दो औरतों ने नौकर के साथ किया कारनामा/पुलिस के भी होश उड़ गए/

वासना की वेदी पर बलि: एक विश्वासघाती षडयंत्र की महागाथा
उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक जिले मेरठ की सीमाओं के भीतर बसा ‘चखमोरना’ गाँव, जो आमतौर पर अपनी शांति और सादगी के लिए जाना जाता था, एक ऐसी भयावह घटना का केंद्र बनेगा, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। यह कहानी है मानवीय महत्वाकांक्षा, अनैतिक संबंधों और एक निर्दोष की जान लेने वाले उस क्रूर खेल की, जिसने समाज के चेहरे पर कालिख पोत दी।
रीटा देवी और उसका एकाकी जीवन
मेरठ के चखमोरना गाँव में रीटा देवी नाम की एक महिला रहती थी। वह गाँव में कपड़े की एक प्रतिष्ठित दुकान चलाती थी। रीटा का व्यक्तित्व प्रभावशाली था और उसकी वाकपटुता के कारण गाँव की लगभग सभी महिलाएँ उसकी दुकान से ही कपड़े खरीदना पसंद करती थीं। आर्थिक रूप से रीटा काफी संपन्न थी और उसकी दुकान से उसे अच्छी खासी आय होती थी।
रीटा के जीवन में अंधकार तब आया जब तीन साल पहले उसके पति का आकस्मिक निधन हो गया। पति की मृत्यु के बाद घर की पूरी ज़िम्मेदारी रीटा के कंधों पर आ गई। घर में उसके ससुर, वयोवृद्ध सुंदर सिंह और उसका मासूम बेटा आरव थे। हालाँकि रीटा के पास धन की कमी नहीं थी, लेकिन वह भीतर ही भीतर एक गहरे अकेलेपन और असंतोष से जूझ रही थी। पति की अनुपस्थिति ने उसके मन में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया था, जिसे वह अनैतिक रास्तों से भरने की कोशिश करने लगी।
राजन पर कुदृष्टि
रीटा के पड़ोस में राजन नाम का एक किशोर रहता था, जो अभी दसवीं कक्षा का छात्र था। राजन एक सरल और पढ़ाई में समर्पित लड़का था। रीटा अक्सर उसे स्कूल जाते हुए देखती थी और धीरे-धीरे उसके मन में उस किशोर के प्रति दुर्भावनाएँ पनपने लगीं। वह अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए राजन को अपने जाल में फंसाना चाहती थी।
एक दिन रीटा राजन की माँ शीला देवी के पास पहुँची। उसने बड़ी चतुराई से प्रस्ताव रखा, “शीला, मेरी दुकान पर काम बढ़ गया है और मुझे एक ईमानदार सहायक की ज़रूरत है। अगर तुम राजन को दोपहर के बाद कुछ घंटों के लिए मेरी दुकान पर भेज दो, तो मैं उसे पढ़ाई के साथ-साथ 4000 रुपये प्रति माह का वेतन भी दूँगी।”
गरीब शीला देवी को यह प्रस्ताव अपने बेटे के भविष्य और घर की आर्थिक स्थिति के लिए अच्छा लगा। उसने राजन को राजी कर लिया। अगले दिन से राजन स्कूल के बाद रीटा की दुकान पर जाने लगा। रीटा ने वहाँ उसे अपनी मीठी बातों में फंसाना शुरू किया। उसने राजन से कहा, “तुम यहाँ काम के साथ पढ़ाई भी करो, और अगर तुम्हें कुछ समझ न आए, तो रात को मेरे घर आ जाया करो, मैं तुम्हें पढ़ा दिया करूँगी।”
राजन ने यह बात अपनी माँ को बताई, लेकिन शीला देवी गाँव की महिला होने के नाते रीटा के चाल-चलन से थोड़ी वाकिफ थीं। उन्होंने राजन को चेतावनी दी, “बेटा, रीटा का चरित्र ठीक नहीं लगता, तुम उसके घर अकेले कभी मत जाना।” जब रीटा ने फोन कर राजन को रात में बुलाने की कोशिश की, तो शीला ने स्पष्ट मना कर दिया। राजन तो बच गया, लेकिन रीटा की भूख अभी शांत नहीं हुई थी।
