जिस सड़क निर्माण पर पति मजदूरी कर रहा था उसको बनवाने का टेंडर तलाकशुदा पत्नी के पास था फिर जो हुआ…

धूल से शिखर तक: एक अधूरी मोहब्बत की पूरी कहानी

शहर से गाँव को जोड़ने वाली उस नई बन रही सड़क पर सुबह की पहली किरण के साथ ही धूल का गुबार छा जाता था। भारी-भरकम जेसीबी मशीनें पहाड़ों जैसी मिट्टी को चीर रही थीं, ट्रक गिट्टी गिराते हुए शोर कर रहे थे और चिलचिलाती धूप में मजदूर पसीने से तर-बतर होकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहे थे। इसी भीड़ के बीच एक नौजवान था जो चुपचाप अपना फावड़ा चला रहा था। उसका नाम था अनुराग।

फटे-पुराने कपड़े, धूल और पसीने से सना हुआ चेहरा, और हाथों में पड़े गहरे छाले—अनुराग की पहचान बस इतनी ही थी। लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी खामोशी थी, जैसे उसने अपनी तक़दीर के हर कड़वे फैसले को स्वीकार कर लिया हो। साइड पर कोई उसे डांट देता तो वह चुप रहता, कोई गाली देता तो बस एक फीकी मुस्कान दे देता। वह किसी से उलझता नहीं था, बस अपने काम में डूबा रहता। वहाँ काम करने वाले किसी भी शख्स को यह अंदाजा नहीं था कि धूल में सना यह लड़का कभी जिले का सबसे बड़ा हार्डवेयर व्यापारी था। ‘अग्रवाल हार्डवेयर’ का मालिक, जिसके यहाँ सरिया, सीमेंट और पाइप खरीदने के लिए बड़े-बड़े ठेकेदार लाइन लगाकर खड़े रहते थे। आज वही लड़का अपनी ही पुरानी पहचान की राख पर खड़ा मजदूरी कर रहा था।

तभी अचानक, उस धूल भरी साइट पर चार चमचमाती काली गाड़ियाँ आकर रुकीं। सूट-बूट पहने सुरक्षाकर्मी और अधिकारी नीचे उतरे। उन सबके बीच से एक महिला बाहर निकली। ऊँची हील्स, महंगे डिजाइनर कपड़े, आँखों पर बड़ा सा काला चश्मा और चाल में एक शाही अंदाज़। वह लावण्या थी। इस सड़क का करोड़ों का टेंडर उसी की कंपनी ‘लावण्या कंस्ट्रक्शन’ के नाम था। अब वह शहर की सबसे बड़ी बिल्डर बन चुकी थी।

जैसे ही लावण्या की नज़र मजदूरों की भीड़ पर गई, उसकी आँखें एक चेहरे पर ठहर गईं। वही चेहरा जिसे उसने कभी अपनी दुनिया माना था। अनुराग! लावण्या के कदम वहीं जम गए। उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं और सांसें जैसे गले में अटक गईं। उसके दिमाग में सवालों का बवंडर उठ खड़ा हुआ—”यह यहाँ क्या कर रहा है? यह तो बहुत अमीर था, फिर आज यह हालत क्यों?”

उधर अनुराग ने भी उसे देख लिया था। वही लावण्या, जो कभी फटे पुराने कपड़ों में उसके घर आई थी, जो अपने छोटे भाई-बहन की स्कूल की फीस के लिए रोया करती थी, आज करोड़ों की मालकिन बनकर उसके सामने खड़ी थी। दोनों की आँखें मिलीं और एक पल में 7 साल लंबी पूरी जिंदगी किसी फिल्म की तरह उनकी आँखों के सामने घूम गई।

अतीत के पन्ने: 7 साल पहले

7 साल पहले शहर के बीचों-बीच ‘अग्रवाल हार्डवेयर’ की तूती बोलती थी। इसके मालिक थे महेश अग्रवाल, जो एक सख्त लेकिन बेहद ईमानदार इंसान थे। उनकी पत्नी सुमित्रा देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। उनका इकलौता बेटा अनुराग पढ़ा-लिखा और बहुत ही सरल स्वभाव का था। उसे दौलत का कभी घमंड नहीं रहा।

