तुम मेरे पति बन जाओ ₹10 Cr. दूँगी — करोड़पति लड़की ने गरीब किसान से किया मजबूरी का सौदा

शर्तों के रिश्ते से सच्चे प्यार तक – एक गांव, एक शहर, एक कहानी

भाग 1: दो दुनियाओं का टकराव

हरियाणा के सदकपुर गांव की सुबह हमेशा ताजगी से भरी होती थी। ईशान, 27 साल का मजबूत और मेहनती युवक, अपने खेत के पुराने कुएं के पास खड़ा था। उसने कृषि विज्ञान में डिग्री ली थी, लेकिन चमचमाते शहर की नौकरी छोड़कर अपने पिता के अधूरे सपनों और मां गायत्री देवी की सेवा को चुना था। उसके लिए खेत सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि इज्जत थी।

एक दिन गांव की सड़कों पर एक काली, चमचमाती एसयूवी आई। गांव के लोग हैरान थे। गाड़ी से उतरी काव्या मल्होत्रा – मल्होत्रा ग्रुप की मालकिन, जिसके चेहरे पर बड़े-बड़े डिजाइनर चश्मे थे, लेकिन आंखों में गहरा सन्नाटा। वह ईशान के पास आई और बेहद सीधे शब्दों में बोली,
“मुझे एक पति चाहिए, सिर्फ 6 महीने के लिए।”

ईशान चौंक गया। उसे लगा कोई शहरी मजाक है। लेकिन काव्या ने अपनी मजबूरी बताई – दादाजी की वसीयत, कंपनी बचाने के लिए शादी जरूरी, और कोई लालची शहरी लड़का नहीं चाहिए। ईशान ने कहा,
“रिश्ते सौदे से नहीं साथ से बनते हैं।”

काव्या ने अपनी आंखों में आंसू लिए कहा,
“मेरी दुनिया में साथ जैसा कुछ नहीं होता। अगर आज मैंने यह फैसला नहीं लिया, तो मैं वह सब खो दूंगी जो मेरे दादाजी ने खून-पसीने से बनाया था।”

ईशान ने उसकी आंखों में दर्द देखा और हां कह दिया, लेकिन एक शर्त रखी –
“शहर जाने से पहले आपको हमारे तरीके से शादी करनी होगी और कुछ दिन मेरे घर रहना होगा।”

काव्या ने पहली बार किसी पर भरोसा किया।

भाग 2: कागज से रिश्ते की शुरुआत

शहर की तहसील में दोनों ने शादी की। काव्या के लिए यह सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट था, पर ईशान के लिए जिम्मेदारी। वकील ने कहा,
“अगर कंपनी बोर्ड को शक ना हो, तो आपको कुछ दिन गांव में रहना होगा।”

काव्या असहज थी, लेकिन मजबूर भी।

गांव में गृह प्रवेश हुआ। गायत्री देवी ने आरती उतारी, तिलक लगाया और “पुत्तर” कहकर सिर पर हाथ फेरा। काव्या की आंखें नम हो गईं। उसे एहसास हुआ कि उसने सिर्फ पति नहीं, एक परिवार भी किराए पर ले लिया है।

पहली रात गांव की थी – बिजली चली गई, उमस, मच्छर, कोई एसी नहीं। ईशान ने लालटेन और मटके का पानी दिया, हाथ से झलने वाला पंखा।
“शहर में बटन दबाते ही रोशनी मिल जाती है। यहां हमें हर चीज के लिए इंतजार करना पड़ता है।”

काव्या ने पहली बार मटके का पानी पिया, और उसे शहर के मिनरल वाटर से ज्यादा सुकून मिला। आसमान के तारे देखे, सोचा –
“ईशान के शब्दों में गहराई है, जो कॉर्पोरेट दुनिया में नहीं मिली।”

भाग 3: बदलाव की शुरुआत

तीसरे दिन सुबह काव्या ने देखा – ईशान किसानों को नई तकनीक, योजनाएं, मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में समझा रहा था। उसे पता चला, ईशान ने बड़ी नौकरियां ठुकराकर गांव के किसानों को शिक्षित करने का संकल्प लिया था।

