तीन महिला साधु को तलाकशुदा आदमी ने एक रात की पनाह दी…सुबह भयानक सच सामने आया, दुनिया हिल गई। Story

गेरुआ वस्त्रों के पीछे का सच
रात के 11:00 बज चुके थे। पूरा गांव गहरी नींद में डूबा था। दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था। तभी रमेश ने अपने घर का दरवाजा खोला। सामने का दृश्य देखते ही उसका दिल जोर से धड़क उठा। तीन औरतें गेरुआ वस्त्रों में खड़ी थी। उनके चेहरे थकान से झुके हुए थे। आंखों के नीचे गहरे काले घेरों में कई दिनों की भूख और डर छुपा था। पैर सूजे हुए थे। कपड़े धूल से अटे हुए। इस वीरान गांव में आधी रात को ऐसी हालत में तीन साध्वियां।
रमेश एक पल को सन्न रह गया। मन में अजीब सा डर उतर आया। इस गांव में लोग बातों को बढ़ा चढ़ाकर सुनाने में देर नहीं लगाते। ऊपर से वह खुद तलाकशुदा था। पत्नी एक साल पहले 8 साल के बेटे आदित्य को लेकर शहर चली गई थी। तब से अकेला रह रहा था। गांव वालों की निगाहें हमेशा उस पर टिकी रहती थी। सबसे आगे खड़ी साध्वी ने दोनों हाथ जोड़ दिए। आवाज में कमजोरी थी लेकिन आंखों में उम्मीद।
“बेटा, हम तीर्थ यात्रा से लौट रहे थे। रास्ता भटक गए हैं। बस सुबह तक कहीं ठहरने की जगह चाहिए।”
रमेश कुछ बोल नहीं पाया। दिमाग में सवालों की भीड़ थी। अगर किसी ने देख लिया तो क्या कहेगा? आधी रात को तीन औरतें उसके घर… गांव वालों को मसाला मिल जाएगा। लेकिन उसी पल उसे अपनी मां की बात याद आ गई। “साधु संतों की सेवा सबसे बड़ा धर्म होती है बेटा।” उसने बिना कुछ सोचे दरवाजा पूरा खोल दिया। “अंदर आइए माताजी। यह मेरा घर है। जब तक चाहे रहिए।”
तीनों औरतें धीरे-धीरे अंदर आई। रमेश ने उन्हें अपने छोटे से कमरे में बिठाया और रसोई से पानी लेकर आया। पास से देखने पर उनकी हालत और साफ दिख रही थी। बीच वाली औरत की उम्र करीब 45 के आसपास रही होगी। चेहरे पर गहरी पीड़ा जमी थी। तीसरी सबसे छोटी थी शायद 25-26 की।
“क्या घर में कुछ खाने को है?” बड़ी साध्वी ने पूछा।
“हां माता जी मैं बना देता हूं।” रमेश ने कहा और रसोई में चला गया। जब वो खिचड़ी बनाकर लौटा तो देखा तीनों चुपचाप बैठी थी। खाना खाते समय बीच वाली औरत की आंखों से आंसू टपक पड़े। उसने जल्दी से सिर झुका लिया। रमेश ने देख लिया लेकिन कुछ नहीं पूछा। रात गहराती गई। रमेश ने तीनों को कमरे में सुला दिया और खुद बाहर बरामदे में चटाई बिछाकर लेट गया।
आंखें बंद थी लेकिन नींद कोसों दूर थी। मन में एक अनजाना डर था। कहीं कोई देख ना ले, कहीं कोई सवाल ना उठा दे। सुबह के करीब 5:00 बजे अचानक उसकी नींद खुल गई। अंदर कमरे से हल्की-हल्की आवाजें आ रही थी। रमेश चौंक गया। वो दबे पांव खिड़की के पास गया। जो उसने देखा उससे उसकी सांस अटक गई। तीनों औरतें अपने गेरुआ वस्त्र उतार रही थी। नीचे साधारण कपड़े थे। बड़ी वाली ने माथा पोछा तो बिंदी साफ दिखी। बीच वाली ने अपनी चोटी खोल ली। तीसरी लड़की ने चूड़ियां निकाली जो उसने कपड़ों में छिपा रखी थी।
“अम्मा अब क्या करेंगे? पैसे भी खत्म हो गए।” छोटी लड़की रो पड़ी।
बड़ी औरत ने उसे चुप कराया। “भगवान ने इस इंसान के रूप में सहारा भेजा है। सुबह निकल जाएंगे।”
