ठेले वाली लड़की से भिखारी ने कहा शादी करो, उसने भिखारी को थप्पड़ मार दी… फिर जो हुआ।

भीड़ के बीच इंसानियत

भाग 1: शिवनगर की भीड़ और पायल की दुनिया

शिवनगर, एक छोटा सा शहर, जहां हर सुबह भीड़ उमड़ पड़ती थी। ऑटो, ठेले, मंदिर की घंटियां, दवा और श्रृंगार की दुकानें, बस स्टैंड—सबका शोर मिलकर एक अजीब सा संगीत बनाता था। इसी शहर के पुराने हिस्से की एक संकरी गली के आखिरी छोर पर रहती थी पायल। मकान नहीं, टीन की छतें और दीवारों पर गरीबी की मोटी परत। पायल यहां पैदा नहीं हुई थी। वह पास के गांव से मजबूरी में आई थी। पिता के चले जाने के बाद शहर ही उसे सहारा लगा।

हर सुबह पायल मंडी जाती, फिर शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर अपना ठेला लगाती। चौराहा अजीब था—एक तरफ मंदिर, दूसरी तरफ दुकानें, पास ही बस स्टैंड। यहां सब कुछ बिकता था—सब्जी, चाय, सपने, और कभी-कभी इंसान की इज्जत भी। पायल का ठेला भीड़ के बीच थोड़ा सा अकेला खड़ा रहता था।

उसकी मां की तबीयत ठीक नहीं थी। रात भर खांसी बढ़ती रही थी। पायल को ज्यादा सब्जी बेचनी थी, ज्यादा पैसे कमाने थे। उसकी आंखें लाल थीं, मगर वह किसी को दिखाती नहीं थी। हंसती नहीं थी, लेकिन बोलचाल में कमजोरी नहीं आने देती थी। उसे लगता था कि अगर उसने एक बार भी थकान दिखा दी तो शहर उसे दबा देगा।

भाग 2: चौराहे पर एक अजनबी

चौराहे पर रोज का शोर था। पायल के ठेले के सामने लोग रुकते, सब्जी देखते, भाव तय करते। कोई आलू दबाकर देखता, कोई टमाटर उलट-पलट करता। पायल को यह सब अपमान जैसा लगता था, मगर वह समझती थी कि यही उसका काम है।

वहीं थोड़ी दूरी पर एक आदमी रोज बैठता था। लोग उसे भिखारी कहते थे। पायल उसे महीनों से देख रही थी, मगर उसके बारे में कभी किसी से कुछ नहीं पूछा। भिखारी वही कोना चुनता था जहां धूप सीधी नहीं पड़ती थी। पुराने बिजली के खंभे के पास फुटपाथ की दीवार से सटकर, उसके पास एक छोटा सा झोला होता था। कभी वह झोले से फटा कपड़ा निकालकर बैठ जाता, कभी जमीन पर ही बैठा रहता। वह किसी को रोकता नहीं था, ना हाथ जोड़ता, ना गिड़गिड़ाता। उसकी चुप्पी अलग थी।

उस दिन पायल का ध्यान अपने पैसों पर था। मां की दवा खत्म होने वाली थी। डॉक्टर ने कहा था कि नियमित दवा न दी तो हालत बिगड़ सकती है। दोपहर होते-होते ठेला थोड़ा खाली होने लगा। पायल को राहत महसूस हुई। तभी वह आदमी उठकर पायल के ठेले की तरफ आया। उसकी चाल में नशा नहीं था, न लड़खड़ाहट। वह धीरे चल रहा था, जैसे किसी जल्दबाजी में नहीं।

पायल ने सोचा शायद सब्जी मांगने आया है। कई बार वह उसे कुछ दे चुकी थी। आज उसके अंदर दया कम, डर ज्यादा था। आदमी पायल के सामने आकर रुका। उसने पायल की आंखों में देखा। पायल को यह नजर अजीब लगी। आमतौर पर लोग उसे ऊपर से नीचे देखते थे या नजरें चुराते थे। यह आदमी सीधा देख रहा था—बिना लालच, बिना बदतमीजी।