काव्या ने पहली बार किसी के लिए चाय बनाई। ट्रैक्टर की छाया में दोनों ने अपनी पिछली जिंदगी के पन्ने खोले। काव्या ने अपने माता-पिता के तलाक की पीड़ा साझा की, ईशान ने अपने माता-पिता के प्रेम की यादें सुनाई। दोनों के बीच साझेदारी की शुरुआत हुई।

गांव की मुश्किलें – बिजली कट, गर्मी, लेकिन गायत्री देवी ने हाथ से पंखा झलकर, ताजा खाना खिलाकर, मां जैसा प्यार दिया। काव्या को एहसास हुआ –
“कंपनी बचाने के चक्कर में परिवार पा लिया, जिसे दौलत से नहीं खरीदा जा सकता।”

भाग 4: आग का तूफान और इंद्रजीत की चाल

एक रात गोदाम में आग लग गई – इंद्रजीत की चाल। ईशान ने जान की परवाह किए बिना लपटों के बीच कूदकर बीज के बोरे बाहर निकाले। काव्या डर गई, लेकिन ईशान ने कहा,
“यह अब सिर्फ तुम्हारी लड़ाई नहीं है, हमारी है।”

इस हादसे ने दोनों को और करीब ला दिया।

अगले दिन इंद्रजीत तीन गाड़ियों के साथ आया – धमकी, पैसे का लालच, झूठे गवाह।
ईशान ने जवाब दिया,
“आपने कीमत लगाना सीखा है, कदर करना नहीं। काव्या जी का साथ मेरे लिए कोई सौदा नहीं है।”

ईशान ने सीसीटीवी नहीं, इंसानी आंखों से रिकॉर्डिंग करवाई थी। राजेश ने वीडियो बना लिया था। इंद्रजीत के कॉल रिकॉर्ड्स भी थे।

भाग 5: सच की जीत

शहर में बोर्ड मीटिंग हुई। काव्या और ईशान ने सबूत पेश किए। पुलिस ने इंद्रजीत को गिरफ्तार कर लिया।
बोर्ड ने ईशान की बुद्धिमानी और काव्या के साहस को सराहा।

मीटिंग के बाद,
काव्या बोली, “अब तुम आजाद हो।”
ईशान ने पूछा, “क्या सच में आप चाहती हैं कि मैं चला जाऊं?”

काव्या की आंखों में हां थी, लेकिन जुबान पर डर।
दोनों समझ गए – जीत सिर्फ कंपनी बचाने की नहीं, एक-दूसरे को पाने की थी।

भाग 6: असली शादी – दो दिलों का मिलन

कुछ हफ्तों बाद सदकपुर गांव में उत्सव था – काव्या और ईशान की असली शादी। खेतों के बीच मंडप, गेंदे के फूल, टिमटिमाती लाइटें। पूरा गांव शामिल था। काव्या अब शहर की मेम नहीं, गांव की बहू थी।

गायत्री देवी ने बहू का हाथ थामा। काव्या को एहसास हुआ –
“जिस परिवार और ममता की तलाश दौलत में की थी, वह इस मिट्टी और प्रेम में मिल गई।”

अग्नि के सामने,
ईशान ने कहा, “हमारा कॉन्ट्रैक्ट आज खत्म हो रहा है, अब आप आजाद हैं।”
काव्या ने जवाब दिया,
“नहीं ईशान, आज से नया कॉन्ट्रैक्ट शुरू हो रहा है – उम्र भर का। इसकी स्याही मेरा दिल है।”

ईशान ने सिंदूर भरा। गांव की औरतें मंगल गीत गा रही थीं। वातावरण पवित्र ऊर्जा से भर गया।

भाग 7: रिश्तों की असली कीमत

काव्या को समझ आ गया था –
“रिश्ते सौदे से नहीं, साथ से बनते हैं।”

ईशान ने दिखा दिया –
“मिट्टी से सोना उगाना हमें आता है, लेकिन रिश्तों की कीमत नहीं लगाई जा सकती।”

दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामे, नए सफर की शुरुआत की। गांव और शहर के बीच की दूरी मिट गई।
काव्या ने सीखा –
“सच्चा प्यार, परिवार और अपनापन दौलत से नहीं, दिल से मिलता है।”

समाप्त