जब कुत्ते की तरह भौंकने लगा लड़का! मिर्ज़ापुर का सबसे डरावना मामला। Real story

अदृश्य जानलेवा वायरस: एक बेबस पिता का पछतावा

क्या आपने कभी सोचा है कि एक छोटी सी लापरवाही या गरीबी की मजबूरी कैसे एक हंसते-खेलते परिवार को ऐसे न/र्क में धकेल सकती है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता? क्या हो अगर कोई अपना, जिसे आपने बड़े लाड-प्यार से पाला हो, अचानक किसी अनजान बी/मारी का शिकार होकर अपनी इंसानी फितरत ही भूलने लगे और एक खौफनाक रूप ले ले?

आज की कहानी कोई आम कहानी नहीं है। यह मिर्जापुर के जोगीपुरवा गाँव की एक ऐसी खौफनाक और दिल दहला देने वाली दास्तान है जिसने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। यह मामला अंधविश्वास, बेबसी और एक अदृश्य जानलेवा वा/यरस का है, जिसे देखकर हर किसी की रूह कांप उठती है।

जोगीपुरवा का वह चिराग: करण

यह दास्तान शुरू होती है साल 2025 की सर्दियों में। मिर्जापुर जिले के कछवा थाना क्षेत्र के अंतर्गत बसा है एक छोटा सा गाँव—जोगीपुरवा। यहाँ के लोग बहुत ही सादा और संघर्षपूर्ण जीवन बिताते हैं। इसी गाँव में भाईलाल नाम का एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ रहता है। भाईलाल शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है।

भाईलाल की दुनिया उनके बेटे करण के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। करण घर का चिराग था और अपने बेबस पिता की आँखों का तारा। भाईलाल अपनी सारी शारीरिक और आर्थिक तकलीफें भूल जाते थे जब वे करण को अपने सामने देखते थे। उन्होंने इस उम्मीद को पाला था कि करण एक दिन उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा।

वह मनहूस दिन: ननिहाल की घटना

करीब 4 महीने पहले करण अपने ननिहाल गया था। ग्रामीण इलाकों में ननिहाल जाना किसी उत्सव से कम नहीं होता। लेकिन नियति कुछ और ही खेल रच रही थी। ननिहाल में ही एक दिन अचानक एक आवारा कु/त्ते ने करण पर हमला कर दिया और उसे बुरी तरह का/ट लिया।

गाँव-देहात में अक्सर लोग कु/त्ते के का/टने को बहुत सामान्य घटना मान लेते हैं। शुरुआती दौर में करण के परिवार वालों ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। फिर भी, किसी के समझाने पर वे इलाज के लिए आगे आए। ननिहाल के पास एक प्राइवेट अस्पताल में करण को रेबी/ज से बचाव का पहला इंजे/क्शन लगवाया गया। इसके बाद गाँव लौटने पर कछवा के सरकारी अस्पताल (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) में उसे दूसरा इंजे/क्शन लगा।

गरीबी की मार और अधूरा इलाज

यहीं से कहानी एक त्रासद मोड़ लेती है। भाईलाल की माली हालत इतनी खराब थी कि दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी मुश्किल था। अस्पताल के बार-बार चक्कर काटना और काम छोड़ना उनके लिए बड़ी चुनौती थी। मेडिकल साइंस कहता है कि कु/त्ते के का/टने पर एंटी-रेबी/ज वै/क्सीन का पूरा कोर्स (सभी डोज) करना अनिवार्य है।

लेकिन जानकारी की कमी और पैसों की तंगी के कारण परिवार ने सोचा कि दो सुई तो लग ही गई हैं, अब खतरा टल गया होगा। बाकी के इंजे/क्शन नहीं लगवाए गए। वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में वापस लौट आए।

वा/यरस का खामोश सफर

समय बीतता गया—एक महीना, दो महीने, तीन महीने। मार्च 2026 का समय आ गया। इन 4 महीनों में करण बिल्कुल सामान्य लग रहा था। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि उसके शरीर के अंदर एक खतरनाक वा/यरस चुपचाप अपनी जगह बना चुका है। वह धीरे-धीरे उसकी नसों के रास्ते उसके दिमाग की तरफ बढ़ रहा था—एक भयानक तूफान से पहले की शांति की तरह।

अचानक एक दिन करण को चक्कर आने लगे। परिवार ने सोचा कमजोरी होगी, लेकिन जल्द ही उसके व्यवहार में अजीब बदलाव आने लगे। उसकी आवाज बदलने लगी। जब वह बोलता, तो ऐसा लगता जैसे किसी जानवर की आवाज हो।

