जिसे भिखारी समझा, उसी ने जीता 1 करोड़ का दंगल! | सब के होश उड़ गए 😱|

हौसलों की अखाड़ा: एक बेटी का संकल्प

अखाड़े की मिट्टी जब माथे पर लगती है, तो वह केवल धूल नहीं होती, वह एक जिम्मेदारी होती है। राजस्थान के एक छोटे से गांव में आज का सूरज कुछ अलग ही गर्मी लेकर आया था। यह गर्मी मौसम की नहीं, बल्कि उस अखाड़े की थी जहाँ आज एक ऐतिहासिक मुकाबला होने वाला था।

अखाड़े की चुनौती

“है कोई माई का लाल इस अखाड़े में जो शेरनी को हरा सके? अगर किसी ने हरा दिया तो उसको 1 करोड़ का इनाम मिलेगा!”

अनाउंसर की यह आवाज लाउडस्पीकर से गूंजती हुई गांव की हर गली, हर नुक्कड़ तक पहुंच रही थी। अखाड़े के बीचों-बीच खड़ी थी—’शेरनी’। 6 फीट का कद, लोहे जैसा शरीर और आंखों में ऐसा अहंकार जैसे उसने अखाड़े को अपनी जागीर समझ लिया हो। शेरनी ने पिछले पांच सालों में किसी भी पहलवान को टिकने नहीं दिया था। उसके लिए कुश्ती केवल एक खेल नहीं, अपना दबदबा बनाए रखने का ज़रिया था।

शीतल: एक खामोश तूफान

गांव के किनारे एक जर्जर झोपड़ी में 17 साल की शीतल रहती थी। शीतल का जीवन अखाड़े की तालियों से बहुत दूर था। वह सुबह चार बजे उठती, दूसरों के घरों में बर्तन मांजती, कपड़े धोती और जो चंद रुपये मिलते, उनसे अपने बीमार पिता की दवाइयां लाती।

शीतल के पिता, जो कभी खुद एक अच्छे पहलवान रह चुके थे, अब बिस्तर पर पड़े अपनी आखिरी सांसों से लड़ रहे थे। उनकी फेफड़ों की बीमारी इतनी बढ़ गई थी कि डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। “इलाज में 50 लाख से ज्यादा का खर्च आएगा,” डॉक्टर की यह बात शीतल के कानों में किसी बम की तरह फटी थी।

शीतल के पास क्या था? बस अपनी मां की यादें। उसकी मां, ‘ज्वाला’, अपने समय की मशहूर पहलवान थी। लेकिन एक धोखे भरे मुकाबले में सिर पर लगी चोट ने उनसे उनकी जान छीन ली थी। पिता तब से टूट गए थे।

जब शीतल ने 1 करोड़ के इनाम की बात सुनी, तो उसके कानों में बर्तनों की खनखनाहट बंद हो गई। उसके सामने बस उसके पिता का चेहरा था, जो हर सांस के लिए संघर्ष कर रहे थे।

अखाड़े में प्रवेश

“मैं लडूंगी इस शेरनी से!”

जब शीतल अखाड़े के बीच पहुंची, तो पूरी भीड़ ठहाकों से गूंज उठी। शेरनी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और उपहास उड़ाते हुए कहा, “ए लड़की! घर जा और चूल्हा फूंक। यहाँ हड्डियां टूटती हैं, सपने नहीं।”

शीतल ने कुछ नहीं कहा। उसने झुककर अखाड़े की मिट्टी उठाई, उसे चूमा और अपने माथे पर लगा लिया। उसकी आंखों में वह चमक थी जो केवल मौत से लड़ने वाले के पास होती है।

संघर्ष की शुरुआत

सीटी बजी और मुकाबला शुरू हुआ। शेरनी किसी जंगली जानवर की तरह शीतल पर झपटी। उसने शीतल को उठाकर मिट्टी पर पटक दिया। शीतल की पीठ जब ज़मीन से टकराई, तो एक पल के लिए उसे अपनी मां की चीख सुनाई दी। उसकी सांसें रुक गईं।