आदमी ने बहुत साधारण आवाज में कहा, “मुझसे शादी करोगी?”
पायल को लगा जैसे किसी ने उसके कानों में गर्म पानी डाल दिया हो। वह कुछ सेकंड तक समझ नहीं पाई कि उसने क्या सुना। जब समझ आया तो उसके भीतर का जमा हुआ सारा गुस्सा एक साथ उबल पड़ा। उसके सामने अपनी गरीबी, मजबूरी और इज्जत तीनों एक साथ खड़ी थीं। और अब चौराहे के बीच सबके सामने एक भिखारी उससे शादी पूछ रहा था।

पास खड़े लोग हंसने लगे। कोई खुलकर हंसा, कोई मुंह पर हाथ रखकर। किसी ने कहा, “वाह, आज तो फिल्म चल रही है।” किसी ने कहा, “भिखारी का भी आत्मविश्वास देखो।” पायल की उंगलियां कांपने लगीं। उसने चारों तरफ देखा। सबकी आंखों में मजा था। किसी की आंख में शर्म नहीं थी।

पायल को लगा जैसे यह सब लोग उसकी मजबूरी को हंसा रहे हैं। उस पल उसे यह भी लगा कि अगर उसने चुप रहकर सह लिया तो यह मजाक रोज का हो जाएगा। उसने बिना सोचे हाथ उठाया। थप्पड़ पड़ा, तराक, आवाज तेज थी। चौराहे की हंसी तुरंत बंद हो गई। कुछ सेकंड के लिए चौराहे पर सिर्फ ट्रैफिक का शोर बचा।

आदमी का चेहरा एक तरफ घूम गया। उसकी आंखें झपकीं। वह गिरा नहीं, ना उसने हाथ उठाया, ना गाली दी। वो बस कुछ पल चुप रहा। फिर उसने धीरे से अपना चेहरा वापस सीधा किया और पायल की तरफ देखा। उस नजर में गुस्सा नहीं था, दुख था—बहुत गहरा। ऐसा दुख जो थप्पड़ से पैदा नहीं होता बल्कि पहले से मौजूद होता है और थप्पड़ बस उसे उभार देता है।

पायल को पहली बार अपने हाथ पर शर्म आई, मगर वह उस शर्म को स्वीकार नहीं कर पाई। उसने कठोर आवाज में कहा, “दोबारा मेरे ठेले के पास मत आना।” आदमी ने कुछ नहीं कहा। वह वापस मुड़ा और अपने कोने की तरफ चला गया। उसके कदम वही धीमे थे।

भाग 3: अस्पताल की रात और मदद

शाम को पायल घर लौटी तो मां की हालत अचानक बिगड़ गई। मां को सांस लेने में परेशानी होने लगी। पायल घबरा गई। वह मां को पड़ोसी की मदद से ऑटो में बैठाकर अस्पताल ले गई। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट लिखे, दवाओं की लंबी पर्ची बना दी। पायल के पास आधे पैसे भी नहीं थे।

दवा वाले ने कहा, “पहले पैसे फिर दवा। यह अस्पताल है, धर्मशाला नहीं।”
पायल को लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर पत्थर रख दिया हो। वह अस्पताल के बाहर आकर बैठ गई। रात का अंधेरा बढ़ रहा था। लोग अपने मरीजों को लेकर भाग रहे थे, डॉक्टर चिल्ला रहे थे। कोई रो रहा था, कोई लड़ रहा था। पायल पहली बार अपने आप को इतना अकेला महसूस कर रही थी।

