तलाकशुदा IPS पत्नी 7 साल बाद पति की झोपड़ी पहुंची… अंदर का सच देख पूरा गांव सन्न रह गया 

पद, प्रतिष्ठा और पश्चाताप: एक आईपीएस की अधूरी कहानी

अध्याय 1: हरिपुर की धूल और सरकारी सायरन

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से करीब 40 किलोमीटर दूर बसा एक छोटा सा गाँव—हरिपुर। दोपहर का वक्त था, सूरज अपनी पूरी तपिश बिखेर रहा था। गाँव की कच्ची सड़क पर अचानक धूल का एक गुबार उठा और एक सफेद सरकारी एसयूवी (SUV) गाँव के बीचों-बीच आकर रुकी। गाड़ी पर लगी नीली बत्ती और सरकारी नंबर प्लेट चीख-चीख कर कह रही थी कि अंदर कोई बड़ा अफसर बैठा है।

गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बाहर उतरीं आईपीएस प्रिया शर्मा। खाकी वर्दी, कंधों पर चमकते सितारे और आँखों में वही अनुशासन जो एक पुलिस अफसर की पहचान होती है। गाँव वाले सहम गए। किसी ने सोचा छापा पड़ा है, तो किसी को लगा कोई बड़ी वारदात हुई है। लेकिन प्रिया की नज़रें कहीं और थीं। वह सीधे उस फूस की झोपड़ी की तरफ बढ़ीं, जहाँ सात साल पहले उन्होंने अपना एक संसार छोड़ा था।

अध्याय 2: संघर्ष के दिन और प्यार की नींव

सात साल पहले की बात है। प्रिया गाँव की उन चंद लड़कियों में से थी, जिनकी आँखों में आसमान छूने के सपने थे। विजय, जो उसी गाँव का एक साधारण युवक था, प्रिया के उन सपनों का सबसे बड़ा समर्थक बना। विजय ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, वह खेतों में मज़दूरी करता था और नदी किनारे जाल डालता था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था।

जब प्रिया ने कहा कि वह ‘अफसर’ बनना चाहती है, तो गाँव के लोगों ने मज़ाक उड़ाया। लोग कहते थे, “मज़दूर की बीवी कलेक्टर बनेगी?” लेकिन विजय ने सिर्फ़ इतना कहा, “प्रिया, तुम पढ़ो। जब तक मैं हूँ, तुम्हें किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूँगा।”

शादी के बाद, उस छोटी सी झोपड़ी में लालटेन की रोशनी में प्रिया रात-रात भर पढ़ती और विजय पास बैठकर कभी पंखा झलता, तो कभी पानी पिलाता। जब प्रिया पहली बार परीक्षा में असफल हुई, वह फूट-फूट कर रोई। विजय ने उसका हाथ थाम कर कहा, “एक हार से सपना नहीं मरता, प्रिया। तुम फिर से कोशिश करो।” विजय ने अपनी छोटी सी कमाई का बड़ा हिस्सा प्रिया की किताबों और कोचिंग की फीस में लगा दिया।

अध्याय 3: सफलता और बढ़ती दूरियाँ

तीसरी कोशिश में प्रिया का चयन आईपीएस (IPS) के लिए हो गया। पूरे गाँव में जश्न मना, विजय की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे। उसे लगा उसके त्याग सफल हुए। लेकिन जैसे-जैसे प्रिया की ट्रेनिंग खत्म हुई और उसकी पोस्टिंग बड़े शहरों में होने लगी, चीज़ें बदलने लगीं।

खाकी वर्दी का रसूख और पद की गरिमा ने धीरे-धीरे प्रिया के व्यक्तित्व को बदल दिया। अब वह बड़े अफसरों, नेताओं और उद्योगपतियों के बीच उठती-बैठती थी। विजय, जो साधारण कुर्ता-पायजामा पहनता था और देहाती भाषा बोलता था, अब प्रिया की ‘प्रोफेशनल लाइफ’ में फिट नहीं बैठ रहा था।

एक शाम, जब प्रिया के कुछ सीनियर अफसर घर आए थे, विजय ने उन्हें नमस्ते किया और चाय पूछी। उनके जाने के बाद प्रिया ने विजय पर चिल्लाते हुए कहा, “तुम्हें तमीज़ नहीं है? मेरे सीनियर के सामने तुम मज़दूरों की तरह पेश आते हो। कम से कम ढंग के कपड़े तो पहन लिया करो!”

