घमंडी अरबपति ने गूँगे बूट पॉलिश वाले को थप्पड़ मारा… सोचा नहीं था कि वही उसकी जान बचाएगा!

दौलत और इंसानियत: बलदेव सिंघानिया और सोनू की कहानी

भूमिका

कहते हैं कि इंसान का असली चरित्र तब सामने आता है जब उसके पास बेहिसाब दौलत आ जाए। कुछ लोग दौलत पाकर विनम्र हो जाते हैं, तो कुछ खुदा बन बैठते हैं। शहर के सबसे बड़े बिजनेस टाइकून बलदेव सिंघानिया दूसरी श्रेणी के लोगों में से थे। उनके लिए दुनिया की हर चीज बिकाऊ थी, और हर गरीब इंसान उनके जूतों की धूल के बराबर। 55 साल की उम्र में उन्होंने सब कुछ पा लिया था—नाम, शोहरत, बेशुमार पैसा। लेकिन जो चीज उन्होंने खो दी थी, वह थी इंसानियत।

शहर का दोपहर और एक मुलाकात

सूरज की तपती दोपहर थी। शहर का सबसे व्यस्त चौराहा गाड़ियों के शोर और धुएं से भरा हुआ था। तभी एक चमचमाती काली Mercedes वहां रुकी। गाड़ी का दरवाजा खुला और बलदेव सिंघानिया अपने महंगे इटालियन जूतों के साथ नीचे उतरे। उनकी आंखों पर काला चश्मा था और चेहरे पर एक अजीब सा घमंड। उन्हें पास ही एक बड़ी बिजनेस मीटिंग के लिए जाना था।

सड़क के किनारे एक पुराना सा पेड़ था, जिसके नीचे 15 साल का एक दुबला पतला लड़का अपनी पॉलिश की पेटी लिए बैठा था। उसका नाम सोनू था। वह बोल नहीं सकता था, जन्म से ही गूंगा था। उसकी दुनिया खामोश थी, लेकिन उसकी आंखों में गजब की चमक और मेहनत की ईमानदारी थी। जैसे ही उसने बलदेव साहब के महंगे जूते देखे, उसे लगा कि आज शायद अच्छी कमाई हो जाएगी। वह अपनी छोटी सी पेटी लेकर उनकी ओर लपका।

सोनू ने इशारे से पूछा, “साहब, पॉलिश कर दूं?”
बलदेव फोन पर किसी पर चिल्ला रहे थे। उन्होंने उपेक्षा से पैर आगे बढ़ा दिया। सोनू ने अपनी मैली कुचैली शर्ट से पसीना पोंछा और पूरी शिद्दत से जूते चमकाने लगा। लेकिन तभी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। सड़क से गुजरते एक तेज रफ्तार रिक्शे ने सोनू को हल्का सा धक्का मार दिया। सोनू का संतुलन बिगड़ा और उसके हाथ में लगी काली पॉलिश का ब्रश बलदेव के क्रीम कलर के पैंट पर लग गया।

एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। बलदेव ने अपनी पैंट पर वह काला दाग देखा और उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने आपे खोते हुए एक जोरदार तमाचा सोनू के गाल पर जड़ दिया।
चटक।

उस तमाचे की गूंज शोरगुल भरे बाजार में भी सुनाई दी। सोनू का छोटा सा शरीर लड़खड़ा कर फुटपाथ पर जा गिरा। उसके होंठ कांपने लगे लेकिन जुबान से कोई आवाज नहीं निकली। बस आंखों से बेबसी के आंसू बह निकले।

“अंधा है क्या? दो कौड़ी के भिखारी! मेरी लाखों की डील और यह पैंट सब खराब कर दिया। तेरी जिंदगी से ज्यादा कीमत है मेरे जूतों की। समझ आया तुझे?”
सोनू ने घबराकर अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। वह जमीन पर घिसटता हुआ माफी मांगने की कोशिश कर रहा था। अपने गले से अजीब सी आवाजें निकाल रहा था, यह समझाने के लिए कि यह गलती से हुआ। लेकिन बलदेव का दिल पत्थर का था। उन्होंने घृणा से सोनू की पॉलिश की पेटी को एक जोरदार लात मारी। ब्रश, डिब्बियां और सोनू की दिन भर की कमाई सड़क पर बिखर गई।

