“तेरी औकात नहीं है हमारे साथ खेलने की!” – अमीर बच्चों ने जिसे भगा दिया… वो लड़का असल में निकला…

क्लास कपड़ों से नहीं, संस्कारों से होती है
अध्याय 1: गुलमोहर एंक्लेव का सच
शहर के सबसे रईस इलाके गुलमोहर एंक्लेव में आज जश्न का माहौल था। मिस्टर मेहता के इकलौते बेटे मुकुल का जन्मदिन था। कोठी के विशाल लन में रंग-बिरंगे गुब्बारे, विदेशी गाड़ियां, और रईसों की भीड़ थी। इन्हीं हंसी-ठिठोली से दूर, बगीचे की झाड़ियों के पास दस साल का चंदन खड़ा था। वह कोठी में काम करने वाले बूढ़े माली रामू का बेटा था। चंदन के कपड़े पुराने, शर्ट का बटन टूटा, पैरों में घिसी चप्पलें, लेकिन आंखों में चमक थी। वह मुकुल और उसके दोस्तों को लाल रंग की रिमोट कंट्रोल कार से खेलते देख रहा था। उसके लिए वह खिलौना किसी जादुई रथ से कम नहीं था।
खेलते-खेलते अचानक वह कार चंदन के पैरों के पास आ रुकी। चंदन का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने अपनी मैली शर्ट से हाथ पोंछे, कार को सीधा किया और मुकुल को लौटाने चला। मुकुल आया, चंदन ने मुस्कुराकर कार आगे बढ़ाई, “ये लो भैया, तुम्हारी गाड़ी गिर गई थी।” मुकुल ने कार लेने के बजाय चंदन के हाथ पर जोर से झटका मारा, कार घास पर गिर गई। मुकुल ने तिरस्कार से कहा, “ओए माली के बच्चे! तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी कार को हाथ लगाने की? पता है कितने की है? तेरे बाप की पूरी जिंदगी की कमाई से भी ज्यादा महंगी है ये।”
चंदन सहम गया, उसकी मुस्कान गायब हो गई। मुकुल ने उसे धक्का दिया, “गंदे हाथ लेकर हमारे खिलौनों को छूता है? तू हमारे साथ खेलने लायक नहीं है। तेरा कोई क्लास नहीं है। निकल यहां से!” उसके अमीर दोस्त जोर-जोर से हंसने लगे। वह हंसी चंदन के सीने में खंजर की तरह चुभ रही थी। रामू माली दूर खड़ा सब देख रहा था। वह दौड़ कर आया, बेटे को पीछे खींचा। बार-बार मुकुल से माफी मांगता रहा। चंदन रोया नहीं, बस उस आलीशान कोठी और हंसते चेहरों को एक आखिरी बार देखा।
उस दिन उसे नहीं पता था कि क्लास और औकात का ताना उसकी तकदीर लिखेगा। जिस धूल में उसे गिराया गया, वही धूल कल उसके माथे का तिलक बनेगी।
अध्याय 2: टूटन से फौलाद तक
रात को रामू काका अपनी झोपड़ी के बाहर खटिया पर बैठे बीड़ी पी रहे थे, आंखों से आंसू बह रहे थे। चंदन उनके पास गया, धीरे से घुटनों पर सर रख दिया। रामू ने बेटे के सर पर हाथ फेरा, “बेटा, हम गरीब लोग हैं। गुस्सा हमारी किस्मत में नहीं होता। बड़े लोग हैं, हम उनके जूतों की धूल बराबर भी नहीं।” पिता की लाचारी देख चंदन के अंदर कुछ टूट गया, पर उसी टूटन से फौलादी जिद्द का जन्म हुआ। उसने आसमान को देखा, कसम खाई—अपनी किस्मत की लकीरें खुद लिखेगा। जवाब जुबान से नहीं, कामयाबी से देगा।
“बापू, एक दिन ऐसा आएगा जब दुनिया मेरी हैसियत मेरे कपड़ों से नहीं, मेरे काम से पहचानेगी।”
