दरोगा को आर्मी के कर्नल से भिड़ना पड़ा भारी।।

खाकी बनाम वर्दी: एक सड़क, दो धर्म

अध्याय 1: भ्रष्टाचार का नाका

दोपहर की चिलचिलाती धूप में, हाईवे से कुछ किलोमीटर दूर एक सुनसान लिंक रोड पर पुलिस की एक जीप खड़ी थी। इंस्पेक्टर जोरावर सिंह और उसका सिपाही यादव बरगद के पेड़ की छांव में बैठे थे। जोरावर सिंह की नजरें सड़क पर आने वाली हर छोटी-बड़ी गाड़ी पर थी, लेकिन उसका ध्यान सेवा पर नहीं, बल्कि ‘वसूली’ पर था।

“साहब, आज का दिन तो बहुत ही सूखा गया। सुबह से ना कोई चालान, ना कोई सेटलमेंट। जेब एकदम ठंडी पड़ी है,” यादव ने खैनी रगड़ते हुए निराशा से कहा।

जोरावर सिंह ने अपनी टोपी उतारी और माथे का पसीना पोंछते हुए बोला, “अरे यादव, सबर रख। शेर जब शिकार पे निकलता है, तो कभी खाली हाथ नहीं लौटता। आज मेरा बाया हाथ फड़क रहा है, कोई मोटा असामी फसेगा।”

यादव की आंखों में चमक आ गई। “साहब, तो फिर इसी सुनसान रोड पे ही क्यों ना जाल बिछाया जाए? यह जो आगे वाला मोड़ है, वहां से दूसरे जिले की गाड़ियां अक्सर शॉर्टकट मारने के लिए गुजरती हैं। अगर वहां नाका लगा दिया, तो पेट्रोल-पानी का खर्चा तो निकल ही आएगा।”

जोरावर हंसा, “बात तो तूने पते की कही है। वैसे भी थाने जाके मक्खियां ही मारनी हैं। चलो, आज इसी सड़क को अपना एटीएम बनाते हैं। रमेश! गाड़ी आगे मोड़ पर लगा।”

अध्याय 2: मजबूरी का मजाक

थोड़ी ही देर में नाका तैयार हो गया। जोरावर सिंह के लिए कानून केवल एक कागज़ का टुकड़ा था जिसे वह अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ सकता था। उसने साफ कह दिया था, “कागज बाद में देखेंगे, पहले चेहरा देखेंगे कि कौन कितना दे सकता है।”

आधा घंटा बीता, तभी एक पुरानी बाइक आती दिखी। उस पर एक मध्यम आयु का व्यक्ति सवार था, जिसके पास हेलमेट नहीं था। यादव ने लाठी मारकर उसे रोका। “रोक गाड़ी! साइड में लगा।”

बाइक सवार कांप रहा था। “सरकार, मैं पास के ही गांव से हूं। हेलमेट घर पे रह गया। बहुत जल्दी में हूं साहब।”

जोरावर उसके करीब आया और हंसा, “जल्दी में है? क्यों भाई? कौन सी ट्रेन छूट रही है तेरी? या मंत्री जी की मीटिंग में जा रहा है?”

सवार ने हाथ जोड़ लिए, “नहीं साहब, मेरी घरवाली बहुत बीमार है। सरकारी अस्पताल में भर्ती है। डॉक्टर ने अर्जेंट दवाई मांगी, वही लेने शहर जा रहा हूं।”

“बीमारी का बहाना यहां नहीं चलेगा। कानून कानून होता है,” जोरावर ने कड़क कर कहा। “बिना हेलमेट, बिना कागज के गाड़ी चला रहा है। चल चालान कटेगा। 5000 रुपये निकाल।”

“5000? साहब, मेरे पास कुल जमा 2000 ही हैं, वो भी दवाई के लिए। अगर मैंने ये आपको दे दिए तो मेरी पत्नी मर जाएगी। रहम करो साहब, मैं आपके पैर पड़ता हूं।”

लेकिन जोरावर के दिल में पत्थर था। उसने धमकी दी, “नौटंकी बंद कर। या तो 5000 दे या बाइक जप्त। सोच ले, दवाई जरूरी है या बाइक।” अंत में, उस गरीब आदमी से 1500 रुपये छीनकर जोरावर ने उसे भगा दिया और उसकी मजबूरी पर ठहाके लगाने लगा।