“अगर दोबारा यहां दिखा तो पुलिस से कहकर जेल में डलवा दूंगा।”
बलदेव ने आखिरी धमकी दी और अपने रुमाल से पैंट झाड़ते हुए उस रोते हुए बच्चे को वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए।

तमाशबीन दुनिया और सोनू की बेबसी

भीड़ तमाशबीन बनी रही। किसी ने उस गूंगे बच्चे को उठाने की जहमत नहीं उठाई। सोनू ने कांपते हाथों से अपने बिखरे हुए सिक्के समेटे, अपनी पेटी उठाई और पेड़ के पीछे छिप कर रोने लगा। उसे नहीं पता था कि जिस आदमी ने उसे इतनी बेरहमी से मारा है, अगले ही पल नियति उसका हिसाब बराबर करने वाली थी।

बलदेव सिंघानिया अभी उस घटना से कुछ ही कदम दूर गए थे। उनका दिमाग अभी भी उस काले दाग और अपनी इज्जत के खराब होने के गुस्से में उलझा हुआ था। सूरज सिर पर था और गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा था। अचानक उनके सीने के बाईं ओर एक तेज सुई छुभने जैसा दर्द उठा। पहले उन्हें लगा कि यह शायद गुस्से की वजह से है। लेकिन अगले ही पल वह दर्द एक भयानक लहर बनकर उनके पूरे शरीर में फैल गया। उनकी सांसे उखड़ने लगी। माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं। वह अपनी टाई ढीली करने के लिए हाथ बढ़ाने ही वाले थे कि आंखों के सामने अंधेरा छा गया। दुनिया का सारा शोर मध्यम पड़ गया और वह लड़खड़ाते हुए बीच सड़क पर ही धड़ाम से गिर पड़े।

उनका महंगा चश्मा टूट कर सड़क पर बिखर गया और वह आलीशान सूट जिस पर लगे एक छोटे से दाग के लिए उन्होंने उस बच्चे को मारा था, अब पूरी तरह सड़क की धूल में सन गया था।

मौत का मुकाबला और सोनू की करुणा

सड़क पर अफरातफरी मच गई। लोग रुके, भीड़ जमा हो गई लेकिन कोई आगे नहीं बढ़ा। यह शहर का वह क्रूर सच था जहां तमाशबीन तो सैकड़ों होते हैं, लेकिन मददगार कोई नहीं। कोई अपने मोबाइल से वीडियो बनाने लगा तो कोई दूर से ही कह रहा था, “अरे शायद पी रखी है।”
किसी ने कहा, “पुलिस का चक्कर होगा भाई, दूर ही रहो।”

बलदेव जमीन पर पड़े तड़प रहे थे। उनका हाथ हवा में मदद के लिए उठता और फिर बेजान होकर गिर जाता। उनकी करोड़ों की दौलत, उनका रुतबा, उनके बॉडीगार्ड्स सब धरे के धरे रह गए थे। मौत उनके सिर पर मंडरा रही थी और उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था।

पेड़ के पीछे छिपा सोनू यह सब देख रहा था। उसके गाल पर अभी भी उस तमाचे की जलन बाकी थी। उसका मन डरा हुआ था। एक पल के लिए उसने सोचा कि यह वही आदमी है जिसने उसे मारा, उसे अपमानित किया। उसे भाग जाना चाहिए। लेकिन तभी उसने बलदेव को तड़पते हुए देखा। सोनू की मां ने उसे सिखाया था कि दुश्मन भी अगर मुसीबत में हो तो उसे छोड़ना नहीं चाहिए। सोनू की आंखों से डर गायब हो गया और करुणा ने जगह ले ली।

वह अपनी फटी हुई चप्पलों के साथ भीड़ को चीरता हुआ दौड़ पड़ा। भीड़ उसे आश्चर्य से देख रही थी। वही गूंगा लड़का जिसे कुछ देर पहले इस अमीर आदमी ने लात मारी थी, अब उसके पास घुटनों के बल बैठा था। सोनू ने अपनी पूरी ताकत लगाकर बलदेव को उठाने की कोशिश की, लेकिन बलदेव का भारी शरीर उससे हिल भी नहीं रहा था। सोनू ने इधर-उधर देखा, किसी से मदद की उम्मीद की, अपने गले से आंच-आंच की आवाजें निकाली। लेकिन लोग सिर्फ देख रहे थे। समझ गया कि कोई नहीं आएगा।

