जिस बच्चे को सब भिखारी समझ रहे थे, वही बना दंगल का हीरो | ओर जीत गया 10 करोड़ का इनाम।😱

रियांश की कहानी

प्रस्तावना

शहर के बीचों-बीच एक पुराना अखाड़ा था, जहां कभी पहलवानों की दहाड़ गूंजती थी। अब वहां सन्नाटा छाया रहता था, पर उसी अखाड़े की मिट्टी में एक सपना पल रहा था—एक ऐसे लड़के का सपना, जिसने गरीबी, दर्द और अपमान को अपनी ताकत बना लिया था। यह कहानी है रियांश की, जो कूड़ा बिनने वाला था, लेकिन उसकी रगों में शमशेर सिंह जैसे पहलवान का खून दौड़ता था।

भाग 1: टूटे सपनों की शुरुआत

सुबह के चार बजे थे। पूरा शहर गहरी नींद में था, लेकिन रियांश की आंखें खुली थीं। उसकी दुनिया में सुबह सूरज की किरणों से नहीं, जिम्मेदारियों के बोझ से होती थी। 16 साल का रियांश, जिसके कंधे अभी स्कूल के बस्ते के लिए बने थे, उन पर एक गंदा भारी बोरा लटक रहा था। वह शहर की उन गलियों से गुजर रहा था, जहां लोग अपनी नाक बंद कर लेते हैं। रियांश एक कूड़ा बिनने वाला था।

उसके कपड़े मैले थे, बाल उलझे हुए और पैरों में अलग-अलग रंग की घिसी हुई चप्पलें। लोग उसे देखते तो रास्ता बदल लेते। जैसे उसकी गरीबी कोई छूत की बीमारी हो। लेकिन उस गंदे चेहरे और फटे कपड़ों के नीचे एक शरीर था जो पत्थर जैसा सख्त था। उसकी कलाइयां किसी आम 16 साल के लड़के की नहीं थी। वे लोहे की छड़ों जैसी मजबूत थी।

रियांश कूड़े के ढेर में प्लास्टिक की बोतलें तलाश रहा था। लेकिन उसका दिमाग कहीं और था। उसे याद आ रहा था वो दौर जब उसका घर मेडल्स और ट्रॉफियों से भरा होता था। रियांश के पिता शमशेर सिंह उस समय के कुश्ती जगत के बेताज बादशाह थे। उनका नाम सुनते ही बड़े-बड़े पहलवान अखाड़ा छोड़ने की बात करते थे।

रियांश को याद था कैसे उसके पिता उसे अपने चौड़े कंधों पर बैठाकर मेले में ले जाते थे। लेकिन शमशेर सिंह की ताकत ही उनकी दुश्मन बन गई थी। शहर के एक भ्रष्ट और ईर्ष्यालु पहलवान ने एक बड़े मुकाबले में साजिश रची। कुश्ती के नियमों के खिलाफ जाकर धोखे से शमशेर की रीड की हड्डी पर ऐसा वार किया गया कि वह फिर कभी खड़े नहीं हो सके। उस चोट ने सिर्फ एक पहलवान को नहीं मारा बल्कि एक पूरे परिवार को मार दिया था।

इलाज में जमा पूंजी खत्म हो गई। घर बिक गया और अंततः लाचारी में शमशेर सिंह ने दम तोड़ दिया। उनकी मौत के बाद मां सुमित्रा को सदमे ने ऐसा तोड़ा कि वह बीमार रहने लगी। अस्थमा और टीबी जैसी बीमारियों ने उन्हें घेर लिया। अब रियांश के पास दो ही काम थे। दिन में कूड़ा बीनकर मां की दवा का इंतजाम करना और रात को अपने पिता के सपने को जीना।

भाग 2: अखाड़े की मिट्टी में जन्मा जुनून

सूरज ढलते ही रियांश शहर के बाहर बने एक पुराने खंडहर हो चुके अखाड़े में जाता। वहां कोई रोशनी नहीं थी। सिर्फ चांद की चांदनी टूटी हुई छत से छन कर आती थी। वह उस ठंडी मिट्टी को अपने माथे से लगाता जैसे कोई मंदिर में माथा टेकता हो। वहां उसका कोई कोच नहीं था। कोई साथी नहीं था। उसका साथी था उसका दर्द और उसकी परछाई।

