तलाक़ के 5 साल बाद पति IAS बनकर मिला, तो पत्नी के होश उड़ गए…

“अहंकार, संघर्ष और पछतावा – तलाक के बाद आईएएस बने अर्जुन की कहानी”
भूमिका
समाज में अक्सर हम सफलता को बाहरी दिखावे, पद और पैसे से आंकते हैं। मगर असली संघर्ष, असली इज्जत उस आग में तपकर मिलती है जिसमें इंसान अपने सपनों, मेहनत और जज्बे को झोंक देता है। यह कहानी है बिहार के सिवान जिले के अर्जुन शर्मा की, जिसने रिश्तों के टूटने के बाद अपनी मेहनत से आईएएस बनकर न सिर्फ अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज को आईना भी दिखाया।
अर्जुन का बचपन और सपना
अर्जुन एक सरकारी स्कूल के ईमानदार शिक्षक का बेटा था। घर छोटा था, महंगी चीजें नहीं थीं, लेकिन किताबों की खुशबू और संस्कारों की दौलत थी। पिता हमेशा कहते,
“बेटा, इंसान की हैसियत तनख्वाह से नहीं, उसके सपनों से मापी जाती है।”
यही बातें अर्जुन के दिल में घर कर गई थीं। बचपन से ही उसका सपना था –
आईएएस बनना, सिस्टम बदलना, लोगों के लिए कुछ करना, अपनी मिट्टी को कुछ लौटाना।
रिया – तेज, आत्मविश्वासी और महत्वाकांक्षी
रिया एक तेज दिमाग वाली लड़की थी। पढ़ाई में सबसे आगे, परिवार में सबसे होशियार। उसकी जुबान तेज थी, सपनों में चमक थी। उसने भी अच्छी पढ़ाई की थी और घर में सब उसे गर्व से देखते थे।
शादी – उम्मीदें और शुरुआत
दोनों की शादी एक सामान्य भारतीय परिवारों की तरह रिश्तेदारों की पसंद, संस्कारों की मिलावट और सामाजिक दबाव में हो गई।
शुरुआत में सब ठीक था। रिया को लगा अर्जुन भले कम बोलता है, लेकिन उसकी मेहनत एक दिन उसे ऊपर ले जाएगी।
कुछ महीनों बाद रिया की जिला कार्यालय में क्लर्क की नौकरी लग गई।
पहला दिन, फॉर्मल कपड़े, हाथ में फाइलें, चारों तरफ लोग “मैडम-मैडम” कहकर संबोधित करते।
रिया को पहली बार एहसास हुआ कि दुनिया उसे पहचानने लगी है।
अर्जुन का संघर्ष और रिश्तों में दरार
दूसरी तरफ अर्जुन अभी भी नौकरी की तैयारी में लगा था।
दिनभर किताबों में डूबा रहता, रात को पिता के साथ स्कूल का थोड़ा बहुत काम कर देता ताकि माता-पिता पर बोझ न बढ़े।
पैसे कम थे, लेकिन दिल में आग ज्यादा थी।
यही अंतर धीरे-धीरे दोनों के रिश्ते में दूरी पैदा करने लगा।
रिया सरकारी नौकरी, वेतन और अपनी पहचान देख रही थी।
अर्जुन अभी तक बेरोजगार, सिर्फ सपनों के सहारे चल रहा था।
शुरुआत में रिया ने समझाया –
“ठीक है, पढ़ लो, तुम्हारा दिन भी आएगा।”
पर वक्त बीतने लगा, साल बदला, घर वालों की अपेक्षाएं बढ़ीं।
समाज की नजरें अब रिया को भी चुभने लगीं।
ऑफिस में सहकर्मी कहते –
“मैडम, आपका पति क्या करता है?”
जवाब – “तैयारी कर रहा है।”
पीछे से धीमी हंसी –
“अरे, पढ़ाई से क्या होता है? नौकरी चाहिए, नौकरी। कितना पढ़ेगा, कब तक?”