विजय उस रात चुप रहा। लेकिन वह खामोशी आंधी से पहले का सन्नाटा थी।

अध्याय 4: रिश्तों का कत्ल और तलाक

दूरियाँ बढ़ती गईं। प्रिया को लगने लगा कि विजय उसकी प्रगति में बाधा है। उसे विजय की सादगी ‘गंवारपन’ लगने लगी। एक दिन बहस इतनी बढ़ गई कि प्रिया ने कह दिया, “हमारा कोई मेल नहीं है विजय। तुम आज भी वहीं मज़दूर हो और मैं एक क्लास-वन ऑफिसर। हम साथ नहीं रह सकते।”

विजय ने प्रिया की आँखों में देखा। उन आँखों में अब वह प्यार नहीं था, सिर्फ़ सत्ता का अहंकार था। विजय ने शांति से कहा, “ठीक है प्रिया। अगर तुम्हें लगता है कि मेरी सादगी तुम्हारी वर्दी पर दाग है, तो मैं चला जाता हूँ।”

बिना किसी शोर-शराबे के, कागजों पर दस्तखत हुए और सात साल पुराना रिश्ता खत्म हो गया। प्रिया ने सोचा उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे सही फैसला लिया है। विजय वापस हरिपुर गाँव लौट आया और अपनी उसी पुरानी झोपड़ी में रहने लगा।

अध्याय 5: सात साल बाद की मुलाकात

वक्त का पहिया घूमा। प्रिया ने पद और प्रतिष्ठा तो बहुत कमाई, लेकिन उसके घर में सन्नाटा पसरा रहता था। उसे अक्सर विजय की वह सादगी याद आती थी। उसे अहसास हुआ कि विजय ने उसे वह बनाया जो वह आज है, लेकिन उसने विजय को क्या दिया? सिर्फ़ तिरस्कार।

इसी अहसास के बोझ तले दबी प्रिया सात साल बाद विजय के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने दरवाज़ा खटखटाया। विजय बाहर आया। वह पहले से काफी कमज़ोर लग रहा था, बाल सफेद हो चुके थे, लेकिन आँखों में वही ठहराव था।

“आप यहाँ? कोई काम है?” विजय ने ‘तुम’ की जगह ‘आप’ कहा। यह शब्द प्रिया के कलेजे को चीर गया।

अध्याय 6: गाँव का कड़वा सच

प्रिया झोपड़ी के अंदर गई। वहाँ सब कुछ वैसा ही था, सिर्फ़ प्रिया की किताबें अब धूल खा रही थीं। गाँव के लोग बाहर जमा हो गए थे। लक्ष्मी काकी, जो पड़ोस में रहती थीं, अंदर आईं और कड़वे स्वर में बोलीं, “अब क्यों आई हो मैडम? जब विजय शहर में काम ढूंढने गया था, तो लोगों ने उसका मज़ाक उड़ाया कि ‘आईपीएस की बीवी का नौकर’ आ गया। उसे झूठे केसों में फंसाया गया ताकि वह तुम्हारा नाम ले और तुम उसे छुड़ाओ। लेकिन इस आदमी ने जेल जाना मंज़ूर किया, पर तुम्हारा नाम कभी खराब नहीं होने दिया।”

प्रिया सन्न रह गई। उसे पता भी नहीं था कि विजय ने पर्दे के पीछे उसकी साख बचाने के लिए कितनी बड़ी कीमत चुकाई थी।

अध्याय 7: आत्मसम्मान की जीत

प्रिया ने रोते हुए विजय का हाथ पकड़ना चाहा। “विजय, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हें वापस लेने आई हूँ। मैं तुम्हारे लिए शहर में घर, गाड़ी और काम सब ठीक कर दूँगी।”

विजय ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसने बहुत धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “प्रिया, जब मैं आपके साथ था, तब मैं ‘इंसान’ था। जब आपने छोड़ा, तब मैं ‘छोटा’ हो गया। लेकिन आज, सात साल बाद, मैंने अपनी मेहनत से अपनी पहचान फिर से बनाई है। मुझे आपका अहसान नहीं चाहिए। मज़दूरी करके जो रोटी मैं खाता हूँ, उसमें कम से कम मेरा आत्मसम्मान तो है।”

प्रिया ने आख़िरी कोशिश की, “क्या हम फिर से शुरुआत नहीं कर सकते?”

विजय ने मुस्कुराते हुए कहा, “देर हो चुकी है मैडम। आपने पद चुना था, मैंने प्रेम। आज आपके पास पद है, और मेरे पास मेरा स्वाभिमान। अब हम कभी एक नहीं हो सकते।”

निष्कर्ष: एक अधूरा सफर

प्रिया अपनी सरकारी गाड़ी में वापस लौट रही थी। सायरन बज रहा था, लोग रास्ता छोड़ रहे थे, लेकिन प्रिया को महसूस हो रहा था कि वह आज सबसे बड़ी हार हार चुकी है। उसके कंधों के सितारे अब उसे बोझ लग रहे थे।

विजय आज भी उसी झोपड़ी में रहता है। वह गरीब ज़रूर है, लेकिन उसकी आत्मा स्वतंत्र है।

सवाल आपके लिए: अगर आप विजय की जगह होते, तो क्या प्रिया को माफ कर देते? क्या सफलता मिलने के बाद अपनों का साथ छोड़ देना जायज़ है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर लिखें।

नोट: यह कहानी हमें सिखाती है कि पद और पैसा अस्थायी हैं, लेकिन आत्मसम्मान और रिश्ते अनमोल हैं। कभी भी सफलता के नशे में उस नींव को मत भूलिए जिस पर आपकी इमारत खड़ी है।