उसने कई लोगों को फोन किया। कोई फोन नहीं उठा रहा था। जिसने उठाया उसने कहा, “अभी नहीं है।” एक ने साफ बोल दिया, “हर बार मेरे अपने खर्चे हैं।”
पायल की आंखों से आंसू अपने आप निकलने लगे। उसने उन्हें पोंछा, लेकिन आंसू रुक नहीं रहे थे। वह उसी बरामदे में बैठी थी, सिर घुटनों पर रखकर।

तभी किसी ने उसके पास आकर धीरे से कुछ रखा। पायल ने सिर उठाया। उसके सामने दवा का पैकेट था और वही आदमी खड़ा था। वही जिसे उसने कुछ घंटे पहले थप्पड़ मारा था।

पायल को लगा जैसे जमीन खिसक गई हो। उसने तुरंत कहा, “तुम? तुम यहां?”
आदमी ने शांत स्वर में कहा, “अंदर डॉक्टर ने जो पर्ची लिखी थी, मैंने देख ली थी। मैं बाहर था। पैसे मैंने दे दिए।”

पायल का गला सूख गया। उसे समझ नहीं आया कि वह पहले माफी मांगे, धन्यवाद कहे या डर जाए। उसकी आंखें दवा के पैकेट और आदमी के चेहरे के बीच घूमती रहीं।
फिर उसने धीमी आवाज में कहा, “मैंने तुम्हें थप्पड़ मारा। तुमने मेरे लिए यह क्यों किया?”

आदमी कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “क्योंकि आज तुम्हें मदद चाहिए थी। और तुम्हारे आसपास कोई नहीं था।”

पायल के होंठ कांपने लगे। उसने कहा, “तुम कौन हो?”
आदमी ने धीरे से कहा, “नाम का क्या करोगी? लोग नाम लेकर भी इंसान नहीं समझते।”

पायल ने पहली बार महसूस किया कि यह आदमी भीख नहीं मांग रहा था, अपना दर्द छुपा रहा था। पायल को अपने थप्पड़ का भार अपने दिल पर महसूस होने लगा।

आदमी ने आगे कहा, “अपनी मां को दवा दे दो। बाकी बात बाद में।”
पायल दवा का पैकेट लेकर अंदर चली गई। वह सोच रही थी कि जिन लोगों ने दिन में उसकी इज्जत पर मजाक किया वे अब कहां हैं, और जिसे उसने सबसे नीच समझकर थप्पड़ मारा वही अब उसके लिए सबसे जरूरी बन गया है।

भाग 4: नीरज की कहानी

रात को मां की हालत कुछ संभली, लेकिन खतरा पूरी तरह नहीं गया। डॉक्टर ने कहा कि रात भर निगरानी करनी होगी। पायल बैठी रही, उसकी आंखें नींद से भारी थीं, लेकिन वह सो नहीं पा रही थी। उसे बार-बार अस्पताल के बाहर बैठे उस आदमी की याद आ रही थी।

रात के करीब 2:00 बजे पायल बाहर निकली। उसने देखा वो आदमी अभी भी वही था। दीवार के सहारे बैठा था, आंखें खुली थीं। जैसे वह सोया ही नहीं था। पायल धीरे से उसके पास गई। उसने बहुत धीमी आवाज में कहा, “मुझे माफ कर दो।”

आदमी ने उसकी तरफ देखा, “माफी की जरूरत नहीं। तुमने जो किया उसके पीछे तुम्हारी मजबूरी थी।”
पायल का दिल और भारी हो गया। उसने कहा, “मजबूरी सबके पास होती है। लेकिन इंसानियत हर किसी के पास नहीं होती। और आज इंसानियत तुमने दिखाई।”

आदमी ने पहली बार थोड़ा सा सिर झुकाया। फिर उसने कहा, “अगर तुम सच में जानना चाहती हो मैं कौन हूं तो कल सुबह यहां आ जाना।”
पायल ने सिर हिलाया। वह वापस अंदर चली गई। लेकिन अब उसके अंदर एक और डर था—कहीं यह आदमी भी सुबह तक गायब ना हो जाए।

