गलती से भारत की सीमा में आ गई पाकिस्तानी लड़की… फिर जो हुआ, उसने सबको चुप करा दिया

नूर: सरहदें, बकरियां और इंसानियत की जीत

अध्याय 1: चाँदपुर की सुबह और अदृश्य रेखा

पाकिस्तान के सिंध प्रांत का एक छोटा सा गाँव, चाँदपुर। यहाँ सुबह सूरज की पहली किरण से पहले ही ज़िम्मेदारियाँ जाग जाती हैं। धूल भरी गलियां और कच्चे मकानों के बीच नूर का घर भी था। नूर, जिसकी उम्र महज़ 17-18 साल थी, लेकिन कंधों पर पूरे घर का बोझ था। उसके अब्बा को गुज़रे चार साल हो चुके थे। घर में एक बीमार माँ, हमीदा बी, और एक छोटा भाई, रशीद था।

नूर का रोज़ का नियम था—बकरियों को चराने निकलना। उस सुबह भी वह अपनी पाँच-छह बकरियों को लेकर निकली। रेत के टीलों पर चलते-चलते नूर अक्सर अपनी ही धुन में खो जाती थी। उस दिन हवा में कुछ अजीब सा खिंचाव था। बकरियां चरते-चरते आगे बढ़ती गईं। नूर ने ध्यान नहीं दिया कि कब वह उन झाड़ियों को पीछे छोड़ आई जहाँ तक गाँव की सीमा मानी जाती थी।

रेगिस्तान में कोई दीवार नहीं होती, कोई तार नहीं होते। बस एक अंतहीन रेत का समंदर। अचानक, एक तीखी आवाज़ गूंजी—”रुको! वहीं खड़ी रहो!”

नूर के हाथ से बकरियों की रस्सी छूट गई। उसने सर उठाया। सामने खाकी वर्दी में कुछ जवान खड़े थे, जिनकी बंदूकें उसकी तरफ तनी हुई थीं। वह भारत की सीमा में दाखिल हो चुकी थी। डर के मारे उसके पैर पत्थर हो गए और वह वहीं रेत पर बैठ गई।

अध्याय 2: खारीतार चौकी का सन्नाटा

नूर को राजस्थान के जैसलमेर जिले की ‘खारीतार सीमा चौकी’ पर लाया गया। एक छोटा सा कमरा, जिसमें एक मेज, दो कुर्सियां और एक कोने में रखा वायरलेस सेट था। नूर एक कोने में दुबक कर बैठ गई। उसकी आँखों से आँसू थम नहीं रहे थे। उसे लगा था कि अब वह कभी वापस नहीं जा पाएगी।

चौकी पर तैनात हेड कांस्टेबल अर्जुन सिंह ने नूर को देखा। उन्होंने अपनी सर्विस में कई घुसपैठिए पकड़े थे, कई तस्करों को रोका था। लेकिन आज उनके सामने कोई दुश्मन नहीं, बल्कि एक डरी हुई बच्ची थी। अर्जुन सिंह ने धीरे से पूछा, “बेटा, पानी पियोगी?”

नूर ने कांपते हाथों से गिलास पकड़ा। उसकी सिसकियों के बीच बस एक ही शब्द निकल रहा था, “अम्मी… मेरी अम्मी बीमार है।”

अर्जुन सिंह और उनके साथी जवान रवि कुमार के लिए यह स्थिति बड़ी अजीब थी। नियम कहते थे कि उसे गिरफ्तार किया जाए, पूछताछ हो और जेल भेज दिया जाए। लेकिन दिल कहता था कि यह सिर्फ़ एक भटकी हुई राहगीर है। रवि कुमार को अपनी छोटी बहन याद आ गई, जो लगभग नूर की ही उम्र की थी।

अध्याय 3: वर्दी के पीछे का इंसान

पोस्ट कमांडर शर्मा साहब ने मामले की गंभीरता को समझा। उन्होंने ऊपर मुख्यालय में रिपोर्ट भेजी। प्रोटोकॉल के मुताबिक, किसी भी विदेशी नागरिक का सीमा पार करना एक गंभीर अपराध था। “अर्जुन, तुम्हें पता है कि मामला पेचीदा है,” शर्मा साहब ने कहा। “दो देशों की राजनीति ऐसे छोटे मामलों को भी बड़ा बना देती है।”