वक्त उड़ता है। पंद्रह साल गुजर गए। गुलमोहर एंक्लेव की दीवारें ऊंची होती गईं, शहर के दूसरे कोने में चंदन ने सरकारी स्कूल के क्लासरूम और स्ट्रीट लाइट के नीचे अपनी तकदीर बदल दी। जिसके पास खिलौने खरीदने के पैसे नहीं थे, वह देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज का गोल्ड मेडलिस्ट बन गया। चंदन वर्मा अब स्ट्रक्चरल आर्किटेक्ट था, बड़ी कंपनियां कतार में थीं। पर कामयाबी के शिखर पर पहुंचकर भी उसमें विनम्रता थी, वही ठहराव जो उसके पिता में था।
अध्याय 3: मुकुल—दौलत का घमंड
दूसरी तरफ मिस्टर मेहता का बेटा मुकुल अब 25 साल का हो चुका था। पिता की दौलत और लाड-प्यार ने उसे निहायत ही बेगदिल बना दिया था। मेहता बिल्डर्स का वारिस तो था, पर जिम्मेदारी नाम की कोई चीज नहीं थी। मुकुल के लिए दुनिया पैसे से चलती थी, वह मानता था कि पैसे फेंककर किसी भी इंसान या हुनर को खरीद सकता है।
मिस्टर मेहता बूढ़े हो रहे थे, व्यापार गिर रहा था। मार्केट में नए कंपटीटर्स आ गए थे, मेहता बिल्डर्स के पुराने डिजाइन अब ग्राहकों को पसंद नहीं आ रहे थे। कंपनी घाटे में जा रही थी, साख दांव पर थी। मुकुल को अपनी पार्टियों और महंगी कारों से फुर्सत नहीं थी।
एक दिन मिस्टर मेहता ने मुकुल को केबिन में बुलाया, “यह ग्रीन वैली प्रोजेक्ट हमारी कंपनी का आखिरी मौका है। अगर टेंडर नहीं मिला, तो हम दिवालिया हो सकते हैं। हमें शहर का सबसे बेहतरीन आर्किटेक्ट चाहिए। मुझे आर्किटेक्ट सी.वी. चाहिए।”
मुकुल हंसते हुए बोला, “डैड, आर्किटेक्ट ही तो है, कोई भगवान थोड़ी है। मैं जाता हूं, उसे पैसे ऑफर करूंगा, हमारा नौकर बन जाएगा।” पर मुकुल नहीं जानता था कि इस बार उसका सामना ऐसे इंसान से होने वाला था जो बिकाऊ नहीं था।
अध्याय 4: चंदन—जवाब संस्कारों से
शहर में ग्रीन वैली जैसे जटिल प्रोजेक्ट को संभालने की काबिलियत सिर्फ एक ही शख्स में थी—आर्किटेक्ट सी.वी.। कोई नहीं जानता था कि सी.वी. कौन है, क्योंकि वह पार्टियों में नहीं जाता, अपने काम से काम रखता था।
अगले दिन सुबह मुकुल स्पोर्ट्स कार से स्काईलाइन आर्किटेक्ट्स के दफ्तर पहुंचा। रिसेप्शन पर बैठी लड़की को देखा भी नहीं, सीधा केबिन की तरफ बढ़ा। “तुम्हें पता है मैं कौन हूं? मुकुल मेहता! तुम्हारे बॉस को बोलो, उनकी किस्मत का दरवाजा खटखटाने खुद कुबेर आया है।”
केबिन का दरवाजा खुला। मुकुल अकड़ते हुए दाखिल हुआ। रिवॉल्विंग चेयर पर एक शख्स बैठा था, पीठ मुकुल की तरफ। मुकुल ने चेकबुक निकाली, “अपना दाम बताओ, ब्लैंक चेक लाया हूं, जो मर्जी भर लो।”
चेयर पर बैठे शख्स ने चेकबुक की आवाज सुनी, पर घूमा नहीं। एक शांत आवाज आई, “मिस्टर मेहता, मैं इमारतों के नक्शे बनाता हूं, लेकिन मेरी ईमानदारी बिकाऊ नहीं है। स्काईलाइन सिर्फ उन प्रोजेक्ट्स पर काम करता है जिनमें विजन होता है, सिर्फ मुनाफा नहीं।”
