तलाक के बाद दूसरी शादी के मंडप में घमंड से बुलाया पहली पत्नी को…पत्नी आई तो जो हुआ, इंसानियत रो पड़ी

सत्य की विजय: अहंकार और प्रायश्चित की एक गाथा

बिहार की राजधानी पटना, अपनी ऐतिहासिक गरिमा और गंगा के शांत किनारों के लिए जानी जाती है। इसी शहर के एक पुराने मोहल्ले की संकरी गलियों में, जहां हर सुबह मंदिर की घंटियों और अज़ान की आवाज़ें एक साथ हवा में तैरती थीं, अमन का छोटा सा घर था। अमन एक निजी कंपनी में मध्यम स्तर की नौकरी करता था। उसके माता-पिता के लिए वह उनकी दुनिया का केंद्र था। घर में सुख-शांति तो थी, लेकिन एक कमी सबको खलती थी—घर के आंगन में किसी बच्चे की किलकारी का न गूंजना।

इसी कमी को पूरा करने के लिए अमन की शादी कविता से हुई। कविता, जो न केवल दिखने में सौम्य थी, बल्कि जिसका मन भी गंगा के जल की तरह पवित्र था।

विवाह और उम्मीदों का बोझ

शादी के शुरुआती दिन किसी उत्सव की तरह बीते। कविता ने पूरे समर्पण के साथ अमन के घर को अपनाया। ससुर की सेवा, सास के साथ रसोई का काम और अमन की हर छोटी जरूरत का ध्यान रखना—कविता के लिए यह कोई बोझ नहीं, बल्कि उसका धर्म था। अमन भी खुश था, उसे लगता था कि उसे संसार की सबसे समझदार पत्नी मिली है।

लेकिन समय का पहिया जैसे-जैसे आगे बढ़ा, समाज और परिवार की उम्मीदें भारी होने लगीं। शादी के दो साल बीत गए, फिर तीन। अब रिश्तेदारों की फुसफुसाहट ताने बनने लगी थी। “घर सूना है,” “वंश कैसे बढ़ेगा?”—ये सवाल कविता के सीने में तीर की तरह चुभते थे। डॉक्टरों के चक्कर शुरू हुए। पटना के बोरिंग रोड से लेकर कंकड़बाग तक के हर बड़े अस्पताल की फाइलों में कविता का नाम दर्ज हो गया।

एक गलत रिपोर्ट और टूटता रिश्ता

एक दिन, एक स्थानीय क्लिनिक की रिपोर्ट ने अमन के परिवार में भूचाल ला दिया। उस रिपोर्ट में लिखा था कि कविता कभी माँ नहीं बन सकती। वह रिपोर्ट दरअसल एक तकनीकी गलती थी, लेकिन उस वक्त अमन के अहंकार और उसके परिवार की हताशा ने किसी और जांच की जरूरत नहीं समझी।

अमन का व्यवहार बदलने लगा। जो पति कभी कविता के साथ घंटों बातें करता था, अब वह घर आते ही मुंह फेर लेता। घर में कलह रहने लगी। एक रात, अमन ने अपने अहंकार की चरम सीमा पर जाकर वह फैसला सुना दिया जिसने कविता की रूह कंपवा दी। “मुझे तलाक चाहिए।”

कविता रोई, गिड़गिड़ाई, उसने इलाज जारी रखने की भीख मांगी, लेकिन अमन का मन पत्थर हो चुका था। उसने समाज के तानों से बचने के लिए अपनी वफादार पत्नी की बलि चढ़ा दी। तलाक हो गया और कविता अपने बूढ़े माता-पिता के पास लौट आई।

कविता का संघर्ष और नया जीवन

तलाक के सदमे के बीच कविता को एक और सच्चाई का पता चला—वह गर्भवती थी। वह रिपोर्ट वाकई गलत थी। कविता की आंखों में आंसू थे, पर ये आंसू कमजोरी के नहीं थे। उसने फैसला किया कि वह इस बच्चे को अकेले पालेगी। उसने अमन को कोई खबर नहीं दी। “जिसने मुझे त्याग दिया, उसे इस बच्चे पर कोई अधिकार नहीं,” उसने खुद से कहा।

पटना के एक छोटे से किराए के कमरे में कविता ने संघर्ष शुरू किया। उसने सिलाई-कढ़ाई की, ट्यूशन पढ़ाया और अपने आत्मसम्मान को आंच नहीं आने दी। कुछ महीनों बाद उसने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम रखा—आरव। आरव कविता के जीवन का ध्रुव तारा बन गया।

