डॉक्टरों ने कहा ये कभी नहीं बोलेगी… एक पागल भिखारी ने चमत्कार कर दिखाया जो करोड़ों नहीं कर पाए 😱💔

चुप्पी का शोर: एक पिता, एक बेटी और वो ‘पागल’ फरिश्ता
शहर के सबसे पॉश इलाके में एक ऐसी इमारत थी जो बादलों से बातें करती थी। उस इमारत के सबसे ऊपर वाले पेंटहाउस में रहता था विक्रमजीत सिंघानिया। विक्रमजीत सिर्फ एक नाम नहीं था, बल्कि ताकत और दौलत का दूसरा नाम था। लोग कहते थे कि वह जिस मिट्टी को छू ले, वह सोना बन जाती है। उसके घर में इटली का मार्बल लगा था, फ्रांस के झूमर लटकते थे और यहाँ तक कि बाथरूम के नल भी सोने के पानी चढ़े हुए थे।
लेकिन उस आलीशान महल में एक चीज़ की बहुत कमी थी—और वह थी ‘आवाज़’।
विक्रमजीत के घर में एक ऐसा सन्नाटा पसरा रहता था जो किसी भी इंसान को बेचैन कर दे। यह सन्नाटा उसकी छह साल की बेटी रूही का था। रूही दिखने में इतनी खूबसूरत थी जैसे कोई नन्ही परी ज़मीन पर उतर आई हो। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें और मासूम चेहरा देखकर लगता था कि वह अभी कुछ बोलेगी, मगर वह बोलती नहीं थी। रूही जन्म से मूक (गूंगी) थी।
विक्रमजीत ने अपनी बेटी की आवाज़ खरीदने के लिए दुनिया भर के डॉक्टरों को दिखाया। अमेरिका, लंदन, जर्मनी—जहाँ भी उम्मीद की कोई किरण दिखी, वह उसे लेकर पहुँचा। डॉक्टरों ने ऑपरेशन किए, स्पीच थेरेपी हुई, पर नतीजा शून्य रहा। विक्रमजीत डॉक्टरों पर पैसों की गड्डियां फेंकता और चिल्लाता, “मुझे बस मेरी बेटी के मुँह से ‘पापा’ सुनना है!” पर कुदरत का लिखा पैसा नहीं बदल सकता था।
गेट के बाहर का ‘पागल’ मेहमान
विक्रमजीत की आलीशान इमारत के बाहर सड़क किनारे एक नया मेहमान आया था। वह एक ‘पागल’ भिखारी था—गंदे फटे कपड़े, उलझे बाल और नंगे पैर। वह दिन भर सड़क किनारे बैठा रहता, कभी हवाओं से बातें करता तो कभी आवारा कुत्तों के साथ अपनी सूखी रोटी बाँटकर खाता। विक्रमजीत जब भी अपनी गाड़ी से गुज़रता, तो नफरत से अपनी नाक सिकोड़ लेता और गार्ड्स को उसे भगाने का हुक्म देता।
एक दोपहर, रूही अपनी बालकनी में खड़ी थी। आज उसका जन्मदिन था, पर उसके पिता काम में व्यस्त थे और माँ उसके जन्म के समय ही चल बसी थी। रूही ने नीचे देखा, वह पागल भिखारी कीचड़ के एक गड्ढे में कागज़ की नाव चला रहा था और जोर-जोर से हंस रहा था। रूही उसे एकटक देखने लगी। उसे समझ नहीं आया कि बिना पैसों के कोई इतना खुश कैसे हो सकता है।
तभी उस पागल की नज़र ऊपर बालकनी पर खड़ी रूही पर पड़ी। उसने अपनी जेब से एक मुरझाया हुआ फूल निकाला और उसे रूही की तरफ ऐसे दिखाया जैसे किसी राजकुमारी को तोहफा दे रहा हो। रूही पहले तो डरी, पर उस पागल की आँखों में दया नहीं, बल्कि सच्ची दोस्ती थी। रूही ने धीरे से अपना हाथ हिलाया।
एक अनूठी दोस्ती
अब यह रोज़ का सिलसिला बन गया। रूही स्कूल से आती और सीधे बालकनी में पहुँच जाती। उन दोनों के बीच 50 फुट की दूरी थी, अमीरी-गरीबी की गहरी खाई थी, मगर उन्होंने अपना एक अलग रिश्ता बना लिया था। वह पागल नीचे से बंदर या हाथी की नकल उतारता और रूही ऊपर से खिलखिलाकर हँसती। रूही चुपके से अपने खाने से सेब और चॉकलेट नीचे फेंकती, जिसे वह पागल अनमोल खजाने की तरह अपनी जेब में रख लेता।
एक दिन तेज़ आंधी चली। रूही ने देखा कि उसका दोस्त ठंड से ठिठुर रहा है। उसने तुरंत अपनी सबसे महँगी ‘पश्मीना शॉल’ बालकनी से नीचे फेंक दी। उस पागल ने उस शॉल को ओढ़ा और रूही को ऐसे देखा जैसे उसने उसकी जान बचा ली हो।
अहंकार का तमाचा
अगले दिन रविवार था। विक्रमजीत घर पर था और अचानक उसकी नज़र गेट पर पड़ी। उसने देखा कि रूही सलाखों के पास खड़ी है और वह गंदा भिखारी उसका हाथ चूम रहा है। विक्रमजीत का अहंकार जाग उठा। वह दहाड़ता हुआ नीचे पहुँचा— “रूही, पीछे हटो!”