अर्जुन सिंह ने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ नूर की बकरियां भी अब बाड़े में बंद थीं। “साहब, अगर कानून इंसानियत की रक्षा नहीं कर सकता, तो वह कानून किस काम का? यह लड़की जानबूझकर नहीं आई है। इसकी आँखों में वो मकारी नहीं है जो जासूसों की आँखों में होती है।”

उस रात नूर को चौकी पर ही रुकना पड़ा। ठंड बढ़ रही थी। अर्जुन सिंह ने चुपचाप एक गर्म चादर नूर के कंधों पर डाल दी। नूर ने पहली बार उन जवानों को सिर्फ़ ‘दुश्मन देश के सिपाही’ की तरह नहीं, बल्कि इंसानों की तरह देखा। उसने धीरे से पूछा, “साहब, क्या मैं वापस जा पाऊंगी?”

अर्जुन सिंह के पास कोई ठोस जवाब नहीं था, पर उन्होंने इतना ज़रूर कहा, “हम कोशिश कर रहे हैं।”

अध्याय 4: फैसले की घड़ी

अगली सुबह वायरलेस पर संदेशों का आदान-प्रदान तेज़ हो गया। ऊपर के अधिकारियों ने मानवीय आधार पर विचार करने का आश्वासन दिया था। शर्मा साहब ने पाकिस्तानी रेंजर्स के साथ ‘फ्लैग मीटिंग’ का समय तय किया।

मीटिंग पॉइंट पर दोनों देशों के झंडे लहरा रहे थे। एक तरफ भारतीय जवान और दूसरी तरफ पाकिस्तानी रेंजर। नूर को वहाँ लाया गया। कागज़ी कार्रवाई पूरी हुई। नूर के बारे में सारी जानकारी साझा की गई। जब नूर को सीमा रेखा के पास ले जाया गया, तो वह एक पल के लिए रुकी।

उसने पीछे मुड़कर उन भारतीय जवानों को देखा जिन्होंने उसे पानी पिलाया था, उसे चादर दी थी और सबसे बढ़कर, उसे सम्मान दिया था। नूर ने हाथ जोड़कर उन सबको नमन किया। यह कोई राजनीतिक संदेश नहीं था, यह एक आत्मा का दूसरी आत्मा को दिया गया धन्यवाद था। अर्जुन सिंह ने भी उसे औपचारिक रूप से सलाम किया—वह सलाम नूर के लिए था, उसकी मासूमियत के लिए था।

अध्याय 5: चाँदपुर का सुकून

जैसे ही नूर ने सीमा पार की, उसे पाकिस्तानी रेंजर्स ने अपनी सुरक्षा में लिया। उसे उसके गाँव चाँदपुर पहुँचाया गया। शाम का वक्त था, सूरज ढल रहा था। हमीदा बी दरवाजे पर आँखें बिछाए बैठी थीं। जब उन्होंने नूर को देखा, तो उनकी आँखों में जैसे ज़िंदगी लौट आई।

“अम्मी!” नूर चिल्लाई और अपनी माँ के गले लग गई। रशीद भी दौड़ता हुआ आया। उस रात चाँदपुर के उस छोटे से घर में खुशियों का चिराग जला। नूर ने अपनी अम्मी को सब बताया—कैसे सरहद के उस पार के लोगों ने उसकी देखभाल की।

उधर, खारीतार चौकी पर अर्जुन सिंह ने अपनी लॉग बुक में एंट्री की: “पाकिस्तानी नागरिक नूर पुत्री हमीदा बी, मानवीय आधार पर सुरक्षित वापस भेजी गई।” उन्होंने रजिस्टर बंद किया और आसमान की तरफ देखा। उन्हें महसूस हुआ कि आज उन्होंने महज़ अपनी ड्यूटी नहीं निभाई, बल्कि इंसान होने का धर्म निभाया था।

कहानी का संदेश

नूर की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि दुनिया के नक्शों पर खिंची लकीरें ज़मीन को तो बाँट सकती हैं, लेकिन इंसानियत को नहीं। जब हम एक-दूसरे को धर्म, देश या राजनीति के चश्मे से हटाकर सिर्फ़ एक इंसान की तरह देखते हैं, तो नफ़रत की दीवारें अपने आप ढहने लगती हैं।

सोचने वाली बात: क्या आपको लगता है कि सरहदों पर तैनात जवानों को ऐसे मामलों में खुद फैसला लेने का अधिकार मिलना चाहिए? क्या इंसानियत किसी भी कानून या नियम से ऊपर होनी चाहिए?

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