रमेश वही जड़ हो गया। उसके सामने सब साफ था। यह साध्वियां नहीं थी। यह साधारण औरतें थी जो किसी मजबूरी में यह वेश अपनाए हुए थी। उसका मन किया कि अभी जाकर पूछे लेकिन कदम नहीं बढ़े। शायद इनकी मजबूरी उससे कहीं बड़ी थी। कुछ देर बाद वह वापस लेट गया। दिल भारी था।
सुबह जब सूरज निकला तो तीनों फिर से गेरुआ वस्त्रों में थी। मानो रात की सच्चाई कभी थी ही नहीं। वे जाने को तैयार थी। “रुकिए माता जी, पहले नाश्ता कर लीजिए।” रमेश ने कहा। नाश्ते के बाद उन्होंने जाने की अनुमति मांगी। तभी रमेश ने हिम्मत जुटाई। “माताजी, एक बात पूछूं क्या आप सच में साध्वी हैं?”
तीनों सन्न रह गई। बीच वाली औरत की आंखें भर आई। बड़ी औरत ने सिर झुका लिया। “नहीं बेटा हम साध्वी नहीं है। हम तीन बेसहारा औरतें हैं।”
रमेश के पैरों तले जमीन खिसक गई। रमेश कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा। उसके कानों में बड़ी औरत के शब्द गूंज रहे थे। “तीन बेसहारा औरतें।” कमरे में अजीब सी खामोशी भर गई थी। बाहर से सुबह की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी। लेकिन रमेश के भीतर अंधेरा था। उसने इशारे से तीनों को बैठने को कहा। गला सूख रहा था। बड़ी औरत ने खुद ही बोलना शुरू किया।
“मेरा नाम सुमित्रा है। यह मेरी बेटी कविता है और यह मेरी भतीजी रेखा। हम साध्वी नहीं है। मजबूरी ने यह वेश पहनाया है।”
रमेश की नजरें झुकी हुई थी। वो बिना टोके सुनता रहा। “हम हरिद्वार के पास के एक गांव से हैं। मेरे पति की मौत के बाद घर में बस यह दो बीघा जमीन बची थी। सोचा था बेटी की शादी कर दूंगी लेकिन मेरे देवर की नियत उस जमीन पर थी।” सुमित्रा की आवाज कांप रही थी। “पहले प्यार से समझाया फिर धमकाया। जब मैंने जमीन देने से मना किया तो उसने गांव में अफवाह फैला दी कि मेरा किसी गैर मर्द से रिश्ता है।”
रेखा की मुट्ठियां खिंच गई। “गांव वालों ने कुछ नहीं सुना। मौसी और दीदी को मारा। घर जला दिया। पुलिस में गए तो उल्टा हमें ही दोषी बना दिया।”
कविता की आंखों से आंसू गिरने लगे। “हमारे पास कुछ नहीं बचा। बस जान बचाकर भागे। तभी यह वेश अपनाया क्योंकि साध्वी बन जाए तो कोई सवाल नहीं करता। कोई गलत नजर से नहीं देखता।”
रमेश की छाती भारी हो गई। उसे अपनी जिंदगी याद आ गई। जब उसकी पत्नी ने उस पर झूठे आरोप लगाए थे। तब भी किसी ने उसकी बात नहीं सुनी थी। सबने एक ही नजर से देखा था। “अब आगे क्या सोच रखा है?” उसने धीरे से पूछा।
“पता नहीं बेटा, किसी शहर में काम मिल जाए यही आस है। पैसे खत्म हो चुके हैं। कल से भूखे हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। तभी कविता ने अपने कपड़ों के अंदर से एक पुरानी मुड़ी-तोड़ी तस्वीर निकाली। “यह मेरा बेटा है। उसका नाम शिवम है।”
रमेश ने जैसे ही तस्वीर देखी, उसका हाथ कांप गया। तस्वीर उसके हाथ से फिसलते फिसलते बची। उसमें जो बच्चा था, वह हूबहू आदित्य जैसा था। “यह तस्वीर कब की है?” उसने संभलकर पूछा।
“6 साल पुरानी।” कविता की आवाज भर गई। “मेरे पति ने मुझ पर झूठा इल्जाम लगाया और बेटे को मुझसे छीन लिया। कहा कि मैं उसे कभी नहीं ढूंढ पाऊंगी।”
रमेश की सांसे तेज हो गई। उसकी पत्नी ने भी तो यही कहा था कि आदित्य का असली नाम शिवम था और उसने नाम बदल दिया था। उसने हिम्मत करके पूछा, “आपके पति का नाम क्या था?”