मुकुल हंसा, “विजन सब गरीबों की बातें हैं, असली दुनिया पैसे से चलती है। मैं तुम्हें वो दे सकता हूं जो तुम जिंदगी भर कमा नहीं पाओगे। मेरी क्लास और तुम्हारी सर्विस मिलकर इतिहास रच सकते हैं।”
तभी कुर्सी घूमी। सामने चंदन बैठा था—नेवी ब्लू सूट, पतला रिमलेस चश्मा, चेहरे पर ठहराव। मुकुल ने उसे देखा, पहचान नहीं पाया। उसके लिए बचपन का माली का बेटा कब का मिट चुका था, और सामने बैठा सफल आर्किटेक्ट उसकी याददाश्त से बाहर था।
चंदन ने मुकुल की आंखों में देखा, वही बचपन का घमंड दिखाई दिया। चेक को वापस सरका दिया, “पैसे से आप ईंट-गारे खरीद सकते हैं लेकिन हुनर और वफादारी नहीं। मुझे आपके प्रोजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं है। रही बात क्लास की, तो क्लास कपड़ों के ब्रांड से नहीं, जुबान की मिठास से आती है। आप जा सकते हैं।”
मुकुल का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “तुम जानते नहीं तुम किसका नुकसान कर रहे हो। मैं तुम्हें बर्बाद कर दूंगा।”
चंदन शांत रहा, “सिक्योरिटी, मिस्टर मेहता को बाहर का रास्ता दिखाइए। इन्हें रास्ता भूलने की आदत है।”
अध्याय 5: वक्त का पहिया
मुकुल बदबुदाते हुए केबिन से बाहर निकला। घर पहुंचकर डैड से झूठ बोला, “सीवी पागल है, उसने ना सिर्फ ऑफर ठुकराया बल्कि हमारी कंपनी की भी बेइज्जती की।”
मिस्टर मेहता व्यापार की दुनिया के पुराने खिलाड़ी थे, बेटे के चेहरे पर अहंकार और झूठ पढ़ सकते थे। टेंडर जमा करने में सिर्फ 48 घंटे बचे थे। “अगर सीवी ने मना किया है, तो जरूर कोई वजह होगी। अब मुझे खुद जाना होगा।”
वे स्काईलाइन आर्किटेक्ट्स के दफ्तर पहुंचे। चंदन ने आदर से स्वागत किया, “नमस्ते मिस्टर मेहता, आइए तशरीफ रखिए।” मिस्टर मेहता हैरान थे। मुकुल ने कहा था यह आदमी बदतमीज है, पर सामने खड़ा शख्स तहजीब की मिसाल था।
मिस्टर मेहता बोले, “अगर मेरे बेटे ने कुछ गलत कहा हो, तो मैं उसकी तरफ से माफी मांगता हूं। पर प्लीज, यह प्रोजेक्ट मना मत कीजिए। मेरी जिंदगी भर की कमाई और साख का सवाल है।”
चंदन ने पानी का गिलास बढ़ाया, “मिस्टर मेहता, मैंने आपके बेटे को इसलिए नहीं निकाला कि उसने कम पैसे ऑफर किए। उसने इंसान और सामान के बीच का फर्क नहीं समझा। एक इमारत सिर्फ सीमेंट और ईंटों से नहीं बनती, वह लोगों के सपनों और पसीने से बनती है। आपका बेटा मजदूरों को अपने जूते की धूल समझता है।”
मिस्टर मेहता शर्मिंदा हो गए, “लाड प्यार ने उसे बिगाड़ दिया। लेकिन मेरी कंपनी के सैकड़ों कर्मचारियों का क्या कसूर? आप जो कीमत मांगेंगे, मैं दूंगा। बस मेरी मदद कीजिए।”
चंदन ने खिड़की से बाहर देखा, “मैं यह प्रोजेक्ट करूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। कॉन्ट्रैक्ट साइन करते वक्त आपका बेटा मुकुल भी मौजूद होना चाहिए, और साइन करने से पहले उसे एक इंसान से माफी मांगनी होगी।”
“किससे?”