रिया सब बातें अंदर छिपाकर घर लौटती और ताने अर्जुन को सुनाने लगती –
कभी प्यार से, कभी गुस्से में, कभी अपमान में।
एक दिन रिया ने ताना दे ही दिया –
“तुम कितने साल और पढ़ाई करोगे? तुम्हारी वजह से मैं ही सबको जवाब देती घूमती हूं।”
अर्जुन ने शांत स्वर में कहा –
“सपना एक दिन पूरा होगा रिया, बस थोड़ा और साथ दो।”
लेकिन रिया बदल चुकी थी।
एक नौकरी लग जाने से उसे खुद को ऊंचा महसूस होने लगा था।
वह भूल गई थी कि सरकारी पहचान से बड़ा संस्कार और इंसानियत होती है।
तलाक – रिश्ते का अंत
धीरे-धीरे दोनों की राहें अलग होने लगीं।
झगड़े बढ़ने लगे, शब्द कड़वे हो गए।
रिया ऑफिस में इज्जत पाती, घर आकर झुंझलाती।
उसे लगता – “मैं कमाती हूं, और यह सिर्फ किताबी होता है।”
आखिर वह दिन आ ही गया जब गुस्से और अहंकार में रिया ने अर्जुन से कह दिया –
“मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। तुम्हारी पढ़ाई और भविष्य से मेरा जीवन रुक नहीं सकता। तलाक चाहिए मुझे।”
उस पल अर्जुन की आंखें नम तो हुईं, दिल टूटा भी, लेकिन वह बिखरा नहीं।
बस एक बात बोला –
“ठीक है रिया, अगर मेरी मेहनत तुम्हें बोझ लगती है तो मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं। पर याद रखना, किस्मत हमेशा एक ही जगह खड़ी नहीं रहती।”
तलाक हो गया।
रिया को लगा उसने बोझ उतार दिया।
अब न कोई ताने, न किसी बेरोजगार पति की चिंता, न किसी के सामने सफाई देने की जरूरत।
लेकिन किस्मत ने अभी अपना खेल दिखाया नहीं था।
अर्जुन का संघर्ष – टूटा, मगर बिखरा नहीं
तलाक के बाद वाली पहली रात अर्जुन अपने छोटे से कमरे में फाइलों और किताबों के बीच चुपचाप बैठा रहा।
आंखों में आंसू थे, ना गुस्सा, बस एक अजीब सा खालीपन।
पिता के कमरे से आती खांसी, मां की टूटी आवाज, चारों तरफ गरीबी की चुभन।
सब उसकी छाती में घुसते जा रहे थे।
लेकिन उस रात उसने महसूस किया –
“इंसान की असली ताकत टूटने के बाद पता चलती है।”
वह पूरी तरह टुकड़ों-टुकड़ों में था।
मगर टूटे हुए कांच की धार कभी-कभी सबसे ज्यादा तेज होती है और वही धार अब उसकी मेहनत बनने वाली थी।
नया सफर – खुद को साबित करना
अगले ही दिन वह बैग लेकर शहर छोड़कर निकल गया – अपने आप को साबित करने।
एक सस्ती चाय की दुकान के ऊपर छोटा सा कमरा किराए पर लिया।
दीवारें धुंधली, छत में दरारें, एक पंखा जो गर्म हवा फेंकता था और एक बल्ब जो रात के अंधेरे को पूरा काट नहीं पाता था।
वहीं उसने यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी।
किताबें, नोट्स, ऑनलाइन क्लास, हजारों सपनों की धड़कनें।
वही उसका संसार बन गया।
कभी लाइब्रेरी में नोट्स बनाता, कभी दिनभर लाइब्रेरी में पीठ झुका कर पढ़ता।
उसकी दुनिया बस दो शब्दों में सिमट गई थी – मेहनत और सपना।
संघर्ष, असफलता और उम्मीद
संघर्ष आसान नहीं था।
दिल्ली जैसा बड़ा शहर, छोटा कमरा, सर पर जिम्मेदारियों का पहाड़।
पैसे कम थे।
ट्यूशन पढ़ाता ताकि कुछ पैसे किताबों और फॉर्म भरने में लग सके।
रात को कभी नींद न आने पर वह आसमान को देखता –
जहां सितारे चमकते, जैसे उसके दर्द को समझते हों।
उनकी चमक उसे याद दिलाती –
“अंधेरा चाहे कितना भी घना हो, सुबह जरूर आती है।”
लेकिन जब हताशा उसे पकड़ लेती, तब रिया के शब्द तलवार की तरह उसकी यादों में उतरते –
“तुम्हारे बस का कुछ नहीं है। मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।”
यही शब्द उसकी रातों का ईंधन बन गए थे।
वह और अधिक पढ़ता, और अधिक मेहनत करता, और अधिक जुनून के साथ लड़ता।
सफलता – आईएएस बनने का सफर
पहली बार प्रीलिम्स दिया, फेल।
दूसरी बार दिया, फिर फेल।
