दूध बेचने वाली से डॉक्टर ने कहा मुझसे शादी करोगी, सच्चाई जानकर…इंसानियत रो पड़ी…

अदिति और समीर: एक नई शुरुआत

इंदौर की सुबह

इंदौर की सुबह बाहर से जितनी साफ दिखती है, भीतर उतनी ही थकी हुई होती है। दिसंबर की हल्की ठंड में शहर जल्दी जागता है। कुछ लोग काम के लिए, कुछ मजबूरी के लिए और कुछ सिर्फ इसलिए कि उनके पास रुकने का हक नहीं होता। एमजी रोड से थोड़ी दूर विजयनगर की ओर जाता हुआ वह बड़ा अस्पताल इसी शहर की धड़कन था। यहां हर दिन किसी की उम्मीद आती थी और किसी का सब कुछ टूट कर बाहर निकल जाता था।

अस्पताल के मुख्य गेट के ठीक सामने सड़क किनारे एक दूध का ठेला रोज लगता था। ना कोई बोर्ड, ना कोई नाम। बस एक साफ ढका कंटेनर, स्टील के गिलास और एक छोटी सी आग, जिस पर दूध गर्म होता रहता। ठेले के पीछे खड़ी लड़की को लोग दूध वाली कह कर बुलाते थे। कोई नाम नहीं पूछता था। जैसे नाम सिर्फ उन्हीं के लिए होते हो जिनके हाथ में पहचान होती है। उस लड़की का नाम अदिति था। उम्र करीब 27, चेहरा सामान्य लेकिन आंखों में एक ऐसी गंभीरता थी जो बहुत कुछ सह लेने के बाद आती है।

वह ज्यादा बोलती नहीं थी। उसकी आवाज में ना बनावट थी, ना किसी को खुश करने की कोशिश। वह बस अपना काम करती थी। साफ समय पर बिना किसी से कुछ मांगे, सुबह 7:00 बजे से पहले वह ठेला लगा देती। ठंड इतनी होती कि उंगलियां सुन पड़ जाएं। स्टील के गिलास पकड़ते समय दर्द उठे। लेकिन अदिति कभी शिकायत नहीं करती। उसे शिकायत करने की आदत बहुत पहले छूट गई थी। जब उसने समझ लिया था कि शिकायतें उन्हीं की सुनी जाती हैं जिनकी जिंदगी में किसी को फर्क पड़ता है।

अदिति का संघर्ष

सिक्योरिटी गार्ड अक्सर उसे डांट देता। “ठेला थोड़ा हटाकर लगाओ। रास्ता मत रोको।” अदिति हल्का सा सिर झुकाकर ठेला दो कदम पीछे कर देती। वह झगड़ा नहीं करती। इस शहर में झगड़ा करने के लिए भी आत्मविश्वास चाहिए। धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती। नर्सें, वार्ड बॉय, मरीजों के रिश्तेदार, कुछ मेडिकल स्टूडेंट सब जल्दी में। कई लोग दूध लेते वक्त उसकी तरफ देखते भी नहीं। जैसे सामने इंसान नहीं, बस एक हाथ हो।

अदिति हर बार पैसे उठाकर ठीक से रख देती। ना गुस्सा, ना प्रतिक्रिया। उसने खुद को भीतर से संभालना सीख लिया था। कभी-कभी कोई छोटा बच्चा जो अस्पताल में भर्ती अपने माता-पिता के साथ आया होता, ठेले के पास रुक जाता। “दीदी, थोड़ा और दे दो।” अदिति चुपचाप गिलास भर देती और पैसे लेने के बजाय उसकी हथेली में दो बिस्कुट रख देती। यह दया नहीं थी। यह उसकी आदत थी। शायद उसे याद रहता था कि भूख का अपमान कितना चुभता है।

8:30 बजे के आसपास कैंटीन खुलती थी। लेकिन सुबह की ड्यूटी वाले डॉक्टर और स्टाफ अक्सर कैंटीन तक जाने के बजाय अदिति के ठेले से दूध पी लेते। ठंड में गर्म दूध का एक गिलास कई बार इंसान को कुछ पल की राहत दे देता है। तभी अस्पताल के भीतर से सफेद कोटों का एक छोटा समूह बाहर आया। चाल में ठहराव, चेहरे पर थकान और आंखों में वह दूरी जो रोज मौत और जिंदगी के बीच खड़े रहने से आती है।