एक बच्चे की जिद और इंसानियत

उसने तुरंत निर्णय लिया। वह भागकर अपना सामान ढोने वाली पुरानी लकड़ी की चार पहियों वाली रेहड़ी ठेला खींच लाया। उस 15 साल के कमजोर बच्चे ने अपनी नसों का पूरा जोर लगा दिया। उसने जैसे-तैसे अपनी जान पर खेलकर बलदेव के भारी शरीर को उस लकड़ी के तख्ते पर लुढ़काया। उसके हाथ छिल गए, पैरों में मोच आ गई। लेकिन उसने हार नहीं मानी। जिस आदमी ने उसे जानवर समझा था, आज वही बच्चा उसके लिए भगवान बना हुआ था।

सोनू ने कांपते हाथों से रेहड़ी के हैंडल को पकड़ा और अस्पताल की तरफ दौड़ने लगा। नंगे पैर, तपती सड़क और उस पर एक मरते हुए आदमी का बोझ—सोनू की असली परीक्षा शुरू हो चुकी थी। सड़क आग उगल रही थी और सोनू के नंगे पैर उस तपती डामर पर जल रहे थे। वह लकड़ी की रेहड़ी, जिस पर आमतौर पर वह सामान ढोता था, आज एक जिंदगी का बोझ उठा रही थी।

रेहड़ी के पहिए पुराने थे, वे चर्र-चर्र की आवाज कर रहे थे, मानो सोनू के दर्द के साथ रो रहे हों। शहर का ट्रैफिक निर्दयी था। गाड़ियां हॉर्न बजा रही थीं, लोग उस पर चिल्ला रहे थे कि वह रास्ता रोक रहा है। लेकिन सोनू को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसका सिर्फ एक ही मकसद था—सामने दिख रही उस बड़ी इमारत तक पहुंचना जिस पर लाल रंग का प्लस का निशान बना था।

अस्पताल में संघर्ष

जैसे-तैसे हांफते हुए सोनू अस्पताल के गेट पर पहुंचा। वह बुरी तरह थक चुका था, टांगे कांप रही थीं। जैसे ही वह इमरजेंसी वार्ड की तरफ बढ़ा, वहां खड़े सुरक्षा गार्ड ने उसे रोक दिया।

“ए, कहां घुस रहा है रेहड़ी लेकर? यह अस्पताल है, कोई धर्मशाला नहीं। मरे हुए भिखारी को लेकर यहां क्यों आ गया?”
“सरकारी अस्पताल ले जाए इसे।”

सोनू ने घबराकर आ करते हुए एक इशारा किया कि यह आदमी मर रहा है। उसने बलदेव की तरफ उंगली दिखाई। लेकिन गार्ड को सिर्फ गंदे कपड़े और धूल से सना चेहरा दिख रहा था। वह यह पहचान ही नहीं पाया कि वह शहर का सबसे अमीर आदमी है। सोनू की आंखों में बेबसी उतर आई। समय निकलता जा रहा था, बलदेव की सांसे अब और धीमी हो रही थीं।

सोनू ने देखा कि एक डॉक्टर रिसेप्शन के पास से गुजर रहा है। उसने गार्ड को धक्का दिया और दौड़कर डॉक्टर के पैरों में गिर पड़ा। उसने अपनी जेब से एक पुरानी मैली सी प्लास्टिक की थैली निकाली। यह उसकी बरसों की कमाई थी—एक-एक दो के सिक्के और कुछ फटे हुए नोट। यही उसकी कुल जमा पूंजी थी जो उसने अपनी टूटी हुई छत को ठीक करवाने के लिए जोड़ी थी।

सोनू ने वह सारे पैसे डॉक्टर के सामने फर्श पर उलट दिए। सिक्के बिखर गए। उसने डॉक्टर के पैरों को कसकर पकड़ लिया और अपना सिर जमीन पर पटकने लगा। उसकी खामोश चीखें अस्पताल के उस ठंडे गलियारे में गूंज रही थीं। वह बोल नहीं सकता था, लेकिन उसकी आंखों से बहते आंसू चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे—
“मेरे पास बस यही है साहब, पर इनकी जान बचा लो। इन्होंने मुझे मारा था, पर मैं इन्हें मरते हुए नहीं देख सकता।”