चरण सिंह का आगमन: एक घातक मोड़
समय बीतता गया और 15 नवंबर 2025 की तारीख आई। रीटा के ससुर सुंदर सिंह अब बूढ़े हो चुके थे। एक दिन खेत में काम करते समय उन्हें चक्कर आ गया। उनके मित्र लक्ष्मण प्रसाद ने उन्हें सलाह दी, “सुंदर, अब तुम्हारी उम्र भाग-दौड़ की नहीं रही। तुम्हें खेती और घर के कामों के लिए एक मज़बूत नौकर रख लेना चाहिए।”
सुंदर सिंह को यह बात जँच गई। उन्होंने गाँव के ही एक युवक चरण सिंह से संपर्क किया। 26 वर्षीय चरण सिंह एक हट्टा-कट्टा और परिश्रमी नौजवान था। सुंदर सिंह ने उसे 16,000 रुपये मासिक वेतन पर अपने घर और खेतों के काम के लिए रख लिया।
जब चरण सिंह पहली बार काम के लिए घर पहुँचा, तो सुंदर सिंह किसी काम से बाहर गए हुए थे। रीटा ने दरवाज़ा खोला। चरण सिंह के बलिष्ठ शरीर और उसकी युवावस्था को देखकर रीटा की आँखें चमक उठीं। उसने मन ही मन सोचा कि यह युवक न केवल खेतों का काम करेगा, बल्कि उसकी उन दबी हुई इच्छाओं को भी पूरा करेगा जिन्हें वह अरसे से दबाए बैठी थी। उसने चरण को अंदर बुलाया और बेहद स्नेह से बात करने का ढोंग किया। चरण बेचारा अपनी मालकिन के इरादों से पूरी तरह अनजान था।
शोषण और धमकी का खेल
दिसंबर की शुरुआत में एक दिन सुंदर सिंह दो दिनों के लिए किसी काम से शहर से बाहर गए। रीटा के लिए यह एक सुनहरा अवसर था। उसने चरण सिंह को घर के काम के बहाने अंदर बुलाया। जैसे ही चरण अंदर आया, रीटा ने घर का मुख्य दरवाज़ा बंद कर दिया।
उसने चरण का हाथ पकड़ लिया और उस पर अनुचित दबाव बनाने लगी। चरण सहम गया। उसने विरोध करते हुए कहा, “मालकिन, आप मेरी माँ के समान हैं, यह आप क्या कह रही हैं? मैं यहाँ केवल काम करने आया हूँ।”
रीटा ने अपनी ममता का चोला उतार फेंका और धमकी पर उतर आई। उसने चिल्लाकर कहा, “अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं शोर मचा दूँगी और शोर सुनकर जब गाँव वाले आएँगे, तो मैं कहूँगी कि तुमने मेरे साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की है। सोच लो, गाँव वाले तुम्हारा क्या हाल करेंगे और फिर पुलिस तुम्हें कभी बाहर नहीं आने देगी।”
अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और जेल जाने के डर से चरण सिंह बुरी तरह डर गया। रीटा ने उसकी मजबूरी का फायदा उठाया और उसके साथ अनैतिक संबंध बनाए। उसने चरण को मजबूर कर दिया कि जब भी वह उसे बुलाए, उसे आना ही होगा। चरण एक ‘बंधुआ मज़दूर’ की तरह उसके शारीरिक और मानसिक शोषण का शिकार होने लगा।
षडयंत्र में दूसरी महिला: आरजू देवी
रीटा की एक सहेली थी, आरजू देवी। आरजू का पति विदेश में नौकरी करता था और वह भी रीटा की तरह ही असंतुष्ट और अकेलेपन की शिकार थी। 28 दिसंबर 2025 को आरजू रीटा की दुकान पर आई। बातों-बातों में रीटा ने अपने और अपने नौकर चरण सिंह के बीच के गुप्त संबंधों का खुलासा कर दिया।
आरजू देवी ने जब यह सुना, तो उसके मन में भी वासना की लहर दौड़ गई। उसने रीटा से कहा, “रीटा, मेरा जीवन भी नीरस है। क्या तुम अपने नौकर को मेरे पास भेज सकती हो?”