सुबह पायल समय से पहले अस्पताल पहुंच गई। रात भर की नींद उसके चेहरे से साफ झलक रही थी। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, बाल बिखरे हुए थे। लेकिन वह तैयार होकर आई थी। मां अभी वार्ड में थी। नर्स ने कहा कि हालत थोड़ी स्थिर है लेकिन दवाइयां और टेस्ट जारी रहेंगे।

पायल बाहर आई। उसका पहला डर यही था कि वह आदमी शायद चला गया होगा। लेकिन वह वही था। उसी दीवार के पास उसी शांत मुद्रा में। उसने पायल को देखा और बिना कोई सवाल पूछे बस इतना कहा, “बैठ जाओ।”

कुछ सेकंड तक दोनों चुप रहे। अस्पताल के बाहर की भीड़ और अंदर की भागदौड़ उनके बीच से गुजर रही थी। लेकिन उनके लिए समय थोड़ी देर को जैसे रुक गया था।

पायल ने धीरे से कहा, “कल आपने बोला था कि अगर मैं जानना चाहूं कि आप कौन है तो सुबह आ जाओ। मैं आ गई।”

आदमी ने लंबी सांस ली। उसकी गर्दन के पास के कपड़े फटे हुए थे, लेकिन उसने उन्हें ठीक करने की कोशिश भी नहीं की। उसने कहा, “मेरा नाम नीरज है।”

पायल ने पहली बार ध्यान दिया कि नीरज कहते वक्त उसकी आवाज थोड़ी थरथरा गई। जैसे यह नाम अब उसके लिए सिर्फ पहचान नहीं, एक बोझ था।

पायल ने कहा, “आप सच में भिखारी नहीं लगते।”
नीरज ने हल्का सा हंसने की कोशिश की, पर हंसी पूरी नहीं हुई। “भिखारी कोई लगता थोड़े हैं। बनता है।”

नीरज ने अपनी कहानी सुनाई। एक कमरे का किराए का घर, नौकरी, मां, पत्नी पूजा, बेटा आकाश। घर छोटा था मगर उसमें आवाजें थीं, हंसी थी, उम्मीद थी। फिर एक दिन सब खत्म हो गया।

कंपनी में घोटाला हुआ। मालिकों ने पैसा बाहर निकाला। पुलिस आई, फाइलें जब्त हुईं। नीरज को बुलाया गया। उस पर केस डाल दिया गया। दोस्तों ने मदद की, फिर सब दूर हो गए। रिश्तेदारों ने फोन उठाना बंद कर दिया। मां ने कहा था, बेटा सच की जीत होगी। लेकिन सच की जीत का रास्ता इतना लंबा होता है कि आदमी रास्ते में मर जाता है।

नीरज को कुछ दिनों के लिए जेल भी जाना पड़ा। बाहर आया तो नौकरी चली गई, घर का किराया बकाया हो गया, पूजा के चेहरे से रंग उतर गया, मां बीमार रहने लगी, आकाश छोटा था, घर में खुशियों की आवाजें बंद हो गई थीं।

काम ढूंढने गया, हर जगह यही सवाल—आपके खिलाफ केस है। पूजा ने पहले बहुत सहा, लेकिन उसके मायके वाले रोज उसके कान भरते रहे। एक रात आकाश को तेज बुखार हो गया। मां की हालत भी ठीक नहीं थी। अस्पताल भागा। पैसे नहीं थे। बाहर जाकर लोगों से मदद मांगी। उसी अस्पताल के बाहर उसी जगह जहां कल तुम बैठी थी। मैंने पहली बार हाथ फैलाया था।

उस रात आकाश बच गया क्योंकि किसी नर्स ने दया कर दी और कुछ दवा दे दी। लेकिन उस रात मैं अंदर से मर गया।

