‘ठाकुर हूं, ऐसी की तैसी कर दूंगी’… रितु त्रिपाठी को हड़काया, क्या है कानपुर बैंक विवाद का असली सच?

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से कानपुर के एक बैंक का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक महिला बैंक कर्मचारी गुस्से में कहती नजर आ रही है, “ठाकुर हूं, ऐसी की तैसी कर दूंगी।” 45 सेकंड के इस क्लिप ने देश भर में हड़कंप मचा दिया। लोग इसे जातिगत अहंकार और सत्ता की हनक बताने लगे, लेकिन अब इस मामले में ‘अंदर की बात’ सामने आई है जिसने पूरी कहानी को ही पलट कर रख दिया है।

वायरल वीडियो का ’45 सेकंड’ वाला सच

वीडियो में जो महिला कर्मचारी नजर आ रही हैं, उनका नाम आस्था सिंह है। वह कानपुर के पनकी इलाके में स्थित HDFC बैंक की शाखा में रिलेशनशिप मैनेजर के पद पर तैनात हैं। वीडियो में वह रितु त्रिपाठी नाम की एक अन्य महिला से बहस करती और अपनी जाति का जिक्र करते हुए धमकाती दिख रही हैं। सोशल मीडिया पर इस वीडियो के आधार पर योगी सरकार को भी घेरने की कोशिश की गई, लेकिन अब आस्था सिंह ने खुद सामने आकर अपनी सफाई दी है।

क्या था असली विवाद?

आस्था सिंह के अनुसार, यह वीडियो अधूरा है और जानबूझकर एक हिस्सा काट कर वायरल किया गया है। घटना की जड़ें उस दिन की एक सामान्य बहस से जुड़ी हैं:

    पुरानी रंजिश: आस्था का आरोप है कि उसी दिन सुबह रितु त्रिपाठी की बहन बैंक आई थीं। बाथरूम के पास कपड़ा फंसने को लेकर दोनों के बीच मामूली कहासुनी हुई थी।
    दोपहर का हंगामा: दोपहर में रितु त्रिपाठी अपना इस्तीफा (Resignation) देने आईं, तो उनके साथ उनके पति भी थे। आस्था का दावा है कि वहां बातचीत सामान्य नहीं रही और निजी हमलों तक पहुंच गई।
    धमकी और दबाव: आस्था का आरोप है कि रितु और उनके पति ने उनसे पहले नाम पूछा, फिर जाति पूछी और फिर धमकी दी कि “प्रेस से जुड़े हैं, सारी गर्मी निकाल देंगे और नौकरी छिनवा देंगे।”

“ठाकुर हूं” कहने पर सफाई

आस्था सिंह ने बताया कि वह उस वक्त भारी मानसिक दबाव में थीं। जब उन्हें उनकी नौकरी जाने और “गर्मी निकालने” की धमकी दी गई, तो उन्होंने अपनी सुरक्षा और बचाव में अपनी पहचान का जिक्र किया। उनका कहना है कि यह किसी को डराने के लिए नहीं, बल्कि खुद को सुरक्षित महसूस कराने की एक तात्कालिक प्रतिक्रिया थी।

राजनीति और योगी सरकार पर निशाना

वायरल वीडियो को लेकर विपक्ष और सोशल मीडिया के एक वर्ग ने योगी सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया, इसे “ठाकुरवाद” से जोड़कर पेश किया गया। हालांकि, आस्था सिंह का कहना है कि:

यह मामला पूरी तरह से निजी है और इसे जानबूझकर राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage) में पूरी सच्चाई दर्ज है, जिसे जांच के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
उनका आरोप है कि जैसे ही रितु त्रिपाठी का फाइनल सेटलमेंट पूरा हुआ, पुराने वीडियो को बदनाम करने के इरादे से वायरल कर दिया गया।

निष्कर्ष: अधूरा सच या सोची-समझी साजिश?

कानपुर का यह मामला सिखाता है कि इंटरनेट पर दिखने वाला हर छोटा क्लिप पूरा सच नहीं होता। सवाल यह नहीं है कि वीडियो में क्या कहा गया, बल्कि सवाल यह है कि उस बयान तक पहुंचने के लिए हालात किसने पैदा किए? फिलहाल बैंक प्रबंधन और स्थानीय अधिकारियों के पास यह मामला पहुंच चुका है।

यह लड़ाई अब केवल एक बैंक की बहस नहीं, बल्कि कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा, सम्मान और सोशल मीडिया ट्रायल की एक बड़ी मिसाल बन गई है।

आपकी राय क्या है? क्या वर्कप्लेस पर दबाव में ऐसी प्रतिक्रिया जायज है या यह वाकई अहंकार था?