मानवता का आंचल: गीता और मनोज की अटूट संवेदना
प्रस्तावना
यह कहानी उस समाज का आईना है जहाँ एक तरफ निर्दयी और स्वार्थी लोग हैं, तो दूसरी तरफ आज भी मानवता और करुणा जीवित है। यह कहानी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से शुरू होकर दिल्ली की गलियों तक जाती है, जहाँ भाग्य के खेल और मानवीय संवेदनाओं का मिलन होता है।
अध्याय 1: गोरखपुर स्टेशन की एक उदास दोपहर
मई का महीना था, २०१४ की तपती गर्मी और गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की बेतहाशा भीड़। इसी भीड़ के बीच, एक कोने में २६ साल की एक बेहद खूबसूरत लेकिन उदास महिला बैठी थी। उसका नाम गीता था। ईश्वर ने उसे बड़ी फुर्सत से गढ़ा था—मासूम चेहरा, गौर वर्ण और शांत आँखें। लेकिन विडंबना देखिए, जिस विधाता ने उसे सुंदरता दी, उसी ने उसकी किस्मत में वैधव्य (विधवापन) का गहरा घाव भी लिख दिया था।
गीता के पास उसका ४ साल का बेटा ‘गोलू’ था। गीता दिल्ली जाने वाली ट्रेन का इंतज़ार कर रही थी, लेकिन जब भी ट्रेन आती, उसमें इतनी भीड़ होती कि एक विधवा औरत और छोटे बच्चे के लिए अंदर पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती।
गीता के पास सामान के नाम पर बस एक पुराना बैग था, जिसमें माँ-बेटे के कुछ जोड़े कपड़े थे और पानी पीने के लिए एक स्टील का गिलास। उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। वह दिल्ली इसलिए जा रही थी क्योंकि उसके दिवंगत पति के कुछ पैसे एक कंपनी में फंसे थे। उसे उम्मीद थी कि शायद उन पैसों से उसके और उसके बच्चे का भविष्य सुधर जाए।
अध्याय 2: भूख की तड़प और एक अजनबी का प्रवेश
स्टेशन पर बिक रही रंग-बिरंगी चीजों को देखकर नन्हा गोलू मचलने लगा। वह कभी चिप्स तो कभी खिलौनों के लिए जिद करता। गीता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह उसे ५ रुपये की चीज भी दिला सके। वह उसे प्यार से समझाती, लेकिन बच्चा तो आखिर बच्चा ही है। जब गोलू बहुत ज्यादा रोने लगा, तो गीता ने उसे अपनी गोद में सुला लिया और वात्सल्य भाव से उसे शांत करने की कोशिश करने लगी।
वहीँ पास में खड़ा एक व्यक्ति, जिसका नाम ‘मनोज’ था, यह सब बड़ी गौर से देख रहा था। मनोज दिल्ली में काम करता था और अपने घर वापस जा रहा था। उसने देखा कि कैसे एक माँ अपने बच्चे की छोटी सी इच्छा पूरी न कर पाने के कारण अंदर ही अंदर टूट रही है।
मनोज ने सीधे मदद करने के बजाय एक तरकीब सोची। उसने चिप्स का एक बड़ा पैकेट खरीदा और गोलू से कुछ दूरी पर बैठकर उसे खाने लगा। गोलू की नज़र उस पर पड़ी। मनोज ने उसे पास आने का इशारा किया। गोलू झिझकते हुए पास गया और मनोज ने उसे बड़े प्यार से चिप्स खिलाए।
जब गीता ने यह देखा, तो उसने गोलू को डाँटा, “बाबू, वापस आ जाओ, किसी अजनबी से कुछ नहीं लेते।” लेकिन मनोज मुस्कुराया और बोला, “बहन जी, बच्चा है, खाने दीजिए। इसमें कोई बुराई नहीं है।”
