दिवालिया होते ही करोड़पति को प्यार करने वाली ने छोड़ा तो नौकरानी अपने घर ले गई||
किस्मत का खेल: करोड़पति से फकीर और फिर वफादारी की जीत
अध्याय 1: खुशियों के बीच तबाही
कोलकाता की जगमगाती रोशनी में आज विवेक के आलीशान बंगले पर उत्सव का माहौल था। विवेक, जो शहर का एक जाना-माना करोड़पति और कॉटन मिल का मालिक था, उसकी सगाई का दिन था। उसकी मंगेतर काव्या, एक ऊंचे रसूख वाले परिवार की बेटी थी। संगीत बज रहा था, मेहमान आ रहे थे, लेकिन तभी एक फोन कॉल ने सब कुछ बदल दिया।
“साहब, मिल में आग लग गई है! सब कुछ जलकर खाक हो रहा है!”
विवेक सगाई बीच में छोड़कर भागा, लेकिन जब तक वह पहुँचा, उसकी बरसों की मेहनत राख बन चुकी थी। करोड़ों का नुकसान हो चुका था। जैसे ही यह खबर काव्या के कानों तक पहुँची, उसने तुरंत अपने पिता से कहा, “पिताजी, मैं इस कंगाल से शादी नहीं कर सकती। इसके पास सिर्फ एक मिल थी, जो अब जल गई। अब यह मुझे ऐशो-आराम नहीं दे पाएगा।”
काव्या और उसका परिवार सगाई तोड़कर चले गए। विवेक के पास अब न मंगेतर थी और न ही संपत्ति।
अध्याय 2: चढ़ते सूरज को सलाम
हादसे के एक महीने के भीतर विवेक की स्थिति बद से बदतर हो गई। मिल के कर्ज और नुकसान की भरपाई के लिए उसे अपना बंगला तक बेचना पड़ा। जो नौकर-चाकर कभी उसके आगे-पीछे घूमते थे, वे अब उसे छोड़कर जाने लगे।
“विवेक सर के पास अब पैसा नहीं बचा, यहाँ काम करने से क्या फायदा?”—यही सोचकर सब चले गए।
विवेक अकेला उस खाली घर में बैठा था। बचपन से ऐशो-आराम में पले-बढ़े विवेक के लिए यह सदमा असहनीय था। लेकिन उस घर में एक नौकरानी थी जिसका नाम शालिनी था। शालिनी 22 साल की एक सरल लड़की थी। जब सब चले गए, तब भी वह विवेक का ख्याल रखती रही।
एक दिन विवेक ने उससे कहा, “शालिनी, तुम यहाँ कब तक काम करोगी? मेरे पास तुम्हें देने के लिए पैसे नहीं हैं। मैं भी कल यह घर खाली कर दूँगा। तुम भी कहीं और काम ढूंढ लो।”
शालिनी ने मासूमियत से पूछा, “साहब, आप कहाँ जाएंगे?” विवेक ने लंबी सांस ली, “पता नहीं, जहाँ किस्मत ले जाए।”
अध्याय 3: वफादारी का कर्ज
शालिनी ने हिम्मत जुटाकर कहा, “साहब, छोटा मुँह बड़ी बात, क्या आप मेरे साथ मेरे घर चल सकते हैं?”
विवेक हैरान रह गया। “मेरे पास कुछ नहीं है शालिनी, फिर तुम ऐसा क्यों कह रही हो?”