अंधविश्वास और झाड़-फूंक का सहारा

ग्रामीण परिवेश में जब ऐसे लक्षण दिखते हैं, तो लोग अक्सर इसे ‘ऊपरी चक्कर’ या ‘साया’ मान लेते हैं। भाईलाल को लगा कि किसी ने जादू-टोना कर दिया है। वे उसे अस्पताल ले जाने के बजाय जमुना चौराहे पर स्थित हनुमान मंदिर ले गए। वहाँ झाड़-फूंक कराई गई, मन्नतें मांगी गईं। लेकिन स्थिति सुधरने के बजाय और भी भयानक होती चली गई।

वा/यरस ने करण के दिमाग को पूरी तरह कब्जे में ले लिया था। वह अब कु/त्तों की तरह हरकतें करने लगा था। वह अजीब तरह से बैठता और उसके मुँह से भौं/कने जैसी आवाजें आने लगीं। गाँव में दहशत फैल गई। एक दिव्यांग पिता अपनी आँखों के सामने अपने बेटे को तिल-तिल कर तड़/पते देख रहा था और वह कुछ नहीं कर सकता था।

अस्पताल का कड़वा सच

जब झाड़-फूंक से कोई असर नहीं हुआ, तब गाँव वालों की मदद से उसे कछवा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने देखते ही पहचान लिया कि यह रेबी/ज का खौफनाक रूप है। उसे तुरंत वाराणसी के ‘माँ विंध्यवासिनी स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय’ रेफर कर दिया गया।

वाराणसी मेडिकल कॉलेज के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर सचिन किशोर और उनकी टीम ने जाँच की। डॉक्टर ने स्पष्ट किया कि कोर्स बीच में छोड़ने की वजह से वा/यरस नर्वस सिस्टम में फैल गया है। चिकित्सा विज्ञान में रेबी/ज एक ऐसी बी/मारी है जिसके लक्षण (Symptomatic) एक बार सामने आ जाएं, तो मरीज को बचाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

एक बेबस पिता का रुदन

अस्पताल में करण को न्यूरोलॉजी विभाग की निगरानी में रखा गया। अब डॉक्टरों का मकसद उसे बचाना नहीं, बल्कि उसके अंतिम समय की पीड़ा को कम करना था (Palliative Care)। इस दर्दनाक स्थिति के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे, जिसमें भाईलाल अपने तड़/पते बेटे को सँभालते नजर आ रहे हैं। उनके कांपते होठों से बस यही निकलता है—”कुकुर का/ट लिया था 4 महीने पहले… सुई लगवाए थे लेकिन बाकी नहीं…” यह वाक्य अब उस पिता का सबसे बड़ा उम्रभर का पछतावा बन चुका है।

समाज के लिए एक चेतावनी

करण की यह कहानी सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। आज भी देश के कई हिस्सों में लोग कु/त्ते, बिल्ली या बंदर के का/टने को हल्के में लेते हैं। लेकिन यह कहानी चीख-चीख कर कह रही है कि ऐसी लापरवाही की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है।

जरूरी जानकारी जो जान बचा सकती है:

    तुरंत सफाई: अगर कोई जानवर काटे, तो घाव को तुरंत बहते पानी और साबुन से कम से कम 15 मिनट तक धोएं।
    पूरा कोर्स: डॉक्टर द्वारा बताए गए एंटी-रेबी/ज वै/क्सीन के सभी इंजे/क्शन समय पर लगवाएं। कोर्स कभी अधूरा न छोड़ें।
    गंभीर घाव: अगर घाव गहरा है, तो वै/क्सीन के साथ ‘इम्यूनोग्लोबुलिन’ लगवाना भी अत्यंत आवश्यक है।
    अंधविश्वास से दूरी: रेबी/ज का कोई इलाज झाड़-फूंक या घरेलू नुस्खों में नहीं है। केवल चिकित्सा विज्ञान ही बचाव का रास्ता है।

जिंदगी बहुत अनमोल है। इसे अज्ञानता की भेंट न चढ़ने दें। करण के लिए अब दुआओं का ही सहारा है, लेकिन उसकी दास्तान हमें भविष्य के लिए सजग कर गई है।

सवाल आपसे: क्या आपके इलाके में भी आवारा जानवरों की समस्या है? क्या लोग वहाँ ऐसे मामलों में तुरंत अस्पताल जाते हैं या अभी भी झाड़-फूंक पर निर्भर हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं, ताकि आपकी दी गई जानकारी किसी की जान बचा सके।