डॉक्टर समीर का परिचय

बाकी डॉक्टर बातें कर रहे थे। हंस रहे थे। लेकिन वह डॉक्टर चुप था। उसका नाम था डॉक्टर समीर माथुर। शहर में उसका नाम सम्मान से लिया जाता था। कार्डियोलॉजी में उसकी पहचान थी। स्टाफ उसे मानता था। मरीज उसके नाम को भगवान की तरह लेते थे। लेकिन समीर भीतर से उतना हल्का नहीं था जितना लोग समझते थे। उसके चेहरे की शांति किसी आदत की तरह थी। किसी टूटे हिस्से को ढकने की आदत।

समीर और उसके साथियों ने ठेले के पास आकर दूध लिया। एक जूनियर डॉक्टर बोला, “भैया, एक-एक कप। शुगर कम रखना।” अदिति ने बिना कुछ कहे दूध निकाला। गर्म किया और कप आगे बढ़ा दिया। वह जानती थी। लोग उसे लड़की देखकर भी दीदी नहीं कहते। समीर ने कप हाथ में लिया। भाप उठ रही थी। कप उठाते उठाते वो एक पल रुका। उसकी नजर अदिति के हाथों पर गई। मेहनत से खुरदरे उंगलियों पर हल्की दरारें। फिर उसकी नजर अदिति की आंखों पर गई। अदिति की आंखें पहले नीचे थीं। लेकिन कप बढ़ाते समय उसने नजर उठाई।

सीधी, स्थिर। ना मुस्कान, ना झुकाव। जैसे कह रही हो, “दूध चाहिए था ले लो, मेरी कमजोरी मत ढूंढो।” समीर को वो नजर अजीब नहीं, सच्ची लगी। अस्पताल में उसने कई तरह के चेहरे देखे थे। डर से झुके हुए, उम्मीद से लटके हुए, पैसों के लालच में मुस्कुराते हुए। लेकिन अदिति की आंखों में झुकाव नहीं था। थकान थी लेकिन गिड़गिड़ाहट नहीं। समीर ने एक घूंट लिया। दूध सादा था। साफ, बिना मिलावट।

उसके मुंह से अनजाने में निकल गया, “दूध बहुत साफ है।” अदिति ने बस कहा, “हां, यह बस एक सच था।” जूनियर डॉक्टर हंसा। “अरे सर, अब आप दूध की क्वालिटी भी चेक करने लगे?” सब हंस दिए। समीर हल्का सा मुस्कुराया लेकिन उसकी नजर अदिति पर ही टिकी रही। अदिति ने पैसे लिए, ना गिने, ना कुछ कहा। उसके लिए हर कप दूध, उस दिन की दवा, उस दिन की रोटी और उस दिन का किराया था। जाते-जाते समीर ने पूछा, “यहां रोज रहती हो?”

अदिति का उत्तर

“हां। कब से?” अदिति ने पल भर सोचा। “काफी समय से।” समीर समझ गया। कुछ जवाब पूरे नहीं दिए जाते। कुछ दर्द हर किसी को नहीं दिखाए जाते। वह वहां से चला गया। लेकिन उसके भीतर कुछ रुक गया था। अदिति की आंखों का एक स्थिर स्पर्श।

कुछ देर बाद गेट पर एक एंबुलेंस आई। अफरातफरी मच गई। अदिति ने ठेला पीछे किया। तभी एक वृद्ध औरत घबराकर वहीं बैठ गई। सांस तेज, आंखें डरी हुई। “बेटी, पानी।” अदिति ने बिना सोचे पानी दिया। कुर्सी बढ़ाई, उसकी पीठ पर हाथ रखा। वह कुछ नहीं बोली। बस साथ खड़ी रही। थोड़ी दूरी से समीर यह सब देख रहा था। उसे लगा यह लड़की सिर्फ दूध नहीं बेचती। यह बिना नाम के इंसानियत बांटती है।