“वक्त आने पर पता चल जाएगा। कल सुबह 10 बजे मुकुल को लेकर आइएगा। याद रखिएगा, अगर वह नहीं आया तो डील नहीं होगी।”
अध्याय 6: माफी का सबक
ठीक 10 बजे मिस्टर मेहता मुकुल के साथ कॉन्फ्रेंस रूम में दाखिल हुए। मुकुल के चेहरे पर अकड़ थी। उसे लगा सीवी उसे किसी बड़े अधिकारी या रसूखदार इंसान से माफी मंगवाएगा। चंदन टेबल के दूसरी तरफ बैठा था, चेहरे पर भाव नहीं, बस गहरी खामोशी।
मुकुल ने कुर्सी खींचते हुए पूछा, “किसे सॉरी बोलना है? जल्दी बुलाओ, मेरे पास फालतू वक्त नहीं है। मुझे लगा था हम बिजनेस करने आए हैं, ड्रामा नहीं।”
चंदन ने घड़ी देखी, “सब्र रखो मुकुल, वक्त की कद्र करना सीखो, वरना वक्त तुम्हें ऐसी जगह ला खड़ा करेगा जहां पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचेगा।”
तभी दरवाजा खुला, एक असिस्टेंट ने बेहद बुजुर्ग शख्स को अंदर आने दिया। लाठी के सहारे, सफेद बाल, झुर्रियों भरा चेहरा, साफ-सुथरा कुर्ता-पजामा। मिस्टर मेहता ने चश्मा ठीक किया, “रामू… तुम?”
हाँ, वही रामू काका थे। मुकुल ने नाक सिकोड़ते हुए देखा, “डैड, आप इसे जानते हैं? यह फटाहाल बूढ़ा यहां क्या कर रहा है? क्या आप चाहते हैं कि मैं इस नौकर से माफी मांगूं?”
चंदन अपनी सीट से उठा, रामू काका के पास गया, “यह कोई फटा हाल बूढ़ा नहीं, मेरे पिता हैं। और मैं वही माली का बेटा चंदन हूं जिसे तुमने 15 साल पहले कोठी से धक्के मारकर निकाला था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। मुकुल का मुंह खुला रह गया। उसकी आंखों के सामने बचपन का मंजर घूमने लगा—टूटी हुई रिमोट कार, डरा हुआ लड़का, घमंड में कही बातें। उसे विश्वास नहीं हुआ कि शहर का सबसे प्रतिष्ठित आर्किटेक्ट वही चंदन है।
अध्याय 7: संस्कार की जीत
चंदन की आवाज भारी थी, “याद आया मुकुल, तुमने कहा था—तू और तेरे जैसे लोग हमारे साथ खड़े होने लायक नहीं हैं। तेरा कोई क्लास नहीं है। आज देखो, मैं कहां खड़ा हूं और तुम कहां? आज तुम्हें अपनी कंपनी बचाने के लिए उसी माली के बेटे के हुनर की भीख चाहिए।”
उसने जेब से पुरानी टूटी हुई लाल रिमोट कंट्रोल कार निकाली, 15 साल से संभाल कर रखी थी, मेज पर मुकुल के सामने रख दी। “उस दिन तुमने मेरा स्वाभिमान छीना था। आज मैं तुम्हारी अकड़ नहीं छीनूंगा, बस इतना याद दिलाऊंगा कि वक्त किसी का गुलाम नहीं होता। आज मैं उस कुर्सी पर हूं जहां से तुम्हारी तकदीर का फैसला कर सकता हूं।”
मुकुल के पसीने छूट रहे थे, घमंड चकनाचूर हो चुका था। जिस इंसान को उसने कीड़ा-मकोड़ा समझा था, वही पहाड़ बनकर सामने था।
मिस्टर मेहता की आंखों से आंसू बह निकले, “मुझे माफ कर दो भाई। उस दिन मैंने अपने बेटे की गलती पर पर्दा डालकर बहुत बड़ा पाप किया था। अगर उस दिन रोका होता, तो आज ये दिन ना देखना पड़ता।”
रामू काका ने मालिक के हाथ थाम लिए, “माफी मांगकर मुझे शर्मिंदा ना करें। ये सब वक्त का खेल है।”
चंदन ने मुकुल की ओर देखा, “मुकुल, मेरी शर्त यह नहीं है कि तुम मेरे पिता के पैर छुओ ताकि मैं तुम्हें नीचा दिखा सकूं। मेरी शर्त है कि तुम समझ सको कि इंसान का कद तब बढ़ता है जब वह झुकना जानता है।”
मुकुल आगे बढ़ा, रामू काका के सामने घुटनों के बल बैठ गया, “काका, मुझे माफ कर दीजिए। मैं भटक गया था, बचपन में भी गलती की, आज भी। माफ कर दीजिए।”