कुछ दिनों बाद मां चली गई। पूजा ने फैसला कर लिया। वो सुबह उठी, आकाश को गोद में लिया और मेरी तरफ देखकर बस इतना कहा, “मैं तुम्हें दोष नहीं देती। लेकिन मैं अपने बच्चे को इस अंधेरे में नहीं रख सकती।”

भाग 5: समाज का सामना और बदलाव

पायल ने नीरज की कहानी सुनी। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसे लगा जैसे उसके सामने एक आदमी की पूरी दुनिया उजड़ गई। और वह आदमी आज भी चुपचाप जिंदा है।

पायल ने धीरे से पूछा, “तो आप भिखारी बन गए?”
नीरज ने कहा, “मैं भिखारी नहीं बना। मैं इंसान से खाली हो गया। जब आदमी अंदर से खाली हो जाता है तो बाहर का कपड़ा कुछ भी हो फर्क नहीं पड़ता।”

कल आपने मुझसे शादी पूछी। वो मजाक नहीं था।
“नहीं, मैंने मजाक नहीं किया था। मैं बस यह देखना चाहता था कि कोई इंसान अभी भी इंसान की बात सुन सकता है या नहीं।”

पायल ने कहा, “मैंने उस दिन आपको थप्पड़ मारकर साबित कर दिया कि मैं भी उन्हीं लोगों जैसी बन गई हूं जो बिना समझे मार देते हैं।”
नीरज ने कहा, “तुम उन्हीं जैसी नहीं हो। फर्क यह है कि तुम्हें दर्द हुआ। जो लोग सच में बुरे होते हैं, उन्हें दर्द नहीं होता।”

पायल ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। वह रो रही थी। उसी समय वार्ड से नर्स बाहर आई और बोली, “पायल जी, आपकी मां को फिर से सांस लेने में दिक्कत हो रही है।”

पायल घबरा कर उठी। नीरज भी उठा। पायल भाग कर अंदर गई। डॉक्टर ने कहा कि एक इंजेक्शन लगेगा और कुछ पैसे तुरंत जमा करने होंगे। पायल की जेब खाली थी। तभी नीरज अंदर आया। उसने अपनी मुड़ी हुई नोटों की गठरी डॉक्टर के सामने रख दी।

पायल ने नीरज को देखा, “आपके पास यह पैसे कहां से?”
नीरज ने बस इतना कहा, “अब सवाल मत पूछो। मां को बचाओ।”

भाग 6: समाज की नजरें और पायल का फैसला

अगले कुछ दिन अस्पताल में बीते। मां की हालत थोड़ी संभली। पायल ने मां से पूछा, “आपको कैसे पता वो आदमी वही है?”
मां ने कहा, “कल रात जब मुझे होश आया था, मैंने उसे बाहर बैठे देखा था। वो पूरी रात गया नहीं।”

मां ने कहा, “हम सब कभी ना कभी किसी को थप्पड़ मारते हैं। बेटा हाथ से नहीं, दिल से। फर्क बस इतना है कि कुछ लोग समझ जाते हैं।”

पायल घर गई। मोहल्ले में बात फैल चुकी थी। किसी ने देखा था कि अस्पताल में एक भिखारी उसके साथ बैठा है। बातें धीरे-धीरे जहर बनकर फैल रही थीं। पड़ोस की एक औरत ने आकर कहा, “लोग बोल रहे हैं। थोड़ा संभल कर रहा कर।”

पायल ने पहली बार पलट कर जवाब दिया, “लोग कब चुप रहते हैं?”