डॉक्टर की इंसानियत और पहचान

डॉक्टर जिनका नाम डॉ. वर्मा था, एक पल के लिए सन्न रह गए। उन्होंने पहले उन बिखरे हुए सिक्कों को देखा, फिर उस बिलखते हुए गूंगे बच्चे को और अंत में स्ट्रेचर पर पड़े उस मरीज को। इंसानियत की ऐसी मिसाल उन्होंने अपने पूरे करियर में नहीं देखी थी। तभी उनकी नजर मरीज के हाथ में बंधी महंगी घड़ी पर पड़ी और वह चौंक गए।

“स्ट्रेचर लाओ जल्दी!”
डॉ. वर्मा ने चिल्लाया।
“यह कोई भिखारी नहीं है, यह तो बलदेव सिंघानिया है!”

अस्पताल में हड़कंप मच गया। जिस आदमी को गार्ड बाहर धकेल रहा था, अब उसे बचाने के लिए पूरा स्टाफ दौड़ पड़ा। सोनू वहीं कोने में खड़ा अपने फटे कपड़ों में कांपता हुआ नम आंखों से उस लोहे के दरवाजे को देख रहा था जिसके पीछे बलदेव को ले जाया गया था। उसके बिखरे हुए सिक्के फर्श पर वैसे ही पड़े थे, लेकिन उसने उन्हें उठाने की कोशिश नहीं की। उसने अपना सब कुछ दे दिया था।

ऑपरेशन थिएटर के बाहर सन्नाटा था, लेकिन अंदर मशीनों की बीप-बीप आवाज जिंदगी और मौत के बीच की जंग का ऐलान कर रही थी। घंटों चले ऑपरेशन के बाद आखिरकार डॉक्टरों ने राहत की सांस ली। बलदेव सिंघानिया की जान बचा ली गई थी। उन्हें वीआईपी वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया, जहां हर सुविधा मौजूद थी—नरम बिस्तर, एयर कंडीशनर और महंगी दवाइयां।

पुनर्जन्म और पछतावा

अस्पताल के ठंडे फर्श पर वार्ड के दरवाजे के ठीक बाहर सोनू अभी भी बैठा था—भूखा, प्यासा और थका हुआ। उसने अपने घुटनों में सिर छिपा रखा था। उसे ना तो इनाम की चाह थी और ना ही किसी तारीफ की। वह बस यह सुनिश्चित करना चाहता था कि वह गुस्सैल अंकल ठीक हो जाए।

अगली सुबह जब सूरज की किरणें खिड़की से अंदर आईं तो बलदेव की आंखें खुली। सीने में हल्का दर्द अभी भी था, लेकिन वह जिंदा थे। उनके पास डॉ. वर्मा खड़े थे जो चार्ट चेक कर रहे थे।

“मैं… मैं यहां कैसे आया?”
बलदेव ने लड़खड़ाती आवाज में पूछा।
“मेरी कार… मेरा ड्राइवर…”

डॉ. वर्मा ने चश्मा उतारते हुए गंभीरता से उनकी ओर देखा।
“मिस्टर सिंघानिया, ना तो आपकी Mercedes काम आई और ना ही आपका ड्राइवर। आपको एक मैसिव हार्ट अटैक आया था। अगर आप 10 मिनट और लेट होते तो दुनिया का कोई डॉक्टर आपको नहीं बचा पाता।”

बलदेव हैरान थे।
“तो मुझे यहां कौन लाया? मेरी कंपनी के लोग?”
डॉक्टर ने गहरी सांस ली और बेड के पास रखी एक छोटी सी ट्रे की ओर इशारा किया। उस ट्रे में मखमल के कपड़े के ऊपर ढेरों चिल्लर और फटे पुराने नोट रखे थे—सोनू की वह पोटली जो उसने डॉक्टर के चरणों में उड़ेल दी थी।

“यह क्या है?”
बलदेव ने भ्रमित होकर पूछा।

“यह उस इंसान की पूरी कायनात है जिसने आपको नई जिंदगी दी।”
डॉ. वर्मा ने कहा,
“बाहर एक लड़का बैठा है, गूंगा है, बोल नहीं सकता। वह आपको ठेले पर लाद कर यहां लाया था। जब हमने उसे रोका, तो उसने यह सारे पैसे—जो शायद उसकी जिंदगी भर की जमा पूंजी थी—हमारे पैरों में डाल दिया और रोते हुए भीख मांगी कि आपको बचा लें।”

