देवर से बोली शादी के बाद वाला सीखोगे।

सम्बन्धों की उलझन और अधूरे सपने: एक पारिवारिक त्रासदी

अध्याय 1: श्रावस्ती की एक उदास शाम

उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के एक छोटे से गाँव की पगडंडियों पर जब सूरज ढलता था, तो गाँव की शांति में एक अजीब सी खामोशी छा जाती थी। इसी गाँव के एक पुराने मगर पक्के मकान में अभिषेक का परिवार रहता था। अभिषेक, जो शहर की आपाधापी में अपनी नौकरी के जरिए परिवार का पेट पाल रहा था, और उसका छोटा भाई विवेक, जो अभी जीवन की देहलीज पर कदम रख ही रहा था।

अभिषेक और मोनिका की शादी को तीन साल बीत चुके थे। शुरुआती साल उम्मीदों से भरे थे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, घर की दीवारों में एक सवाल गूंजने लगा—”संतान कब होगी?” गाँवों में किसी स्त्री के लिए ‘बाँझ’ शब्द का दंश किसी विषैले तीर से कम नहीं होता। मोनिका रोज़ आईने के सामने खड़ी होती और अपनी सूनी गोद को देखकर सिसकियाँ भरती। अभिषेक का प्यार उसे मिलता तो था, लेकिन वह केवल कुछ हफ्तों के लिए होता था। साल के बाकी महीने वह अकेलेपन की चादर ओढ़े काटती थी।

अभिषेक के माता-पिता की बूढ़ी आँखें हर आहट पर पोते की किलकारी ढूँढती थीं। वे अक्सर मोनिका से कहते, “बहू, हमारी उम्र हो चली है, जाने से पहले एक बार पोते का मुँह दिखा दे।” ये शब्द मोनिका के कलेजे को छलनी कर देते थे। उसे महसूस होने लगा था कि अभिषेक के साथ बिताए गए वे थोड़े से दिन उसे वह पूर्णता नहीं दे पा रहे थे, जिसकी उसे ज़रूरत थी।

अध्याय 2: वह कड़ाके की ठंड और एक नई दृष्टि

दिसंबर का महीना था। उत्तर भारत की कड़ाके की ठंड ने पूरे गाँव को अपनी आगोश में ले रखा था। सुबह के पाँच बज रहे थे और कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था। अभिषेक के पिता बाहर बरामदे में अपनी लाठी टेकते हुए ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे, “विवेक! ओ विवेक! उठ जा लल्ला, आज खेत में पानी लगाने की बारी हमारी है। जल्दी नहीं गया तो नहर का पानी आगे निकल जाएगा।”

विवेक अपनी खाट पर खर्राटे ले रहा था। रसोई में चाय बना रही मोनिका ने ससुर की बेचैनी देखी, तो वह विवेक को जगाने के लिए उसके कमरे की ओर बढ़ी। कमरे में अंधेरा था, बस एक खिड़की से छनकर आती हल्की सी सफेदी विवेक के चेहरे पर पड़ रही थी। मोनिका ने उसे आवाज़ दी, “बाबू, उठो। बाबूजी बाहर गुस्सा कर रहे हैं।”

पर विवेक नहीं हिला। मोनिका को लगा कि वह जानबूझकर सो रहा है। उसने झुँझलाकर एक ही झटके में विवेक के ऊपर से भारी कंबल खींच लिया। जैसे ही कंबल हटा, कमरे की उस मद्धम रोशनी में जो दृश्य मोनिका की आँखों के सामने आया, उसने उसके अस्तित्व को हिलाकर रख दिया।

विवेक केवल अपने अंतः/वस्त्रों (कच्छा और बनियान) में सोया हुआ था। 19 साल का वह युवक, जिसका शरीर श्रम और जवानी की दहलीज पर होने के कारण पुष्ट और सुगठित था। उसकी चौड़ी छाती और सुडौल भुजाएं देखकर मोनिका की साँसें थम गईं। उसके शरीर में एक अजीब सी ‘उ/त्ते/जना’ और श/क्ति का अहसास हो रहा था। मोनिका ने पहली बार अपने देवर को उस ‘म/र्दाना’ नज़रिए से देखा था। वह कई मिनटों तक सुध-बुध खोकर उसे देखती रही। उसके मन के किसी कोने में दबी हुई अतृप्त इच्छाएं अचानक जाग उठी थीं। उसने सोचा, “क्या अभिषेक कभी ऐसा था? क्या मेरे जीवन का सूनापन इसी श/क्ति से दूर हो सकता है?”