लेकिन लड़ाई वही जीतता है जो आखिरी सांस तक मैदान नहीं छोड़ता।
तीसरी बार उसने खुद को पूरी तरह झोंक दिया।
दिन-रात एक कर दिया।
रिजल्ट का दिन आया।
अर्जुन कांपते हाथों से मोबाइल की स्क्रीन खोला, रोल नंबर टाइप किया, एंटर दबाया।
कुछ सेकंड की सांसें रुक गईं और फिर –
एआईआर 62, यूपीएससी सीएसई सिलेक्टेड – आईएएस।
उसने अपनी किताबों को कसकर गले लगाया।
आंखों में बरसों की थकान, लेकिन उस थकान में आज एक ऐसी चमक थी जिसे कोई हार कभी नहीं बुझा सकती थी।
उसने आसमान की तरफ देखा –
वही आसमान जो उसकी हर रात का गवाह था, जब वह अकेला था, भूखा था, हर ताना उसके दिल में तीर बनकर उतरता था।
आज वही आसमान उसकी जीत देख रहा था।
घर फोन किया –
पिता की कांपती आवाज – “हां बेटा, बोल।”
“पापा, मैं आईएएस बन गया।”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर रोने की आवाजें – गर्व, खुशी, बरसों की तपस्या की।
मां सिसकते हुए बोली –
“तूने हमारी दुनिया बदल दी बेटा।”
पहली पोस्टिंग – किस्मत का खेल
कुछ हफ्तों बाद ट्रेनिंग पर गया।
फिर पोस्टिंग लिस्ट आई।
उसकी पहली पोस्टिंग उसी जिले में थी जहां रिया पिछले 7 साल से क्लर्क की नौकरी कर रही थी।
किस्मत फिर एक मोड़ पर खड़ी थी – शांत, लेकिन सब कुछ पलट देने वाली।
रिया का पछतावा
रिया को कुछ भी पता नहीं – न रिजल्ट, न ट्रेनिंग, न पोस्टिंग।
वह अब भी उसी दफ्तर की फाइलों के बीच अपनी जिंदगी घसीट रही थी।
थोड़ी थकान, थोड़ी खामोशी, थोड़े से पछतावे में।
उसे क्या पता कि जिस आदमी को उसने अयोग्य कहकर छोड़ दिया था, वह अब उसी शहर में अधिकारी बनकर आने वाला है।
वो मुलाकात – वक्त ठहर गया
नए एसडीएम की पोस्टिंग की खबर जिले में पहुंची।
पूरा ऑफिस मुख्य हॉल में लाइन बनाकर खड़ा था।
फाइल सेक्शन, अकाउंट्स, ड्राइवर, चपरासी, सफाई कर्मचारी – सब सलीके से खड़े थे।
रिया भी उन सबके साथ खड़ी थी।
हवा में हल्का तनाव, हल्की उत्तेजना, थोड़ा उत्साह और थोड़ा डर।
सरकारी सफेद जीप धीरे से पोर्टिको के नीचे रुकी।
ड्राइवर उतरा, गार्ड दाएं-बाएं खड़े हुए।
रिया की सांसे फंस गईं।
जीप का पिछला दरवाजा खुला।
एक कदम बाहर निकला – मजबूत, आत्मविश्वासी, संयम भरा।
फिर चेहरा – वही चेहरा जिसे कभी उसने छोड़ दिया था, कमतर समझा था, कहा था – “तुम्हारे बस का कुछ नहीं।”
आज वही चेहरा आईएएस अधिकारी बनकर उसके सामने खड़ा था।
रिया की आंखें फैल गईं, उंगलियां सुन्न हो गईं, धड़कन इतनी तेज हो गई कि उसे अपने सीने तक की आवाज सुनाई देने लगी।
वह सिर्फ एक पल था।
लेकिन उस एक सेकंड में 7 साल पुराने सारे जख्म फिर से खुल गए थे।
अर्जुन की नजर भीड़ से गुजरती हुई कुछ सेकंड के लिए रिया पर ठहरी।
वह नजर नफरत की नहीं थी, गुस्से की नहीं, किसी हिसाब-किताब की नहीं।
वह नजर बस एक शांत स्वीकारोक्ति थी – “मैं अब पहले वाला आदमी नहीं हूं।”
रिया का गला सूख गया।
वह चाहकर भी नमस्ते की आवाज नहीं निकाल पाई, बस हल्का सा सिर झुका लिया।
अर्जुन आगे बढ़ गया, उसके सामने से गुजरा – बिना रुके, बिना कुछ कहे, बिना एक पल भी अतिरिक्त हरकत।
रिया ने महसूस किया कि उसके पैरों से जैसे जमीन खिसक गई हो।
वह अंदर ही अंदर हिल चुकी थी।
स्टाफ उसे घेरे रहा, फाइलें, परिचय, औपचारिक बातें – सब उसकी वहां मौजूदगी की गवाही दे रहे थे।
लेकिन रिया चुपचाप अपने भीतर गिर रही थी।
पछतावे की रात
घर जाते समय उसने बार-बार उसी सरकारी जीप के निशान को देखा जो कुछ घंटे पहले ऑफिस के पोर्टिको से गुजरी थी।
वही जीप जिसमें वह आदमी बैठा था जिसे वह कभी अयोग्य समझती थी।
आज ट्रैफिक में खड़े-खड़े उसकी आंखें बार-बार भर आतीं।
वह खुद से बोलती – “इतनी बड़ी गलती मैंने की कैसे?”