बलदेव के दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। उन्हें दोपहर की वह घटना याद आ गई। वह तमाचा, वह गालियां, वह लात मारकर उसकी रोजीरोटी बिखेर देना।

“क्या… क्या वे वही लड़का है जो पॉलिश करता है?”
बलदेव का गला सूख गया।

“हां,” डॉक्टर ने पुष्टि की।
“वो कल दोपहर से बाहर जमीन पर बैठा है। उसने पानी की एक बूंद तक नहीं पी। वह सिर्फ आपके होश में आने का इंतजार कर रहा है।”

बलदेव का सालों पुराना अहंकार पल भर में चकनाचूर हो गया। जिस लड़के को उन्होंने दो कौड़ी का कहा था, आज उसी के चंद सिक्कों ने उनकी करोड़ों की दौलत को हरा दिया था। शर्मिंदगी का एक ऐसा सैलाब उनके अंदर उमड़ा कि उनकी आंखों के पोर भीग गए।

पहचान और मिलन

उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस हाथ को उन्होंने धिक्कारा था, वही हाथ उन्हें मौत के मुंह से खींच लाएगा। कांपते हुए हाथों से उन्होंने डॉक्टर का हाथ पकड़ा।

“डॉक्टर, मुझे उससे मिलना है। प्लीज उसे अंदर बुलाइए।”

डॉ. वर्मा ने इशारा किया और वार्ड बॉय बाहर गया। कुछ ही पलों में दरवाजा धीरे से खुला। सोनू वहां खड़ा था—सहमा हुआ, डरा हुआ। उसे लगा कि शायद अमीर अंकल उसे फिर से डांटेंगे या पुलिस को बुलाएंगे। वह दरवाजे की चौखट पर ही ठिटक गया। अपनी मैली शर्ट को मुट्ठी में भींचे।

बलदेव ने उस मासूम चेहरे को देखा, जिस पर अभी भी कल के थप्पड़ का हल्का निशान बाकी था। उनकी रूह कांप उठी। सोनू दरवाजे पर ऐसे खड़ा था जैसे किसी अदालत में मुजरिम खड़ा हो। उसकी आंखों में वही डर था जो कल दोपहर सड़क पर था। बलदेव की आंखें उस बच्चे के चेहरे पर टिकी थीं और हर पल के साथ उनके दिल का बोझ बढ़ता जा रहा था।

“पास आओ बेटा।”
बलदेव ने बेहद धीमी और टूटी हुई आवाज में कहा। उनकी आवाज में वह कल वाली कड़क और घमंड नहीं था, बल्कि एक अजीब सी नरमी और पछतावा था।

सोनू हिचकिचाया। उसने डॉक्टर की तरफ देखा। डॉ. वर्मा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और उसे आगे जाने का इशारा किया। सोनू दबे पांव धीरे-धीरे उस शानदार बिस्तर के पास पहुंचा। बलदेव ने कांपते हुए अपना हाथ बढ़ाया। सोनू डरते-डरते पीछे हट गया। उसे लगा शायद वे फिर से मारेंगे। यह देखकर बलदेव की आंखों से एक आंसू टपक कर तकिए पर गिर गया।

“डरो मत। मैं तुम्हें नहीं मारूंगा।”
बलदेव का गला भर आया।
“मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया। फिर भी तुमने… तुमने मुझे क्यों बचाया?”

सोनू कुछ बोल नहीं सकता था। उसने बस अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज का टुकड़ा निकाला और बलदेव के हाथ में थमा दिया। उस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—
“मां कहती थी, किसी को दर्द में देखो तो मदद करो। भगवान सब ठीक कर देगा।”

बलदेव उस पर्ची को पढ़ते ही सन्न रह गए। यह लिखावट, यह बात, यह संस्कार—उनके दिमाग में यादों का एक तूफान उमड़ पड़ा। 15 साल पहले की एक धुंधली तस्वीर उनकी आंखों के सामने तैर गई। उनकी पत्नी सरिता, जो हमेशा यही बात कहा करती थी।

अचानक बलदेव की नजर सोनू की दाहिनी कलाई पर पड़ी। वहां एक पुराना गहरा जले का निशान था। एक ऐसा निशान जिसे वह कभी भूल नहीं सकते थे। उनका दिल जोर से धड़कने लगा। सांसें अटक गईं। उन्होंने झपट कर सोनू का वह हाथ पकड़ लिया। सोनू घबरा गया।

“यह… यह निशान…”
बलदेव हकलाने लगे।
“यह तुम्हें कैसे मिला?”