अध्याय 3: आकर्षण की मद्धम आंच

उस सुबह के बाद से मोनिका का संसार ही बदल गया। अब वह रसोई में काम करते समय भी विवेक की आहट का इंतज़ार करती। उसने विवेक का विशेष ख्याल रखना शुरू कर दिया। उसे समय पर नाश्ता देना, उसके कपड़ों को सलीके से तह करना और उसके कमरे की सफाई के बहाने घंटों वहां रुकना उसकी दिनचर्या बन गई।

विवेक, जो अपनी पढ़ाई और खेलकूद में मस्त रहता था, उसे शुरू में अपनी भाभी के इस बदलते मिज़ाज का अहसास नहीं हुआ। उसे लगा कि शायद भाभी उसे छोटे भाई की तरह प्यार करती हैं। लेकिन मोनिका का प्यार अब भाईचारे की सीमाओं को लांघ रहा था।

एक दोपहर की बात है, घर पर कोई नहीं था। ससुर पंचायत में गए थे और सासु माँ पड़ोस में किसी कार्यक्रम में थीं। विवेक स्कूल से लौटा और पसीने से तर-बतर होकर पंखे के नीचे बैठ गया। मोनिका ठंडा पानी लेकर आई और उसके करीब बैठ गई।

“विवेक, स्कूल में कोई लड़की पसंद है तुम्हें?” मोनिका ने शरारती अंदाज़ में पूछा। विवेक झेंप गया और बोला, “नहीं भाभी, मुझ जैसे देहाती को कौन पसंद करेगी? शहर की लड़कियाँ तो बड़े घरों के लड़कों को देखती हैं।” मोनिका ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा—वह स्पर्श हल्का था लेकिन बहुत कुछ कह गया। “तुम गलत सोचते हो विवेक। तुम जैसे गठीले और सीधे लड़कों पर तो कोई भी फिदा हो जाए। बस तुम्हें लड़कियों को रिझाना नहीं आता।”

मोनिका ने उसे ‘रिझाने’ के बहाने छूना शुरू किया। वह कभी उसके कंधे दबाती, तो कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरती। विवेक के भीतर भी जवानी की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। अपनी भाभी का वह रेशमी स्पर्श उसे एक अलग ही दुनिया में ले जाने लगा।

अध्याय 4: मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा का टूटना

दिन बीतते गए और दोनों के बीच का आकर्षण एक गहराते जाले की तरह उन्हें जकड़ने लगा। एक दोपहर, जब बाहर लू चल रही थी और गाँव सन्नाटे में डूबा था, विवेक अपने कमरे में शर्ट उतारकर लेटा था। मोनिका धीरे से अंदर आई और दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया।

विवेक घबराकर उठ बैठा, “भाभी, यह क्या?” मोनिका ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “विवेक, क्या तुम्हें डर लगता है? मैं भी अकेली हूँ और तुम भी। अभिषेक महीने में एक बार आते हैं, पर बाकी दिन मैं कैसे काटती हूँ, यह कोई नहीं जानता।” विवेक ने झिझकते हुए कहा, “पर भाभी, यह गलत है… भाई साहब…” मोनिका ने उसकी बात काट दी, “क्या गलत है? अगर दो प्यासे एक-दूसरे की प्यास बुझा लें, तो इसमें क्या पाप है?”

उस दिन, श्रावस्ती की उस तपती दोपहर में, मोनिका और विवेक के बीच ‘अ/वैध/शारी/रिक/सम्बन्धों’ की शुरुआत हुई। वह ‘गं/दा/खेल’ जो समाज की नज़रों में महापाप था, उनके लिए एक नशा बन गया। विवेक, जो पहले हिचकिचाता था, अब मोनिका की बाहों का आदी हो चुका था। जब भी घर खाली होता, दोनों मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघ देते।

अध्याय 5: खुशियों का मुखौटा और कड़वा सच

कुछ महीने बीत गए। मोनिका के शरीर में बदलाव आने लगे। उसे सुबह-सुबह जी मिचलाना और कमजोरी महसूस होने लगी। वह समझ गई कि वह माँ बनने वाली है। उसने यह राज़ विवेक को बताया। विवेक पहले तो डर गया, पर मोनिका ने उसे ढांढस बंधाया।