अध्याय 3: सेना का काफिला और शॉर्टकट

उसी समय, मुख्य हाईवे पर एक बड़ा ट्रक और कुछ जिप्सियां रुकी हुई थीं। सेना की एक यूनिट अपने बेस कैंप की ओर जा रही थी। कर्नल राघवेंद्र प्रताप सिंह अपने कमांडो दस्ते के साथ थे। हाईवे पर एक एक्सीडेंट की वजह से घंटों लंबा जाम लगा था।

“विक्रम, हम बेस कैंप पहुंचने में कितना लेट हैं?” कर्नल ने अपने ड्राइवर से पूछा। “सर, करीब एक घंटा पीछे चल रहे हैं। अगर हाईवे पे जाम नहीं खुला तो रात हो जाएगी।”

कर्नल राघवेंद्र ने नक्शा देखा। “विक्रम, नक्शे के मुताबिक यहां से एक लिंक रोड कटती है। यह गांव के बीच से होकर जाती है। रास्ता संकरा है, लेकिन यह हमें जाम से बचा लेगा। मोड़ लो गाड़ी।”

सेना का वह भारी-भरकम अशोक लेलैंड ट्रक और पीछे कर्नल की जिप्सी उस छोटी सड़क पर मुड़ गई। उन्हें अंदाजा नहीं था कि आगे कानून की वर्दी में कुछ लुटेरे उनका इंतजार कर रहे हैं।

अध्याय 4: जब टकराई ‘खाकी’ और ‘हरी’ वर्दी

जोरावर सिंह दूर से आते भारी ट्रक की आवाज सुनकर खुश हो गया। “साहब, शिकार आ गया! ट्रक है, मालवाहक होगा। आज तो लॉटरी लग गई!” यादव चिल्लाया।

जैसे ही ट्रक करीब आया, यादव ने बीच सड़क पर आकर लाठी भांजी। ट्रक रुका। नायक विक्रम नीचे उतरा। “जय हिंद श्रीमान, क्या बात है? आपने हमें क्यों रोका?”

जोरावर सिंह अकड़ कर आगे बढ़ा। उसे ट्रक पर लगा सेना का निशान और ‘On Government Duty’ का बोर्ड दिख रहा था, लेकिन लालच ने उसे अंधा कर दिया था। “कागज दिखा—लाइसेंस, परमिट, और रूट का नक्शा।”

“श्रीमान, यह आर्मी का ट्रक है। हम आधिकारिक ड्यूटी पर हैं। हमारे पास रक्षा मंत्रालय के आदेश हैं,” विक्रम ने शांत स्वर में कहा।

“जुबान लड़ाता है? तू मुझे कानून सिखाएगा?” जोरावर ने चिल्लाकर कहा। तभी कर्नल राघवेंद्र जिप्सी से नीचे उतरे। उनकी कद-काठी और आंखों की चमक किसी को भी डराने के लिए काफी थी।

“इंस्पेक्टर साहब, मैं कर्नल राघवेंद्र प्रताप सिंह हूं। अगर कोई समस्या है तो आप मुझसे बात कीजिए,” कर्नल ने गरिमा के साथ कहा।

जोरावर हंसा, “ओह, तो तुम हो इनके सरदार। देखो कर्नल साहब, तुम्हारी ये हेकड़ी छावनी में चलती होगी। यह मेरा इलाका है। यहां मेरी मर्जी के बिना परिंदा भी पर नहीं मारता। 5000 रुपये निकालो, सड़क मरम्मत टैक्स समझो।”

कर्नल की आंखें लाल हो गईं। “कैसा जुर्माना? हम देश की रक्षा करते हैं और आप हमसे ही वसूली कर रहे हैं?”

जोरावर ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। “देश की रक्षा? तुम आर्मी वाले करते क्या हो? बस मुफ्त की रोटियां तोड़ते हो और कैंटीन की सस्ती शराब पीते हो। असली काम तो हम पुलिस वाले करते हैं। तुम लोग तो बस बॉर्डर पे सोने के पैसे लेते हो।”

अध्याय 5: शेर की दहाड़ और ‘डैश-कैम’ का सच

जोरावर की बात सुनकर ट्रक के पीछे बैठे जवानों का खून खौल उठा। नायक विक्रम ने अपनी मुट्ठियां भींच लीं। “इंस्पेक्टर साहब, अपनी भाषा पर लगाम दीजिए,” कर्नल ने चेतावनी दी।

“नहीं दूंगा! तुम क्या कर लोगे? हम चार पुलिस वाले हैं, तुम दो। पैसे दो वरना यही मुर्गा बनाऊंगा और वीडियो वायरल कर दूंगा,” जोरावर ने कर्नल के कंधे पर हाथ रखने की जुर्रत की।