वह भारी पत्थरों को उठाता, पुराने पेड़ों के तनों से टक्कर लेता और हवा में दांव पेच लगाता। जब वह मिट्टी पर गिरता और उसे चोट लगती तो वह रोता नहीं था। उसे अपने पिता की आवाज हवाओं में सुनाई देती थी। “उठ रियांश, दर्द कमजोरी को शरीर से बाहर निकालता है। जब तक तू टूटा नहीं, तब तक तू हारा नहीं।”

एक दिन जब रियांश घर लौटा तो उसने देखा कि उसकी मां की हालत बहुत खराब थी। वह खून की उल्टियां कर रही थी। मां रियांश दौड़ा और उन्हें संभाला। “बेटा, पानी…” मां ने कांपते हुए कहा। रियांश ने उन्हें पानी पिलाया। लेकिन वह जानता था कि पानी से काम नहीं चलेगा। डॉक्टर ने कहा था कि अगर जल्द ही बड़ा ऑपरेशन नहीं हुआ तो वह नहीं बचेंगी। ऑपरेशन का खर्चा लाखों में था और रियांश की जेब में आज की कमाई के सिर्फ ₹40 थे।

वह हताश होकर घर के बाहर चबूतरे पर बैठ गया। उसकी आंखों से आंसू बहकर उसके गंदे गालों पर लकीरें बना रहे थे। तभी पास से गुजर रहे कुछ लोगों की बातें उसके कानों में पड़ी। “सुना तुमने? 10 करोड़। बाप रे! लेकिन जीतेगा कौन? सुना है शेरा आ रहा है। शेरा वही झल्लाद, तब तो भूल जाओ। उसके सामने जो खड़ा होता है, वह अस्पताल में ही आंख खोलता है। कोई पागल ही होगा जो उससे लड़ेगा।”

रियांश के कान खड़े हो गए। 10 करोड़। यह रकम उसकी मां की जान बचा सकती थी। यह रकम उनके माथे से गरीबी का कलंक मिटा सकती थी। यह रकम उसे वापस उसका खोया हुआ सम्मान दिला सकती थी। लेकिन शेरा… रियांश ने भी उसका नाम सुना था। शेरा इंसान नहीं, वैशी था। 6.5 फीट का कद, 120 किलो वजन और पत्थर जैसा शरीर। उसे हराना नामुमकिन माना जाता था।

रियांश ने अपनी पतली बाहों को देखा। क्या वह शेरा से लड़ पाएगा? तभी घर के अंदर से मां की खांसी की भयानक आवाज आई। वह आवाज रियांश के दिल पर हथौड़े की तरह लगी। उसने अपनी मुट्ठियां भींच ली। उसकी आंखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक आग धक रही थी। डरने का वक्त खत्म हो गया है। उसने खुद से कहा, “अगर पिताजी होते, तो क्या वह पीछे हटते? नहीं, मैं शमशेर सिंह का बेटा हूं। मेरे रगों में खून नहीं, अखाड़े की मिट्टी दौड़ती है।”

भाग 3: चुनौती का दिन

अगले दिन शहर का स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था। हजारों की भीड़ शोर मचा रही थी। अमीरों की गाड़ियां चमक रही थी। ढोल-नगाड़े बज रहे थे। इस चकाचौंध के बीच एक लड़का जिसके कपड़े फटे हुए थे और जिसके कंधे पर एक मैला सा थैला था, भीड़ को चीरता हुआ गेट की तरफ बढ़ रहा था।

सिक्योरिटी गार्ड ने उसे रोका। “ए कूड़े वाले, इधर कहां जा रहा है? यह जगह तेरे लिए नहीं है। भाग यहां से।” रियांश ने अपनी नजरें ऊपर उठाई। उसकी आंखों में एक ऐसी चमक थी कि गार्ड एक पल के लिए सहम गया। “मुझे अंदर जाना है,” रियांश ने धीमी लेकिन भारी आवाज में कहा। “मुझे लड़ना है।”

गार्ड जोर से हंसा। “लड़ना है किससे? भूख से? जा बेटा कहीं और जा।” तभी अंदर से अनाउंसर की आवाज गूंजी—”देवियों और सज्जनों, स्वागत कीजिए अखाड़े के बादशाह अजय योद्धा शेरा का।” भीड़ का शोर आसमान छूने लगा। रियांश गार्ड की तरफ देखे बिना बैरिकेड के नीचे से निकलकर अंदर की तरफ दौड़ पड़ा।