अगले दिन जब वह चौराहे पर ठेला लगाने पहुंची तो माहौल बदला हुआ था। वही लोग, वही दुकानें लेकिन नजरें अलग थीं। कुछ लोग जानबूझकर उसके ठेले के पास रुके जैसे कुछ देखने आए हों। किसी ने सब्जी नहीं खरीदी, बस बातें की।

एक आदमी बोला, “कल अस्पताल में तुम्हारे साथ कौन था?”
पायल ने जवाब नहीं दिया।
दूसरा बोला, “आजकल लड़कियां भी क्या-क्या करने लगी हैं।”

पायल का दिल तेज धड़कने लगा। उसी वक्त नीरज दूर से आता दिखा। पायल का मन किया कि वह उसे रोक दे। लेकिन नीरज चला आया।

एक आदमी ने ऊंची आवाज में कहा, “अरे वही भिखारी है ना?”
नीरज ने सब सुना। उसने सिर झुकाकर आगे बढ़ने की कोशिश की। लेकिन पायल ने उसे रोक लिया। उसने पहली बार ठेले के पीछे से निकलकर सबके सामने खड़े होकर कहा, “हां यही है।”

भीड़ चुप हो गई।
“यही आदमी मेरी मां के लिए दवा लाया था जब आप में से कोई फोन तक नहीं उठा रहा था। यही आदमी पूरी रात अस्पताल में बैठा रहा जब आप लोग घरों में चैन से सो रहे थे।”

एक आदमी बोला, “तो क्या भिखारी है?”
पायल की आवाज कांप गई, लेकिन वो रुकी भी नहीं।
“भिखारी वह होता है जो इज्जत मांगता है। यह आदमी तो इज्जत देता है।”

कुछ लोग नजरें झुकाने लगे। कुछ अब भी हंस रहे थे। पायल को समझ आ गया कि समाज एक बार में नहीं बदलता। लेकिन उसने यह भी समझ लिया कि उसे अब चुप नहीं रहना है।

उसी शाम नीरज ने पायल से कहा, “अगर मेरी वजह से तुम्हें दिक्कत हो रही है, तो मैं चला जाऊंगा।”
पायल ने बिना सोचे कहा, “नहीं, अब अगर कोई जाएगा तो डर जाएगा। मैं नहीं डरूंगी।”
यह पायल का पहला फैसला था जो उसने डर के बिना लिया।

भाग 7: सच की लड़ाई

रात को मां की हालत फिर बिगड़ी। डॉक्टर ने साफ कह दिया कि इलाज लंबा चलेगा, खर्च और बढ़ेगा। पायल बाहर आकर बैठ गई। उसने पहली बार अपने भविष्य के बारे में खुलकर सोचा।

नीरज ने कहा, “मैं काम ढूंढने जाऊंगा।”
पायल ने उसकी तरफ देखा।
“मैं हमेशा भागता रहा। अब नहीं। अगर सच कभी बाहर आएगा तो मुझे सामने खड़ा होना पड़ेगा।”

नीरज ने अगले दिन शहर के दूसरे सिरे की ओर जाना शुरू किया। वह उसी चौराहे पर नहीं बैठा जहां लोग उसे पहचानते थे। पहचान दो तरह की होती है—एक नाम देती है, दूसरी जंजीर बांध देती है। उसे अब दूसरी से छुटकारा चाहिए था।

पायल ठेला लगाकर खड़ी रही। उसकी निगाहें हर आते-जाते आदमी पर टिक जाती थीं। जैसे वह नीरज को ढूंढ रही हो। भीतर एक डर था—अगर वह लौट कर ना आया तो? लेकिन उसी डर के साथ एक भरोसा भी था—अगर वह लौटा तो बदला हुआ लौटेगा।

दोपहर के आसपास पायल के पास एक अधेड़ उम्र की महिला आई। उसने पायल को देखा और धीरे से कहा, “तू ही पायल है ना?”
पायल ने सिर हिलाया।
महिला ने कहा, “तू उस नीरज शर्मा को जानती है?”
पायल चौंक गई।
“आप कौन?”
“मेरा नाम सरला है। मैं उसी कंपनी में काम करती थी जहां नीरज काम करता था।”