समीर का आत्ममंथन

उसी रात अस्पताल के दूसरे हिस्से में समीर अपने कमरे में बैठा था। बाहर शहर जाग रहा था। लेकिन उसके भीतर खामोशी थी। उसकी आंखों में बार-बार वही दृश्य लौट रहा था। एक लड़की, एक ठेला और एक हाथ जो बिना सवाल किए किसी को सहारा दे रहा था। उसने खुद से पूछा, “हम डॉक्टर हैं, इलाज करते हैं। लेकिन क्या हम इंसान भी हैं?”

अगली सुबह इंदौर की हवा में हल्की धुंध थी। सूरज निकल चुका था। लेकिन उसकी रोशनी अभी पूरी तरह शहर पर नहीं उतरी थी। अस्पताल के गेट के सामने वही हलचल थी। एंबुलेंस की आवाज, गार्ड की सीटी, मरीजों के रिश्तेदारों की बेचैनी और उसी हलचल के बीच अदिति फिर से अपना दूध का ठेला सजा रही थी।

उसके लिए हर सुबह एक जैसी होती थी। फर्क सिर्फ इतना होता कि कभी पैसे पूरे पड़ जाते, कभी नहीं। आज भी उसने कंटेनर खोला, दूध छाना, गिलास लाइन से रखे। हाथों में ठंड चुभ रही थी। लेकिन चेहरे पर वही संयम था।

समीर की चिंता

वह जानती थी दिन शुरू होने से पहले अगर चेहरे पर थकान दिख गई तो पूरा दिन भारी हो जाएगा। अस्पताल के भीतर डॉक्टर समीर अपने केबिन में बैठा फाइलें देख रहा था। मरीजों के रिपोर्ट, ईसीजी, एंजियोग्राफी सब वही रोज का काम। लेकिन आज उसकी निगाहें बार-बार घड़ी पर चली जाती जैसे वह किसी समय का इंतजार कर रहा हो।

उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वो किसका इंतजार कर रहा है। कल का दृश्य बार-बार उसकी आंखों के सामने लौट रहा था। अदिति का वो शांत चेहरा, वो स्थिर नजर और वह स्पर्श जिससे उसने एक अनजान औरत की घबराहट को थाम लिया था।

अदिति का नया दिन

दोपहर के करीब समीर को ब्रेक मिला। बाकी डॉक्टर कैंटीन की तरफ गए। लेकिन वह अनजाने में अस्पताल के बाहर की ओर मुड़ गया। उसके कदम खुद ब खुद उसी ठेले की तरफ बढ़ गए। अदिति उस वक्त एक नर्स को दूध दे रही थी। नर्स ने मुस्कुराकर कहा, “दीदी, आज दूध ज्यादा अच्छा है।” अदिति ने हल्का सा सिर हिलाया।

समीर ठेले के पास आकर खड़ा हो गया। अदिति ने उसे देखा। पहचान लिया। उसने बिना पूछे एक गिलास निकाल लिया। लेकिन फिर रुक गई। उसने कप आगे नहीं बढ़ाया। पूछना पड़ेगा। उसने शांत स्वर में कहा, “आज भी दूध ही?” समीर को उसके इस सवाल में एक अलग तरह की बराबरी महसूस हुई।

उसने सिर हिलाया। “हां।” अदिति ने दूध डाला। गिलास आगे बढ़ाया। समीर ने पैसे निकालने चाहे। लेकिन अदिति ने हाथ उठाकर मना कर दिया। “कल के पैसे ज्यादा थे।” समीर ने उसकी तरफ देखा। गिने नहीं थे। आदत है। अदिति ने कहा।

अदिति की संवेदनशीलता

“नजर से अंदाजा लग जाता है।” समीर कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “तुम बहुत ध्यान से देखती हो।”