शालिनी मुस्कुराई, “साहब, मेरी मां गायत्री आपके पिताजी के यहाँ काम करती थी। मां ने बताया था कि जब हम पर मुसीबत आई थी, तब आपके पिता ने हमारे घर का खर्च उठाया और हमें पढ़ाया। आज जब आप मुसीबत में हैं, तो हमें अपना कर्ज चुकाने का मौका दीजिए। मां आपको देखकर बहुत खुश होगी।”
विवेक ने पहले मना किया, लेकिन शालिनी की जिद के आगे वह हार गया। वह एक ऑटो में बैठकर गरीब बस्ती की ओर निकल पड़ा।
अध्याय 4: एक नई शुरुआत
शालिनी का घर छोटा था लेकिन साफ-सुथरा था। वहां उसकी मां गायत्री और उसका भाई-भाभी रहते थे। गायत्री ने विवेक का स्वागत किया और उसे एक कमरा दिया। विवेक के मन में विचार चल रहे थे कि एक तरफ काव्या थी, जिसने सगाई तोड़ दी और दूसरी तरफ यह परिवार है, जो पुराना कर्ज चुकाने के लिए उसे सहारा दे रहा है।
शालिनी ने विवेक से कहा, “साहब, आप ऐसे खाली बैठकर बीमार हो जाएंगे। हमारी बस्ती के बाहर एक दुकान खाली है, आप वहां छोटा-मोटा काम शुरू क्यों नहीं करते?”
विवेक के अंदर का ‘करोड़पति’ पहले तो हिचकिचाया, लेकिन फिर उसने वास्तविकता को स्वीकार किया। उसने शालिनी के साथ मिलकर उस दुकान की सफाई की। शालिनी ने अपनी जमा-पूंजी से दुकान का किराया दिया।
अध्याय 5: किस्मत का दूसरा मौका
दुकान तो खुल गई, लेकिन सामान भरने के लिए पैसे नहीं थे। एक रात विवेक को अचानक अपने पिता की एक पुरानी बात याद आई। उसके पिता ने सालों पहले एक जमींदार की मदद की थी और बदले में उस जमींदार ने 5 एकड़ जमीन विवेक के पिता के नाम कर दी थी। वह जमीन हाईवे के पास थी और बंजर होने के कारण विवेक उसे भूल चुका था।
विवेक तुरंत उस गाँव पहुँचा। वहां जाकर उसे पता चला कि हाईवे बनने की वजह से अब उस जमीन की कीमत करोड़ों में है। उसने वह जमीन बेची और उसे 12 करोड़ रुपये मिले।
विवेक एक बार फिर करोड़पति बन चुका था। उसने सबसे पहले अपना पुराना बंगला वापस खरीदा और शालिनी के पूरे परिवार को ससम्मान अपने साथ रहने के लिए ले आया।
अध्याय 6: चेहरे से नकाब उतरा
जब काव्या को पता चला कि विवेक फिर से करोड़पति बन गया है, तो वह अपने पिता के साथ दोबारा विवेक के घर पहुँची। “विवेक, वो तो एक गलतफहमी थी। मैं आज भी तुमसे सगाई करना चाहती हूँ।”
विवेक मुस्कुराया और बोला, “काव्या, गरीबी ने मुझे इंसानों के असली चेहरे दिखा दिए। जब मेरे पास कुछ नहीं था, तब तुमने साथ छोड़ दिया। और जब मेरे पास फिर से पैसा आया, तो तुम वापस आ गई। मुझे तुमसे शादी नहीं करनी।”
काव्या गुस्से में बोली, “तो किससे शादी करोगे? कौन सी राजकुमारी मिलेगी तुम्हें?”
विवेक ने शालिनी का हाथ पकड़ा और गर्व से कहा, “मैं शालिनी से शादी करूँगा। इसने मेरा साथ तब दिया जब मैं फकीर था। जो औरत बुरे वक्त में साथ खड़ी हो, वही सुख के दिनों की असली हकदार है।”
काव्या का सिर शर्म से झुक गया और वह वहां से चली गई। विवेक और शालिनी ने धूमधाम से शादी की और आज वे एक खुशहाल जीवन बिता रहे हैं।
कहानी का संदेश: पैसा आता-जाता रहता है, लेकिन जो इंसान आपके बुरे वक्त में आपके साथ खड़ा होता है, वही आपका अपना होता है। वफादारी और चरित्र की कीमत दौलत से कहीं बढ़कर है।
नोट: यह कहानी केवल मनोरंजन और प्रेरणा के उद्देश्य से लिखी गई है।
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