सरला ने बताया कि वर्षों पहले कंपनी में घोटाला हुआ था। असली दोषी ऊपर के लोग थे। लेकिन किसी ने बोलने की हिम्मत नहीं की। सरला भी डर गई थी। उसकी नौकरी, उसका घर सब दांव पर था। वह चुप रही। पर सालों बाद जब वही लोग फिर किसी नए कर्मचारी को फंसाने की तैयारी में थे तो उसे लगा कि अब चुप रहना पाप है। उसने पुराने कागज संभाल कर रखे थे—ट्रांजैक्शन की असली एंट्री, मेल्स, नोटिस। सब। वह गवाही देना चाहती थी।

शाम तक नीरज लौटा। उसके चेहरे पर थकान थी, पर आंखों में चमक थी। उसने बताया कि एक छोटे गोदाम में अस्थाई काम मिल गया है मजदूरी का। पायल ने उसे सरला के बारे में बताया। नीरज कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “सच सामने आया तो कीमत चुकानी पड़ेगी।”

पायल ने कहा, “किसकी?”
नीरज ने जवाब दिया, “हम दोनों की।”

अगले हफ्तों में सरला ने वकील से बात की। पुराने दस्तावेज अदालत में पहुंचे। केस दोबारा खुला। शहर में चर्चा शुरू हुई। वहीं नीरज शर्मा जिसे लोग भिखारी कहते थे उसका नाम अखबार में छपा। कुछ लोग पहचान गए। कुछ ने सिर झुका लिया। कुछ ने कहा, “अब क्या फायदा?”

भाग 8: जीत और नई शुरुआत

पायल की मां की हालत फिर बिगड़ी। डॉक्टर ने कहा कि ऑपरेशन जरूरी है। खर्च बहुत ज्यादा था। पायल ने एक रात घर के बाहर बैठकर हिसाब लगाया। सब्जी, किराया, दवा, स्कूल सब जोड़कर भी रकम नहीं बन रही थी। उसने पहली बार ठेला बेचने का सोचा। यही उसकी आखिरी पूंजी थी।

अदालत का दिन तय था। सुबह से ही शहर में हलचल थी। अखबारों में छोटा सा कॉलम छपा था—पुराने घोटाले की सुनवाई आज। बहुत से लोग यह पढ़कर आगे बढ़ गए। लेकिन पायल के लिए यह उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी सुबह थी।

नीरज अदालत पहुंचा। सरला पहले से मौजूद थी। उसके हाथ में फाइल थी। वही फाइल जो सालों तक अलमारी के कोने में दबी रही और अब बोलने वाली थी। दूसरी तरफ कंपनी के वकील थे। चमकदार कोट, तेज आवाज, आत्मविश्वास।

जज ने दस्तावेज देखे। सवाल जवाब हुए। सरला ने साफ-साफ बताया कि किस तारीख को किसने किस खाते से पैसा निकाला। किस ईमेल में आदेश आया और किसने कागजों पर नीरज के हस्ताक्षर जोड़ दिए। कंपनी के वकील ने शोर मचाने की कोशिश की। लेकिन कागज शोर से ज्यादा तेज होते हैं।

जज ने जब पूछा, “नीरज शर्मा, क्या आप कहना चाहते हैं?”
नीरज खड़ा हुआ। उसने कोई भाषण नहीं दिया। बस इतना कहा, “मैंने गलती नहीं की। मैंने सच बोला। अगर सच बोलना अपराध है तो मैं वही अपराधी हूं।”

अदालत में सन्नाटा छा गया। जज ने फैसला सुरक्षित रखा और थोड़ी देर बाद सुनाया—नीरज शर्मा पर लगे आरोप प्रथम दृष्ट्या गलत पाए जाते हैं। मामले में जिन लोगों के नाम आए हैं, उन पर कार्रवाई होगी।

नीरज के लिए यह सिर्फ कानूनी जीत नहीं थी। यह उस रात का जवाब था जब उसने अस्पताल के बाहर हाथ फैलाया था और किसी ने उसे कीड़ा समझ कर देखा था।