स्टेडियम के बीचों-बीच धूल उड़ रही थी और शेरा दहाड़ रहा था। रियांश वहां खड़ा था जहां उसकी किस्मत का फैसला होने वाला था। उस मिट्टी के बीचों-बीच शेरा खड़ा था। एक विशालकाय पर्वत जैसा। उसकी बाहें बरगद के पेड़ की जड़ों जैसी मोटी थी और छाती इतनी चौड़ी कि जैसे सामने कोई दीवार खड़ी हो।

उसने अभी-अभी एक नामी पहलवान को हवा में ऐसे उछाला था जैसे कोई बच्चा खिलौने को फेंकता है। वह पहलवान बेहोश होकर गिरा और स्ट्रेचर पर बाहर ले जाया गया। अनाउंसर का माइक कांप रहा था। “क्या कोई और है? क्या कोई माई का लाल है जो शेरा को चुनौती दे सके? इनाम ₹1 करोड़ है!”

पूरे स्टेडियम में सन्नाटा छा गया। बड़े-बड़े पहलवान जो दूसरे शहरों से आए थे, उन्होंने अपनी नजरें झुका ली। शेरा की क्रूरता देखकर सबकी रूह कांप गई थी। शेरा ने अखाड़े के बीच में खड़े होकर अपनी जांघ पर ताल ठोकी और जोर से हंसा। “अरे क्या सारे मर्द मर गए इस शहर में? है कोई जो मेरे सामने खड़ा हो सके, या मैं यह इनाम बिना लड़े ही ले जाऊं?”

सन्नाटा इतना गहरा था कि सुई गिरने की भी आवाज सुनाई दे। तभी भीड़ के एक कोने से एक पतली और दृढ़ आवाज आई। “मैं लडूंगा।” सबकी नजरें उस आवाज की तरफ घूमी। वहां वीआईपी स्टैंड या पहलवानों के खेमे से नहीं बल्कि आम जनता की भीड़ को चीरते हुए रियांश आगे आ रहा था। उसके कपड़े फटे हुए थे। चेहरे पर धूल और कालिख लगी थी और पैरों में वहीं टूटी चप्पलें थी।

भीड़ एक पल के लिए हैरान रह गई और फिर पूरा स्टेडियम हंसी के ठहाकों से गूंज उठा। “अरे देखो, कूड़ा बिनने वाला आया है कुश्ती लड़ने। ए लड़के, यह अखाड़ा है, कबाड़ खाना नहीं। जा अपनी बोतलें बीन।” लोग उस पर पॉपकॉर्न और खाली बोतलें फेंकने लगे। अपमान के तीर रियांश के शरीर को भेद रहे थे। लेकिन उसका मन लोहे का बना था।

वह सीधा चलता गया और अखाड़े की रस्सी के पास जा पहुंचा। शेरा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा जैसे कोई शेर किसी मच्छर को देखता है। “तू…” शेरा ने हिकारत से पूछा, “तू मुझसे लड़ेगा? ए भिखारी, तुझे पता भी है कि यहां जान जाती है। यहां से भाग जा वरना एक घूसे में तेरी हड्डी का पाउडर बन जाएगा।”

रियांश ने झुककर मिट्टी को माथे से लगाया। बिल्कुल वैसे ही जैसे उसके पिता करते थे। वह शेरा के सामने खड़ा हुआ। शेरा उसके सामने किसी विशालकाय पहाड़ की तरह लग रहा था। “मैं भीख मांगने नहीं आया शेरा,” रियांश ने कहा, उसकी आवाज में कंपन नहीं बल्कि एक अजीब सी शांति थी। “मैं लड़ने आया हूं और यह इनाम मैं ही लेकर जाऊंगा।”

शेरा का अहंकार जैसे आहत हो गया। एक गंदा सा बच्चा उसे शहर के सबसे बड़े पहलवान को चुनौती दे रहा था। शेरा ने गुस्से में कहा, “ठीक है कीड़े, तुझे मरने का इतना ही शौक है तो तेरी इच्छा पूरी कर देता हूं।”

रेफरी ने भी रियांश को रोकने की कोशिश की। “बेटा, यह नियमों के खिलाफ है तुम्हारा वजन और उम्र।” तभी आयोजक सेठ धनराज ने माइक पर कहा, “रोको मत। अगर यह लड़का मरना चाहता है तो इसे मरने दो। जनता को तमाशा चाहिए।”