सोनू ने इशारे से बताया कि वह बचपन से है। बलदेव का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।
“बेटा, क्या तुम्हारे पास कोई और निशानी है? कोई लॉकेट, कोई ताबीज?”

सोनू ने अपनी शर्ट के अंदर हाथ डाला और एक काला धागा बाहर निकाला। उसमें एक छोटा सा चांदी का ‘ॐ’ बना हुआ लॉकेट लटक रहा था, जिसका आधा हिस्सा टूटा हुआ था। बलदेव की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। लेकिन यह हार्ट अटैक नहीं था, यह सदमा था—खुशी और दर्द का मिलाजुला सदमा।

उन्होंने अपने गले से वैसा ही एक लॉकेट निकाला, जिसका दूसरा आधा हिस्सा उनके पास था। उन्होंने कांपते हाथों से दोनों टुकड़ों को मिलाया। वे एकदम फिट बैठ गए। कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ बलदेव की सिसकियों की आवाज आ रही थी।

“शिवा…”
बलदेव के मुंह से 15 साल पुराना वो नाम निकला।
“तुम मेरे शिवा हो… मेरा बेटा!”

15 साल पहले एक भयानक मेले में उनका 3 साल का बेटा खो गया था। उसी दिन घर में एक दिए से उसका हाथ जल गया था। बलदेव ने उसे बहुत ढूंढा था, लेकिन वह नहीं मिला। पत्नी सरिता उस गम में चल बसी थी और बलदेव पत्थर दिल इंसान बन गए थे। उन्होंने मान लिया था कि उनका बेटा मर चुका है। लेकिन नियति ने उसे ठीक उनके सामने लाकर खड़ा कर दिया था—एक गूंगे बेसहारा पॉलिश वाले के रूप में।

पुनर्मिलन और बदलाव

सोनू, जो अब शिवा था, कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह बस उस आदमी को रोते हुए देख रहा था जो उसे गले लगाने के लिए तड़प रहा था।
“माफ कर दे मुझे, मेरे बच्चे।”
बलदेव फूट-फूट कर रो पड़े। उन्होंने सोनू को कसकर अपनी छाती से लगा लिया। सारे ट्यूब्स और तार खींच गए, लेकिन उन्हें परवाह नहीं थी।
“जिस बाप को तेरा हाथ पकड़ना चाहिए था, उसने उसी हाथ पर थप्पड़ मारा। मैं बहुत बदनसीब हूं, शिवा। बहुत बदनसीब हूं।”

डॉक्टर और नर्सें जो दरवाजे पर खड़े थे, अपनी आंखें पोंछ रहे थे। बाप-बेटे का यह मिलन दौलत और गरीबी, नफरत और प्यार की सारी दीवारों को ढा चुका था। सोनू को भले ही जुबान नहीं मिली थी, लेकिन आज उसे उसका खोया हुआ पिता और एक पहचान मिल गई थी।

अस्पताल के उस कमरे में बाप-बेटे का मिलन एक ऐसा दृश्य था जिसे देखकर पत्थर दिल इंसान भी पिघल जाए। बलदेव ने शिवा सोनू को अपनी बाहों में ऐसे जकड़ रखा था जैसे कोई खजाना मिल गया हो। जिस बेटे को उन्होंने 15 साल पहले खो दिया था और जिसे कल ही उन्होंने अपनी ठोकर से अपमानित किया था, आज वही उनकी गोद में सिर रखकर सुबक रहा था। नियति ने अपना चक्र पूरा कर लिया था। पाप का प्रायश्चित भी हुआ और खोया हुआ प्रेम भी वापस मिला।

दौलत से बड़ा दिल

अगले कुछ दिनों में यह खबर पूरे शहर में जंगल की आग की तरह फैल गई। अखबारों की हेडलाइंस बदल गईं—
“अरबपति बलदेव सिंघानिया का वारिस मिला, एक मूक मोची जिसने बचाई पिता की जान।”

जो लोग कल तक सोनू को हिकारत की नजर से देखते थे, आज वे ही अस्पताल के बाहर फूलों का गुलदस्ता लिए खड़े थे। लेकिन बलदेव के लिए अब दुनिया की वाहवाही का कोई मतलब नहीं था। उनकी दुनिया अब सिर्फ उनके बेटे में सिमट गई थी।