उसी दौरान, गाँव से एक बेहद साधारण परिवार की लड़की लावण्या शहर आई। उसके पिता गोविंद मजदूरी करते थे और माँ शांति दूसरों के घरों में काम करती थी। लेकिन लावण्या अपनी गरीबी के बावजूद संस्कारों और सुंदरता की मिसाल थी। एक दिन वह अपनी झोपड़ी की मरम्मत के लिए सीमेंट लेने अनुराग की दुकान पर आई। सिर पर दुपट्टा और हाथ में गिने-चुने पैसे—लावण्या की सादगी ने महेश अग्रवाल का दिल जीत लिया।

महेश जी ने घर जाकर सुमित्रा से कहा, “लड़का अब शादी के लायक है। आज एक ऐसी लड़की देखी जो संस्कारों में अमीरों से बड़ी है।” जल्द ही रिश्ता पक्का हो गया और अनुराग ने जब पहली बार लावण्या को देखा, तो उसे लगा जैसे उसकी बेरंग जिंदगी में रंगों की बौछार हो गई हो। धूमधाम से शादी हुई, लेकिन शादी के दिन ही अनुराग के छोटे भाई राहुल और बहन पूजा ने लावण्या के गरीब मायके वालों का बहुत अपमान किया। अनुराग ने सबको शांत कराया और लावण्या को वचन दिया कि वह उसे कभी कोई दुख नहीं होने देगा।

खुशियों का ग्रहण

शुरुआत में सब कुछ किसी सपने जैसा था। अनुराग लावण्या से बेहद प्यार करता था। वह सुबह की चाय खुद बनाता और रात को छत पर बैठकर लावण्या से कहता, “तुम मेरी खुशकिस्मती हो।” लेकिन घर के बाकी सदस्य लावण्या को पसंद नहीं करते थे। सास, ननद और देवर उसे हर बात पर ताने देते— “तुम्हारे मायके वाले क्या लाए? हमारे घर की रौनक छीन ली।” लावण्या सब कुछ सहती रही क्योंकि अनुराग उसके साथ था।

लेकिन वक्त ने करवट बदली। दुकान पर एक दिन श्रेया नाम की एक अमीर और आधुनिक लड़की आई। वह एक बड़ी कंपनी की मालकिन थी। उसने धीरे-धीरे अनुराग से दोस्ती बढ़ाई। पहले बिजनेस की बातें, फिर देर रात तक कॉल्स और चैट्स। अनुराग श्रेया के बुने हुए जाल में फंसता चला गया। लावण्या ने अनुराग में बदलाव महसूस किया—वह अब फोन छुपाने लगा था, घर देर से आता और बात-बात पर चिढ़ जाता।

एक दिन लावण्या ने अनुराग के फोन पर श्रेया का मैसेज देख लिया। जब उसने पूछा, तो अनुराग ने उस पर हाथ उठा दिया। लावण्या टूट गई। घर वालों ने भी अनुराग का ही साथ दिया और लावण्या को ‘मनहूस’ कहकर घर से निकाल दिया। वह रोती हुई, आधी रात को सड़क पर अकेली निकल गई और अपने पिता के घर गाँव लौट आई।

अनुराग का पतन और लावण्या का उदय

लावण्या के जाने के बाद अनुराग ने जल्दबाजी में श्रेया से शादी कर ली। लेकिन शादी के कुछ ही महीनों बाद श्रेया का असली चेहरा सामने आया। वह लालची थी और उसे अनुराग की दौलत से प्यार था। उसने अनुराग को नशे की लत लगा दी और धीरे-धीरे सारी प्रॉपर्टी अपने नाम करवा ली। झूठे मुकदमों और साजिशों के जाल में अनुराग ऐसा फंसा कि उसकी दुकान, गोदाम, बंगला—सब बिक गया। श्रेया उसे सड़क पर छोड़कर किसी और अमीर शख्स के साथ भाग गई। अनुराग के माता-पिता बीमार हो गए और वह दाने-दाने को मोहताज होकर मजदूरी करने लगा।