रामू काका ने मुकुल को उठाया, “बड़ों के पैर छूने से कोई छोटा नहीं होता। भगवान तुम्हें सद्बुद्धि दे।” मुकुल को वह प्यार और आशीर्वाद मिला जो शायद कभी अपने रईस रिश्तेदारों से नहीं मिला था।
अध्याय 8: असली क्लास
चंदन ने ग्रीन वैली प्रोजेक्ट की फाइल पर दस्तखत किए, “यह रहा आपका प्रोजेक्ट। मैंने यह साइन आपकी कंपनी बचाने के लिए नहीं, बल्कि उन सैकड़ों मजदूरों के लिए किए हैं जिनके घर का चूल्हा आपकी कंपनी से जलता है। पर याद रखिएगा—इमारत तो मैं खड़ी कर दूंगा, पर आपके बेटे का चरित्र आपको खुद खड़ा करना होगा।”
मिस्टर मेहता ने फाइल सीने से लगा ली। आज उन्हें बिजनेस का टेंडर तो मिल गया, लेकिन उससे भी कीमती चीज जो मिली, वह थी इंसानियत का पाठ।
चंदन ने चलते-चलते मुकुल से कहा, “वह टूटी हुई कार तुम रख सकते हो। जब भी लगे कि तुम दूसरों से श्रेष्ठ हो, उसे देख लेना। वह याद दिलाएगी कि रिमोट वाली गाड़ियां पैसे से खरीदी जा सकती हैं, पर इज्जत कमानी पड़ती है।”
स्काईलाइन की कांच वाली इमारत से बाहर निकलते ही दोपहर की धूप चंदन और रामू काका के चेहरे पर पड़ी। यह धूप वैसी ही थी जैसी 15 साल पहले थी, लेकिन आज इसकी तपिश में चुभन नहीं, सुकून था।
रामू काका ने पूछा, “बेटा, तूने उसे माफ कर दिया, उसका काम भी कर दिया। क्या तुझे नहीं लगता कि तुझे उससे थोड़ा और बदला लेना चाहिए था?”
चंदन मुस्कुरा कर बोले, “बापू, बदला लेकर मैं भी उसी जैसा बन जाता। बदला इंसान को बराबर बनाता है, लेकिन माफी इंसान को महान बनाती है। आज मैंने उसका काम करके उसे एहसान के बोझ तले दबा दिया है जो उसे जिंदगी भर याद रहेगा। मैंने उसे नहीं हराया, उसकी सोच को हराया है।”
अध्याय 9: बदलाव की शुरुआत
मुकुल अब भी उस टूटी हुई लाल कार को देख रहा था। वह खिलौना अब सिर्फ प्लास्टिक का टुकड़ा नहीं, उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक बन चुका था। मुकुल रातोंरात नहीं बदला, लेकिन उसने बदलने की कोशिश शुरू कर दी। वह कार ऑफिस की मेज पर सजा ली। जब भी अहंकार सिर उठाता, वह उस कार को देखता और चंदन की बात याद आती—क्लास कपड़ों से नहीं, संस्कारों से होती है।
मेहता बिल्डर्स फिर से खड़ा हुआ। ग्रीन वैली प्रोजेक्ट सफल भी हुआ। लेकिन इस बार सफलता का स्वाद अलग था। अब मजदूरों को इज्जत दी जाती थी।
अध्याय 10: कहानी का सबक
यह कहानी सिखाती है कि वक्त का पहिया गोल है। जो आज ऊपर है, कल नीचे हो सकता है। किसी की गरीबी या मजबूरी का मजाक मत उड़ाओ। वक्त ने कोयले को हीरा बनते और महलों को खंडहर होते देखा है।
इंसान की असली दौलत बैंक बैलेंस नहीं, उसका व्यवहार है। चंदन ने साबित कर दिया कि अगर नियत साफ हो और हौसला बुलंद हो, तो एक माली का बेटा भी दुनिया के लिए मिसाल बन सकता है।
अंत में जीत अहंकार की नहीं, संस्कारों की होती है।
(कहानी समाप्त)
अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो अपने विचार जरूर साझा करें। क्या आपको चंदन की माफी ने या मुकुल के पश्चाताप ने ज्यादा छू लिया? इस कहानी को उन दोस्तों के साथ जरूर साझा करें, जो क्लास और औकात के भ्रम में जीते हैं।
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