गांव के सरपंच ने मंदिर में पुजारी रखा और फिर उसी पुजारी ने कर दिया कारनामा/

सरसावा का पुजारी और छलावा: एक खौफनाक हकीकत

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के सरसावा गांव में जीवन अपनी धीमी गति से चल रहा था। 38 वर्षीय प्रेम सिंह, जो हाल ही में गांव के सरपंच चुने गए थे, गांव की सूरत बदलने के लिए प्रतिबद्ध थे। सरपंच बनने के बाद उनके मन में पहला विचार आया कि गांव की आध्यात्मिक और भौतिक स्वच्छता पर ध्यान दिया जाए। उनकी पहली प्राथमिकता गांव के प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार करना था, जो पिछले तीन महीनों से पुजारी के न होने के कारण उपेक्षित पड़ा था।

तीन महीने पहले, मंदिर के पुराने पुजारी की अचानक हृदय गति रुकने से मृ/त्यु हो गई थी, जिसके बाद से मंदिर में गंदगी का अंबार लग गया था। गांव के आवारा पशु मंदिर परिसर में घूमते रहते थे। प्रेम सिंह ने सबसे पहले एक मिस्त्री की व्यवस्था की और मंदिर की चारदीवारी को ऊंचा करवाने का काम शुरू किया ताकि मंदिर की मर्यादा बनी रहे।

मंदिर का कायाकल्प और एक मसीहा का आगमन

सरपंच प्रेम सिंह ने मंदिर की सफाई करवाई और उसे एक नया स्वरूप दिया, लेकिन अब उन्हें तलाश थी एक योग्य और विद्वान पुजारी की। वे कई दिनों तक आसपास के गांवों में घूमे, पर कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिला। इसी दौरान एक दिन सुबह करीब 9:00 बजे एक ऐसी घटना घटी जिसने मंदिर के भविष्य का फैसला कर दिया।

सरपंच की पत्नी, कौशल्या देवी, घर के अंधेरे स्टोर रूम में सफाई कर रही थीं। वहां छिपा एक सा/प उनके पैर पर चढ़ गया और उसने काट लिया। कौशल्या की चीख सुनकर प्रेम सिंह और पूरा गांव वहां इकट्ठा हो गया। तभी वहां से एक साधु गुज़रे, जिनका नाम नानकनाथ था। उनके चेहरे पर एक विशेष तेज और शांत भाव था। नानकनाथ ने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझा। उन्होंने जड़ी-बूटियों और अपने ज्ञान से सा/प के जहर को निकालने का सफल उपचार किया।

कौशल्या की जान बच गई और सरपंच प्रेम सिंह ने इसे ईश्वर का सीधा संकेत माना। उन्होंने कृतज्ञता भाव से नानकनाथ को मंदिर का पुजारी बनने का आग्रह किया, जिसे नानकनाथ ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

भक्ति की आड़ में छिपा ‘लंगोट का ढीला’ व्यक्ति

नानकनाथ ने मंदिर का कार्यभार संभाल लिया और देखते ही देखते भक्तजनों की संख्या बढ़ने लगी। गांव वाले उसकी पूजा-विधि और मंत्रोच्चारण से अत्यंत प्रभावित थे। लेकिन, कोई भी उसके अतीत या उसके भीतर पल रहे अंधेरे से वाकिफ नहीं था। नानकनाथ वास्तव में एक ‘लंगोट का ढीला’ और चरित्रहीन व्यक्ति था, जिसने धर्म को अपनी कुत्सित इच्छाओं को पूरा करने का माध्यम बना लिया था।

वह मंदिर आने वाली खूबसूरत महिलाओं को अपनी गंदी नज़र से देखता था और उनके बारे में अ/श्लील विचार रखता था। वह धीरे-धीरे ऐसे शिकार की तलाश में रहने लगा जो उसकी हवस का शिकार बन सके और वह अपनी साख पर भी आंच न आने दे।

अर्चना देवी और वह मनहूस सुबह

गांव की एक बेहद शालीन और सुंदर विधवा महिला, अर्चना देवी, जिनकी उम्र करीब 30 वर्ष थी, रोज की तरह सुबह 5:00 बजे मंदिर में पूजा करने आईं। उस समय मंदिर में भीड़ कम थी। पुजारी नानकनाथ की नज़र उन पर पड़ी और अर्चना की सादगी को देख वह अपनी सुध-बुध खो बैठा।