वहीं दूसरी ओर, लावण्या ने हार नहीं मानी। वह एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करने लगी। वहाँ के मालिक राजेंद्र वर्मा, जिनका कोई वारिस नहीं था, लावण्या की मेहनत और ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने लावण्या को अपनी बेटी माना और उसे बिजनेस की बारीकियां सिखाईं। सालों की कड़ी मेहनत के बाद, राजेंद्र वर्मा ने अपनी कंपनी लावण्या के नाम कर दी और लावण्या शहर की सबसे सफल बिजनेसवुमन बन गई।

वर्तमान: प्रायश्चित और पुनर्मिलन

साइट पर आज वही लावण्या और अनुराग आमने-सामने थे। लावण्या आगे बढ़ी और उसकी आँखों में आँसू थे। उसने धीरे से पूछा, “अनुराग… तुम? यह सब क्या है?” अनुराग फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने लावण्या के पैर पकड़ लिए और बोला, “लावण्या, मुझे माफ कर दो। मैंने हीरा छोड़कर पत्थर चुन लिया था। खुदा ने मुझे मेरे कर्मों की सजा दी है।”

लावण्या का दिल पसीज गया। उसने अनुराग को उठाया और कहा, “मैं तुम्हें माफ तो कर सकती हूँ, लेकिन दोबारा अपनी जिंदगी में वह जगह नहीं दे सकती। पर मैं तुम्हें इस तरह टूटते हुए भी नहीं देख सकती। मैं तुम्हें दोबारा खड़ा होने में मदद करूँगी।”

लावण्या ने अनुराग को अपनी कंपनी में एक सम्मानजनक पद दिया। शुरुआत में ऑफिस के लोगों ने उसका बहुत मजाक उड़ाया, उसे ‘मजदूर मैनेजर’ कहा गया। लेकिन अनुराग ने बिना किसी शिकायत के दिन-रात मेहनत की। उसने साबित कर दिया कि वह बदला हुआ इंसान है।

श्रेया की वापसी और अंतिम संघर्ष

कहानी में नया मोड़ तब आया जब श्रेया दोबारा शहर लौटी। वह अब भी लावण्या को बर्बाद करना चाहती थी। उसने लावण्या की कंपनी के खिलाफ साजिशें रचीं, नकली कागजात बनवाए और लावण्या को जेल भेजने की कोशिश की। लेकिन इस बार अनुराग लावण्या के साथ था। उसने अपनी जान जोखिम में डालकर श्रेया के सारे राज़ उगलवाए और पुलिस के सामने उसके गुनाहों के सबूत पेश किए।

श्रेया को जेल हुई और लावण्या की कंपनी बच गई। इस संघर्ष ने अनुराग और लावण्या को फिर से करीब ला दिया।

एक नई शुरुआत

महीनों बाद, उसी सड़क का उद्घाटन था जहाँ से यह सब दोबारा शुरू हुआ था। लावण्या ने रिबन काटने के लिए अनुराग को अपने साथ खड़ा किया। मीडिया ने पूछा, “मैडम, इस सड़क की सफलता का श्रेय किसे जाता है?” लावण्या ने मुस्कुराते हुए अनुराग की तरफ देखा और कहा, “उस इंसान को, जिसने धूल से उठकर दोबारा शिखर तक पहुँचने का साहस दिखाया।”

अनुराग ने धीरे से लावण्या का हाथ थाम लिया। हालांकि पुरानी यादों के घाव गहरे थे, लेकिन अब उनके सामने एक नई और सुनहरी सुबह थी। उन्होंने तय किया कि वे अब एक-दूसरे के हमसफर बनकर नहीं, तो कम से कम एक-दूसरे की ताकत बनकर जरूर रहेंगे।

निष्कर्ष: यह कहानी हमें सिखाती है कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जो आज धूल में है, वह कल शिखर पर हो सकता है, और जो शिखर पर है, वह अपने अहंकार के कारण धूल में मिल सकता है। प्यार में माफी से बड़ा कोई हथियार नहीं और मेहनत से बड़ी कोई जीत नहीं।