भाग 4: अखाड़े की जंग

मैच की घंटी बजी। शेरा ने रियांश को मौका भी नहीं दिया। जैसे ही घंटी बजी, वह रियांश पर झपटा। रियांश ने बचने की कोशिश की, लेकिन शेरा की रफ्तार उसके भारी शरीर के बावजूद बिजली जैसी थी। शेरा ने रियांश को पकड़ा और हवा में उठाकर जमीन पर दे मारा। धड़ाम! धूल का एक गुब्बार उठा। रियांश की पसलियों में जैसे बिजली दौड़ गई। दर्द इतना भयानक था कि उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया।

भीड़ चिल्लाई, “मार डालो, खत्म करो!” रियांश अभी उठने की कोशिश ही कर रहा था कि शेरा ने उसे फुटबॉल की तरह ठोकर मारी। रियांश लुढ़कता हुआ अखाड़े के किनारे जा गिरा। उसके मुंह से खून निकल आया। शेरा हंसते हुए बोला, “कहां था ना? एक घूंसे में दम तोड़ देगा। अब उठ और भाग जा, वरना अगली बार तू उठ नहीं पाएगा।”

रियांश हाफ रहा था। उसका शरीर चीख रहा था कि बस करो। लेकिन तभी उसे अपनी मां का चेहरा याद आया। वह अस्पताल का बिस्तर, वह खून की उल्टियां। उसे याद आया पिता का वह आखिरी दिन। उसने अपनी हथेली मिट्टी पर रगड़ी। “नहीं, मैं नहीं हार सकता।”

रियांश कांपते हुए पैरों पर फिर से खड़ा हो गया। भीड़ की हंसी थम गई। लोग हैरान थे कि इतनी जोर से गिरने के बाद वह खड़ा कैसे हुआ? शेरा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “तुझे दर्द नहीं होता क्या?”

रियांश ने अपने खून से सने होठों से मुस्कुराते हुए कहा, “शेरा, तूने मुझे सिर्फ मिट्टी पर पटका है। मैंने भूख सही है। मैंने बीमारी सही है। मैंने रोज लोगों की गालियां सही हैं। तेरे घूंसे उस दर्द के आगे कुछ भी नहीं हैं।”

रियांश ने शेरा की आंखों में आंखें डालकर एक शर्त रखी। “सुन शेरा, अगर तूने मुझे हरा दिया तो मैं वादा करता हूं कि आज के बाद कुश्ती का नाम नहीं लूंगा। लेकिन अगर मैं जीता, तो तुझे मानना होगा कि ताकत शरीर में नहीं, जिगर में होती है।”

शेरा दहाड़ते हुए फिर आगे बढ़ा। इस बार वह रियांश को खत्म करने के इरादे से आया था। उसने रियांश की गर्दन पकड़ ली और उसका गला दबाने लगा। रियांश के पैर हवा में झूलने लगे। उसका दम घुट रहा था। भीड़ खामोश हो गई। सबको लगा कि रियांश अब मर जाएगा।

लेकिन रियांश को अखाड़े में नहीं, जीवन ने लड़ना सिखाया था। जब शेरा उसे दबा रहा था, रियांश ने अपनी ताकत से मुकाबला नहीं किया। उसने तकनीक का सहारा लिया। उसने अपने पिता की सिखाई हुई बात याद की। “जब दुश्मन तुमसे बड़ा हो, तो उसकी ताकत को ही उसके खिलाफ इस्तेमाल करो।”

रियांश ने शेरा की कलाई पर एक विशेष नस को अपने अंगूठे से दबाया। दर्द के मारे शेरा की पकड़ ढीली हुई। उसी पल रियांश ने हवा में ही अपने शरीर को मोड़ा और शेरा की गर्दन के पीछे चढ़ गया। शेरा बौखला गया। वह रियांश को झटकने के लिए इधर-उधर भागने लगा। दीवारों से टकराने लगा। लेकिन रियांश किसी जिद्दी जोक की तरह उससे चिपका रहा।

अब रियांश का हर वार सटीक था। वह ताकत नहीं लगा रहा था। वह शेरा को थका रहा था। शेरा थकने लगा था। उसका भारी शरीर अब उसका दुश्मन बन रहा था। रियांश को वह मौका मिल गया जिसका उसे इंतजार था।

शेरा ने गुस्से में एक जोरदार पंच मारा। रियांश झुक गया और शेरा का हाथ खाली हवा में गया। शेरा का संतुलन बिगड़ा। यही वह पल था। रियांश की आंखों में उसके पिता शमशेर सिंह की परछाई दिखाई दी। उसने शेरा के पैर को एक खास दांव में फंसाया। यह वही पुरानी चाल थी जिसे नागपाश कहते थे, जो उसके पिता ने उसे अंधेरे अखाड़े में सिखाई थी।