बाहर निकलते ही कैमरे चमके। किसी ने पूछा, “आप क्या कहना चाहेंगे?”
नीरज ने जमीन की तरफ देखकर कहा, “सच देर से आता है, पर आता है।” और वो आगे बढ़ गया।

भाग 9: जिंदगी की पटरी पर वापसी

पायल अस्पताल में थी। मां को होश था। डॉक्टर ने कहा कि अब खतरा कम है पर देखभाल जारी रखनी होगी। पायल ने मां का हाथ पकड़ा। मां ने धीमे से पूछा, “फैसला?”
पायल ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया। मां की आंखें भर आई। उसने कहा, “देखा, सच चलता है, बस धीरे।”

शाम को चौराहे पर लोग इकट्ठा थे। वही चौराहा जहां हंसी उड़ी थी, जहां थप्पड़ पड़ा था। आज लोग बातें कर रहे थे। “वही भिखारी, गलत किया था हमने।” कुछ लोग चुप थे। शर्म बोलने से ज्यादा भारी होती है।

नीरज वहां नहीं बैठा। वो अब उस कोने का नहीं था। पायल आई। उसने ठेला नहीं लगाया था। उसके पास ठेला अब नहीं था। लेकिन वो खाली हाथ भी नहीं थी। उसने लोगों की तरफ देखा और पहली बार बिना डर के बोली, “जिस दिन आप हंसे थे उस भी दिन यह आदमी सही था। फर्क बस इतना था कि तब आप गलत थे।”

कोई जवाब नहीं आया। कुछ लोगों ने सिर झुका लिया। किसी ने माफी नहीं मांगी। लेकिन माफी हमेशा शब्दों में नहीं होती। कभी-कभी खामोशी भी स्वीकार होती है।

नीरज की जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर आई। अस्थाई काम पक्का हुआ। केस की कागजी कार्रवाई पूरी हुई। उसने पूजा और आकाश के साथ बैठकर लंबी बात की। उसने साफ कहा, “मैं वापस वही बनने की कोशिश नहीं करूंगा जो था। मैं वही रहूंगा जो सच के साथ जी सके।”

पूजा ने उसे देखा। थकी आंखों में उम्मीद थी। आकाश ने उसके हाथ की उंगली पकड़ ली। नीरज ने महसूस किया, कुछ पकड़ फिर से लौट आई है।

पायल ने नए सिरे से शुरुआत की। उसने पास की दुकान में काम शुरू किया। मेहनत वही थी, बस जगह बदली थी। मां धीरे-धीरे संभल रही थी।

एक शाम पायल और नीरज चाय पर मिले। दोनों चुप थे। फिर पायल ने कहा, “शादी वाला सवाल, अब भी है?”
नीरज ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, “अब सवाल नहीं है। अब प्रस्ताव है साथ चलने का, बराबरी का।”

पायल ने जवाब तुरंत नहीं दिया। उसने अपनी मां, अपने भाई, अपने डर सबको एक साथ देखा। फिर कहा, “साथ तब अच्छा लगता है जब पीछे डर नहीं, भरोसा हो।”
नीरज ने कहा, “भरोसा रोज कमाया जाता है।”
पायल ने हाथ बढ़ाया। नीरज ने पकड़ लिया।

कुछ महीने बाद उसी चौराहे से लोग गुजरते हैं। कोई जल्दी में, कोई सोच में। कभी-कभी कोई रुक कर उस कोने को देखता है जहां एक आदमी बैठता था। अब वहां कोई नहीं बैठता लेकिन वहां एक कहानी बैठी है—कि इंसान को समझे बिना थप्पड़ मारना आसान है और इंसान बनकर साथ देना मुश्किल। जो मुश्किल चुन ले वही इंसानियत का मालिक होता है।

समाप्त

अगर इस कहानी ने आपके दिल के किसी कोने को छुआ हो, आपकी आंखों को नम किया हो, तो इसे अपने सभी साथी और दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें। ताकि प्यार और इंसानियत की यह लौ जलती रहे।