“अनिकेत।” कविता ने जवाब दिया।
रमेश के सिर में जैसे बिजली कड़क गई। यही नाम उसकी पत्नी ने भी लिया था। वही कहानी, वही बच्चा। सब कुछ जुड़ता जा रहा था। उसने बिना कुछ कहे फोन उठाया और शहर में रहने वाली पत्नी को कॉल किया। कई बार घंटी गई। फिर फोन उठा। “क्या चाहिए?” आवाज में बेरुखी थी।
“एक सवाल है। आदित्य की असली मां कौन है?”
दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया। “सच बताओ।” रमेश की आवाज भारी थी। फोन कट गया। उसने दोबारा कॉल किया। अब फोन बंद था।
कविता ने रमेश की हालत देख ली। “मेरा बेटा तुम्हारे पास है ना?”
रमेश की आंखें भर आई। उसने सिर हिला दिया। “हां, उसका नाम आदित्य रखा गया है। लेकिन अब समझ आ रहा है कि वह तुम्हारा शिवम है।”
कविता रो पड़ी। सुमित्रा और रेखा उसे संभालने लगी। “मुझे उससे मिलना है। बस एक बार।” कविता ने हाथ जोड़ दिए।
रमेश ने गहरी सांस ली। उसे समझ आ गया था कि यह सिर्फ तीन औरतों की कहानी नहीं है। यह उसके अपने बेटे की भी सच्चाई है। “मैं तुम्हें उससे मिलवाऊंगा। आज ही।” कमरे में बैठे चारों लोगों को पहली बार लगा कि शायद इस अंधेरे के बाद कोई सुबह भी हो सकती है।
रमेश ने बिना कुछ कहे बाइक की चाबी उठा ली। कमरे में बैठे तीनों औरतें उसकी तरफ देख रही थी। कविता की आंखों में डर भी था और उम्मीद भी। सुमित्रा ने कुछ कहना चाहा लेकिन शब्द नहीं निकले। रेखा चुपचाप खड़ी रही। “अभी चलना होगा।” रमेश ने बस इतना कहा। कविता ने सिर हिला दिया। उसके हाथ कांप रहे थे। 6 साल का इंतजार अब खत्म होने वाला था या फिर टूटने वाला था, यह उसे खुद भी नहीं पता था।
रास्ते भर बाइक की आवाज के अलावा कुछ नहीं था। कविता पीछे बैठी थी। उसका माथा रमेश की पीठ से लगा हुआ था। आंखें बंद थी। यादें खुली थी। कभी शिवम की हंसी याद आती कभी उसका रोना कभी वो रात जब उसे बेटे से अलग कर दिया गया था।
शहर करीब आता जा रहा था। रमेश के भीतर भी तूफान था। जिस बच्चे को वह अपना बेटा मानकर जी रहा था, वह किसी और की गोद से छीना गया था। उसने कभी उस सच को जानने की कोशिश नहीं की। शायद इसलिए कि वह सच से डरता था। घर के सामने बाइक रुकी। वही दरवाजा, वही दीवारें, वही आंगन। 8 साल का शिवम स्कूल बैग लटकाए बाहर खड़ा था। जूते उतार रहा था। रमेश उसे रोज इसी तरह देखता था। लेकिन आज नजरें ठहर गई।
कविता बाइक से उतरी। उसके पैर जमीन पर टिक नहीं पा रहे थे। उसने एक कदम आगे बढ़ाया। फिर रुक गई। शिवम ने उसे देखा। कुछ पल तक देखता रहा जैसे दिमाग में कुछ तलाश रहा हो। फिर वो धीरे से बोला, “मम्मा?”