घर पहुंचते ही वह बिस्तर पर गिर पड़ी।
पूरी दुनिया उसके ऊपर आ गिरी थी।
वह खुद को संभाल नहीं पाई और फूट-फूट कर रोने लगी।
उसे लग रहा था कि भगवान ने उसकी सबसे बड़ी भूल को उसी शहर में लाकर उसके सामने खड़ा कर दिया है ताकि वह हर सेकंड अपनी गलती का बोझ महसूस करे।
माफी और स्वीकारोक्ति
अगले दिन ऑफिस में कदम रखते ही उसकी आंखें दरवाजे पर चली गईं – अर्जुन के कमरे की तरफ।
मन में एक ही बात – “आज कह देना है सब सच।”
लेकिन दोपहर तक हिम्मत जुटा ही नहीं पाई।
कभी फाइलें देने का बहाना, कभी पानी लेने का।
हर बार दरवाजे के पास जाकर वापस लौट आती।
शाम को ऑफिस लगभग खाली था।
अर्जुन केबिन में बैठा फाइलें पढ़ रहा था – बिल्कुल शांत, बिल्कुल संयमित।
रिया धीरे-धीरे केबिन तक गई।
दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि शरीर कांप रहा था।
दरवाजे पर बहुत धीमे से दस्तक दी।
अर्जुन ने बिना ऊपर देखे कहा – “हां, आइए।”
स्वर में कोई भाव नहीं था – न पहचान, न घृणा, न अपनापन।
रिया अंदर आई, आंखें भर आईं।
खुद को संभालने के लिए 2 सेकंड लिए।
फिर धीमी कांपती आवाज में बोली –
“अर्जुन, मुझे आपसे बात करनी है, प्लीज।”
यह पहली बार था जब अर्जुन ने फाइल से नजर उठाई।
चेहरे पर हल्की सी हैरानी भी नहीं थी, जैसे वह तैयार था किसी भी औपचारिक या अनौपचारिक बात के लिए।
लेकिन भावनाओं की कोई उम्मीद उसने खुद से ही निकाल दी थी।
रिया ने पलकें झुकाई और धीरे-धीरे बोली –
“मैं जानती हूं, आपके लिए मैं अब कुछ नहीं हूं और शायद होनी भी नहीं चाहिए।
पर आज मैं बोझ लेकर नहीं जी सकती।
मैं आपसे माफी मांगना चाहती हूं।”
अर्जुन ने शांत स्वर में कहा –
“माफी किस बात की?”
