देश के सबसे बड़े आर्मी कैप्टन को पुलिस वालों ने बेरहमी से पीटा। फिर जो हुआ, उससे पूरी सरकार हिल गई..

न्याय का पथ: वर्दी का सम्मान और खाकी का अहंकार
अध्याय 1: माँ का आँचल और मिट्टी की पुकार
गाजियाबाद के कमाजपुर गाँव की मिट्टी में एक अलग ही महक थी। यहाँ के घरों में अगरबत्ती की खुशबू और खेतों की ताजी हवा सुकून देती थी। इसी गाँव का बेटा था विक्रम, जो अब भारतीय सेना में ‘कैप्टन विक्रम’ बन चुका था। विक्रम के लिए सेना सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि एक इबादत थी। उसकी माँ उसे ‘शेर’ कहती थी और विक्रम के लिए उसकी माँ का आशीर्वाद ही दुनिया का सबसे बड़ा कवच था।
कई महीनों बाद विक्रम छुट्टी पर घर आया था। जैसे ही उसने घर की दहलीज पर कदम रखा, उसकी नाक में वही पुरानी जानी-पहचानी खुशबू समा गई। माँ ने उसे देखते ही गले लगा लिया। “बेटा विक्रम, तू बाहर क्यों खड़ा है? अंदर आ ना। कब से तेरा रास्ता देख रही थी,” माँ की आँखों में ममता के आँसू थे।
विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ, मैं आ गया हूँ।” अंदर जाते ही माँ ने उसके लिए गरमा-गरम पराठे और नाश्ता तैयार किया। विक्रम ने पहला निवाला तोड़ते हुए कहा, “माँ, फौज का खाना बहुत बढ़िया होता है, बस तेरे प्यार का तड़का नहीं होता वहाँ।” माँ ने उसे दुलारते हुए कहा, “तू दुबला हो गया है, वहाँ ठीक से खाना नहीं मिलता क्या?” विक्रम ने हँसते हुए माँ को आश्वस्त किया।
अध्याय 2: कर्तव्य की पुकार और विदाई
नाश्ता अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि विक्रम के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘कमांडिंग ऑफिसर’ (CO) का नाम चमक रहा था। विक्रम ने तुरंत फोन उठाया, “जय हिंद सर!”
CO की आवाज में गंभीरता थी, “विक्रम, कहाँ हो तुम? इमरजेंसी है। तुम्हारी यूनिट को तुरंत मूव करने का ऑर्डर मिला है। क्या तुम अभी निकल सकते हो?”
विक्रम की रगों में दौड़ता फौजी खून उबाल मारने लगा। उसने बिना पल गंवाए कहा, “यस सर, अभी निकलता हूँ।” माँ ने उसे बीच में ही टोका, “बेटा अभी तो आया था, नाश्ता तो पूरा कर ले।”
विक्रम ने माँ का हाथ थामा और भावुक होकर कहा, “माँ, इमरजेंसी है। अगर मैं नहीं गया तो मेरे साथी खतरे में पड़ सकते हैं। तू तो शेरनी है और मैं तेरा शेर बेटा। मुझे जाने दे माँ, भारत माँ भी बुला रही है।” माँ ने कलेजा मजबूत किया और कहा, “जा बेटा, उन दुश्मनों को दिखा दे कि तू शेर का बच्चा है।”
अध्याय 3: सड़क पर खाकी का अहंकार
विक्रम अपनी मोटरसाइकिल लेकर यूनिट की ओर निकल पड़ा। रास्ते में गाजियाबाद के एक सुनसान मोड़ पर दरोगा गोपाल और उसका साथी कालिया नाका लगाए खड़े थे। दरोगा गोपाल का टशन ही अलग था, वह कानून की रक्षा कम और अवैध वसूली में ज्यादा यकीन रखता था।
कालिया ने दूर से विक्रम को आते देखा और कहा, “साहब, देखो आगे कोई फौजी आ रहा है। आज तो चांदी है अपनी।” दरोगा ने मूँछों पर ताव दिया और कहा, “बढ़ाओ गाड़ी, देखते हैं कितनी हिम्मत है इसकी।”
जैसे ही विक्रम पास पहुँचा, दरोगा ने उसे रुकने का इशारा किया। विक्रम ने रुककर सैल्यूट किया और कहा, “जय हिंद साहब, यूनिट से इमरजेंसी कॉल आया है, मुझे जल्दी जाना है।”
दरोगा गोपाल ने तिरस्कार से कहा, “अरे इमरजेंसी गई तेल लेने, पहले ये बता कि ये सड़क तेरे बाप की है क्या? हेलमेट कहाँ है तेरा?”
विक्रम ने विनम्रता से जवाब दिया, “साहब, मैं साइड में ही चल रहा हूँ और हेलमेट जल्दबाजी में घर रह गया।” लेकिन दरोगा को नियम नहीं, पैसा चाहिए था। उसने चिल्लाकर कहा, “साले आज बच के दिखा! जुबान लड़ाता है?”