मनोज ने देखा कि बच्चा बहुत भूखा है। वह पास के स्टॉल पर गया और फ्रूटी, बिस्कुट और चॉकलेट जैसे करीब १००-२०० रुपये का सामान खरीदकर एक थैली में भरकर गोलू को दे दिया।
अध्याय 3: सफर का आगाज़ और बढ़ती आत्मीयता
गीता को संकोच हो रहा था। उसने मनोज से कहा, “भाई साहब, आपने इतना खर्च क्यों किया? हम गरीब लोग हैं, इतना बोझ नहीं उठा सकते।” मनोज ने सहज भाव से उत्तर दिया, “बच्चे भगवान का रूप होते हैं। और वैसे भी, मुझे भी दिल्ली ही जाना है। मेरा नाम मनोज है।”
मनोज को पता चला कि गीता के पास जनरल टिकट है और वह किसी भी तरह ट्रेन में चढ़ने की कोशिश कर रही है। मनोज का टिकट ‘वैशाली एक्सप्रेस’ के थर्ड एसी (B5 कोच) में कन्फर्म था। उसने मानवता दिखाते हुए गीता से कहा, “आप मेरे साथ चलिए। मेरे पास कन्फर्म सीट है, आप और बच्चा आराम से बैठ सकेंगे।”
जब गीता पहली बार एसी कोच के अंदर दाखिल हुई, तो उसे ठंडक महसूस हुई। वह चकित थी क्योंकि उसने एसी के बारे में सुना तो था, पर कभी उसमें बैठी नहीं थी। कोच के अन्य यात्री उन्हें देख रहे थे। गीता के माथे पर सिंदूर न होने और उसकी वेशभूषा से लोग समझ गए थे कि वह विधवा है।
रात के समय टीटी (TTE) आया। गीता का जनरल टिकट देखकर वह भड़क गया। मनोज ने हस्तक्षेप किया और कहा, “साहब, ये मेरे साथ हैं। जो भी जुर्माना है, मैं भर देता हूँ।” मनोज ने बिना हिचकिचाए १५०० रुपये का जुर्माना भरा। गीता का गला भर आया, “भैया, मेरी वजह से आपके इतने पैसे खर्च हो गए।”
अध्याय 4: दुखों का साझा और अतीत की यादें
ट्रेन की बर्थ पर बैठे-बैठे दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। मनोज ने पूछा, “गीता जी, आप दिल्ली में किसके पास जा रही हैं?” गीता ने अपनी आपबीती सुनाई, “मेरे पति नोएडा की एक कंपनी में ८ साल से काम करते थे। उनकी सैलरी से हर महीने कुछ पैसे कटते थे। वे कहते थे कि जब काम छोड़ेंगे, तो एक बड़ी रकम मिलेगी। लेकिन एक साल पहले, शराब की लत के कारण उनका एक्सीडेंट हो गया और वे हमें छोड़कर चले गए।”
गीता ने आगे बताया कि कंपनी वाले अब उसका फोन नहीं उठा रहे हैं। उसे करीब ६०-७० हजार रुपये मिलने की उम्मीद थी, जिससे वह अपने बेटे के नाम कुछ जमा करना चाहती थी या कोई छोटी दुकान खोलना चाहती थी।
रात गहरी हो गई थी। बर्थ पर गोलू सो रहा था। मनोज ने गीता से कहा कि वह भी सो जाए। गीता ने देखा कि मनोज पूरी रात बैठकर बिता रहा है। उसने आग्रह किया, “आप भी यहाँ लेट जाइए, बच्चे के पास जगह है।”
उस रात, एक ही बर्थ पर तीन जिंदगियां सिमटी हुई थीं। गीता ने सोते हुए मनोज के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अनजाने में उसके पैरों को स्पर्श किया, जैसे वह उस फरिश्ते को धन्यवाद दे रही हो जिसने उसे इस भीड़भरे सफर में सम्मान दिया।
अध्याय 5: दिल्ली की कड़वी सच्चाई
सुबह दिल्ली पहुँचने पर मनोज गीता को लेकर नोएडा की उस कंपनी में गया। वहाँ जाकर जो सच्चाई सामने आई, उसने गीता के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। कंपनी के अकाउंट मैनेजर ने बताया, “आपके पति ने नॉमिनी में अपने पिताजी (ससुर) का नाम लिखवाया था। इसलिए ये पैसे आपको नहीं, बल्कि आपके ससुर को ही मिलेंगे।”