पूजा के बाद, जब अर्चना ने विदा लेनी चाही, तो नानकनाथ ने उन्हें रोक लिया। उसने एक विशेष ‘प्रसाद’ अर्चना को दिया और दावा किया कि इसे खाने से उनकी हर मंगल कामना पूरी होगी। भोली-भाली अर्चना नहीं जानती थी कि उस प्रसाद में पुजारी ने तीव्र न/शीली दवा मिला दी है।

प्रसाद खाते ही कुछ ही मिनटों में अर्चना को चक्कर आने लगे और वह मंदिर के फर्श पर बेहोश होकर गिर पड़ीं। इस बात का फायदा उठाकर पुजारी उन्हें मंदिर के पीछे बने एक गुप्त और सुनसान कमरे में ले गया। वहां उसने अर्चना के साथ ग/लत रिश्ते कायम किए और मानवता को शर्मसार कर दिया। जब अर्चना को थोड़ा होश आने लगा और पुजारी को डर लगा कि उसका यह कृत्य अब छिपा नहीं रहेगा, तो उसने निर्दयतापूर्वक अर्चना का गला दबाकर उनकी ह/त्या कर दी।

शराबी की गवाही और सच का पर्दाफाश

जब अर्चना घंटों तक घर नहीं लौटीं, तो उनके परिवार वाले व्याकुल हो गए। सरपंच और गांव वालों ने मंदिर जाकर पुजारी से पूछताछ की। नानकनाथ ने बड़ी ही चतुराई और शांत भाव से झूठ बोला—”यहां तो कई महिलाएं आती हैं, वे भी आई होंगी और चली गई होंगी।” सरपंच को उस पर अटूट विश्वास था, इसलिए उन्होंने पुजारी की बातों को सच मान लिया।

लेकिन सत्य को अधिक देर तक दबाया नहीं जा सकता था। उसी रात करीब 11:00 बजे, जब पूरा गांव सो रहा था, नानकनाथ मंदिर के पीछे एक गहरा गड्ढा खोदकर लाश को दफनाने की तैयारी कर रहा था। तभी गांव का एक शराबी, दिनेश, जो मंदिर में चोरी करने की फिराक से घुसा था, वहां छिपकर बैठ गया। उसने देखा कि पुजारी एक भारी बोरी (लाश) को गड्ढे में डाल रहा है।

दिनेश की नशा उतर गया और वह डर के मारे जोर-जोर से चिल्लाने लगा। उसके शोर से आसपास के लोग जाग गए। गांव वालों ने जब गड्ढे के पास जाकर देखा, तो वहां अर्चना देवी का निष्प्राण शरीर मिला। पुजारी मौके का फायदा उठाकर अंधेरे में गायब हो गया।

पुलिस की कार्रवाई और चौंकाने वाला बयान

सरपंच प्रेम सिंह को अपनी गलती का अहसास हुआ और तुरंत पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने 24 घंटे के भीतर घेराबंदी कर नानकनाथ को गांव के बाहरी खेतों से गिरफ्तार कर लिया। जब पुलिस ने सख्ताई से पूछताछ की, तो नानकनाथ ने जो सच उगला, उसने पूरे सहारनपुर को दहला दिया।

उसने कबूल किया कि वह एक तांत्रिक विचारधारा से प्रभावित था और वह ‘पांच ब/लियां’ पूरी करना चाहता था। उसका मानना था कि पांच महिलाओं की ह/त्या और अनाचार के बाद उसे ‘स्वर्ग लोक’ की प्राप्ति होगी। अर्चना से पहले वह दो और महिलाओं को इसी तरह अपना शिकार बना चुका था। पुलिस ने तुरंत चार्जशीट दाखिल की और पुख्ता सबूतों के आधार पर अदालत ने नानकनाथ को उम्रकैद की कठोर सजा सुनाई।

निष्कर्ष

सरसावा की यह घटना हमें एक बड़ा सबक सिखाती है। श्रद्धा और भक्ति अच्छी बात है, लेकिन किसी पर भी अंधा विश्वास करना, विशेषकर तब जब आप उनके चरित्र से पूरी तरह वाकिफ न हों, घातक हो सकता है। अपराधी अक्सर धर्म और साधुता का चोला ओढ़कर समाज के बीच छिप जाते हैं।

सतर्कता ही बचाव है। हमें अपनी और अपनों की सुरक्षा के प्रति हमेशा सजग रहना चाहिए।