जिसे लोग पागल समझकर मार रहे थे… उसी को आर्मी चीफ ने सैल्यूट क्यों किया?😱

शमशेर: एक अनसुनी दास्तां
अध्याय 1: रामगढ़ का ‘बावरा’
मई की दोपहर थी। राजस्थान के रामगढ़ कस्बे में सूरज अपनी पूरी तपिश के साथ आग उगल रहा था। आसमान से बरसती आग ने सड़कों को भट्टी बना दिया था। पुराने बस स्टैंड पर धूल का गुबार और पसीने की गंध हवा में घुली हुई थी। बसों के पुराने हॉर्न, फेरीवालों की चीख-पुकार और यात्रियों की गहमागहमी के बीच, वाटर टैंक के पास एक कोना ऐसा था जिसे लोग ‘गंदगी का ढेर’ समझते थे।
वहीं बैठा था वह आदमी। कस्बे के लोग उसे ‘बावरा’ कहते थे। उसकी उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था। चेहरे पर धूल से अटी हुई लंबी दाढ़ी, सिर पर जटाओं जैसे उलझे बाल और शरीर पर खाकी रंग के फटे-पुराने चिथड़े। उसके नंगे पैरों की बिवाइयां फट चुकी थीं और उनमें बस स्टैंड की गंदी मिट्टी भर गई थी। वह अक्सर अपनी ही दुनिया में खोया रहता था। कभी वह हवा में हाथ हिलाकर किसी को आदेश देता, तो कभी एकदम सावधान (Attention) की मुद्रा में घंटों खड़ा रहता।
बस स्टैंड के ठीक सामने सेठ दीनदयाल की कचौड़ी की दुकान थी। दीनदयाल अपने व्यापार और अपने गुस्से, दोनों के लिए मशहूर था। वह अपनी दुकान की साख को लेकर इतना सजग था कि उसे अपनी दुकान के सामने किसी गरीब या भिखारी का खड़ा होना भी बर्दाश्त नहीं था।
“ओ पागल! यहां से उठ और हट जा। साहब की गाड़ी आने वाली है। जमीन पर बैठकर पूरा स्टैंड गंदा कर रखा है तूने,” दीनदयाल चिल्लाया।
पागल ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी सूनी आंखें दीनदयाल की कढाई में छन रही कचौड़ियों को देख रही थीं। भूख ने उसके पेट में मरोड़ पैदा कर दी थी। तभी एक आवारा कुत्ता उस पागल के पास पड़े एक जूठे दोने को चाटने लगा। पागल ने धीरे से कुत्ते को हटाया और उस दोने में चिपका हुआ एक छोटा सा टुकड़ा उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।
यह देख दीनदयाल का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। “अरे ओ मनहूस! मेरी दुकान के सामने ही मरेगा क्या? ग्राहक खराब कर रहा है मेरे।” उसने पास रखा गर्म पानी का एक मग उठाया और बिना सोचे-समझे उस पागल के पैरों पर फेंक दिया।
“भाग यहां से! वरना अगली बार खौलता हुआ तेल डाल दूंगा!”