अध्याय 4: अन्याय की हद और वीडियो का वायरल होना
दरोगा और उसके साथियों ने विक्रम को घेर लिया। उन्होंने जबरदस्ती मोटरसाइकिल की चाबी छीन ली। दरोगा ने अहंकार में कहा, “चल, तेरा 20,000 का चालान कटेगा। यहाँ हम राजा हैं।”
विक्रम ने विनती की, “साहब, चालान काटना है तो काटिए, मैं भरने को राजी हूँ, पर मुझे जाने दीजिए।” लेकिन पुलिस वालों ने उसे धक्का देना शुरू कर दिया। वे उसे आतंकवादी की तरह व्यवहार करने लगे। जब विक्रम ने विरोध किया, तो दरोगा ने उस पर आर्म्स एक्ट और सरकारी काम में बाधा डालने का झूठा केस ठोकने की धमकी दी।
“मारो इसे! वी विल शो यू द रियल पावर टुडे,” दरोगा ने आदेश दिया।
वहीं पास में खड़े एक युवक ने अपनी हिम्मत दिखाई और पूरी घटना का वीडियो अपने मोबाइल में कैद कर लिया। उसने सोचा, “अगर यह वीडियो वायरल हो गया तो इस फौजी भाई को इंसाफ मिल जाएगा।” उसने तुरंत वीडियो को इंस्टाग्राम पर अपलोड कर दिया। चंद मिनटों में वह वीडियो देशभर में आग की तरह फैल गया।
अध्याय 5: बटालियन का प्रस्थान
सेना के मुख्यालय में कैप्टन रोहन ने वह वीडियो देखा। उसका खून खौल उठा। उसने तुरंत अपने सीनियर ऑफिसर को सूचना दी, “सर, पुलिस वाले कैप्टन विक्रम को रास्ते में घेर कर मार रहे हैं। वीडियो वायरल हो चुका है।”
ऑफिसर ने आदेश दिया, “रोहन, यह समय सोचने का नहीं, ताकत दिखाने का है। अपनी बटालियनों को कहो कि तुरंत ट्रकों में तैनात हो जाएं।” सेना के ट्रक तेजी से उस स्थान की ओर बढ़े जहाँ विक्रम को अपमानित किया जा रहा था।
अध्याय 6: असली न्याय और वर्दी की ताकत
उधर नाके पर दरोगा और कालिया अभी भी विक्रम को परेशान कर रहे थे। वे आपस में हँस रहे थे, “शाम को सोल्जर के पैसों से पौआ पिएंगे।” तभी दूर से सेना के भारी-भरकम ट्रकों की आवाज सुनाई दी। दरोगा को लगा कोई और मुर्गा फँसने आ रहा है।
लेकिन जैसे ही ट्रक रुके और उनमें से हथियारों से लैस सेना के जवान उतरे, दरोगा के चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। कैप्टन रोहन ट्रक से उतरा और विक्रम के पास पहुँचा। “तुम ठीक हो विक्रम?” रोहन ने पूछा।
दरोगा ने अभी भी अकड़ दिखाने की कोशिश की, “तुम लोगों की हिम्मत कैसे हुई यहाँ ट्रक लाने की? किससे परमिशन ली?”
रोहन ने दरोगा के पास जाकर उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “इसे दिखाओ कि यहाँ असली बेताज बादशाह कौन है।” जवानों ने तुरंत उन भ्रष्ट पुलिस वालों को घेर लिया। जो पुलिस वाले कुछ देर पहले कानून की धौंस जमा रहे थे, अब वे घुटनों पर थे।
अध्याय 7: समाज का फैसला
कैप्टन विक्रम ने अपनी वर्दी झाड़ी और अपनी मोटरसाइकिल उठाई। उसने उन पुलिस वालों की ओर देखा जो अब गिड़गिड़ा रहे थे। विक्रम ने कुछ नहीं कहा, उसका संयम ही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
विक्रम ने वहाँ खड़े लोगों और वीडियो बनाने वाले युवक की ओर देखा। वह जानता था कि आज की जीत सिर्फ उसकी नहीं, बल्कि हर उस ईमानदार इंसान की थी जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है।
विक्रम ने अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की और सीमा की ओर बढ़ गया। जाते-जाते उसके मन में सिर्फ एक ही विचार था—देश की रक्षा सिर्फ सीमा पर नहीं, बल्कि देश के भीतर फैले भ्रष्टाचार से भी करनी है।
निष्कर्ष: यह कहानी हमें याद दिलाती है कि वर्दी चाहे खाकी हो या ओलिव ग्रीन, उसका असली मूल्य ‘सेवा’ में है, ‘सत्ता’ के दुरुपयोग में नहीं। न्याय का पथ कठिन हो सकता है, लेकिन सत्य की विजय निश्चित है।
समाप्त
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