कविता वही टूट गई। उसने दौड़कर शिवम को सीने से लगा लिया। 6 साल की चुप्पी एक ही पल में रोने में बदल गई। “मैंने रोज आपको याद किया, मम्मा।” बच्चे की आवाज कांप रही थी।
रमेश वही खड़ा सब देख रहा था। आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन वह पोंछ नहीं रहा था। यह उसका दर्द नहीं था। यह उस मां का हक था जो अपने बच्चे से छीन ली गई थी। घर का दरवाजा खुला। रमेश की पत्नी बाहर आई। कविता को देखते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया। “तुम यहां कैसे?”
कविता ने शिवम को धीरे से अलग किया और पत्नी के सामने खड़ी हो गई। “तुमने मेरे बेटे को मुझसे छीना था। आज वह मेरे सामने है।”
पत्नी की आंखें झुक गई। आवाज कमजोर हो गई। “मुझसे गलती हो गई। मैं मां नहीं बन सकती थी। मुझे बच्चा चाहिए था। मैंने सोचा मैं उसे अच्छी जिंदगी दूंगी।”
रमेश आगे आया। “तुमने मुझसे झूठ बोला। तुमने सच छुपाया। तुमने एक मां को तोड़ा।”
पत्नी फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन अब रोने से कुछ वापस नहीं हो सकता था। रमेश ने शिवम का हाथ पकड़ा और कविता की तरफ बढ़ा दिया। “यह तुम्हारा बेटा है। अब फैसला तुम्हारा है।”
शिवम ने कविता का हाथ कसकर पकड़ लिया। जैसे डर हो कि कहीं फिर से छूट ना जाए। “हम गांव वापस चलेंगे।” कविता ने धीमे से कहा। रमेश ने सिर हिला दिया। कुछ घंटे बाद चारों फिर गांव की तरफ थे। सुमित्रा और रेखा पहले ही पहुंच चुकी थी। कविता ने जैसे ही गांव में कदम रखा, उसकी आंखों में अजीब सी शांति थी। वह अब अकेली नहीं थी।
शिवम को स्कूल में दाखिला दिलाया गया। कविता एक दुकान में काम करने लगी। सुमित्रा मंदिर में फूल बेचने लगी। रेखा पास के स्कूल में सहायक बन गई। रमेश सब देखता रहा। बिना किसी शोर के, बिना किसी घोषणा के।
समय बीतता गया। एक शाम शिवम ने रमेश का हाथ पकड़ लिया। “आप मेरे पापा हो ना?”
रमेश कुछ नहीं बोला। उसने बच्चे को सीने से लगा लिया। कविता यह सब दूर से देख रही थी। उसकी आंखें नम थी लेकिन चेहरे पर सुकून था। कुछ महीने बाद रमेश और कविता ने साथ रहने का फैसला किया। कोई दिखावा नहीं। कोई शोर नहीं। बस दो टूटे हुए लोग एक दूसरे का सहारा बन गए। जिस रात तीन औरतें गेरुआ वस्त्रों में उसके दरवाजे पर खड़ी थी, वो रात उसकी जिंदगी बदलने आई थी।
कर भला तो हो भला। अंत में सब ठीक हो जाता है, अगर आपका इरादा सही है तो।
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