रीटा ने एक घिनौनी योजना बनाई। उसने कहा, “तुम्हारे घर में तुम्हारी सास है, वहाँ खतरा है। आज रात मेरा ससुर और बेटा गहरी नींद में सोएँगे, तुम मेरे घर आ जाना।”
वो खौफनाक रात और हत्या का मंजर
रात को रीटा ने अपने ससुर सुंदर सिंह और बेटे आरव के खाने में नींद की गोलियाँ मिला दीं। जैसे ही वे दोनों बेसुध होकर सो गए, रीटा ने आरजू को घर बुला लिया। फिर उसने चरण सिंह को फोन करके तुरंत घर आने का आदेश दिया।
जब चरण सिंह पहुँचा, तो उन दोनों महिलाओं ने उस पर अत्यधिक दबाव बनाना शुरू कर दिया। चरण पहले से ही मानसिक रूप से टूट चुका था। अपनी उत्तेजना और वासना की पूर्ति के लिए रीटा ने चरण को दूध में मिलाकर कुछ तीव्र शक्तिवर्धक औषधियाँ (Tablets) दे दीं। चरण ने मना किया, लेकिन उन महिलाओं ने ज़बरदस्ती उसे वह दूध पिला दिया।
दवाइयों के दुष्प्रभाव और अत्यधिक शारीरिक तनाव के कारण चरण की स्थिति बिगड़ने लगी। उसे चक्कर आने लगे और उसकी साँसें उखड़ने लगीं। दवा की अधिक मात्रा (Overdose) ने उसके हृदय पर गहरा असर किया। देखते ही देखते चरण का शरीर नीला पड़ने लगा और वह बिस्तर पर ही ढेर हो गया।
जब रीटा और आरजू ने देखा कि चरण हिल-डुल नहीं रहा है, तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने उसके हाथ-पैर हिलाए, लेकिन उसका शरीर ठंडा पड़ चुका था। चरण सिंह की मौत हो चुकी थी।
लाश को ठिकाने लगाने की क्रूर कोशिश
अब उन दोनों महिलाओं के सामने अपनी साख बचाने और अपराध को छिपाने की चुनौती थी। पकड़े जाने के डर से उन्होंने एक बेहद क्रूर निर्णय लिया। रीटा ने घर में रखा एक धारदार हथियार निकाला। उन दोनों ने मिलकर चरण सिंह की लाश के कई टुकड़े किए ताकि उसे आसानी से बोरियों में भरा जा सके। उन्होंने खून से सनी उन बोरियों को साइकिल पर लादा। उनका इरादा था कि रात के अंधेरे में गाँव के बाहरी इलाके में स्थित तालाब में इन टुकड़ों को फेंक दिया जाए।
सूरज कुमार: न्याय का दूत
तकरीबन रात के 2 बजे, जब वे दोनों साइकिल पर बोरियाँ लादकर तालाब की ओर बढ़ रही थीं, गाँव का एक किसान सूरज कुमार अपने खेतों की रखवाली करके लौट रहा था। उसने दो महिलाओं को इतनी रात में साइकिल पर भारी बोरियाँ ले जाते देखा तो उसे शक हुआ।
सूरज ने अपनी टॉर्च जलाकर पूछा, “रीटा भाभी, इतनी रात को आप लोग कहाँ जा रही हैं? इस बोरी में क्या है?”
रीटा और आरजू के चेहरे पीले पड़ गए। वे लड़खड़ाने लगीं। सूरज ने जब बोरियों के पास जाकर देखा, तो उनमें से खून की बूंदें रिस रही थीं। सूरज चिल्ला उठा, “हत्या! हत्या!”
शोर सुनकर आसपास के लोग जमा हो गए। जब बोरियाँ खोली गईं, तो चरण सिंह के क्षत-विक्षत अंगों को देखकर हर कोई दहल गया। तुरंत पुलिस को सूचना दी गई। मेरठ पुलिस मौके पर पहुँची और दोनों महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया।
पुलिसिया पूछताछ और कबूलनामा
थाने ले जाकर जब महिला दरोगा ने सख्ती से पूछताछ की, तो रीटा और आरजू ने अपना सारा जुर्म कबूल कर लिया। उन्होंने बताया कि कैसे अपनी वासना की पूर्ति के लिए उन्होंने एक निर्दोष युवक का शोषण किया और अंततः उसकी जान ले ली।
पुलिस ने दोनों के खिलाफ हत्या (धारा 302), सबूत मिटाने (धारा 201) और आपराधिक षडयंत्र (धारा 120B) के तहत मामला दर्ज किया। चरण सिंह के परिवार को जब इस बारे में पता चला, तो पूरे गाँव में मातम छा गया। एक मेहनती युवक केवल इसलिए मारा गया क्योंकि वह गलत लोगों के संपर्क में आ गया था।
उपसंहार और समाज को चेतावनी
यह घटना हमें सचेत करती है कि समाज में नैतिकता का पतन किस स्तर तक पहुँच गया है। विश्वास, साख और मर्यादा के पीछे छिपे हुए भेड़ियों से सावधान रहना आवश्यक है। यह कहानी किसी को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि एक सबक के रूप में लिखी गई है कि अपराध की जड़ें हमेशा विनाश की ओर ले जाती हैं।
आज रीटा और आरजू सलाखों के पीछे अपने कर्मों का फल भुगत रही हैं, लेकिन चरण सिंह का परिवार आज भी उस बेटे के लिए रो रहा है जो अब कभी वापस नहीं आएगा।
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