उसकी आवाज की यही शांति रिया के दिल को सबसे ज्यादा चुभ रही थी।
रिया रोते हुए बोली –
“उस सब बात के लिए जो मैंने तुम्हें कहा था, तुम्हारे बारे में सोचा, तुम्हारी मेहनत पर शक किया, तुम्हारे सपनों का मजाक उड़ाया।
मैं बहुत गलत थी, अर्जुन, बहुत गलत।
तुम्हारे जाने के बाद मैंने शादी कर ली थी।”
यह सुनकर अर्जुन की आंखों में पहली बार हल्की सी हरकत हुई, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
रिया बोली –
“मैंने सोचा था कि जिंदगी आसान हो जाएगी।
मुझे लगा था कि मैं तुमसे कहीं बेहतर किसी के साथ खुश रह पाऊंगी।
लेकिन जिस आदमी से शादी की, वह शराबी था, गुस्सैल था, उसने मुझे मारा, अपमानित किया, और फिर उसने भी मुझे छोड़ दिया।
तलाक हो गया।
मां-बाप ने भी ठुकरा दिया।
आज मैं अकेली हूं, बिल्कुल अकेली।
हर रात मुझे लगता है कि मेरी सबसे बड़ी मूर्खता तुम्हें छोड़ना था।
हो सके तो मुझे माफ कर दो।
अगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए एक भी कोना बचा हो तो एक मौका दे दो।
मैं कहीं से तुम्हारे लायक नहीं हूं, पर अगर तुम कह दो तो बाकी जिंदगी तुम्हारे कदमों में काट दूंगी।”
कमरा पूरी तरह खामोश था।
बस रिया की सुबकियां दीवारों से टकरा कर लौट रही थीं।
अर्जुन ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर सिर उठाया – आंखों में गुस्सा नहीं था, प्रतिशोध नहीं था, बस एक परिपक्व शांत थकान थी।
जैसे वह अतीत को इतनी बार चल चुका हो कि अब उसके पास सिर्फ राख बची है।
वह धीरे से बोला –
“रिया, तुमने मुझे उस वक्त छोड़ा था जब मैं सबसे कमजोर था, जब मुझे एक साथ ही एक भरोसा चाहिए था।
तुम चली गईं और मैं टूट गया।
लेकिन इस टूटन ने मुझे बनाया भी।”
फिर एकदम शांत स्वर में बोला –
“मैं तुम्हें माफ करता हूं।”
रिया की आंखें चमक उठीं –
“तो क्या…क्या तुम…”
अर्जुन ने सिर हिलाकर साफ कहा –
“नहीं रिया, माफ कर देना और वापस अपनाना दो अलग बातें हैं।
मैंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया है इस मुकाम तक पहुंचने में और अब जब मैं यहां हूं, मैं अतीत को वापस नहीं दोहराना चाहता।
मैं आगे बढ़ चुका हूं।
मैं अपने उस संस्करण में लौटना नहीं चाहता जिसे तुमने तोड़ दिया था।”
रिया वहीं खड़ी रही – जड़, सुन, टूटी हुई।
अर्जुन ने बहुत धीरे, बहुत नरमी से कहा –
“तुमने गलतियां कीं, मैंने भी जिंदगी से सीखा, लेकिन मैं वापस नहीं आऊंगा।
तुम्हें माफ है, पर तुम्हारे लिए मेरे जीवन में अब जगह नहीं है।”
रिया के होंठ कांपने लगे, पांव जवाब दे गए।
वो दीवार से टिक गई और रोते-रोते फुसफुसाई –
“तो मेरी सजा क्या है?”
अर्जुन ने शांत स्वर में कहा –
“सजा…सजा तो तुम झेल चुकी हो रिया।
वही जो इंसान खुद अपनी गलतियों से पाता है – पछतावा, अकेलापन और वह टीस जो जिंदगी भर चुभती रहती है।”
रिया जोर से रो पड़ी।
आज उसका दिल पूरी तरह टूट गया था और वह टूटन अब कभी नहीं भरेगी।
अर्जुन ने नजरें झुका ली और कमरे से निकल गया।
बिना पीछे देखे रिया वहीं खड़ी रह गई – अपने ही किए पापों की राख में डूबती हुई।
संदेश
काश समय लौट आता।
लेकिन समय कभी नहीं लौटता, बस सिखाता है।
दोस्तों, किसी इंसान की कीमत उसके संघर्षों से मापना सीखो।
आज जो सफल है, वही कल तुम्हारी कल्पना से भी ऊंचा उठ सकता है।
अहंकार रिश्तों को तोड़ देता है और टूटे हुए रिश्तों का पछतावा उम्र भर जलाता है।
सवाल
क्या आपको लगता है कि रिया को दूसरा मौका मिलना चाहिए था?
क्या इंसान अपनी गलती सुधार सकता है या कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जो जिंदगी भर पीछा करती हैं?
कमेंट में अपना जवाब जरूर दें।
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मिलते हैं अगले वीडियो में। तब तक खुश रहिए।
समाप्त
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