विक्रमजीत ने आव देखा न ताव, उस पागल को ज़ोर का तमाचा मारा और उसे लातों से पीटने लगा। उसने वह शॉल भी छीन ली। रूही रोती रही, बिना आवाज़ के चीखती रही, “पापा, उसे मत मारो!” पर विक्रमजीत ने गार्ड्स को हुक्म दिया, “इस कचरे को शहर के बाहर फेंक आओ!”
जब दौलत मिट्टी बन गई
उस दिन के बाद रूही ने खाना-पीना छोड़ दिया। उसका शरीर बुखार से तपने लगा। डॉक्टरों ने कहा, “मिस्टर सिंघानिया, आपकी बेटी का दिल टूट गया है। उसे वह चाहिए जिससे उसे खुशी मिलती थी, वरना हम उसे नहीं बचा पाएंगे।”
विक्रमजीत सन्न रह गया। रात के सन्नाटे में जब उसने अपनी मरती हुई बेटी को देखा, तो उसे एहसास हुआ कि उसकी करोड़ों की दौलत बेकार है। वह उसी वक्त अपनी गाड़ी लेकर शहर के कचरा डंपिंग ग्राउंड पहुँचा। कीचड़ और बदबू के बीच वह पागलों की तरह चिल्लाने लगा— “दोस्त! कहाँ हो तुम?”
दो घंटे बाद उसे वह पागल एक टूटी झोपड़ी में मिला, उसे तेज़ बुखार था। विक्रमजीत उसके पैरों में गिर गया और रोते हुए बोला, “मुझे माफ़ कर दो भाई, मेरी बेटी को बचा लो!” उस पागल ने मुस्कुराते हुए अपनी जेब से वही टूटी हुई चॉकलेट निकाली और विक्रमजीत के आँसू पोंछ दिए।
वो चमत्कार
विक्रमजीत उसे अपने घर लेकर आया। डॉक्टरों ने उसे रोकने की कोशिश की, पर विक्रमजीत ने उसे सीधा रूही के कमरे में भेजा। जैसे ही उस पागल ने रूही के बिस्तर के पास बैठकर चिड़ियों की आवाज़ निकाली— ‘चीं-चीं’—रूही की पलकें झपकीं। उसने आँखें खोलीं और अपने दोस्त को सामने पाया।
रूही के चेहरे पर वह मुस्कान लौट आई। धीरे-धीरे रूही ठीक होने लगी और चमत्कार यह हुआ कि उस पागल (जिसका नाम भोला था और जो कभी संगीत शिक्षक था) की आवाज़ों की नक़ल उतारते-उतारते रूही के गले से भी आवाज़ निकलने लगी।
आज विक्रमजीत के घर में सन्नाटा नहीं, बल्कि हंसी गूँजती है। भोला अब सड़क पर नहीं रहता, वह रूही का सबसे अच्छा दोस्त और गुरु है। विक्रमजीत ने सीख लिया है कि— “अमीरी दिल की होनी चाहिए, जेब की नहीं।”
शिक्षा: प्यार और अपनापन दुनिया की किसी भी महँगी दवा से बड़े होते हैं। कभी भी किसी को उसकी गरीबी से मत आँकिए, क्योंकि अक्सर फरिश्ते फटे हाल में ही आते हैं।
News
बेटे ने माँ और बहन को घर से निकाल दिया… लेकिन माँ ने जो किया, पूरी दुनिया रो पड़ी
बेटे ने माँ और बहन को घर से निकाल दिया… लेकिन माँ ने जो किया, पूरी दुनिया रो पड़ी माँ…
करोडपति लडका गरीब का भेष बना कर अपने घर आया… फिर घर वालों ने जो किया 😱
करोडपति लडका गरीब का भेष बना कर अपने घर आया… फिर घर वालों ने जो किया 😱 असली अमीरी भाग…
एक अकेला फौजी पुलिस वालों पर भारी पड़ गया।।
एक अकेला फौजी पुलिस वालों पर भारी पड़ गया।। कर्तव्य पथ पर सिपाही भाग 1: घर की दहलीज और मां…
महिला पुलिस दरोगा अकेली घर लौट रही थी/रास्ते में हो गया हादसा/
महिला पुलिस दरोगा अकेली घर लौट रही थी/रास्ते में हो गया हादसा/ न्याय का शंखनाद: मर्यादा और प्रतिशोध की कहानी…
“बैलेंस हुआ तो दोगुना दूँगा!” — मैनेजर ने मज़ाक उड़ाया… पर वह बैंक का CEO था!
“बैलेंस हुआ तो दोगुना दूँगा!” — मैनेजर ने मज़ाक उड़ाया… पर वह बैंक का CEO था! फीकी पगड़ी का ताज…
Buhri Saas Ke Sath Bahu Ny Zulm Ki Inteha Kar Di
Buhri Saas Ke Sath Bahu Ny Zulm Ki Inteha Kar Di सफलता की कीमत और माँ का सम्मान: एक मार्मिक…
End of content
No more pages to load