शेरा लड़खड़ाया। एक विशाल पहाड़ हिल रहा था। भीड़ अपनी सीटों से खड़ी हो गई। क्या यह संभव है? रियांश ने अपनी बची खुची सारी ताकत बटोरी। ईश्वर और अपने पिता को याद किया और एक जोरदार हुंकार के साथ शेरा को खींच दिया।

अखाड़े में समय जैसे थम गया था। शेरा का संतुलन बिगड़ा हुआ था और रियांश ने पूरी ताकत से नागपाश दांव लगा रखा था। शेरा, जिसका वजन रियांश से तीन गुना ज्यादा था, गुरुत्वाकर्षण और रियांश की सटीक तकनीक के आगे बेबस हो गया। रियांश की नसों में खून खौल रहा था। यह सिर्फ एक दांव नहीं था। यह उसके पिछले 10 सालों का संघर्ष था।

उसने एक जोरदार झटके के साथ खुद को पीछे खींचा और शेरा के विशाल शरीर को हवा में लहरा दिया। धड़ाम! पूरा स्टेडियम हिल गया। आवाज ऐसी थी जैसे कोई इमारत गिर गई हो। शहर का सबसे बड़ा अजय पहलवान शेरा पीठ के बल जमीन पर पड़ा था।

रियांश ने बिना एक पल गंवाए शेरा को जकड़ लिया ताकि वह हिल ना सके। रेफरी नीचे झुका और हाथ जमीन पर मारने लगा। एक… शेरा ने उठने की कोशिश की। उसकी आंखें फटी हुई थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि वह जमीन पर है। दो… रियांश रो रहा था। दर्द से नहीं, बल्कि उस जुनून से जो उसके सीने में फट रहा था। उसने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। “यह मेरी मां के लिए है,” उसने चीख कर कहा। तीन! घंटी बजी। टन टन टन।

पूरे स्टेडियम में एक पल के लिए मौत जैसा सन्नाटा छा गया। किसी को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। वह कूड़ा बिनने वाला, वह भिखारी, वह फटे हाल लड़का जीत गया था। और फिर सन्नाटा शोर में बदल गया। ऐसा शोर जो शायद उस शहर ने पहले कभी नहीं सुना था। लोग अपनी सीटों पर कूद रहे थे, टोपियां हवा में उछाल रहे थे। जो लोग कुछ देर पहले उस पर हंस रहे थे, अब वही लोग उसकी जय जयकार कर रहे थे।

“रियांश! रियांश!” का शोर गूंजने लगा। रियांश धीरे से शेरा के ऊपर से हटा और वहीं मिट्टी पर लेट गया। उसकी छाती धौकने की तरह चल रही थी। उसने आसमान की तरफ देखा, जहां स्टेडियम की लाइट्स सितारों जैसी लग रही थी। उसे लगा जैसे उन लाइट्स के बीच उसके पिता मुस्कुरा रहे हैं।

शेरा अभी भी जमीन पर पड़ा हाफ रहा था। उसका अहंकार चखनाचूर हो चुका था। वह धीरे से उठा और रियांश की तरफ देखा। उसकी आंखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सा सम्मान था। शेरा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। रियांश ने उसे थाम लिया। शेरा ने रियांश का हाथ हवा में ऊपर उठाया और माइक लेकर चिल्लाया, “मैं हार गया। मैंने शरीर बनाया लेकिन इस लड़के ने रूह को लोहे का बनाया है। असली विजेता यह है।”

भाग 5: सम्मान की वापसी

तभी आयोजक और मीडिया वाले दौड़कर रियांश के पास आए। कैमरों की फ्लैश चमकने लगी। रिपोर्टर्स ने माइक उसके मुंह के पास लगा दिए। “बेटा, तुम कौन हो? तुमने यह नामुमकिन काम कैसे किया? कौन है तुम्हारा उस्ताद?”