अमन का अहंकार और दूसरी शादी

उधर, अमन की जिंदगी बाहर से बहुत सफल दिख रही थी। उसकी पदोन्नति हुई, पैसे आए, लेकिन घर का सन्नाटा उसे हर रात डराता था। माँ-बाप के दबाव में आकर उसने दूसरी शादी के लिए हामी भर दी। लड़की थी नेहा—पढ़ी-लिखी और आधुनिक।

शादी की तैयारियां जोरों पर थीं। अमन के मन में अब भी कविता के प्रति एक अजीब सी कड़वाहट और अहंकार था। उसे लगा कि कविता अब भी उसे याद करके रो रही होगी। अपने इसी अहंकार को संतुष्ट करने के लिए उसने एक घृणित कदम उठाया। उसने अपनी दूसरी शादी का निमंत्रण कार्ड कविता को भेजा। वह उसे दिखाना चाहता था कि वह उसके बिना कितना खुश है और कैसे आगे बढ़ चुका है।

वह ऐतिहासिक मंडप

पटना के एक आलीशान मैरिज हॉल में अमन और नेहा की शादी का मंडप सजा था। रोशनी ऐसी थी कि रात भी दिन लग रही थी। ढोल-नगाड़े बज रहे थे। अमन दूल्हे के लिबास में घमंड से भरा बैठा था। तभी, भीड़ को चीरती हुई एक सादे लिबास में औरत अंदर आई। वह कविता थी।

उसके गोद में एक छोटा सा बच्चा था, जिसकी आंखें हूबहू अमन जैसी थीं। मंडप में सन्नाटा छा गया। पंडित के मंत्र रुक गए। लोग फुसफुसाने लगे, “यह तो अमन की पहली पत्नी है! गोद में बच्चा किसका है?”

अमन के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। कविता धीरे-धीरे मंडप तक पहुंची। उसने अमन की आंखों में आंखें डालकर देखा। उस नजर में नफरत नहीं, बल्कि एक गहरी सच्चाई थी।

आरव ने मासूमियत से पूछा, “मम्मा, ये कौन हैं?” कविता ने शांत स्वर में कहा, “आरव, ये तुम्हारे पापा हैं।”

यह सुनते ही अमन के हाथ से जयमाला गिर गई। कविता ने अपने साथ लाए हुए मेडिकल पेपर और आरव का जन्म प्रमाण पत्र अमन की ओर बढ़ा दिया। उसने बताया कि कैसे एक गलत रिपोर्ट ने उनकी दुनिया उजाड़ी थी और कैसे उसने अकेले आरव को पाला।

मानवता की जीत और पछतावा

मंडप में मौजूद वह डॉक्टर, जिसने गलत रिपोर्ट दी थी (जो संयोगवश उस शादी में मेहमान था), खड़ा हुआ और उसने अपनी गलती स्वीकार की। अमन का सारा घमंड मिट्टी में मिल गया। वह सबके सामने घुटनों के बल बैठ गया और कविता के पैर पकड़कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दो कविता! मैंने अपने ही खून को ठुकरा दिया।”

नेहा, जो दुल्हन के लिबास में थी, वह भी यह सब देखकर सन्न रह गई। लेकिन वह एक नेक दिल औरत थी। उसने अमन के हाथ से अपनी जयमाला उतार दी। उसने कहा, “मैं किसी और की तबाही पर अपनी खुशियों का महल नहीं खड़ा कर सकती। अमन, तुम्हारा असली स्थान कविता और आरव के पास है।”

शादी की रस्में वही रुक गईं। जो मंडप अमन के अहंकार का प्रतीक बनने वाला था, वह उसके प्रायश्चित का गवाह बना। नेहा ने स्वयं कविता और अमन का हाथ एक-दूसरे के हाथ में दिया। अमन ने आरव को पहली बार गोद में उठाया और फूट-फूटकर रो पड़ा।

एक नई शुरुआत

उस रात कोई दूसरी शादी नहीं हुई। बल्कि एक पुराना, टूटा हुआ रिश्ता फिर से जुड़ा। अमन ने कविता से दोबारा शादी की, लेकिन इस बार कोई दिखावा नहीं था। केवल आंखों में आंसू और मन में सम्मान था।

यह कहानी पटना की गलियों से निकलकर हर उस इंसान के लिए एक सबक बन गई जो अहंकार में आकर रिश्तों को पैरों तले कुचल देते हैं।

निष्कर्ष: सत्य को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। और एक माँ का संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। अहंकार इंसान को अंधा कर देता है, लेकिन प्रायश्चित की आग उसे फिर से पवित्र कर सकती है।

शिक्षा: किसी भी रिश्ते को तोड़ने से पहले सत्य की तह तक जाना जरूरी है। संतान न होना केवल स्त्री का दोष नहीं होता, और अहंकार हमेशा पतन का कारण बनता है।