गीता टूट गई। उसके ससुर और ससुराल वालों ने उसे पहले ही बेघर कर दिया था। मनोज ने गीता के ससुर को फोन लगाया और पूरी स्थिति बताई। लेकिन ससुर का जवाब दिल दहला देने वाला था— “मेरा बेटा मर गया, तो मेरा बहू से कोई वास्ता नहीं। पैसे मैं खुद लूँगा, और तुम उन दोनों को जहाँ मर्जी छोड़ दो। मेरे घर में उनके लिए कोई जगह नहीं है।”
गीता फूट-फूटकर रोने लगी। “मैं अब कहाँ जाऊँ? मेरे पास वापस जाने के भी पैसे नहीं हैं।” मनोज ने उसे ढांढस बंधाया, “जब तक मैं हूँ, तुम्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। तुम मेरे घर चलोगी।”
अध्याय 6: नया बसेरा और समाज का चेहरा
मनोज गीता और गोलू को अपने जनकपुरी स्थित दो मंजिला छोटे से घर ले आया। वहाँ गीता ने घर की साफ-सफाई की जिम्मेदारी संभाली। मनोज अपनी ड्यूटी पर जाता और गीता उसके लिए टिफिन बनाती। धीरे-धीरे गोलू और मनोज के बीच एक पिता-पुत्र जैसा रिश्ता बनने लगा।
इसी दौरान, उस कंपनी के मैनेजर का गीता के पास फोन आया। उसने मदद के बहाने गीता पर बुरी नज़र डालनी चाही। उसने कहा, “तुम इतनी खूबसूरत हो, मेरे पास आ जाओ, मैं तुम्हें बहुत पैसे दूँगा।” मनोज ने जब यह सुना, तो उसने फोन छीनकर उस व्यक्ति को कड़ी फटकार लगाई। गीता को अहसास हुआ कि इस मतलबी दुनिया में मनोज जैसा निस्वार्थ व्यक्ति मिलना नामुमकिन है।
अध्याय 7: प्रेम का अंकुरण और स्वीकारोक्ति
एक महीना बीत गया। एक रात गीता ने मनोज से पूछा, “आप मुझे घर कब भेजेंगे? मैं कब तक आप पर बोझ बनी रहूँगी?” मनोज ने उदास होकर पूछा, “क्या तुम्हारा मन नहीं लग रहा?” गीता की आँखों में आँसू आ गए। उसने कांपती आवाज़ में कहा, “सच तो यह है कि अब आपके बिना जीना नामुमकिन सा लगता है। पर मैं एक विधवा हूँ, मैं आपके लायक नहीं हूँ।”
मनोज ने गीता का हाथ थाम लिया। “मैंने तुम्हें पहले ही दिन से पसंद किया था, गीता। मुझे तुम्हारे अतीत से कोई फर्क नहीं पड़ता।”
अगले दिन, मनोज अपने माता-पिता को दिल्ली बुलाता है। उसके माता-पिता मनोज की भलाई और गीता की मासूमियत देखकर इस रिश्ते के लिए राजी हो जाते हैं। मई २०२४ के एक शुभ दिन, मनोज ने एक मंदिर में भगवान को साक्षी मानकर गीता की मांग में सिंदूर भरा।
उपसंहार
आज गीता और मनोज एक सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। गोलू को एक पिता का प्यार मिल गया है और गीता को एक सुरक्षित आंचल। यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसानियत और संवेदना आज भी जिंदा है। जहाँ स्वार्थी लोग रिश्तों को पैसों में तौलते हैं, वहीं मनोज जैसे लोग निस्वार्थ प्रेम से नई दुनिया बसाते हैं।
विशेष टिप्पणी: यह कहानी एक वास्तविक अनुभव पर आधारित है जो मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना करती है।
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