“ध्यान देना पड़ता है।” अदिति ने कहा, “नहीं तो लोग रौंद कर निकल जाते हैं।” उसके इस वाक्य में शिकायत नहीं थी। सिर्फ सच था। समीर ने महसूस किया कि अस्पताल के भीतर वो रोज जिन लोगों का इलाज करता है, उनमें से बहुत कम ऐसे हैं जो बाहर खड़ी इस लड़की को सच में देखते होंगे।

अदिति और समीर की बातचीत

उसी वक्त अस्पताल के अंदर से डॉक्टर अग्रवाल निकलते दिखे। अस्पताल के डायरेक्टर ने दूर से समीर को देखा और फिर अदिति के ठेले को। उनके चेहरे पर हल्की सी असहमति आ गई। वो पास आए।

“समीर,” उन्होंने कहा, “कैंटीन में बैठना चाहिए। बाहर यह सब।” वाक्य अधूरा रह गया। लेकिन मतलब पूरा था। समीर ने पहली बार महसूस किया कि यह अधूरा वाक्य कितना भारी होता है।

“यह सब,” समीर ने शांत स्वर में कहा, “सर, दूध अच्छा है।” डॉक्टर अग्रवाल ने कुछ नहीं कहा। बस एक नजर अदिति पर डाली। ऐसी नजर जिसमें इंसान कम और जगह ज्यादा देखी जाती है। फिर वे अंदर चले गए।

अदिति ने सिर झुका लिया। वह इस तरह की नजरों की आधी थी। लेकिन समीर के भीतर कुछ कस गया। उसे लगा जैसे किसी ने बिना शब्दों के उसे बता दिया हो। “तुम किसके साथ खड़े हो? यह मायने रखता है।”

अदिति का निर्णय

उस दिन के बाद समीर का बाहर आना रोज का हो गया। कभी सुबह, कभी दोपहर। बातें लंबी नहीं होती। लेकिन हर बातचीत में कुछ ऐसा होता जो दोनों के भीतर धीरे-धीरे जगह बना रहा था। अदिति कभी अपनी मां का जिक्र करती। कभी दूध के रेट का। समीर कभी मरीजों की थकान का, कभी शहर की बेरुखी का।

वे दोनों अपनी-अपनी जगह खड़े थे। लेकिन उनके बीच की दूरी कम हो रही थी। एक शाम जब ठंड कुछ ज्यादा थी। अदिति ने ठेला समेटना शुरू किया। समीर वहीं खड़ा था। उसने पूछा, “घर दूर है?”

“नहीं।” उस रात समीर देर तक सो नहीं पाया। उसे पहली बार लगा कि कोई है जिसे वह बिना किसी भूमिका के देख रहा है। ना डॉक्टर, ना मरीज, ना समाज का हिस्सा। बस दो इंसान।

अदिति और समीर की शादी

उस दिन इंदौर की सुबह कुछ अलग नहीं थी। वही हलचल, वही जल्दबाजी, वही आवाजें। अस्पताल के बाहर गाड़ियों की लाइन लगी थी। अंदर वार्डों में मशीनों की बीप गूंज रही थी। डॉक्टर फाइलें लिए तेजी से चल रहे थे। अदिति ने रोज की तरह ठेला लगाया। दूध छाना, कंटेनर ढका, कब जमाए?

उसके भीतर ना उत्साह था, ना डर। उसकी जिंदगी में खास दिन नहीं होते थे। हर दिन बस गुजरता था। आज मां की तबीयत थोड़ी बेहतर थी। यही उसकी राहत थी। उसने मन ही मन हिसाब लगाया। अगर आज बिक्री अच्छी रही तो दवा का पूरा कोर्स जाएगा। सुबह के पहले घंटे में भीड़ ज्यादा होती है। नर्सें जल्दी में, डॉक्टर हाथ में फाइलें लिए। मरीजों के रिश्तेदार नींद में डूबे। सब दूध लेते, पैसे देते और आगे बढ़ जाते।