गर्म पानी की छींटें पड़ते ही वह पागल बिलबिलाया नहीं, न ही वह रोया। उसने बस अपनी जलती हुई, गहरी आंखों से सेठ को देखा। उसकी आंखों में उस वक्त पागलपन नहीं, बल्कि एक अजीब सी गरिमा थी। उसने अपने कांपते हुए हाथ जोड़े और धीमी लेकिन भारी आवाज में कहा, “जय हिंद नागरिक… कष्ट के लिए क्षमा। हम… हम यहां सुरक्षा कर रहे हैं।”
आसपास खड़े लोग हंसने लगे। एक लड़के ने मजाक उड़ाते हुए पत्थर का टुकड़ा उसकी पीठ पर दे मारा। पत्थर उसकी रीढ़ की हड्डी पर लगा, पर वह आदमी हिला तक नहीं। वह वैसे ही तनकर खड़ा रहा जैसे कोई संतरी सरहद पर खड़ा हो।
अध्याय 2: तिरंगे की आन
उसी समय पास में एक स्कूल बस रुकी। बच्चे शोर मचाते हुए उतर रहे थे। अचानक हवा का एक तेज झोंका आया और एक छोटे बच्चे के हाथ से कागज का बना एक छोटा सा तिरंगा छूट गया। वह तिरंगा उड़ता हुआ सीधे पास के गंदे नाले की तरफ जाने लगा।
दीनदयाल और बाकी लोग इस दृश्य को देख रहे थे, पर किसी के मन में उस कागज के टुकड़े के लिए कोई संवेदना नहीं थी। लेकिन वह ‘बावरा’ जैसे बिजली की गति से सक्रिय हो गया। जो आदमी अभी लंगड़ा कर चल रहा था, वह चीते की रफ्तार से दौड़ा। लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले ही उसने नाले के कीचड़ की परवाह किए बिना छलांग लगा दी।
उसका आधा शरीर कीचड़ में सन गया, लेकिन उसका एक हाथ हवा में था। उसने उस कागज के तिरंगे को कीचड़ को छूने से पहले ही लपक लिया था। उसने बड़ी कोमलता से उसे अपनी फटी शर्ट से पोंछा, उसे चूमा और अपने माथे से लगाया। फिर बहुत सावधानी से उसे अपनी ऊपरी जेब में रख लिया, जैसे वह कोई मामूली कागज नहीं बल्कि उसकी जान हो।
दीनदयाल ने फिर ताना मारा, “बड़ा आया देशभक्त! नौटंकी साला… ये ड्रामा कहीं और जाकर कर।”
अध्याय 3: वीआईपी मूवमेंट और खलबली
तभी अचानक पूरे कस्बे का माहौल बदलने लगा। पुलिस की गाड़ियों के सायरन गूंजने लगे। इंस्पेक्टर राणा अपनी टीम के साथ बस स्टैंड खाली कराने लगे। “हटो! रास्ता खाली करो! जनरल साहब का काफिला निकलने वाला है। कोई भी सड़क पर नहीं दिखना चाहिए!”
इंस्पेक्टर राणा की नजर उस कीचड़ से सने पागल पर पड़ी। “अरे! ये भिखारी अभी तक यहीं है? इसे हटाओ यहां से, वरना मेरी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।”
दो हवलदारों ने उसे घसीटना शुरू किया। लेकिन वह आदमी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। उसकी नजरें सड़क की तरफ थीं। उसने हवलदार का हाथ झटक दिया और कड़क आवाज में बोला, “गाड़ी आ रही है… कमांडर आ रहे हैं… रिपोर्टिंग करनी है!”
हवलदार ने गुस्से में आकर अपनी लाठी उसके घुटने पर दे मारी। वह आदमी घुटनों के बल गिर पड़ा, पर उसकी नजरें अब भी सामने धूल उड़ाते हुए काफिले पर टिकी थीं।
सामने से तीन सितारों वाली चमचमाती काली गाड़ी आ रही थी—लेफ्टिनेंट जनरल रणविजय सिंह की गाड़ी। जनरल रणविजय अपने अनुशासन और सख्त मिजाज के लिए पूरे सैन्य जगत में जाने जाते थे।
अध्याय 4: पहचान का वो पल
जैसे ही काफिला बस स्टैंड के करीब पहुंचा, वह पागल अचानक पुलिस की पकड़ से छूटकर सड़क के बीचों-बीच आ गया। ड्राइवर ने इमरजेंसी ब्रेक लगाए। कमांडो गाड़ियों से बाहर कूद पड़े, उनकी बंदूकें उस पागल की तरफ तन गईं।
इंस्पेक्टर राणा का चेहरा सफेद पड़ गया। “साहब, ये पागल है, मैं अभी इसे…”
लेकिन जनरल रणविजय सिंह गाड़ी से बाहर निकल आए थे। उनकी नजरें उस आदमी पर जमी थीं जो कीचड़ में सना हुआ था, पर जिसके खड़े होने का अंदाज (Posture) एक सधे हुए सैनिक जैसा था। उस पागल ने अपनी एड़ियां जोड़ीं, सीना चौड़ा किया और एक ऐसा ‘कड़क’ सैल्यूट मारा कि वहां मौजूद हर फौजी की सांसें थम गईं।
“जय हिंद सर! अल्फा वन रिपोर्टिंग फॉर ड्यूटी, सर!” उसकी आवाज में एक ऐसी गरज थी जो केवल युद्ध के मैदान में सुनी जाती थी।
‘अल्फा वन’—यह कोड सुनते ही जनरल रणविजय के हाथ से उनकी फाइल गिर गई। यह कोड तो 18 साल पहले खत्म हो चुके एक अत्यंत गुप्त मिशन का था। जनरल धीरे-धीरे उस आदमी की तरफ बढ़े। उन्होंने उसके मैले हाथ पर एक पुराना, धुंधला सा टैटू देखा—एक उड़ता हुआ बाज (The Soaring Eagle)।
जनरल की आंखों से आंसू छलक आए। उन्होंने कांपती आवाज में पूछा, “शमशेर? मेजर शमशेर… क्या यह तुम हो?”