रियांश ने अपनी आंसू भरी आंखें पोंछी। उसके शरीर पर लगी मिट्टी और खून अब मेडल की तरह चमक रहे थे। उसने माइक हाथ में लिया और कांपती हुई आवाज में कहा, “आप लोग पूछते हैं मैं कौन हूं? आप ही ने तो कहा था मैं एक कूड़ा बिनने वाला हूं। लेकिन सच यह है…” उसने एक लंबी सांस ली और भीड़ की तरफ देखा, “मैं उस शमशेर सिंह का बेटा हूं जिसे इसी शहर ने भुला दिया था। मैं उस पहलवान का खून हूं जिसने मुझे सिखाया कि कुश्ती ताकत से नहीं, नियत से लड़ी जाती है। मैंने यह लड़ाई किसी इनाम, शोहरत या मेडल के लिए नहीं लड़ी।”

उसकी आवाज भारी हो गई। “मेरे घर में मेरी मां मौत से लड़ रही है। मेरे पास उसके इलाज के पैसे नहीं थे। यह ₹1 करोड़ मेरे लिए दौलत नहीं। मेरी मां की सांसे हैं। मैं एक पहलवान का बेटा हूं और एक बीमार मां का सहारा। बस यही मेरी पहचान है।”

पूरे स्टेडियम में फिर से सन्नाटा छा गया। लेकिन इस बार यह सन्नाटा सम्मान का था। कई लोगों की आंखों में आंसू आ गए। सेठ धनराज ने आगे बढ़कर ₹1 करोड़ का चेक रियांश के हाथों में थमाया और उसके पैर छूने की कोशिश की। लेकिन रियांश ने उन्हें रोक दिया। रियांश ने वह चेक सीने से लगाया और वहां एक पल भी नहीं रुका। उसे मीडिया, इंटरव्यू या पार्टी से कोई मतलब नहीं था। वह सीधा अस्पताल की तरफ दौड़ा।

भाग 6: जीत का असली स्वाद

अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर डॉक्टर खड़े थे। रियांश हाफता हुआ वहां पहुंचा। उसका हुलिया देखकर डॉक्टर चौंक गए। “डॉक्टर साहब,” रियांश ने वह चेक उनके हाथ में रख दिया। “यह लीजिए पैसे, जितने चाहिए ले लीजिए। बस मेरी मां को बचा लीजिए।”

डॉक्टरों ने चेक देखा और हैरान रह गए। ऑन ऑपरेशन शुरू हुआ। घंटे बीतते गए। रियांश बाहर कॉरिडोर में जमीन पर बैठा रहा। उसकी आंखें बंद थी और वह बस प्रार्थना कर रहा था। काफी देर बाद डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर मुस्कान थी। “ऑपरेशन सफल रहा। रियांश, तुम्हारी मां खतरे से बाहर है।”

रियांश वहीं फूट-फूट कर रो पड़ा। यह जीत शेरा को हराने से भी बड़ी थी। कुछ दिनों बाद जब रियांश अपनी मां को व्हील चेयर पर लेकर अस्पताल से बाहर निकला तो उसने देखा कि बाहर हजारों की भीड़ खड़ी है। वही लोग जो उसे दुत्कारते थे, आज फूलों की माला लेकर खड़े थे।

मां ने हैरान होकर पूछा, “बेटा, यह सब क्या है?” रियांश ने मां के पैरों के पास बैठकर अपना सिर उनकी गोद में रख दिया और कहा, “मां, पिताजी का सपना पूरा हो गया। अब हमें कभी कूड़ा नहीं बिनना पड़ेगा। अब हम सम्मान से जिएंगे।”

मां ने अपने कांपते हाथों से रियांश के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “बेटा, तूने सिर्फ कुश्ती नहीं जीती। तूने जिंदगी जीत ली।” उस दिन शहर ने जाना कि मिट्टी में सना हुआ हर इंसान गंदा नहीं होता। कभी-कभी उसी मिट्टी में हीरे छिपे होते हैं।

उपसंहार

रियांश की कहानी पूरे शहर में फैल गई। अखाड़े की मिट्टी में पला वह लड़का अब हजारों बच्चों की प्रेरणा बन गया। उसकी मां अब स्वस्थ थी और रियांश ने अखाड़े को फिर से शुरू किया। उसने गरीब बच्चों को मुफ्त में कुश्ती सिखाना शुरू किया। उसका सपना था कि कोई और बच्चा कभी कूड़ा न बिने, बल्कि अपने सपनों की मिट्टी को हीरा बना सके।

शहर के लोग अब रियांश को सम्मान से देखते थे। उसकी मेहनत, जज्बा और प्यार ने सबको बदल दिया था। शेरा भी अब उसका दोस्त बन गया था और दोनों मिलकर बच्चों को ट्रेनिंग देने लगे।

रियांश की कहानी बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो मिट्टी में भी हीरे उग सकते हैं। समाज की नजरें बदल सकती हैं, बस एक जुनूनी दिल की जरूरत होती है।

समाप्त