अदिति सबको एक सी नजर से देखती। ना ऊपर, ना नीचे। उसने सीख लिया था कि अगर खुद को छोटा मान लिया तो दुनिया और छोटा कर देगी। करीब 9:30 बजे अस्पताल के अंदर एक मीटिंग खत्म हुई। सीनियर डॉक्टर बाहर निकले। सबसे आगे डॉक्टर अग्रवाल थे। उनके पीछे विभागाध्यक्ष और कुछ जूनियर डॉक्टर। बातचीत चल रही थी। नई मशीनें, नए प्रोजेक्ट, अस्पताल की इमेज। शब्द बड़े थे। आवाजें धीमी और उसी समूह में थोड़ी दूरी पर डॉक्टर समीर भी थे।

समीर की दुविधा

समीर आज अलग था। चेहरे पर वही शांति लेकिन भीतर बेचैनी। उसने रात ठीक से नींद नहीं ली थी। सुबह से ही एक बात उसके भीतर साफ थी। कुछ बातें अब भीतर नहीं रखी जा सकती। वे या तो कह दी जाती हैं या इंसान को भीतर से तोड़ देती हैं।

इंदौर की सुबह उस दिन कुछ ज्यादा ही खामोश थी। अस्पताल के बाहर वही चहल-पहल थी। लेकिन भीतर एक अजीब तनाव तैर रहा था। लोग कम बोल रहे थे। नजरें ज्यादा घूम रही थीं। सब जानते थे आज कुछ होने वाला है। अदिति ने ठेला लगाया। कप आज उसने थोड़ा और करीने से जमाए। दूध छानते वक्त हाथ रुके लेकिन कांपे नहीं।

अदिति की ताकत

उसने खुद से कहा, “जो होगा देखा जाएगा।” यह उसका सबसे पुराना सहारा था। समीर उस सुबह देर से आया। चेहरे पर वही शांति थी। लेकिन आंखों के नीचे थकान की रेखा साफ दिख रही थी। अस्पताल के बाहर कदम रखते ही उसकी नजर अदिति से मिली। दोनों ने कुछ नहीं कहा। बस हल्का सा सिर हिलाया जैसे एक दूसरे को याद दिला रहे हों कि वे अकेले नहीं हैं।

10:00 बजे कॉन्फ्रेंस हॉल का दरवाजा बंद हुआ। डॉक्टर अग्रवाल, बोर्ड के सदस्य और कुछ वरिष्ठ डॉक्टर अंदर थे। बाहर खड़े लोगों की सांसें जैसे थम गईं। डॉक्टर समीर अग्रवाल ने सीधे कहा, “आप जानते हैं कि आपका हालिया व्यवहार अस्पताल की प्रतिष्ठा के खिलाफ है।”

समीर ने शांत स्वर में कहा, “अगर प्रतिष्ठा इंसान से बड़ी है तो शायद कमरे में हलचल हुई।” यह अब निजी मामला नहीं रहा। एक सदस्य बोला, “आपने सार्वजनिक रूप से…”

अदिति का साहस

समीर ने कहा, “मैं अदिति से शादी करना चाहता हूं।” वाक्य छोटा था। लेकिन उसका असर बहुत बड़ा। कुछ सेकंड के लिए कोई कुछ नहीं बोला। जैसे एंबुलेंस की आवाजें, गाड़ियों का शोर, लोगों की बातचीत सब थम गई हो। कुछ नर्सें गिलास हाथ में लिए जमी रह गईं।

एक जूनियर डॉक्टर की हंसी अधूरी रह गई। अदिति को लगा जैसे किसी ने उसके कान ढक दिए हों। उसे अपनी सांसे सुनाई देने लगीं। उसने समीर की ओर देखा। उसकी आंखें स्थिर थीं। डरी हुई नहीं। जैसे वह इस वाक्य के लिए तैयार था।

समीर का फैसला

“क्या?” किसी ने फुसफुसाकर कहा। डॉक्टर अग्रवाल के चेहरे पर पहले हैरानी आई फिर सख्ती। उन्होंने अदिति की ओर देखा। ठेले के पीछे खड़ी लड़की, सादे कपड़े, हाथों में दूध की गंध।

“समीर,” उन्होंने कहा, “तुम समझ रहे हो तुम क्या कह रहे हो?” समीर बोला, “अगर यह अपराध है तो मैं अपराधी हूं।” डॉक्टर अग्रवाल ने कागज आगे बढ़ाया। “बोर्ड का निर्णय है। आप या तो अपनी बात से पीछे हटेंगे या नौकरी छोड़नी होगी।”