“खत्म! खेल खत्म!” भीड़ चिल्लाई।

लेकिन शीतल उठी। वह धीरे-धीरे खड़ी हुई। शेरनी फिर झपटी, लेकिन इस बार शीतल ने ताकत का मुकाबला ताकत से नहीं किया। उसने अपनी मां की सिखाई हुई तकनीक का इस्तेमाल किया—’दुश्मन की ताकत को उसी के खिलाफ मोड़ना’।

जैसे ही शेरनी ने उसे जकड़ने की कोशिश की, शीतल मछली की तरह फिसल गई। शेरनी का संतुलन बिगड़ा और वह पहली बार लड़खड़ाई।

तकनीक बनाम ताकत

मुकाबला अब खूनी हो चला था। शेरनी को गुस्सा आ गया था। उसने शीतल के बालों को पकड़कर घसीटा, उसे लातें मारीं, लेकिन शीतल हर बार गिरकर फिर खड़ी हो जाती। अखाड़ा मिट्टी और पसीने से सन चुका था। शीतल का शरीर नीला पड़ गया था, लेकिन उसका हौसला पत्थर जैसा था।

“जब सांस टूटने लगे, तो समझना कि जीत करीब है,” शीतल को अपनी मां की आखिरी बात याद आई।

शेरनी थकने लगी थी। उसका भारी शरीर अब उसके लिए बोझ बन रहा था। शीतल ने देखा कि शेरनी की बाईं टांग थोड़ी ढीली पड़ रही है। उसने अपनी पूरी जान एक जगह इकट्ठा की और शेरनी के घुटने के पीछे अपनी टांग फंसा दी।

ऐतिहासिक जीत

एक जोरदार धमाके के साथ शेरनी पीठ के बल ज़मीन पर गिरी। पूरा अखाड़ा सन्न रह गया। शीतल ने तुरंत शेरनी की गर्दन और हाथों को ‘लॉक’ कर दिया। शेरनी ने बहुत छटपटाने की कोशिश की, उसने शीतल के हाथों पर दांत भी गड़ाए, लेकिन शीतल ने पकड़ ढीली नहीं की।

अनाउंसर ने गिनती शुरू की: “एक… दो… तीन!”

“शीतल जीत गई! शीतल ने शेरनी को धूल चटा दी!”

इनाम और नया जीवन

भीड़ मैदान में दौड़ पड़ी। लोग शीतल को अपने कंधों पर उठाना चाहते थे, लेकिन शीतल सीधे इनाम के बैग की तरफ बढ़ी। उसने 1 करोड़ का चेक और बैग लिया और बिना किसी से बात किए सीधे अस्पताल की तरफ दौड़ लगा दी।

अस्पताल पहुंचकर उसने डॉक्टरों के सामने पैसे रख दिए। “मेरे पिता को बचा लीजिए, अब आपके पास कोई बहाना नहीं है।”

ऑपरेशन सफल रहा। जब उसके पिता को होश आया, तो उनकी आंखों में अपनी बेटी के लिए गर्व के आंसू थे। उन्होंने शीतल का हाथ चूमते हुए कहा, “तूने आज अपनी मां का नाम रोशन कर दिया, बेटी।”

उपसंहार

शीतल ने उस पैसे से न केवल अपने पिता का इलाज कराया, बल्कि गांव में लड़कियों के लिए ‘ज्वाला कुश्ती अकादमी’ खोली। वह अब भी अखाड़े में उतरती है, लेकिन इनाम के लिए नहीं, बल्कि उन लड़कियों को यह सिखाने के लिए कि “अखाड़े में जीत केवल शरीर की नहीं, बल्कि उस जिद की होती है जो हार मानने से इनकार कर दे।”

बालेश्वर के अखाड़े में आज भी शीतल और शेरनी के उस मुकाबले के किस्से सुनाए जाते हैं। वह कहानी, जिसने साबित कर दिया कि एक बेटी का संकल्प पहाड़ों को भी झुका सकता है।

शिक्षा: परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हो, यदि उद्देश्य पवित्र हो और हौसला अटूट, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।