अस्पताल से छुट्टी मिलने का दिन आया। अस्पताल के गेट पर एक नई चमचमाती Mercedes खड़ी थी। बलदेव ने शिवा को दुनिया के सबसे महंगे और आरामदायक कपड़े पहनाए थे। साफ-सुथरे कपड़ों और बालों में तेल लगाए शिवा बिल्कुल किसी राजकुमार जैसा लग रहा था। लेकिन उसकी आंखों में वही पुरानी सादगी और विनम्रता थी।

जैसे ही वे बाहर निकले, गार्ड और ड्राइवर ने झुककर सलाम किया। बलदेव ने गर्व से अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा और कार की ओर बढ़े।

लेकिन अचानक शिवा रुक गया। उसने कार में बैठने से मना कर दिया। बलदेव हैरान हुए।
“क्या हुआ बेटा? बैठो, हम घर जा रहे हैं।”

शिवा ने सिर हिलाया और अपनी उंगली पार्किंग के एक कोने की ओर उठाई। वहां कूड़ेदान के पास उसकी वह पुरानी टूटी हुई लकड़ी की रेहड़ी-ठेला लावारिस पड़ी थी। वही रेहड़ी जिस पर उसने पसीना बहाकर अपने पिता को मौत के मुंह से निकाला था। अस्पताल के कर्मचारियों ने उसे कबाड़ समझकर वहां फेंक दिया था।

शिवा दौड़कर उस रेहड़ी के पास गया और उसे प्यार से सहलाने लगा। उसकी आंखों में एक मूक संदेश था—
“यह कबाड़ नहीं, मेरा साथी है। इसने मेरा तब साथ दिया जब मेरे पास कुछ नहीं था।”

बलदेव की आंखों से रहीस धुंध भी छट गई। उन्हें अपनी Mercedes अचानक बहुत छोटी और वह टूटी हुई रेहड़ी बहुत महान लगने लगी। वह समझ गए कि उनका बेटा दौलत से नहीं बल्कि संस्कारों से अमीर है।

बलदेव अपने बेटे के पास गए। उन्होंने अपने ड्राइवर को बुलाया और एक ऐसा आदेश दिया जिसे सुनकर वहां मौजूद हर शख्स दंग रह गया।

“इस रेहड़ी को Mercedes की छत पर बांधो।”
बलदेव ने भारी आवाज में कहा और बड़े सम्मान के साथ—
“क्योंकि आज अगर मैं जिंदा हूं तो इस लकड़ी की गाड़ी की वजह से, ना कि मेरी करोड़ों की कार की वजह से।”

नया जीवन, नई सोच

जब वह काफिला शहर से गुजरा तो लोगों ने एक अजीब नजारा देखा। एक करोड़ों की कार, जिसकी छत पर एक पुराना मैला कुचैला ठेला बंधा था। यह बलदेव के अहंकार की अंतिम विदाई थी।

घर पहुंचकर आलीशान महल जैसे बंगले में शिवा ने कदम रखा। नौकरों की फौज उसकी सेवा में लग गई। लेकिन बलदेव देख रहे थे कि शिवा उन मखमली गद्दों और सोने की प्लेटों के बीच खुश नहीं था। वह खिड़की से बाहर उन गरीब बच्चों को देख रहा था जो सड़क पर भीख मांग रहे थे। वही बच्चे जिनके साथ वह कल तक सोता था।

उस रात बलदेव अपने बेटे के पास बैठे।
“शिवा, तुम्हें यहां अच्छा नहीं लग रहा?”
उन्होंने प्यार से पूछा।

शिवा ने अपने पिता का हाथ थाम लिया और इशारों में समझाया—
“पिताजी, यह महल बहुत बड़ा है लेकिन दिल बहुत छोटा लगता है। बाहर मेरे दोस्त भूखे हैं। क्या यह सारा पैसा सिर्फ हमारे लिए है?”