उस आदमी की पथराई आंखों में एक चमक कौंधी। “टाइगर हिल… मिशन सक्सेसफुल सर… पर मेरे साथी… वे वापस नहीं आए सर…”
जनरल ने बिना अपनी वर्दी की परवाह किए, उस कीचड़ से सने आदमी को गले लगा लिया। पूरा बस स्टैंड सन्न रह गया। एक थ्री-स्टार जनरल एक भिखारी के गले लगकर बच्चों की तरह रो रहा था।
अध्याय 5: बलिदान की दास्तां
जनरल रणविजय ने मुड़कर उस भीड़ की तरफ देखा जो अभी तक पत्थर मार रही थी। उनका चेहरा गुस्से से लाल था। उन्होंने मेजर शमशेर की फटी शर्ट का एक हिस्सा हटाया। वहां गहरे जख्म थे—गोलियों के निशान और जलने के भयानक दाग।
“देख रहे हो ये निशान?” जनरल दहाड़े। “ये किसी बीमारी के नहीं हैं। ये उस दुश्मन के टॉर्चर सेल की निशानियां हैं, जहां इस आदमी को 18 साल तक कैद रखा गया। 18 साल!”
भीड़ में सन्नाटा छा गया। जनरल ने आगे बताया, “18 साल पहले ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ के दौरान मेजर शमशेर ने दुश्मन के उस बायो-लैब को तबाह किया था जो भारत पर जैविक हमला करने वाला था। उन्होंने करोड़ों भारतीयों की जान बचाई। हम समझे थे कि वे शहीद हो गए। पर दुश्मन ने उन्हें बंदी बना लिया। उन्हें इतनी यातनाएं दी गईं कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया, पर उन्होंने देश का एक भी राज नहीं उगला। दुश्मन ने जब देखा कि ये अब उनके किसी काम के नहीं, तो उन्हें अधमरी हालत में बॉर्डर पर छोड़ दिया।”
जनरल ने मेजर के हाथ से वो कागज का तिरंगा लिया जिसे उन्होंने अपनी जेब में सुरक्षित रखा था। “जिस तिरंगे का तुम लोग सम्मान करना भूल गए, उसे इस ‘पागल’ ने अपनी जान पर खेलकर नाले में गिरने से बचाया।”
अध्याय 6: प्रायश्चित और सम्मान
सेठ दीनदयाल के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया और रोने लगा। जिन लड़कों ने पत्थर मारे थे, वे शर्म से सिर झुकाए खड़े थे।
मेजर शमशेर को सम्मान के साथ जनरल की अपनी गाड़ी में बैठाया गया। जब काफिला वहां से रवाना हुआ, तो रामगढ़ का हर नागरिक—चाहे वो दुकानदार हो, पुलिसवाला हो या यात्री—सड़क के दोनों ओर एक कतार में खड़ा हो गया। बिना किसी आदेश के, हजारों हाथ एक साथ हवा में उठे और उस ‘गुमनाम नायक’ को सैल्यूट किया।
बाद में पता चला कि सेना के अस्पताल में इलाज के बाद मेजर शमशेर की याददाश्त धीरे-धीरे वापस आने लगी। उन्हें ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।
रामगढ़ के उस बस स्टैंड पर आज एक बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा है: “किसी के फटे कपड़ों को देखकर उसकी औकात का अंदाजा मत लगाना, हो सकता है कि उन चिथड़ों के नीचे इस देश का रक्षक धड़क रहा हो।”
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारी आजादी मुफ्त नहीं मिली है। इसकी कीमत उन गुमनाम नायकों ने चुकाई है, जिन्हें हम अक्सर पहचानना भी भूल जाते हैं।
जय हिंद।
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