

दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि असली सम्मान किसी की दौलत या कपड़ों से नहीं, बल्कि उसके किरदार और व्यवहार से मिलता है। समाज में हर व्यक्ति को बराबर सम्मान मिलना चाहिए, चाहे उसकी स्थिति कैसी भी हो। बैंक, ऑफिस, या कोई भी संस्था – उसकी असली पहचान वहां काम करने वाले लोगों के व्यवहार से बनती है।
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धन्यवाद। जय हिंद।