उस मूक प्रश्न ने बलदेव की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने अपना बेटा तो पा लिया है, लेकिन अभी भी उस बेटे के लायक बनना बाकी है।

“नहीं बेटा,” बलदेव ने आंसू पोंछते हुए मुस्कुरा कर कहा,
“यह पैसा अब सिर्फ हमारा नहीं है। तुमने मुझे एक नई जिंदगी दी है। अब हम मिलकर दूसरों को जिंदगी देंगे। कल से एक नई शुरुआत होगी।”

समाज सेवा और इंसानियत की जीत

समय का पहिया घूमा और बलदेव सिंघानिया की जिंदगी का मकसद पूरी तरह बदल गया। जिस शहर में कभी उनकी पहचान एक क्रूर और घमंडी बिजनेसमैन के रूप में होती थी, अब वही शहर उन्हें दानवीर पिता के नाम से जानने लगा था।

बलदेव ने अपनी कंपनी का एक बड़ा हिस्सा समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने उस अस्पताल को करोड़ों का दान दिया, जहां उनकी जान बची थी। और शहर के हर गरीब बच्चे के लिए मुफ्त शिक्षा और इलाज की व्यवस्था की।

लेकिन सबसे दिल को छू लेने वाला नजारा हर रविवार को देखने को मिलता था। हर रविवार की सुबह शहर के उसी व्यस्त चौराहे पर जहां कभी वह घटना घटी थी, एक अनोखी सवारी आती थी। कोई महंगी गाड़ी नहीं, बल्कि वही पुरानी लकड़ी की चरमराहट करती हुई रेहड़ी। उस रेहड़ी को अब सजा दिया गया था। उस पर बड़े-बड़े पतीलों में गरमागरम खाना, कंबल और दवाइयां लदी होती थीं। और उस रेहड़ी को धक्का लगाने वाला कोई नौकर नहीं, बल्कि खुद अरबपति बलदेव सिंघानिया और उनका बेटा शिवा होते थे।

बलदेव, जिन्होंने कभी अपनी Mercedes से उतर कर जमीन पर पैर रखना भी अपनी शान के खिलाफ समझा था, आज साधारण सूती कुर्ते-पायजामे में नंगे पांव गरीबों के बीच खड़े होकर अपने हाथों से खाना परोसते थे।

“लीजिए अम्मा, यह आपके लिए है।”
बलदेव ने एक बूढ़ी भिखारी महिला को भोजन का पैकेट देते हुए कहा और उसके सामने झुककर प्रणाम किया। उनकी आंखों में अब घमंड की जगह सिर्फ करुणा और सेवा भाव था। शिवा अपने पिता के बगल में खड़ा सबको पानी पिला रहा था। उसकी जुबान खामोश थी, लेकिन उसका चेहरा किसी सूरज की तरह चमक रहा था। उसने अपने पिता को वह इंसान बना दिया था, जो शायद वे कभी नहीं बन पाते।

एक दिन एक पत्रकार ने बलदेव से पूछा,
“सर, आप तो अरबपति हैं। आप यह काम नौकरों से भी करवा सकते हैं। फिर आप खुद इस टूटी हुई रेहड़ी को क्यों खींचते हैं?”

बलदेव ने मुस्कुराते हुए शिवा के कंधे पर हाथ रखा और उस पुरानी रेहड़ी की ओर देखा। उनकी आंखों में नमी उतर आई।
“बेटा,” बलदेव ने भारी आवाज में कहा,
“मेरी Mercedes मुझे सिर्फ ऑफिस तक ले जा सकती थी, लेकिन यह लकड़ी की रेहड़ी मुझे इंसानियत तक ले आई है। जब मैं इस पर अपना पसीना बहाता हूं, तो मुझे अपने उस पाप का प्रायश्चित महसूस होता है जो मैंने किया था। यह रेहड़ी मेरी दौलत नहीं, मेरी गुरु है। इसने मुझे सिखाया कि असली अमीर वह नहीं जिसकी तिजोरी भरी हो, बल्कि वह है जिसका दिल भरा हो।”

अंतिम संदेश

सूरज ढल रहा था। सुनहरी रोशनी में बाप और बेटे की जोड़ी उस खाली होती रेहड़ी को वापस घर की ओर ले जा रही थी। दोनों के चेहरों पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान थी जो दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं खरीदी जा सकती थी।

नियति ने साबित कर दिया था कि कर्म का फल जरूर मिलता है। एक थप्पड़ ने रिश्तों को तोड़ा था, लेकिन एक निस्वार्थ सेवा ने उन रिश्तों को अमर बना दिया। बलदेव और शिवा की कहानी ने दुनिया को एक ही सबक दिया—
दौलत झुक सकती है, लेकिन इंसानियत हमेशा सिर उठाकर चलती है।