कर्नल राघवेंद्र मुस्कुराए। “तुमने वर्दी की मर्यादा लांघी है जोरावर सिंह। तुम्हें लगता है हम दो हैं? विक्रम, सिग्नल दो।”

अचानक ट्रक का पिछला पर्दा हटा और 10 हथियारबंद पैरा कमांडो नीचे कूद पड़े। पलक झपकते ही उन्होंने जोरावर और उसके सिपाहियों को घेर लिया। जोरावर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

“तुम कह रहे थे कि हम दो हैं… गणित थोड़ा कमजोर है तुम्हारा इंस्पेक्टर। हम दो नहीं, 12 हैं,” कर्नल ने ठंडे स्वर में कहा।

जोरावर ने घबराकर फोन निकाला और अपने जिले के एसपी को फोन लगाया। “सर! जल्दी आइए! आर्मी वालों ने मुझे घेर लिया है। उन्होंने हम पर बंदूकें तान दी हैं, वे बागी हो गए हैं सर!”

कर्नल ने उसे रोका नहीं। “बुलाओ अपने अफसरों को। आज फैसला सड़क पर ही होगा।”

अध्याय 6: इंसाफ का तराजू

15 मिनट के भीतर एसपी साहब का काफिला वहां पहुंचा। जोरावर रोते हुए उनके पास भागा। “सर, देखिए इन लोगों को! मैं रूटीन चेकिंग कर रहा था और इन्होंने मुझे मारने की कोशिश की।”

एसपी साहब ने कर्नल की ओर देखा और उन्हें सैल्यूट किया। “जय हिंद कर्नल साहब। क्या मामला है?”

कर्नल ने शांत भाव से कहा, “एसपी साहब, आपके इंस्पेक्टर ने ना केवल रिश्वत मांगी, बल्कि भारतीय सेना को अपमानित किया। उसने मेरे जवानों के साथ हाथापाई की। लेकिन हम हवा में बात नहीं करते।”

कर्नल ने विक्रम की ओर इशारा किया। “विक्रम, डैश-कैम की फुटेज दिखाओ।”

सेना के ट्रक में लगे अत्याधुनिक कैमरों ने जोरावर की हर एक गाली, उसकी रिश्वत की मांग और सेना के प्रति उसके अपमानजनक शब्दों को रिकॉर्ड कर लिया था। जब एसपी ने वो वीडियो देखा, तो उनका सिर शर्म से झुक गया।

एसपी ने जोरावर की ओर मुड़कर देखा, जिसकी सिपाही जैसी अकड़ अब गीली बिल्ली जैसी हो गई थी। “शर्म आती है मुझे कि तुम जैसे लोग पुलिस की वर्दी पहनते हैं,” एसपी ने गरज कर कहा। “कंट्रोल! इंस्पेक्टर जोरावर सिंह को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड किया जाता है। इसकी सर्विस बेल्ट और कैप अभी जमा करो!”

जोरावर एसपी के पैरों में गिर पड़ा। “सर, गलती हो गई सर, मेरे बच्चे हैं!” “वो बच्चे शर्मिंदा होंगे जब उन्हें पता चलेगा कि उनका बाप एक वर्दी वाला गुंडा था,” एसपी ने कठोरता से कहा।

अध्याय 7: तिरंगे का सम्मान

एसपी साहब ने कर्नल राघवेंद्र से हाथ मिलाया। “कर्नल साहब, मैं अपने विभाग की तरफ से आपसे और आपकी पूरी टीम से माफी मांगता हूं। वर्दी कोई भी हो, खाकी हो या हरी, उसका धर्म एक ही होता है—देश और जनता की सेवा।”

कर्नल ने मुस्कुराकर सैल्यूट किया। “हमें खुशी है कि खाकी में आप जैसे अफसर भी हैं। जय हिंद!”

सेना का काफिला अपनी मंजिल की ओर बढ़ गया। सड़क के किनारे अब जोरावर सिंह बिना वर्दी के खड़ा था, और वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति की नजरों में उसके लिए केवल घृणा थी। उसी सड़क पर उस गरीब बाइक सवार को उसके पैसे वापस दिलाए गए, जिसे जोरावर ने लूटा था।

न्याय हो चुका था। यह जीत केवल सेना की नहीं, बल्कि उस ईमानदारी की थी जो हर वर्दी की असली शान होती है।

सीख: शक्ति का दुरुपयोग अंततः विनाश की ओर ले जाता है, और ईमानदारी का मार्ग चाहे कितना भी कठिन हो, जीत उसी की होती है।

समाप्त