इत्तेफाक से अभिषेक भी उन्हीं दिनों गाँव आया। मोनिका ने बड़े ही शातिर अंदाज़ में उसे यह खुशखबरी सुनाई। पूरे घर में जैसे दिवाली का माहौल हो गया। अभिषेक ने मोनिका को गले लगा लिया, उसे लगा कि उसकी तीन साल की मन्नत पूरी हो गई है। ससुर ने मंदिर में प्रसाद चढ़ाया और सासु माँ ने मोहल्ले में मिठाइयाँ बाँटीं।

लेकिन विवेक और मोनिका का ‘स/म्ब/न्ध’ रुका नहीं। अभिषेक के जाने के बाद वे फिर से उसी राह पर चल पड़े। वे भूल गए थे कि पाप का घड़ा एक न एक दिन ज़रूर भरता है।

एक दिन, जब घर के बाकी सदस्य बाहर काम कर रहे थे, विवेक और मोनिका कमरे में ‘अं/तरं/ग’ अवस्था में थे। उन्हें लगा कि कोई नहीं आएगा, पर सासु माँ अपनी दवा भूल गई थीं और वह अचानक वापस आ गईं। जैसे ही उन्होंने कमरे का दरवाज़ा धक्का दिया, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उन्होंने अपनी बहू और अपने छोटे बेटे को उस ‘श/र्म/नाक’ हाल में देख लिया जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था।

“शर्म नहीं आई तुम्हें? अपने ही घर में आग लगा दी!” माँ की आवाज़ सुनकर दोनों के होश उड़ गए।

अध्याय 6: बिखरता परिवार और त्रासदी का अंत

घर में जैसे ज्वालामुखी फट पड़ा। सासु माँ ने मोनिका के चरित्र पर सवाल उठाए और विवेक को घर से निकालने की धमकी दी। मोनिका ने रोते हुए अपना बचाव किया और बताया कि यह बच्चा विवेक का ही है। यह सुनकर ससुर को दिल का दौरा पड़ते-पड़ते बचा। घर की इज़्ज़त मिट्टी में मिल चुकी थी।

समाज में बदनामी न हो, इसलिए मोनिका को उसके मायके भेज दिया गया। विवेक को शहर जाने के लिए मजबूर किया गया। लेकिन विवेक, जो अब पूरी तरह मोनिका के आकर्षण में बंध चुका था, वह चुपके से उसके मायके पहुँच जाता।

एक शाम, जब मोनिका आठ महीने की गर्भवती थी, वह विवेक से मिलने गाँव के बाहर एक एकांत खेत में गई। विवेक उस दिन बहुत उत्तेजित था। उसने मोनिका की शारीरिक स्थिति का ध्यान रखे बिना उसके साथ ‘ज़/बर/दस्ती’ करने की कोशिश की। मोनिका ने उसे रोकने का प्रयास किया, “विवेक, अभी नहीं, बच्चे को नुकसान होगा!”

पर विवेक नहीं माना। उस ‘ज/बर/दस्ती’ और ‘खीं/चाता/नी’ के कारण मोनिका को पेट में भयानक दर्द हुआ। वह ज़मीन पर गिर पड़ी और कराहने लगी। विवेक डर के मारे वहाँ से भाग गया। मोनिका किसी तरह घर पहुँची। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने बताया कि ‘गर्भ/पात’ हो गया है।

अभिषेक जब घर पहुँचा, तो उसे सारी सच्चाई का पता चला। उसका भाई और उसकी पत्नी—दोनों ने उसे धोखा दिया था। वह घंटों तक चुपचाप बैठा रहा। उसके पास दो रास्ते थे—या तो वह आत्महत्या कर ले या इस सच्चाई के साथ जिए। उसने मोनिका को देखा, जो पश्चाताप की आग में जल रही थी।

अंततः, अभिषेक ने मोनिका को स्वीकार तो कर लिया, क्योंकि गाँव के कायदे और अपनी कमियों को वह जानता था। लेकिन उनके घर की वह दीवारें अब कभी खुशियों की गूंज नहीं सुन पाएंगी। विवेक शहर भाग गया और कभी वापस नहीं लौटा। वह घर, जो कभी खुशियों का सपना देख रहा था, अब केवल एक टूटे हुए परिवार की गवाही दे रहा था।

निष्कर्ष: यह कहानी हमें याद दिलाती है कि अनैतिकता की नींव पर बना सुख हमेशा दुख में ही समाप्त होता है। मर्यादाओं का उल्लंघन न केवल रिश्तों को खत्म करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सपनों को भी निगल जाता है।