समीर ने बात पूरी कर दी। कमरे में सन्नाटा छा गया। “मैं पीछे नहीं हटूंगा,” उसने कहा। “अगर इसकी कीमत मेरी नौकरी है तो यही सही।”

अदिति की स्थिति

निर्णय लिख दिया गया। कोई बहस नहीं हुई। शायद इसलिए कि कुछ फैसले तर्क से नहीं, डर से लिए जाते हैं। उसी समय अस्पताल के गेट पर अदिति ठेला समेटने लगी। आज किसी ने दूध नहीं मांगा। लोग बस देखते रहे। कुछ नजरें सहानुभूति की थीं। कुछ तंज की। नर्स कविता पास आई और उसका हाथ थाम लिया।

“जो भी हो,” उसने कहा, “तुमने किसी को आईना दिखा दिया है।” अदिति हल्की सी मुस्कुराई। “आईने अक्सर तोड़ दिए जाते हैं।” तभी समीर बाहर आया। उसके हाथ में कोई फाईल नहीं थी। कोई पहचान तो नहीं। बस वह था एक इंसान।

एक नई शुरुआत

अदिति ने उसे देखा और समझ गई। “हो गया?” उसने पूछा। समीर ने सिर हिलाया। “हां, कीमत पूरी।” अदिति के भीतर कुछ बैठ गया। “मैं नहीं चाहती थी कि आप…”

“मैं चाहता था,” समीर ने कहा, “क्योंकि अगर आज नहीं करता तो कल खुद से नजर नहीं मिला पाता।” पास खड़े लोगों में फुसफुसाहट शुरू हो गई। “दूध वाली से मजाक कर रहा है, इतना बड़ा डॉक्टर और यह शब्द,” धीमे थे लेकिन अदिति के कानों तक साफ पहुंच रहे थे।

अदिति का साहस

अदिति ने पहली बार ठेले के पीछे से कदम बाहर रखा। वह समीर के बगल में आकर खड़ी हो गई। सीधी, शांत। “मेरे लिए नहीं,” उसने ऊंची आवाज में कहा ताकि सब सुन सके। “अपने लिए।” भीड़ अचानक चुप हो गई। अदिति ने कहा, “मैं दूध बेचती हूं क्योंकि मेरी मां बीमार है, क्योंकि मेरे पिता नहीं रहे और क्योंकि मुझे जिंदगी से लड़ना आता है।”

“अगर महंत शर्म है तो यह शर्म मेरी है। आपकी नहीं।” उसकी आवाज नहीं कांपी। आंखों में आंसू थे लेकिन वेग गिरे नहीं। समीर ने उसकी ओर देखा, गर्व और कृतज्ञता से।

वे दोनों वहां से चले गए। बिना शोर, बिना किसी जीत के ऐलान के, बस साथ चलते हुए।

अंत में

दिन बीते। खबर शहर में फैल गई। कुछ लोगों ने समीर की आलोचना की। कुछ ने चुपचाप सराहना की। एक छोटे से निजी क्लीनिक ने उसे काम दिया। कम नाम, कम पैसा लेकिन ज्यादा इंसानियत। समीर ने स्वीकार कर लिया।

अदिति ने ठेला नहीं छोड़ा। उसने मां की दवाइयां पूरी की। और एक शाम उसने कहा, “मैं तुमसे शादी करूंगी। लेकिन अपनी पहचान नहीं छोड़ूंगी।” समीर मुस्कुराया। “मैं चाहता भी यही हूं।”

शादी सादगी से हुई। ना बड़ा हॉल, ना भीड़। बस कुछ लोग, कुछ आशीर्वाद और बहुत सारा सुकून। आज भी अस्पताल के बाहर लोग दूध पीते हैं। अदिति कभी-कभी वहां रुकती है, देखती है, मुस्कुराती है और समीर आज भी दिलों का डॉक्टर है। बस अब मशीनों से ज्यादा इंसानों को सुनता है।

निष्कर्ष

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